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लिंगेश्वर की काल भैरवी
09-22-2010, 11:08 AM
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लिंगेश्वर की काल भैरवी
आज हमारा खजुराहो के मंदिर देखने का प्रोग्राम था। रात के घमासान के बाद सुबह उठने में देर तो होनी ही थी। सत्यजीत का जब फ़ोन आया तब आँख खुली।

वो बोल रहा था "ओह … क्या बात है गुरु ? रात में ज्यादा स्कोर कर लिया था क्या ?"

"अरे नहीं यार कल रात को अच्छे से नींद नहीं आई थी !"

"नींद नहीं आई थी या भाभी ने सोने नहीं दिया था ?"

"ओह... यार देर हो रही है ! हम जल्दी से तैयार होकर आते हैं !"

"यार स्कोर तो बता दो कल का ?"

"ओह... तुम भी... भाई मैंने तिहरा शतक लगाया था… और तुमने ?"

"यार मैंने तो 2*2 किया था !"

"क्या मतलब ?"

"तुम भी बावली बूच ही हो…. अमां यार। दो बार चूत मारी और दो बार जम कर गांड मारी थी !"

"ओह …" मैंने फ़ोन काट दिया नहीं तो वो फिर अपना भाषण शुरू कर देता कि मैं मधु कि गांड क्यों नहीं मारता। अब मैं उसे क्या समझाता।

मैं सोती हुई मधु की प्यारी सी चूत पर एक पुच्ची लेकर उसे जगाने के लिए जैसे ही उसकी ओर बढ़ा उसने आँखें खोलते हुए पूछा,"कौन था ?"

"वो… वो सत्यजीत हमारा नीचे इंतज़ार कर रहा है... तुम जल्दी तैयार हो जाओ !" मुझे कहना पड़ा। मधु चादर से अपना नंगा शरीर ढांपते हुए बाथरूम में घुस गई।

हम जल्दी से तैयार होकर नीचे आये तो सत्यजीत और रूपल बेसब्री से हमारा इंतज़ार कर रहे थे। मोटी और सलोनी भी एक मेज़ पर बैठी नाश्ता कर रही थी। प्रोफ़ेसर कहीं नज़र नहीं आ रहा था। मुझे उससे कुछ और बातें भी पूछनी थी। बाद में मोटी ने बताया था कि उनकी तबीयत नरम है हमारे साथ नहीं जाएगा।

मैंने अपने मन में कहा- अति उत्तम !

खजुराहो के मंदिर अपनी आकृति सौन्दर्य के लिए ही नहीं बल्कि अपनी सजावट की सजीवता के लिये भी जाने जाते हैं। खूबसूरत पहाड़ियों से घिरा खजुराहो किसी जमाने में चंदेल वंश के राजाओं की राजधानी हुआ करता था पर अब तो सिमट कर एक छोटा सा गाँव ही रह गया है। यह मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में पड़ता है। चंदेल वंश के राजा चन्द्र वर्मन ने यहाँ तालाबों और उद्यानों से आच्छदित 85 मंदिरों का निर्माण 950 से 1050 ईस्वी में करवाया था। ये हिन्दू और जैन मंदिर मध्ययुगीन भारत की वास्तु शिल्पकला के अद्भुत नमूने हैं। अब तो इन में 20-22 ही बचे हैं। शायद यहाँ पर खजूर के बहुत पेड़ हुआ करते थे इसलिए इस जगह का नाम खजुराहो पड़ गया? यहाँ के प्रसिद्ध मैन्दिरों में कंदरिया महादेव, चौसठ योगिनी, पार्श्वनाथ, देवी जगदम्बा मंदिर और चतुर्भुज मंदिर प्रमुख हैं। रति क्रीड़ा (सम्भोग) की विभिन्न कलाओं को पत्थरों पर बेहद ख़ूबसूरती से उकेरा गया है। मैथुनरत मूर्तियाँ पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध को दर्शाती हैं। कई जगह मुखमैथुन, समलैंगिक व पशु मैथुन के भी चित्र हैं।

कामसूत्र से प्रेरित रतिक्रीड़ा करती मूर्तियाँ तो ऐसे लगती हैं जैसे वो अभी सजीव हो उठेंगी। बिना परकोटा के सभी मंदिर ऊंचे चबूतरे पर निर्मित हैं। दैनिक उल्लास, पीड़ा, व्यथा, संगीत, गायन और नृत्य की मुद्राओं में ये पाषाण प्रतिमाएं तत्कालीन शिल्पियों के कला कौशल का चिर स्मारक हैं। पाषाण जैसे कठोर फलक पर उत्कीर्ण खजुराहो कला की जान अप्सराओं और सुर सुंदरियों की मूर्तियाँ, कोमल भावनाओं की कोमलतम अभीव्यक्तियाँ हैं ।

जूड़ों को संवारते, गेंद से क्रीड़ाएं करते, ललाट पर तिलक लगाते, नेत्रों में अंजन लगाते, अधरों पर लाली और पैरों में महावर रचाते हुए नारी-मूर्तियों को देख कर मन मंत्र मुग्ध हो जाता है। उन्नत वक्ष, नितम्ब और पतली कटी वाली नारी मूर्तियों के अंग प्रत्यंग की रचना देखते ही बनती है। बेहद पतली कमर, कोमल और लचीली कमर यौवन के भार को संभालने में असमर्थ सी लगती हैं। प्रेम की चाह में लीन युवती, आँखों में अंजन शलाका का स्पर्श देती हुई सुलोचना, बालक को स्तनपान कराती स्नेहमयी जननी और नुपूर बांधती नृत्योंदत्त किन्नर बाला की प्रतिमाएं अपनी जीवंत कला को समाहृत कर रही हैं ।

मैं तो ललचाई आँखों से उन मूर्तियों को देखता ही रह गया। मैंने मधु से जब उस मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहा कि देखो इसके नितम्ब कितने सुडौल और भारी हैं ! काश इस तरह की कोई सुन्दर कन्या मुझे मिल जाए या ये मूर्तियाँ ही सजीव हो उठें तो बस इस मानव जीवन का मज़ा ही आ जाए।

मधु ने मेरी ओर घूर कर देखा तब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ कि अनजाने में क्या बोल बैठा हूँ। मधु ने तो मुँह ही फुला लिया। फिर तो उसने सारे दिन मुझ से बात ही नहीं की।

पूरा दिन तो इन मंदिरों को देखने में ही बीत गया। शाम को इन मंदिरों को बंद कर दिया जाता है। मोटी हमारे साथ ही चिपकी रही। उस सोनचिड़ी के साथ की मजबूरी नहीं होती तो मैं भला इस मोटी को क्या भाव देता। लौंडिया ने सफ़ेद पेंट और शोर्ट (छोटी शर्ट) डाल रखी थी। हे भगवान् ! कसी हुई पेंट में दोनों जाँघों के बीच फसी उसकी पिक्की का भूगोल साफ़ नज़र आ रहा था। मैं तो दिन भर यही सोच रहा था इसने अन्दर कच्छी (पेंटी) डाली होगी या नहीं। और अगर डाली है तो गुलाबी रंग की है या काले रंग की। सच पूछो तो मैं तो इसी फिराक में लगा रहा था कि किसी तरह इस सोनचिड़ी की चूचियाँ दबा सकूं या गालों पर हाथ फिरा सकूं, पर मोटी जरा दूर हटे तब ना।

शाम को लौटते समय जब हम उस रेस्तरां में चाय पी रहे थे तब मधु वाशरूम जाने उठी। साली वो सोनचिड़ी भी साथ ही चली गई। मेरी रही सही आस भी जाती रही। मोटी ने अच्छा मौका जानकर बात शुरू की।

"हाय प्रेमजी... तुहाडी वाइफ ते बड़ी ई सोहनी है ?" उसने एक ठंडी आह भरी।

"हाँ जी … थैक्यू !"

"ओह... जदों मेरी शादी होई सी मैं वी इन्नी ही सोहनी ते पतली सी !"

"ओह … आप तो अभी भी बहुत खूबसूरत हैं !"

"हाये मैं मर जावां !" वो तो किसी नवविवाहिता की तरह शरमा गई। ऐसे तो मधु शरमाया करती है जब मैं उसे अपना लंड हाथ में पकड़ने को कहता हूँ।

"पर वेखो ना प्रोफ़ेसर साहब ते मेरी कदर ही नई करदे !" उसने बुरा सा मुँह बनाया। इतने में मधु वाश रूम वापस आती दिखाई दी। शुक्र है इस मोटी से पीछा छूटा।

उधर सत्यजीत उस फिरंगन पर डोरे डाल रहा था। किसी बात पर वो सभी (सत्यजीत, रूपल, कालू और फिरंगन) हंस रहे थे। मुझे मोटी से बतियाते हुए देख कर उसने मेरी ओर आँख मार दी। इसका मतलब मैं अच्छी तरह जानता था, उसने कहा था ‘लगे रहो मुन्ना भाई’।

बाद में मुझे उसने बताया था कि बित्रिस और कालू आज शाम की फ्लाईट से आगरा जा रहे हैं। उसने सत्यजीत से उसका मोबाइल नंबर ले लिया है और वो बाद में उस से बात करेगी।

रात में मधु को मनाने में मुझे कम से कम 2 घंटे तो जरूर लगे होंगे। और फिर जब वो राजी हुई तो आज पहली बार उसने मेरे लंड को जम कर चूसा और फिर मुझे नीचे करके मेरे ऊपर आ गई और अपने नितम्बों से वो झटके लगाये कि मैं तो इस्स्स्स …… कर उठा। रोज़ मीठा खाने के बाद कभी कभी अगर नमकीन खाने को मिल जाए तो स्वाद और मज़ा दुगना हो जाता है।

और फिर सारी रात मुझे उन भारी नितम्बों वाली मूर्तियों के ही सपने आते रहे जैसे वो सजीव हो उठी हैं और मुझे अपनी बाहें पसारे रति-क्रिया के लिए आमंत्रित कर रही हैं। पता नहीं क्यों उन सभी की शक्लें सलोनी और सिमरन से ही मिल रही थी।

आज हमारा लिंगेश्वर और काल भैरवी मंदिर देखने जाने का प्रोग्राम था। लिंगेश्वर मंदिर में एक चबूतरे पर 11-12 फुट ऊंची एक विशालकाय कामदेव की नग्न मूर्ति बनी है। जिसका लिंग अश्व (घोड़ा) की तरह डेढ़ फुट लम्बा और 4-5 इंच (व्यास) मोटा है। कुंवारी लड़कियों को बड़ी चाह होती है कि उनके पति का लिंग मोटा और लम्बा हो। यहाँ पर वो इस मूर्ति का लिंग पकड़ कर मन्नत मांगती हैं कि उन्हें भी ऐसे ही लिंग वाला पति मिले। विवाहित स्त्रियाँ भी इसे अपने हाथों में पकड़ कर कामना करती हैं कि उनके पति को भी अश्व जैसी काम-शक्ति मिले। उसके साथ ही थोड़ी दूर काल भैरवी का मंदिर बना है जिसमें भैरवी (योगिनी) की बहुत सुन्दर नग्न मूर्ति बनी है। पर इसके बारे में मैं नहीं बताऊंगा। मेरे प्रबुद्ध पाठक और पाठिकाएं जिन्होंने यह मंदिर और मूर्ति भले ही ना देखी हो, बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि मूर्ति कैसी होगी।

काश ! आज सलोनी (मेरी नई चिड़िया) साथ होती तो बस मज़ा ही आ जाता। वो जब अपनी नाज़ुक सी अँगुलियों से उस मूर्ति के लिंग को पकड़ कर मन्नत मांगती तो उसके गालों की रंगत देख कर तो मैं इस्स्स्सस … कर उठता। पर पता नहीं आज मोटी और उस सलोनी का कोई अता पता नहीं था। मैं होटल के क्लर्क से पता करना चाहता था पर मधु जल्दी करने लग गई तो नहीं पूछ पाया।

मधु ने अपनी पसंदीदा सफ़ेद जीन पेंट, टॉप और उसके ऊपर काली जाकेट पहनी थी। खुले बाल, आँखों पर काला चश्मा और हाथों में लाल रुमाल। उसके नितम्ब तो आज कमाल के लग रहे थे। मैंने आज चूड़ीदार पाजामा और लम्बी सी अचकन जैसा कढ़ाई किया कुरता और पैरों में जोधपुरी जूते पहने थे। रूपल ने भारी लहंगा और चोली पहनी थी। ऊपर चुनरी गले में मोतियों की माला। उसके पुष्ट और मोटे मोटे सुडौल उरोज तो ऐसे लग रहे थे जैसे उस पतली सी चोली को फाड़ कर बाहर ही आ जायेंगे। वो अपनी टांगें कुछ चौड़ी करके चल रही थी। मैं समझ गया कल रात भी जीत ने 2*2 जरूर किया होगा। सच कहूं तो मेरा लंड उसे देखते ही खड़ा हो गया था। वो तो जोधा अकबर वाली ऐश्वर्या ही लग रही थी। मैं तो उसे जोधा बाई कह कर छेड़ने ही वाला था पर बाद में मुझे कल वाली बात याद आ गई कहीं आज मधु बुरा मान गई तो मेरा पूरा दिन और रात ही पानीपत का मैदान बन जाएगी। मैं तो बस उसे देखता ही रह गया। पता नहीं सत्यजीत को क्या सूझा था उसने घुटनों तक के जूते और सैनिकों जैसे खाखी कपड़े पहने थे।

40 कि.मी. की दूरी तय करने में ही दो घंटे लग गए। अब गाड़ी आगे तो जा नहीं सकती थी ड्राईवर ने गाड़ी एक पेड़ के नीचे पार्क कर दी। आस पास कुछ दुकानें बनी थी जिन पर प्रसाद और फूल मालाएं बिक रही थी। भीड़ ज्यादा नहीं थी। हम सभी ने दो दो फूल मालाएं ले ली। 3-4 फर्लांग दूरी पर थोड़ी ऊंचाई पर लिंगेश्वर मंदिर दिखाई दे रहा था। जैसे ही हम आगे बढ़े, गाइड से दिखने वाले 3-4 आदमी हमारी ओर लपके।

अरे… यह होटल वाला जयभान यहाँ क्या कर रहा है ? मैंने उसे इशारे से अपने पास बुलाया।

"श्रीमान, मैं गाइड हूँ और यहाँ पिछले 10 सालों से सैलानियों की सेवा कर रहा हूँ। मैं इस मंदिर का पूरा इतिहास जानता हूँ। अगर आप कहें तो मैं साथ चलूँ ? मैं आपको सारी बातें विस्तार से बताऊंगा"

"ओह... पर वो जय ... ?"

"हाँ... श्रीमान आप मेरे छोटे भाई जयभान की बात कर रहे हैं। हमारा चेहरा आपस में मिलता है इसलिए कई बार धोखा हो जाता है ! मेरा नाम वीरभान है।" उसने बताया।

बाकी सभी तो आगे चले गए थे मैंने उसे अपने साथ ले लिया।

रास्ते में उसने बताना चालू किया :

खजुराहो के मंदिर चंदेल वंश के राजाओं ने बनाए थे। ऐसा माना जाता है जब जैन और बौद्ध दर्शन के वैराग्य से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में युवा सन्यासी बनाने लगे थे तब उन्हें रोकने के लिए यह तरीका अपनाया गया था। इनका उद्देश्य संभवतया यह रहा होगा कि मानव जाति कहीं इस काम रहस्य को भूल ही ना जाए। यह लिंगेश्वर और काल भैरवी मंदिर तो महाराज नील विक्रमादित्य चतुर्थ ने अपने एक मित्र राजा चित्र सेन की याद में बनवाया था। इसका वास्तविक नाम अश्वलिंग (घोड़े का लिंग) मंदिर था जो बाद में लिंगेश्वर बन गया। इसकी भी बड़ी रोचक कथा है।

यहाँ का राजा चित्र सेन बहुत कामुक प्रवृति का राजा था। उसकी रानी भी एक युवा राजकुमार के प्रेम में पड़ी थी जो उसकी सौतेली युवा पुत्री से प्रेम करता था। अपने यौवन काल में राजा प्रतिदिन नई नई कुंवारी कन्याओं के साथ कई कई बार सम्भोग किया करता था। कुछ विशेष पर्वों या अवसरों पर वह अपने सामंतों और मंत्रियों के साथ सामूहिक सम्भोग भी किया करता था जिस में प्राकृतिक और अप्राकृतिक दोनों मैथुन शामिल होते थे। यह जो सामने पहाड़ी पर जयगढ़ बना है इसके अन्दर एक रंगमहल का निर्माण इसी प्रयोजन हेतु किया गया था। इसी रंगमहल में वह अपनी रासलीला किया करता था।

कुछ दिनों बाद रानी ने षड्यंत्र रचा जिसके तहत एक विष कन्या के साथ सम्भोग करने के कारण वह अपनी पौरुष (काम) शक्ति खो बैठा। तब किसी सामंत या राज वैद्य ने कामशक्ति पुनः प्राप्त करने हेतु एक उपाय सुझाया कि इस रंगमहल में एक सौ किशोरवय अक्षत-यौवन कन्याएं रखी जाएँ जो हर समय नग्न अवस्था में राजन की सेवा में प्रस्तुत रहें। साथ ही उन्हें कुछ औषधियों के सेवन की भी सलाह दी। तीन माह तक ऐसा करने से राजा को खोई हुई काम शक्ति पुनः प्राप्त हो जाएगी और उनका लिंग भी अश्व जैसा हो जाएगा। फिर काम देव को प्रसन्न करने के लिए उस विष कन्या की बलि दे दी जाएगी।

कुछ दिनों बाद रजा की काम शक्ति में कुछ सुधार आरम्भ हो गया। पर राजन के दुर्भाग्य ने अभी उसका पीछा नहीं छोड़ा था। उसकी रानी ने एक और षड़यंत्र रचा और उस विष कन्या को अमावस्या की रात को किसी तरह तरह कारागृह से बाहर निकाल दिया। उसने रात्रि में सोये हुए राजा का शीश अपने हाथ में पकड़े खांडे (एक छोटी पर भारी सी तलवार) से एक ही वार में धड़ से पृथक कर दिया। और उस रंगमहल को भी जाते जाते अग्नि को समर्पित कर दिया। सभी अन्दर जल कर भस्म हो गए।"

"ओह …" मेरे मुँह से बस इतना ही निकला। बाकी सभी तो आगे निकल गए थे। मैं और वीरभान ही पीछे छूट गए थे।

"फिर क्या हुआ ?" मैंने पूछा।

"इस रंगमहल के बारे में बहुत सी किम्वदंतियां हैं। कुछ लोग तो अब भी इसे भूतिया महल कहते हैं। लोगों से सुना है कि आज भी अमावस्या की रात्रि में रंगमहल में बनी मूर्तियाँ सजीव हो उठती हैं और आपस में सामूहिक नृत्य और मैथुन करती हैं। रात को आस पास के रहने वाले लोगों ने कई बार यहाँ पर घुन्घरुओं और पायल की झंकार, कामुक सीत्कारें, चीखें और विचित्र आवाजें सुनी हैं। लोगों की मान्यता है कि वो भटकती आत्माएं हैं। इनकी शान्ति के लिए बाद में लिंगेश्वर और भैरवी मंदिर बनवाये थे और इस रंगमहल का भी जीर्णोद्धार उसी समय किया गया था। रंगमहल में लगभग 100 सुन्दर कन्याओं की रति-क्रीड़ा करते नग्न मूर्तियाँ भी इस मंदिर के निर्माण के समय ही बनाई गई थीं।"

पता नहीं क्या और कितना सत्य था पर उसने कहानी बड़े रोचक अंदाज़ में सुनाई थी। वीरभान ने रहस्ययी ढंग से मुस्कुराते हुए जब यह बताया कि संयोगवश आज अमावस्या है तो मेरी हंसी निकल गई। मैं तो यही सोच रहा था काश ! सलोनी आज हमारे साथ होती तो इस रंगमहल में विभिन्न आसनों में मैथुन रत मूर्तियाँ इतने निकट से देख कर मस्त ही हो जाती और मेरा काम बन जाता। चलो सलोनी ना सही मधु तो इन अप्राकृतिक मैथुन रत मूर्तियों को देख कर शायद खुश हो जाए और मुझे उस स्वर्ग के दूसरे द्वार (गांड मारने) का मज़ा ले लेने दे !

मेरी प्यारी पाठिकाओं आप तो "आमीन" (खुदा करे ऐसा ही हो) बोल दो प्लीज।

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