स्वाति सुरंगिनि श्यामा प्यारी
कभी स्वाति के कपोलों को थपथपाती उसपर अपने गाल सटाये वह बुदबुदाती-" हाय मेरी नाजुक छड़ी...चुद गई रे आज..."..." हाय-हाय कैसा कसकर चोदा है रे निरदयी ने...बिलकुल फाड़ डाला रे मेरी सांवली सखी की कोमल चूत को.."...." हाय मेरी छ्बीली...तूने तो चूत में तो कभी उंगली भी घुसने ना दी मेरी कली, आज इत्ता बड़ा लौड़ा कैसे निगला होगा मेरी बन्नो"...."हाय री स्वाती कैसा लगा रह होगा री तुझको भला आज की इस भयंकर चोदवाई मे."...."हाय-हाय,.. काश मै तेरी जगह चुदवा लेती री..तेरी चूत तो छितरा-छितरा डली रे आज इस जबरदस्त लौड़े ने"..."आह..आह मेरी सांवरी...काश चुदने से पहले मेरी चूत और तेरी चूत भी टकरा-टकरा कर गले मिल लेते मेरी सखी."... "हाय रानी,..अब तू उठ भर जा फिर मेरी चूत तेरी चूत को रगड़ेगी जरूर".. "मै तो तरस कर रह गई रे.."
सरोज वह सब कहती जाती और कभी अपनी शानदार छातियों को मेरी पीठ पर चिपका कर मसलती मुझसे कहती- " छोड़ दो..अब मेरी स्वाती को.. छोड़ दो मेरे राजा. उसकी नाजुक देह को छोड़ दो प्यारे. खूब मसल डाला रे मेरी नाजुक कली को...छोड़ दो ना अब छोड़ भी दो...जरा तो सोचो कि छोटी सी सूराख का तुम्हारे लंड ने क्या बुरा हाल कर दिया होगा.."
मैने स्वाति का कंधा अपने हाथों से कसकर दबा रखा था ताकि चुदाई की आखिरी चोटों से घबराकर वह कोई गड़बड़ न कर बैठे. प्यारी स्वाति की नाज़ुक टांगें मेरे कन्धे पर चढ़ी थीं. उसकी चूत की फांक खुल चली थी और रस से भीग रही थी फिर भी संकरी और टाइट थी. इस वक्त लौड़ा अच्छी दूरी तक पीछे जाता और फिर बाहर से पक्का निशाना साधकर स्वाति की चूत पर टूट्ता पूरी गहराई को माप रहा था.टक्कर ऐसी तूफानी चाल से हो रही थी कि चूत और लौड़े के साथ जांघों के अन्दरूनी पठार भी "चटाचट" और "छ्पाक-छपाक" की आवाज करते टकरा रहे थे. चूत की संकरी सुराख मे लंड के घुसते-निकलते "फ़ुक्क-फुक्क" की आवाज़ बनती और उसके साथ ही पठार टकराकर "चटाक-छपाक" करके चीखते थे.

उधर सरोज बड़बड़ा रही थी और अपनी "हाय-हाय" करती सखी को मुझसे अलग करने के चक्कर में थी और इधर उसकी ओर से बेखबार स्वाति और मै चुदवाते और चोदते हिमालय की चोटियों की तरफ बढ़ रहे थे.स्वाति और मेरी छातियों के बीच आड़ी होकर सरोज चित्त पड़ी थी. स्वाति की चूत "मार डाला रे" की धुन में चीखती हुई भी अपने को सिकोड़ती और फैलाती खूब मजे ले रही थी. स्वाति आहें भरती " चोदो राजा" ..."और जोर से आह".."फाड़ डालो आज मेरी चूत" कहती लौड़े के हर वार को लपक-लपक कर झेलती जा रही थी, लेकिन सरोज के चढ़ जाने से उसका चेहरा छिप गया था.मेरा झुका मुंह इसीलिये अब सरोज के चेहरे से चिपका होठों से भिड़ने लगा था. एक तरफ़ स्वाति की कड़क चूत थी तो दूसरी तरफ सरोज की गदराई छातियां और रसीले होठ थे. दोनों मिलकर मुझे दीवाना किये जा रहे थे.मेरे पांव का अंगूठा सरोज की खुली चूत से खेलने लगा था.
स्वाति बोल रही थी- "धीरे राजा...तुम्हारी चुदाई की जबरदस्त चोट से तो मेरी जान निकली जा रही है.."
"सह लो मेरी प्यारी छ्बीली.ऐसी प्यारी चोट के लिये फिर तुम तरस जाओगी और मै भी ऐसी प्यारी चूत कहं पाऊंगा"...."बस मेरी रानी,...मेरी प्यारी स्वाती...बस ये आखरी झटका" .."बस ये लो"...."लेती जाओ मेरी रानी.".."लो बस ये हो गया" कहता मेल ट्रेन की तेजी से"फकाफक...फकाफक" चोदता मैं उसे उस स्टेशन तक ले आया जहां बिजली की सनसनी से मेरा प्रचन्ड लौड़ा और स्वाति की रसीली चूत दोनों थरथराने लगे. दोनो के दोनो आपस में कसकर लिपटे हुए एक-एक कर बरसती फुहारों से नहा-नहा कर भीग गये. इन फुहारों के समय स्वाति और मैं आपस मे लिपटकर एक-देह और एक-प्राण हो गये थे. हम दोनों को पता नहीं चला कि हम उस वक्त कहां गुम हो गये थे.
बहुत देर तक हम तीनों आपस में चिपके हुए बेहोश पड़े रहे. जब अलग हुए तो सरोज स्वाति पर मेरे समने ही चढ़ बैठी और चूम-चूमकर उसे उसकी चुदाई की हिम्मत और स्टेमिना के लिये बधाई देने लगी.
सरोज ने मेरी तरफ नज़र फ़ेंकी और कहा कि "राजाजी, जाइयो मत अभी.अपना वादा याद करो. अब मेरी बारी है." स्वाति से वह बोली कि तुम बुरा मत मानन मेरी रानी. चुदवाने मे जितना मजा है उससे कम मजा इसके देखने में नहीं है.
स्वाति ने शर्त रखी कि प्यारे, इसका दिल मत तोड़ो, लेकिन आज दिन और रात अब आप को यहीं रहना है. मेरी चूत की प्यास आप ने भड़का दी है. चूत फट ही गई तो डर कैसा. देखूं कि दिन और रात चोदने और चुदवाने की टक्कर में बाजी कौन जीतता है.
इसी वक्त सरोज उठी और वहां पहुंची जहां मै अपने ट्राउज़र को पहनता खड़ा था. इससे पहले कि मै कुछ समझ पाता वह मेरे पांव के पास घुटनों के बल बैठ गई. झपटकर ट्राउज़र को एक ओर फेंका और अपनी मुट्ठी को मुट्ठी में घेर सरोज रानी ने मेरे लौड़े की मुन्डी को होठों के बीच निगल लिया.मेरा संकोच अब टूट गया.सरोज का चुस्त बदन, उसके रसभरे होठ, और नुकीली चूचियों वाले कोमल पहाड़ो से गुजरता हुआ मैं जल्द से जल्द उसकी गुलाबी चूत से खेलना चाहता था, जो मेरी टक्कर की थी.
स्वाति ने देखा. अंदर जाती-जाती वह बोली कि अभी शुरू मत करना तुम लोग. मै भी आ रही हूं. अकेले-अकेले नहीं,..तीनों मिलकर खेलेंगे तो मजा आएगा.
 


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