साली ने जमकर चुदवाया
नमिता मेरी पत्नी सुनीता की बहन यानी मेरी साली थी . सुनीता ने मेरे पास आ सकने के लिये पेन्टिंग सीखने का बहाना चुन रखाथा. जिद करके हपते में दो दिन अब नमिता भी उसके साथआने लगी थी. उस रोज़ भी मौज के साथ हम तीनों बैठे थे. दोपहर दो बजेका वक्त हो रहा था. सुनीता का मोबाइल बजा. वह नमितासे बोली-”सहेली का फ़ोन है शौपिंग करके अभी लौटती हूँ. चल चलते हैं”. नमिता बोली – “तू तो अपना काम करेगी.मैं यहीं बैठती हूं. इनसे पहले का छूटा पाठ समझ लेती हूं. तू हो कर आ.”सुनीता ने मेरी तरफ एक बार आंखेंगडा़ईं और चली गई.

सुनीता के पलटते हीनमिता मेरी तरफ देख्कर मुस्कुरा दी. बोली – “वो आप की तरफ आंखें गडाक़रक्यों देख रही थी ?”मैनें कहा कि तुम बताऒ. नमिता बोली कियह तो आप को भी मालूम है. मैने हंसकर कहा कि सुनीता सोच रहीथी कि कहीं उसके जाने के बाद हमदोनों मौके का फायदा न उठा लें. नमिता नेकहा कि मैने तो उसी रोज आप को देख लिया था, जब आप सुनीता के यहां थे और मैअनजाने में घुस आई थी. वह टाल रही थी लेकिन अन्दर कमरे के आइने नेमेरी आंखों को बता दिया कि आप अंदर बिस्तर को खूब हिलाकर लेटे हुए हैं. “अच्छा हुआ जो तुमने देख लिया था.मेरी तो उसी वक्त इच्छा हुई थी कि तुम्हें बांहों मे भरकर घसीट लूंऔर ….” ” और ?” नमिता बोली.”जमकर लिपटाऊं और पटककर ..” मेरा सन्कोच देख कर नमिता बोली -”बोलो ना प्लीस. यहां कौन है. बहुत शर्माते हो”

सामने नमिता का छोटा सा प्याराचौकोर चेहरा प्यार की चढ़्ती गर्मी से लाल हुआ पड़ रहा था. उसकीशरारत मुझको चिढ़ाती हुई खिझा रहीथी. नमिता को बिना आगे मौका दिये “अपनीप्यारी नमिता को चोद डालूं” कहतासोफे पर ही उसपर पिल पडा़. मैने उसकी पतलीकमर को बांहों में लपेटते हुये उसकीगोल-गोल छातियों को जकड़कर अपनीछाती में समेत लिया था. मेरे ओठ नमिताके बारीक गुलाबी होठों की फांक परटूट पडे़ थे. कभी मेरे और कभी उसके ओठआपस में होड़ लगते एक दूसरे को निगलरहे थे. भारी-भारी सांसों दे साथनमिता की कोमल छातियां मेरी कठोर छाती परमचल रही थीं. नमिता अपने को संभाल नहीं पा रही थी और उसकी”आह..आह” कीदबी-दबी आवाज मुझको आगे बढ़कर दोनों बदनों की प्यास बुझानेउत्तेजित किये जा रही थी. सोफे मेंबदन समाये नही पड़ रहे थे और मैं बेकाबू हुआ जा रहाथा. नमिता की नाजुक कमर को झटके से अपनी तरफ खींचते हुए छातियों कोकसकर जकड़े हुये और बगैर अलग कियेबार-बार पूरी आवाज के साथ बेतहाशाचूमता हुआ मैने दोनों के चिपकेबदनों को दीवार से सटाया. दीवार से चिपककर अबखड़े-खड़े नमिता और मेरा बदन खूब अकड़ते एक-दूसरे को दबाते ऎंठे जा रहे थे.नमिता और मै इस प्रकार गुंथे पड़ रहेथे जैसे दो डोरियां बार-बार लिपटती हुईंएक-दूसरे को बुन रही हों. हम दोनों परमदहोशी की तारी छाई जा रही थी. मेरा एक हाथनमिता की साड़ी को ऊपर सरकाता उंगलियों से उस जगह को कुरेद रहा थाजहां उसकी छोटी सुनीता जीभ लपलपाती लार तपका रही थी और नमिता उसी तरहअपना एक हाथ नीचे करके छोटी सुनीता के चहेते राजा को मुठ्ठी में थामप्यार से खींच-खींचकर शिकायत कर रहीथी कि बहुत दिनों में तुमको पाया है.क्यों इतना तड़पाया है तुमने मुझको.
” सहा नहीं जा रहा है. अब मुझकोथामकर बिस्तर पर ले चलो प्लीज़.” नमिता उसी प्वाइंट पर आ गई थी जहांमेरा दिल भी पहुंचा हुआ था. मेरा एक हाथ उसके घुटनों पर पहुंचा औरदूसरा हाथ उसकी पीठ पर. प्यारी नमिताके खूबसूरत कोमल बदन को बाहों मेंथामे मैं बिस्तर की ओर चला. बाहोंमें थमे हुए गुलाई में ढला नमिता का बदन मुझसेचिपक चला था. नमिता की आंखों की पुतलियां एकटक मेरी आंखों में डूबीमुझे निहार रही थीं और उसके मादकरसीले होठ बिला-संकोच आवाज करते मेरेहोठों को लगतार चूमे जा रहे थे.

नमिता उस वक्त मुझे अत्यंतखूबसूरत और प्यारी लग रही थी. “ये पल फिर न जाने हासिल हों” -मैने सोचा कि उसके एक-एक अंग को मै आज जी भरकर निहार लूं. उसकी छरहरीदेह जैसे बड़ी फुरसत में गढ़ी गई नक्काशी की प्रतिमा थी. सिर से पैरतक बदन का हर अंग मन को मोह लेने वाले इतने खूबसूरत कटाओं से भरा थाकि प्यारी नमिता की समूची देहयष्टिमें हिमालय की कंदराओं से अपनी उछ्लतीतरंगों के साथ चट्टानों के बीच सेआड़ी-तिरछी दौड़ती निर्मल, चंचल उसमानभरी सरिता की सुन्दर छबि दिखाईपड़ती थी जिसका स्निग्ध, शीतल, पारदर्शी जलचाहे जितना-जितना पिया जाता रहे, वह मन में और-और पीते जाने की तृष्णाजगाता उसे सदैव अतृप्त्ता में अधीरबनाये रखता है.

नमिता का समूचा बदन मेरे सामनेसंगमरमर की खूबसूरत नक्काशीदार ऐसी दूधिया मूरत की मानिन्द बिछीथी जिसे गुलाबी रंग में नहलाया गयाहो. चित्त लेटी हुई नमिता के बदन पर मैंपेट के बल पूरी लंबाई में सवार होचला था. उसके पैरों की उंगलियों से लेकरउसके खूबसूरत चेहरे तक मेरा हर अंगनमिता रानी के अंगों से चिपका था. उसके हाथों कीअंगुलियों में मैने अपनी उंगलियांफंसाते हुए सिर के पार फैलाकर पूरी लंबई मेचिपक लिया था.उसका छोटा सा कोमल मुख बड़ा प्यारा लग रहा था जिसपरपतली नाक के नीचे बारीक लाल होठोंकी नाजुक फांक सजी थी. मेरे होठों उनहोठों पर बेताबी से खेल रहे थे. हमदोनों में एक दूसरे के होठों को निगल जने कीहोड़ लगी थी.नमिता की खू्बसूरतसुराहीदार गरदन को अपने गले से रगड़ता और जीभ सेचाटता हुआ मैंने अपनी हथेलियों से उसके कन्धों को दबाया. अब म्रेरीनिगाह नमिता रानी के उन कोमल उभारदारसंगमरमरी स्तनों पर पहुंची, जिनपरगुलाबी बेरियां सजी थीं. उन्हे अपनेगालों से खिलाता बारी-बारी से होठों मेंदबाता मै चूसता हुआ हौले से यूं चबाजाता था कि नमिता रानी की सुरीली सिसकियां निकलआती थीं.
” हाय, धीरे..” वह कहती औरशरारत में उन्हे मेरे दांत और जोर से काट जाते थे. मेरेहाथ उस प्यारी के स्तनों को कसकरथामे पहाडी़ के तले से उसकी चोटी तकमालिश किये जा रहे थे. नमिता रानी के बदन का खूबसूरत पहाडी़ दरिया हौले-हौलेकांपता लहरें लेने लगा था. उसकीनाजुक गुलाबी एड़ियां मुझको नीचे उतरने कान्यौता दे रही थीं. गालों और होठोंको मैने धीरे-धीरे नीचे उतारता हुआ मैं नदीकी उस संकरी घाटी में पहुंच चला था जो मेरी सुनीता की बाईस इन्ची कमर थी.नमिता रानी के पुठ्ठों को दबाकरघेरते हाथों के पन्जों ने उसकी क्षीण कटि को खूब कसकर जकड़ रखे था और नाभि केदायें-बायें मचलते गालों के बीच मेरे ओठ‘पुच्च-पुच्च..’ की ध्वनि केयौनत्तेजक स्वरों के साथ नाभि में डूब-डूब कर नहा रहे थे.काया की नदी में तरंगेअ उठीं. नमिता की बाहों ने मेरी गरदन को घेरते मेरेमाथे, मेरे गालों और फिर लबों कोताबड़-तोड़ ठीक वैसी ही आतुरता से चूम डाला.उसके कांपते हुए लबों का बेताबसंगीत मेरे कानों में मिठास घोलता गुनगुना रहाथा – ‘ आह, मेरे प्यारे प्रियहरि,…आह,तुम मुझे पागल किये जा रहे हो… मैं तुम्हारी दीवानी हो गयीहूं ….अब मुझसे रहा नहीं जा रहाहै…मैं भीगी जा रही हूं. नमिता की सांसेंभारी हो रही थीं और उखडे़-उखडे़स्वरों में वह मेरे कानों में बुदबुदाए जा रही थी-
‘ हाय मेरी किस्मत ….तूने मेरेमन के राजा से मिलाया भी तो कितने छोटे लम्हे के लिये…वो आतीहोगी …मेरे राजा..आज इस मौके को मै अधूरा नही छोड़ना चाहती.’
नमिता ने उठकर अपनी बाहों मेंभींचते हुए अपनी छाती में कसकर मुझेजकड़ लिया. धक्का देती मुझे धकेलकरउसने मुझे चित्त कर दिया था. उसकी फुर्ती की मन ही मन तारीफ करता हुआमैने कहा- ‘ मेरी प्यारी जंगली बिल्ली. मौकाभले आज मिला है लेकिन ख्वाबों में तो तुम्हारी झाडी़ में उसलम्हे में ही घुस पडा़ था, जब पहलीबार तुमसे मेरी आंखें टकराई थीं.’ ‘हां, मुझे भी वह लम्हा हमेशायाद रहेगा.’

इस बीच मेरी प्यारी सुन्दरी नमिताके हाथ मेरे तन्नाए हथियार को उसकीमूठ से उस चमकते तिकोने गोल सिरे तकखींच रहे थे जो अपनी लाली में लार टपकाता मचल रहा था. नमिता बार-बारहोठों से उसे चूमती नीचे से ऊपर तक जुबान फिराती प्यार से चाटे जा रहीथी. इधर मेरी अंगुलियां अपनी सुनीताकी बेदाग, चिकनी, पतली और सुडौल टांगोंपर फिसलतीं नरम और ताजगी से चुस्त जंघाओं के बीच घुंघराली झाड़ियोंमें उस बारीक फांक को टोह रही थीं,जहां अपने आप को बडे़ जतन से घूंघट में छिपायेसुनीता नमिता की लाल लचीली कोमल कली लजाती उस राजकुमार का इन्तिज़ार कररही थी जो इस वक्त उसकी मालकिन की हथेलियों पर खेलता बार-बार दुलारसे चूमा जा रहा था. मैने पास ही रखेजैम में अपनी उंगलियां डालते सुनीता की आंखोंमें झांका.

‘ ज़रा फिरा दूं. मिठास आ जाएगी?’ आंखों में आंखें डुबोती वह धीरे सेबोली-‘वह स्वाद तो जुबान पर यूं हीचढा़ रहता है. मुझे यही बहुत प्यारा है,जो ताजिन्दगी मुझमें बसा रहेगा.’ आंखों के जादू ने फौरन यूं असरकिया कि नमिता और मेरी छातियों ने कसकर भिड़ते हुएएक-दूसरे को बांध लिया. हम दोनों गालसटाए इक-दूजे के गले से लिपटे थे. नमिता मेरेकानों में बुदबुदा रही थी -‘ मैनेपहली बार में ही आप को अपने अंदर प्रवेश करतादेख लिया था.सुनीता भी साथ हुआ करती थी, मगरन जाने कैसे मेरी और आप की नज़रें दूरसे ही एक दूसरे से टकराती यूं भिड़जाती थीं कि फिर किसी और के साथ होनेका अह्सास ही न होता था.’

‘ हां, तब मै भी न जाने कहां खोजाता था. मुझे यूं लगता जैसे पास आते-आते स-शरीर मेरे अन्दर समागई हो.’ ‘ आह, प्यार का यह कैसा अजीब संयोगथा. और तब क्या होता था जानते हो ? दिन और रात हर घडी़ नज़रों सेगुजरता वह नज़ारा झरने की तरह वहां पहुंचकर बेचैन गुदगुदी से यूं भरदेता कि उसके साथ मेरी समूची देह रिसने लगती थी.’ सुनीता नमिता की आवाज़ जैसे किसीस्वप्नलोक से आ रही थी. उसका कहना जारी था-‘एक रात तो मैं सपनों मेंयूं मचलती रही कि आंख खुलने पर अपनेको रिस-रिसकर सचमुच रात के रस में बहतापाया’ ‘ कहीं यह दो दिन पहले की बात तोनहीं जब मैने तुम्हें रेशमी हरी कुर्ती और वैसी ही चमकती सफेदसलवार में देखा था?’
‘ हां, उसी सुबह जब आप को मैने भीहल्की हरी धारियों वाले वासंती केसरिया फूलों के रंग में पाया था.उस रोज किसी एक ने मजा़क में जब यहकहा कि आज तो सुबह-सुबह केसरिया और हरेके साथ पार्क में वसन्त उतर आया है री. लगता है कि जैसे पहले से आज कामुहूर्त तय करके आए हैं. उसे सुनकर सभी खिलखिलाकर हंस पडी़ थीं. केवलदीदी सुनीता ने प्रश्नित करतीउदास आंखों से मेरे चेहरे को देखा था.’

मैने नमिता की चिबुक थामकर उसकेचेहरे को प्यार से निहारा और उसे फिर गले से लिपटाता अपनी छाती सेचिपका लिया. अपने होठ प्रिया के कानसे सटा उसकी कोमल फुनगी को नरमी सेचबाते मैने प्यार में सनी आहिस्ताआवाज़ में कहा-‘उस रात मेरी भी हालत वैसीही थी. सुबह की तुम्हारी खूबसूरतछबि को आंखों में बसाये मैं भी तुम्हारीयादों में सारी रात ठीक तुम्हारीतरह भीगता और रिसता रहा था.’

इस तरह प्यार में लिपटी जातीदेह और आनन्द की तरंगों पर मचलते दिलों को पूरा भरोसा हो चलाथा कि हम एक-दूसरे के लिये ही बनेहैं. बातों को विराम देते नमिता और मैंचुप्पी में अचानक गंभीर हो चले थे. बातों-बातों में नमिता और मैं इतनेनजदीक आ चले थे कि अब किसी भूमिका कीज़रूरत नहीं रह गई थी. जैसे तूफान आनेसे पहले हवा थम जाती है, वैसे ही अब जो होने जा रहा था उसका मूड हमपर छाचला था. हम दोनों के चेहरे लाल हो गये थे और एक-दूसरे को निगल जाने केलिये नसों में दौड़ता खून खलबली मचारहा था. मुझे कुछ देर पहले कही नमिता कीबात याद आई. मैने अपनी उंगलियों से उसकी चिबुक थामकर आखोंमें आंखें डाल उसकी सूरत को प्यारसे निहारते हुए शरारत से छेडा़ -’तुमने अभी-अभी कहा था कि मेरी देह कानज़ारा झरने की तरह तुम्हारे वहां कहींपहुंचकर बेचैन गुदगुदी से यूं भरदेता कि उसके साथ तुम्हरी समूची देह रिसने लगतीथी.मुझे बताओ न कि वहां का मतलब कहां ?’ नमिता शरमा गई. उसकी आंखें चमककरबिजली की तरह मेरी आंखों पर झपटीं. मेरे गाल पर हल्की सी चपतपडी़ -’ शरारत…?’ छाती से चिपकती निगाहें नीची किये रबर के गुड्डेको बारीक फांक के मुहाने पर टिकातीवह बोली-’ यहां.’
न जाने अचानक भावना का वह कैसाज्वार मुझसे लिपटी नमिता की देहलता में उमड़ आया था कि अपनेस्तनों पर मुझे भींचती और मेरेकन्धे पर सिर गडा़ए नमिता सिसकियां ले रही थी.उसके लिये मेरा भी प्यार ज्वार बनकरमुझपर छा चला. यह सम्पूर्ण मिलन कीबेला थी. अब देर करने का कोई काम न था. नमिता को मैने धीरे से अलग किया.अपनी उंगलियों से उसके सुन्दरमुखडे़ की चिबुक थाम मैने उसकी आंखों कोबारी-बारी से चूमा. नमिता के आंसुओंके सारे मोती मेरे अधरों ने सोख लिये.नमिता के दोनों गालों को अपनीहथेलियों के बीच मैने कसकर समेटा और नमिता केनाजुक अधरों से मेरे होठ टूटकर भिड़चले. तेज होती सांसों के तूफ़ान केबीच लताओं की तरह गुंथी पड़ती हमारीकायाएं बिस्तर पर बिछ्ती चली गईथीं. मेरे हाथों की हथेलियां नमिताके फैल चले हाथों की हथेलियों पर अपनीउंगलियों में उसकी उंगलियों कोजकड़कर दबाये थीं. नमिता की गुब्बारे की तरह फूलती छातियां मेरी छाती की जकड़न मेंबन्धीं उठती-बैठतीं मचल रही थीं. एड़ियों, घुटनोंसे जंघाओं तक हम दोनों की टांगेंएक-दूसरे पर काबू पाने होड़ ले रही थीं.झाड़ियों में छिपी राजकुमारी केबारीक होठों को बेचैनी मे लहराते मेरे राजकुमार नेझटके से ठेल किले में जैसे हीप्रवेश किया वैसे ही मेरी प्यारी नमिता रानी की बेहोशहोती पलकों ने आह भरी सिसकी ली. उसकीवह मीठी आह उस गुठली के स्वाद की थीजो उसके होठों के बीच अटक गई थी.

’ हाय..,बहुत मोटा लग रहा है. ये तोदरवाजे पर ही एकदम टाइट हो गया है..मै कैसे संभालपाउंगी..बहुत डर लग रहा है. धीरे-धीरेकरना प्लीज़.’ -नमिता बोली. ’ तुम देखो तो.., एक बार घुस जानेदो फिर कुछ नहीं होगा. लो संभालो..’- कहकर मैने जैसे हीअपने हथियार को उसकी चूत में ठेलातो वह उठती हुई चीख पडी़ – ’ हाय-हाय..मेरीचूत फट गई.’ उसने अपनी मुठ्ठी में लौडे़ को कसकर जकड़ लिया और गुस्सेमें चिल्लाई – ’नइ ना प्लीज़. निकाल लो इसको. मैने कहा ना कि मेरी चूत फटरही है.’ आधे धंसे लौडे़ को आंख फाडे़ वहदेख रही थी. वह उसकी हथेली के घेरे में नहीं समा रहा था. नमिता कीआंखों से लालच की लार टपक रही थी मगरजुबान कह रही थी-’ हा..य ! कहां मेरीपतली सी नाजुक चूत और कहां तुम्हाराइत्ता मोटा लौडा़ ! मैं घुसानेनहीं दूंगी. इसे निकालो न प्लीज़..’उसका हाथ हटाते हुए मैने कहा – ’अच्छा बाबा.., लो.’

मुसंबी जैसे स्तनों को कसकर झिन्झोड़ते हुए मैने नमिता को बिस्तर पर दबाया और बाहरनिकालने की बजाय अपने लौडे़ को नमिताकी चूत में बेरहम झटके से पूरा कापूरा यूं ठेला कि उसकी कमर, नितंब औरजांघें चमककर उछल पड़ीं. ’ मेरी प्यारी, जिसके लिये तुमडर रही थीं वो हो गया.’

नमिता की चूतकुमारी का मूडवैसे तो पहले से ही पिघलता हुआ लार टपका रहा था लेकिनआहिस्ता-आहिस्ता और नजाकात के साथचोदते हुए मैने और पिघलाना शुरू किया.इतना कि वह खुद मूड में आ गई थी. वहबोली – ’ हाय.., तुमने मुझे आखिर वश में कर ही लिया….मेरे राजा, अब चोद डालो जितनाचोदना हो. मैं भी चाहती हूं कि आज जी भर कर चुदवाऊं और तुमको पाने कीतमन्ना पूरी कर लूं.’
इसी वक्तसुनीता की रिन्ग आई. उसका संदेशा आया कि बीस-पच्चीसमिनट में पहुंच रही हूं. नमिता नेसुना तो, लेकिन इस वक्त वह दूसरी दुनिया मेंथी.मुझसे बोली कि राजा अब मैं पीछेनहीं हतने वाली. आए तो अभी आ जाये.आज मैं जी भर चुदवा कर ही हटूंगी.तुम्हे कसम है मेरी. तुम उसके सामनेही मुझे उठा-उठाकर, पटक-पटककर, रगड़-रगड़करचोदना. मौज में तन्ना-तन्नाकर ऐंठते,फूल-फूलकर लगातार मुटाते, और हर कदम के साथ लंबाते जा रहेप्यारे गुब्बारे के हर झटके को सुन्दरी नमिता की आह भरी सिसकारी आनंद केस्वर्गिक संगीत में बदल रही थी.कहीं कोई रुकावट न आए इसलिये ऊपर से किन्चितनीचे खिसक अपना सिर मैने नमिता की संगमरमरी छातियों पर ला टिकाया था.इधर कटिभाग से नीचे मैने अपनी देहको नमिता की देह के साथ यूं अवस्थितकिया था कि बिना किसी अतिरिक्त आसनके मेरा लंब बिछौने पर ठीक समान सतह परआगे-पीछे होता उसकी गुलाबी फांक को चपाचप पूरी लंबाई का मज़ा पहुंचाताहुआ ठोंक सके. स्पीड बढ़ती गई और उसकेसाथ झाग में भीगते चूत और लौडे़ कीहर टक्कर जोर-जोर से फक्क-फक्क, चप्प-चप्प का शोर मचाती तेज़ होतीगई. नमिता तरन्नुम में थी. सारासंकोच हवा में उड़ चुका था.खुशी में वह उछ्ली पड़ रही थी -’आह, कितना मजा आ रहा है. मेरे राजा तुम कितने अच्छे हो. ..चोदोराजा..चोदे जाओ…आह..तुम तो मुझेस्वर्ग में ले आये हो.’

’ लो मेरी रानी..लेती जाओ..येलो..और जोर से…लो…ये संभालो..’ कहता मैं भीनमिता की प्यास मिटा रहा था.’
दीवानगी अब काबू से बाहर होरही थी. मैने नमिता की टांगें उठाकर अपने कन्धे पर सम्भालली और सामने कीचड़ से सनी चूत पर एक-एक फीट की दूरी बना दनादन यूंचोट देनी शुरू की कि नमिता की चूत औरमेरे लौडे़ के साथ हम दोनों कीजांघें और टांगें भी चटाचट-चटाचट, छ्पाछपकी चीख के साथ हाहाकार मचाने लगीं. नमिता की झाड़ियों और जांघ का प्रदेशप्यार की दलदल में नहाया पड़ रहा था.उसकी पानी-पानी होती चूत के लियेमेरे भन्नाये लौड़े की चोट कोसंभालना मुश्किल पड़ रहा था. आंखें मूंदे वहटांगें फटकारती और हाथों से मुझेठेलती चीख रही थी – ’ हाय-हाय बस करो..छोड़ दोप्लीज़..छोड़ दो मेरे राजा ..बस करो..हाय-हाय मर गईरे……..आह…उफ्फ़..मार डाला राजा..’
जितनी जोर की टक्कर होतीउतनी ही ज्यादा जोश से मेरा लौडा़ फूला पड़ रहा था. शरीर का साराआनंद बनकर उसमें भर आया था. अपनी नमिता रानी की चूत में उस रस कोखाली किये बगैर वह ह्टने वाला नहींथा. आखिरकर बिजली की सनसनी के साथ लगातार फुहारों से नमिता रानी कीअंधेरी सुरंग के हर सिरे को कंपातेमेरा लौडा़ अपनी प्यारी चूत में बरस पडा़. नमिताकी चूत सिकुड़ती-कसती-बांधती उसवक्त अपने प्यारे लौडे़ को अपने अंदरसमेटे गले लगा रही थी. बारिश के उसलम्हे में नमिता और मैं मदहोश होकर एक-दूसरेमें यूं समा गए कि न वह अलग रही और न मै अलग रहा.रहा तो केवल वह आनंदजिसकी चाहत में हम दोनों पागल हुए जा रहे थे. समय कुछ देर के लियेहमारे बीच से गायब हो चला था. सुनीता के आने की आहट सेतुरंत अलग होकर अच्छे बच्चों की तरह मैं और नमिता अपनी-अपनी जगहोंपर बैठ गये थे.

’ क्या हो रहा है ?’ कहते हुएउसने बारी से हम दोनों के चेहरों की तरफ देखा. मेरा चेहरा खूनकी लाली से अब भी असाधारण रूप से दमक रहा था. नमिता का चेहरे पर मिहनतकी थकान अब भी लिखी थी. सुनीता ने नमिता और मेरे बीच कीअसाधारण खामोशी को जरूर पढा़ होगा. उसने मेरी तरफ खिसियाई मुस्कुराहटके साथ देखा था. उसकी दृष्टि मेंजिज्ञासा भरा व्यंग था- ” अच्छा, तो ये बात ?देखती हूं तुम्हें बाद में.”


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