Post Reply 
मेरी चुदाई
04-13-2016, 11:37 AM
Post: #1
मेरी चुदाई
भाग-१: मेरी तंग पजामी

मेरा नाम कोमल प्रीत कौर है। मेरी उम्र सत्ता*ईस साल है और मैं शादीशुदा हूँ। मेरे पति आर्मी में मेजर हैं और उनकी पोस्टिंग दूर-दराज़ के सीमावर्ती इलाकों या सम्युक्त राष्ट्र के किसी अंतर्राष्ट्रीय मिशन पर होती रहती है। इसलिये मैं अपनी सास और ससुर के साथ जालंधर के पास एक गाँव में रहती हूँ जहाँ हमारी पुश्तैनी कोठी और काफी सारी खेती और ज़मीन-ज़ायदाद है।



सास और ससुर दोनों की उम्र साठ साल के पार है। सास थोड़ी बिमार रहती है और अपना ज्यादा वक्त भजन कीर्तन और गाँव के गुरुद्वारे में बिताती हैं। ससुर जी भी रिटायर्ड कर्नल हैं और अब पूरा वक्त खेतों पर मज़दूरों की निगरानी और गाँव के विकास कार्यों में मसरूफ रहते हैं। दोनों ही मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार और इज़्ज़त देते हैं और मेरी ज़िंदगी में ज्यादा दखल-अंदाज़ी नहीं करते। मेरा मायका भी मेरे ससुराल से बस एक घंटे की दूरी पर जालन्धर से थोड़ा आगे है। मेरे मायके में मेरे मम्मी और पापा और भैया-भाभी हैं। पापा भी ससुर जी की तरह आर्मी के रिटायर्ड कर्नल हैं।



हर लड़की और औरत की तरह मुझे भी बनने-संवरने, मेक-अप, नये-नये फैशन के सलवार-कमीज़, ऊँची ऐड़ी की चप्पल-सैंडल पहनने का बहुत शौक है। मैं इतनी सुंदर और सेक्सी हूँ कि मेरा गोरा बदन, मेरी पतली कमर, लम्बे रेशमी बाल, कसे हु*ए चूतड़ और मोटे मम्मों को देख कर लड़के तो क्या बुड्ढों का भी दिल बे*ईमान हो जाये। मेरी चुदाई की प्यास भी कुछ ज्यादा ही है और शादी के पहले चंडीगढ़ में कॉलेज के दिनों से खुल कर चुदाई के मज़े लेती आयी हूँ। अब पति आर्मी में हैं तो इस कारण से कई महीने उनके लण्ड को तरसती रहती हूँ। वैसे तो मेरे मोहल्ले में बहुत सारे लण्ड रहते हैं और सारे लड़के मुझे पटाने की कोशिश करते रहते हैं। मेरे मम्मे, लड़कों की नींद उड़ाने के लि*ए काफी हैं। मेरी बड़ी सी गाण्ड देख कर लड़कों की हालत खराब हो जाती है और वो खड़े-खड़े लण्ड को हाथ में पकड़ लेते हैं। मगर मैं किसी-किसी से ही चुदा*ई करवाती हूँ, जो मुझे बहुत अच्छा लगे और जहाँ पर मेरी चुदा*ई के बारे में किसी को पता भी ना चले।



सास-ससुर के होते मुझे खुद को काबू में रखना पड़ता है। लेकिन मैं अपने बेडरूम में कंप्यूटर पर चैटिंग के ज़रिये साइबर सैक्स का खूब मज़ा लेती हूँ। वयस्क वेबसाइटों पर नंगी ब्लू-फिल्में देख-देख कर मुठ मारने का मुझे बहुत सौक है। मुठ मारने के लिये मैं हर तरह के फल-सब्ज़ी जैसे केले, बैंगन, खीरे, मूली, लौकी या कोई भी लण्डनुमा चीज़ जैसे बियर की बोतल, क्रिकेट या बैडमिंटन के बल्ले का हत्था और कोई भी ऐसी चीज़ जो चूत में घुसयी जा सके, उसका प्रयोग करती हूँ। मेरी चुदाई की प्यास इतनी ज़्यादा है कि दिन में कम से कम आठ -दस बार तो मुठ मार कर झड़ती ही हूँ।



इसके अलावा चुदाई से पहले मुझे शराब पीना भी अच्छा लगता है क्योंकि थोड़े नशे और खुमारी में चुदाई का मज़ा कईं गुना बढ़ जाता है। वैसे मैं शराब इतनी ही पीती हूँ कि मुझे इतना ज्यादा नशा ना चढ़े या मैं खुद को संभाल ना सकूँ। मेरा तजुर्बा ये रहा है कि जरूरत से ज्यादा नशा चुदाई का मज़ा और मस्ती खत्म कर देता है। ऐसा नहीं है कि मैं कभी नशे में धुत्त नहीं होती मगर ऐसा बहुत ही कम होता है। वैसे मेरे ससुराल और मायके में आर्मी वातावरण वजह से औरतों का कभी-कभार शराब पीना उचित माना जाता है पर मगर मेरे परिवार वालों को ये नहीं पता कि मैं तो तकरीबन हर रोज़ ही रात को सास ससुर के सो जाने के बाद अपने कमरे में एक-दो पैग मार कर खूब मुठ मारती हूँ।



अपने बारे में मैंने काफी बता दिया... अब आगे मेरी चुदाई के गरम-गरम किस्से पड़ें।



भाग-१: मेरी तंग पजामी



शादी के तीन चार महीने के बाद की बात है। मेरे पति की पोस्टिंग उन दिनों अरुणाचल में थी। मैं हर रोज़ कंप्यूटर पर लड़कों से चैटिंग करके मुठ मार कर अपनी प्यास बुझाती थी। चैटिंग पर मुझे लड़के अक्सर अपना मोबा*इल नंबर देने और मिलने को कहते मगर मैं सबको मना कर देती। फिर भी क*इंयों ने अपना नम्बर मुझे दे दिया था।



इन सब दोस्तों में एक एन.आर.आ*ई बुड्ढा भी था। वो कुछ दिन बाद भारत आने वाला था। उसने मुझे कहा कि वो मुझसे मिलना चाहता है, मगर मैंने मना कर दिया। कुछ दिन के बाद उसने भारत आने के बाद मुझे अपना फोन नम्बर दिया और अपनी तस्वीर भी भेजी और कहा- “मैं अकेला ही इंडिया आया हूँ, बाकी सारी फॅमिली अमेरिका में हैं।”



उसने यह भी कहा कि वो सिर्फ मुझे देखना चाहता है बेशक दूर से ही सही।



अब तो मुझे भी उस पर तरस सा आने लगा था। वो जालंधर का रहने वाला था और मैं भी जालंधर के पास ही गाँव में रहती हूँ।



अगले महीने मेरी सास की बहन के लड़के की शादी आ रही थी जिसके लि*ए मुझे और मेरी सास ने शॉपिंग के लि*ए जालंधर जाना था। मगर कुछ दिनों से मेरी सास की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी तो उसने मुझे अकेले ही जालन्धर चली जाने को कहा।



जब मैंने अकेले जालन्धर जाने की बात सुनी तो एकदम से मुझे उस बूढ़े का ख्याल आ गया। मैंने सोचा कि इसी बहाने अपने बूढ़े आशिक को भी मिल आती हूँ। मुझे झाँटें बिल्कुल पसंद नहीं हैं और मैं हर हफ्ते अपनी चूत वैक्सिंग करके साफ करती हूँ। अभी दो दिन पहले ही मैंने मैंने अपनी चूत की वैक्सिंग करी थी, फिर भी मैंने नहाते समय अपनी चूत फिर से साफ करी और पूरी सज-संवर कर बस में बैठ ग*ई। मैंने बस में से रास्ते में ही उस बूढ़े को फोन कर दिया। उसे मैंने एक जूस-बार में बैठने के लि*ए कहा और कहा- “मैं ही वहाँ आ कर फोन करुँगी।”



मैं आपको बूढ़े के बारे में बता दूँ। वो पचपन-साठ साल का लगता था। उसके सर के बाल सफ़ेद हो चुके थे पर उसकी जो फोटो उसने मुझे भेजी थी उसमे उसकी बॉडी और उसका चेहरा मुझे उससे मिलने को मजबूर कर रहा था।



बस से उतरते ही मैं रिक्शा लेकर वहाँ पहुँच ग*ई जहाँ पर वो मेरा इन्तजार कर रहा था। उसने मेरी फोटो नहीं देखी थी इसलि*ए मैं तो उसे पहचान ग*ई पर वो मुझे नहीं पहचान पाया। मैं उससे थोड़ी दूर बैठ ग*ई। वो हर औरत को आते हु*ए गौर से देख रहा था मगर उसका ध्यान बार बार मेरे बड़े-बड़े मम्मों और उठी हु*ई गाण्ड की तरफ आ रहा था। वही क्या… वहाँ पर बैठे सभी मर्द मेरी गाण्ड और मम्मों को ही देख रहे थे। मैं आ*ई भी तो सज-धज कर थी अपने बूढ़े यार से मिलने।



मैंने आसमानी नीले रंग की नेट की कमीज़ और बहुत ही टाइट चूड़ीदार पजामी पहनी हुई थी। कमीज़ भी काफी टाइट थी और उसका गला भी बहुत गहरा था। साथ ही मैंने गोरे नरम पैरों में काफी ऊँची पेंसिल हील वाले काले रंग के सैंडल पहने हुए थे। खुले बालों में हेयर रिंग और सिर पर गॉगल चढ़ाये हुए थे।



थोड़ी देर के बाद मैं बाहर आ ग*ई और उसे फोन किया कि बाहर आ जा*ए। मैं थोड़ी छुप कर खड़ी हो ग*ई और वो बाहर आकर इधर उधर देखने लगा। मैंने उसे कहा- “तुम अपनी गाड़ी में बैठ जा*ओ, मैं आती हूँ।”



वो अपनी स्विफ्ट गाड़ी में जाकर बैठ गया। मैंने भी इधर उधर देखा और उसकी तरफ चल पड़ी और झट से जाकर उसके पास वाली सीट पर बैठ ग*ई। मुझे देख कर वो हैरान रह गया और कहा- “तुम ही तो अंदर ग*ई थी, फिर मुझे बुलाया क्यों नहीं?”



मैंने कहा- “अंदर बहुत सारे लोग थे, इसलि*ए! ”



उसने धीरे-धीरे गाड़ी चलानी शुरू कर दी। उसने मुझे पूछा- “अब तुम कहाँ जाना चाहोगी?”



मैंने कहा- “कहीं नहीं, बस तुमने मुझे देख लिया, इतना ही काफी है, अब मुझे शॉपिंग करके वापस जाना है।“



उसने कहा- “अगर तुम बुरा ना मानो तो मैं तुम्हें कुछ तोहफ़ा देना चाहता हूँ। क्या तुम मेरे साथ मेरे घर चल सकती हो?”



उसका जालन्धर में ही एक शानदार बंगला था। पहले तो मैंने मना कर दिया पर उसके ज्यादा जोर डालने पर मैं मान ग*ई। फिर हम उसके घर पहुँचे। मुझे एहसास हो चुका था कि अगर मैं इसके घर पहुँच ग*ई हूँ तो आज मैं जरूर चुदने वाली हूँ। मैं गाड़ी से उतर कर उसके पीछे पीछे चल पड़ी।



अंदर जाकर उसने मुझे पूछा- “क्या पियोगी तुम कोमल?”



“कुछ नहीं! बस मुझे थोड़ा जल्दी जाना है!”



वो बोला- “नहीं ऐसे नहीं! इतनी जल्दी नहीं.. अभी तो हमने अच्छे से बातें भी नहीं की!”



“अब तो मैंने तुम्हें अपना फोन नम्बर दे दिया है, रात को जब जी चाहे फोन कर लेना.. मैं अकेली ही सोती हूँ।”



“प्लीज़! थोड़ी देर बैठो तो सही!”



मैंने कुछ नहीं कहा और सोफे पर बैठ ग*ई। वो जल्दी से बियर की दो बोतलें ले आया और मुझे देते हु*ए बोला- “मेरे साथ यह बियर ही पी लो फिर चली जाना।”



मैंने वो बियर ले ली। वो मेरे पास बैठ गया और हम इधर उधर की बातें करने लगे। बातों ही बातों में वो मेरी तारीफ करने लगा।



वो बोला- “कोमल.. जब जूस बार में तुम्हें देख रहा था तो सोच रहा था कि काश कोमल ऐसी हो, मगर मुझे क्या पता था कि कोमल यही है।”



“रहने दो! झूठी तारीफ करने की जरुरत नहीं है जी!” मैंने कहा।



उसने भी मौके के हिसाब से मेरे हाथ पर अपना हाथ रखते हु*ए कहा- “सच में कोमल, तुम बहुत खुबसूरत हो।”



मेरा हाथ मेरी जांघ पर था और उस पर उसका हाथ! वो धीरे-धीरे मेरा हाथ रगड़ रहा था। कभी-कभी उसकी उंगलियाँ मेरी जांघ को भी छू जाती जिससे मेरी प्यासी जवानी में एक बिजली सी दौड़ जाती। बियर की आधी बोतल पी चुकी थी और उसकी हरकतों से अब मैं मदहोश हो रही थी। मगर फिर भी अपने ऊपर काबू रखने का नाटक कर रही थी जिसे वो समझ चुका था। फिर उसने हाथ ऊपर उठाना शुरू किया और उसका हाथ मेरे बाजू से होता हु*आ मेरे बालों में घुस गया। मैं चुपचाप बैठी मदहोश हो रही थी और मेरी साँसें गरम हो रही थी। उसका एक हाथ मेरी पीठ पर मेरे बालों में चल रहा था और वो मेरी तारीफ कि*ए जा रहा था। फिर दूसरे हाथ से उसने मेरी गाल को पकड़ा और चेहरा अपनी तरफ कर लिया।



मैंने भी अपना हाथ अपनी गाल पर उसके हाथ पर रख दिया। उसने अपने होंठों को मेरे होंठों पर रख दिया और मेरे होंठों का रस चूसना शुरू कर दिया। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मैं उसका साथ देने लगी। फिर उसने मुझे अपनी तरफ खींच लिया और मुझे अपनी गोद में बिठा लिया। अब मेरे दोनों चूचे उसकी छाती से दब रहे थे। उसका हाथ अब कभी मेरी गाण्ड पर, कभी बालों में, कभी गालों पर, और कभी मेरे मम्मों पर चल रहा था। मैं भी उसके साथ कस कर चिपक चुकी थी और अपने हाथ उसकी पीठ और बालों में घुमा रही थी।



पंद्रह-बीस मिनट तक हम दोनों ऐसे ही एक दूसरे को चूमते-चाटते रहे। फिर उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और बेडरूम की ओर चल पड़ा। उसने मुझे जोर से बेड पर फेंक दिया और फिर मेरी टाँगें पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया। वो मेरी दोनों टांगों के बीच खड़ा था। फिर वो मेरे ऊपर लेट गया और फिर से मुझे चूमने लगा। इसी बीच उसने मेरे बालों में से हेयर रिंग निकाल दिया जिससे बाल मेरे चेहरे पर बिखर ग*ए।



मुझे यह सब बहुत अच्छा लग रहा था, अब तो मैं भी वासना की आग में डूबे जा रही थी। फिर उसने मुझे पकड़ कर खड़ा कर दिया और मेरी कमीज़ को ऊपर उठाया और उतार दिया। मेरी छोटी सी जालीदार काली ब्रा में से मेरे गोरे मम्मे जैसे पहले ही आजाद होने को मचल रहे थे। वो ब्रा के ऊपर से ही मेरे मम्मे मसल रहा था और चूम रहा था।



फिर उसका हाथ मेरी पजामी तक पहुँच गया... जिसका नाड़ा खींच कर उसने खोल दिया। मेरी पजामी बहुत ही टा*ईट थी जिसे मेरी टाँगों से खींचने में उसे बहुत मुश्किल हु*ई। उसके बाद भी वो पजामी मेरे ऊँची ऐड़ी वाले सैंडलों में अटक गयी और जब उसने झटके से खींची तो सैंडल की ऐड़ी से पजामी हल्की सी चीर भी गयी। मगर पजामी उतारते ही वो मेरे गोल गोल चूतड़ देख कर खुश हो गया।



अब मैं उसके सामने काली ब्रा पैंटी और सैंडलों में थी। उसने सैंडलों के बीच में मेरे पैरों और फिर मेरी टांगों को चूमा और फिर मेरी गाण्ड तक पहुँच गया। मैं उल्टी होकर लेटी थी और वो मेरे चूतडों को जोर जोर से चाट और मसल रहा था।



अब तक मेरी शर्म और डर दोनों गायब हो चुके थे और फिर जब गैर मर्द के सामने नंगी हो ही ग*ई थी तो फिर चुदा*ई के पूरे मज़े क्यों नहीं लेती भला। शादी से पहले तो कईं लण्डों से चुदती थी... पर शादी के बाद किसी पराये मर्द के साथ ये पहली बार था।



मैं पीछे मुड़ी और घोड़ी बन कर उसकी पैंट पर, जहाँ पर लण्ड था, अपना चेहरा और गाल रगड़ने लगी। मैंने उसकी शर्ट खोलनी शुरू कर दी थी। जैसे-जैसे मैं उसकी शर्ट खोल रही थी उसकी चौड़ी और बालों से भरी छाती सामने आ*ई। मैं उस पर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगी और चूमने लगी। धीरे-धीरे मैंने उसकी शर्ट खोल कर उतार दी। वो मेरे ऐसा करने से बहुत खुश हो रहा था। मुझे तो अच्छा लग ही रहा था। मैं मस्त होती जा रही थी।



मेरे हाथ अब उसकी पैंट तक पहुँच ग*ए थे। मैंने उसकी पैंट खोली और नीचे सरका दी। उसका लण्ड अंडरवियर में कसा हु*आ था। ऐसा लग रहा था कि जैसे अंडरवीयर फाड़ कर बाहर आ जा*एगा।



मैंने उसकी पैंट उतार दी। मैंने अपनी एक ऊँगली ऊपर से उसके अंडरवियर में घुसा दी और नीचे को खींचा। इससे उसकी झांटों वाली जगह, जो उसने बिलकुल साफ़ की हु*ई थी दिखा*ई देने लगी। मैंने अपना पुरा हाथ अंदर डाल कर अंडरवियर को नीचे खींचा। उसका आठ इंच का लण्ड मेरी उंगलियों को छूते हु*ए उछल कर बाहर आ गया और सीधा मेरे मुँह के सामने हिलने लगा।



इतना बड़ा लण्ड अचानक मेरे मुँह के सामने ऐसे आया कि मैं एक बार तो डर ग*ई। उसका बड़ा सा और लंबा सा लण्ड मुझे बहुत प्यारा लग रहा था और वो मेरी प्यास भी तो बुझाने वाला था। मेरे होंठ उसकी तरफ बढ़ने लगे और मैंने उसके सुपाड़े को चूम लिया। मेरे होंठों पर गर्म-गर्म एहसास हु*आ जिसे मैं और ज्यादा महसूस करना चाहती थी।



तभी उस बूढ़े ने भी मेरे बालों को पकड़ लिया और मेरा सर अपने लण्ड की तरफ दबाने लगा।



मैंने मुँह खोला और उसका लण्ड मेरे मुँह में समाने लगा। उसका लण्ड मैं पूरा अपने मुँह में नहीं घुसा सकी मगर जो बाहर था उसको मैंने एक हाथ से पकड़ लिया और मसलने लगी।



बुढा भी मेरे सर को अपने लण्ड पर दबा रहा था और अपनी गाण्ड हिला-हिला कर मेरे मुँह में अपना लण्ड घुसेड़ने की कोशिश कर रहा था। थोड़ी ही देर के बाद उसके धक्कों ने जोर पकड़ लिया और उसका लण्ड मेरे गले तक उतरने लगा। मेरी तो हालत बहुत बुरी हो रही थी कि अचानक मेरे मुँह में जैसे बाढ़ आ ग*ई हो। मेरे मुँह में एक स्वादिष्ट पदार्थ घुल गया। तब मुझे समझ में आया कि बुड्ढा झड़ गया है। तभी उसके धक्के भी रुक ग*ए और लण्ड भी ढीला होने लगा और मुँह से बाहर आ गया।



उसका माल इतना ज्यादा था कि मेरे मुँह से निकल कर गर्दन तक बह रहा था। कुछ तो मेरे गले से अंदर चला गया था और बहुत सारा मेरे मम्मों तक बह कर आ गया। मैं बेसुध होकर पीछे की तरफ लेट ग*ई। और वो भी एक तरफ लेट गया। इस बीच हम थोड़ी रोमांटिक बातें करते रहे।



थोड़ी देर के बाद वो फिर उठा और मेरे दोनों तरफ हाथ रख कर मेरे ऊपर झुक गया। फिर उसन मुझे अपने ऊपर कर लिया और मेरी ब्रा की हुक खोल दी। मेरे दोनों कबूतर आजाद होते ही उसकी छाती पर जा गिरे। उसने भी बिना देर किये दोनों कबूतर अपने हाथो में थाम लि*ए और बारी-बारी दोनों को मुँह में डाल कर चूसने लगा।



वो मेरे मम्मों को बड़ी बुरी तरह से चूस रहा था। मेरी तो जान निकली जा रही थी। मेरे मम्मों का रसपान करने के बाद वो उठा और मेरी टांगों की ओर बैठ गया। उसने मेरी पैंटी को पकड़ कर नीचे खींच दिया और दोनों हाथों से मेरी टाँगे फ़ैला कर खोल दी। वो मेरी जांघों को चूमने लगा और फिर अपनी जीभ मेरी चूत पर रख दी। मेरे बदन में जैसे बिजली दौड़ने लगी। मैंने उसका सर अपनी दोनों जांघों के बीच में दबा लिया और उसके सर को अपने हाथों से पकड़ लिया। उसका लण्ड मेरे सैंडल की पट्टियों के बीच में से पैरों के साथ छू रहा था। मुझे पता चल गया कि उसका लण्ड फिर से तैयार हैं और सख्त हो चुका हैं।



मैंने बूढ़े की बांह पकड़ी और ऊपर की और खींचते हु*ए कहा- “मेरे ऊपर आ जा*ओ राजा...!”



वो भी समझ गया कि अब मेरी फुद्*दी लण्ड लेना चाहती है। वो मेरे ऊपर आ गया और अपना लण्ड मेरी चूत पर रख दिया। मैंने हाथ में पकड़ कर उसका लण्ड अपनी चूत के मुँह पर टिकाया और अंदर को खींचा। उसने भी एक धक्का मारा और उसका लण्ड मेरी चूत में घुस गया।



मेरे मुँह से आह निकल ग*ई। मेरी चूत में मीठा सा दर्द होने लगा। अपने पति के इन्तजार में इस दर्द के लि*ए मैं बहुत तड़पी थी। उसने मेरे होंठ अपने होंठो में लि*ए और एक और धक्का मारा। उसका सारा लण्ड मेरी चूत में उतर चुका था। मेरा दर्द बढ़ गया था। मैंने उसकी गाण्ड को जोर से दबा लिया था कि वो अभी और धक्के ना मारे।



जब मेरा दर्द कम हो गया तो मैं अपनी गाण्ड हिलाने लगी। वो भी लण्ड को धीरे-धीरे से अंदर-बाहर करने लगा।



कमरे में मेरी और उसकी सीत्कारें और आहों की आवाज़ गूंज रही थी। वो मुझे बेदर्दी से पेल रहा था और मैं भी उसके धक्कों का जवाब अपनी गाण्ड उठा-उठा कर दे रही थी।



फिर उसने मुझे घोड़ी बनने के लि*ए कहा।



मैंने घोड़ी बन कर अपना सर नीचे झुका लिया। उसने मेरी चूत में अपना लण्ड डाला। मुझे दर्द हो रहा था मगर मैं सह ग*ई। दर्द कम होते ही फिर से धक्के जोर-जोर से चालू हो ग*ए। मैं तो पहले ही झड़ चुकी थी, अब वो भी झड़ने वाला था। उसने धक्के तेज कर दि*ए। अब तो मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे यह बुड्ढा आज मेरी चूत फाड़ देगा। फिर एक सैलाब आया और उसका सारा माल मेरी चूत में बह गया।



वो वैसे ही मेरे ऊपर गिर गया। मैं भी नीचे उल्टी ही लेट ग*ई और वो मेरे ऊपर लेट गया। मेरी चूत में से उसका माल निकल रहा था।



हम दोनों थक चुके थे और भूख भी लग चुकी थी। उसने किसी होटल में फोन किया और खाना घर पर ही मंगवा लिया। मैंने अपने मम्मे और चूत कपड़े से साफ़ कि*ए और अपनी ब्रा और पैंटी पहनने लगी। उसने मुझे रुकने का इशारा किया और एक गिफ्ट-पैक मेरे हाथ में थमा दिया।



मैंने खोल कर देखा तो उसमें बहुत ही सुन्दर ब्रा और पैंटी थी जो वो मेरे लि*ए अमेरिका से लाया था। फिर मैंने वही ब्रा और पैंटी पहनी और अपने कपड़े पहन लि*ए।



तभी बेल बजी, वो बाहर गया और खाना लेकर अंदर आ गया। हमने साथ बैठ कर बियर पी और खाना खाया।



उसने मुझे कहा- “चलो अब तुम्हें शॉपिंग करवाता हूँ।“



वो मुझे मॉल में ले गया। पहले तो मैंने शादी के लि*ए शॉपिंग की, जिसका बिल भी उसी बूढ़े ने दिया। उसने मुझे भी एक बेहद सुन्दर और कीमती साड़ी लेकर दी और बोला- “जब अगली बार मिलने आ*ओगी तो यही साड़ी पहन कर आना क्योंकि तेरी तंग पजामी उतारने में बहुत मुश्किल हु*ई आज।”



फिर वो मुझे बस स्टैंड तक छोड़ गया और मैं बस में बैठ कर वापिस अपने गाँव अपने घर आ ग*ई। शादी के बाद पहली बार मैंने सामाजिक बंधनों को तोड़ कर लकीर पार की थी और मैं बहुत हल्का और अज़ाद महसूस कर रही थी। फिर से कॉलेज के दिनों की तरह नये-नये लण्डों से चुदने के लिये अब मेरी सारी झिझक उड़न छू हो चुकी थी। सिर्फ थोड़ी सावधानी और चालाकी से कदम बढ़ाना होगा।


!!! क्रमशः !!!
Find all posts by this user
Quote this message in a reply
04-13-2016, 11:38 AM
Post: #2
RE: मेरी चुदाई
भाग-२: मेरी बिगड़ी हु*ई चाल

मेरा वो एन-आर-आ*ई बुड्ढा आशिक थोड़े दिनों में ही वापिस अमेरिका जाने वाला था इसलि*ए उसने मुझे फिर आखरी बार मिलने के लि*ए कहा। अब तक मुझे भी उसके लौड़े की जरूरत महसूस हो रही थी इसलि*ए मैं अपने ससुराल में मायके जाने का बहाना बना कर जालन्धर अपने आशिक के पास चली ग*ई। उसके बाद मुझे अपने मायके भी जाना था जो जालन्धर के आगे ही था... तो वहाँ से मुझे को*ई परेशानी भी नहीं थी जाने की।



मैंने उस दिन उसी की दी हु*ई साड़ी पहनी थी। साथ में स्लीवलेस ब्लाउज़ और हमेशा की तरह बहुत ही ऊँची पेंसिल हील वाले सैंडल पहने थे और मैं खूब सैक्सी लग रही थी। वो बस स्टैंड पर गाड़ी लेकर आया और घर जाते समय गाड़ी में ही मेरी जांघ पर हाथ घुमाने लगा। मैं भी मौका देख कर पैन्ट के ऊपर से ही उसके लण्ड को सहलाने लगी। बंगले में पहुँचते ही उसने मुझे गोद में उठा लिया और अन्दर ले गया।



उसने मुझे बीयर दी और खुद व्हिस्की पीने लगा।



फिर उसने मुझे कहा- “कोमल, तुम भी व्हिस्की का स्वाद लेकर देखो, इसमें बीयर से ज्यादा मस्त नशा है।”



उसने समझा था कि मैं सिर्फ बीयर पीती हूँ और व्हिस्की या रम वगैरह नहीं पीती। मैंने भी उसकी गलतफहमी दूर नहीं की और जानबूझ कर पहले तो मैंने मना कर दिया मगर उसके थोड़ा जोर डालने पर मैंने व्हिस्की का पैग ले लिया।



हम दोनों सोफे पर बैठे थे और उसने वहीं पर मेरे होंठों को अपने होंठों में भर लिया। मैं भी उसका साथ देने लगी। उसने फिर एक जाम बनाया और उसमें बीयर मिला दी। मुझे बाद में अपने मायके जाना था पर मैंने भी सोचा कि दो पैग में क्या होगा, और मैंने वो पूरा जाम ख़त्म कर दिया।



हम दोनों आपस में लिपटे हु*ए थे। वो कभी मेरी चूचियों को मसल रहा था और कभी मेरी गाण्ड पर हाथ फेर रहा था। मेरी साड़ी का पल्लू भी नीचे गिर गया था और मेरे ब्ला*उज में से दिख रहे गोल-गोल उभारों पर अपनी जीभ रगड़ रगड़ कर चाट रहा था। मेरे मुँह से सिसकारियाँ निकल रही थी। उसका लण्ड एकदम सख्त हो चुका था। मैं सोफे पर ही घोड़ी बन ग*ई और उसके लण्ड की तरफ अपना मुँह करके उसकी पैन्ट खोल दी। उसने भी अपने चूतड़ उठा कर अपनी पैन्ट उतार दी। उसके कच्छे में उसका लण्ड पूरा तना हु*आ था। मैंने उसका लण्ड बाहर निकाला और अपने हाथों में ले लिया।



वो भी मेरे लम्बे बालों में हाथ घुमाने लगा। मैंने उसके लण्ड को चूमा और फिर अपने नर्म-नर्म लाल लिपस्टिक वाले होंठ उस पर रख दि*ए। मानो जैसे मैंने किसी गरम लोहे के लठ्ठ को मुँह में ले लिया हो। मैं उसका लण्ड पूरा मुँह में ले रही थी। लप-लप की आवाजें मेरे मुँह से निकल कर से कमरे में गूंज रहीं थी।



वो भी मेरे सर को ऊपर से दबा-दबा कर और अपनी गाण्ड उठा-उठा कर अपना लण्ड मेरे मुँह में ठूँस रहा था। उसके मुँह से भी आह आह की आवाजें निकल रही थी।



वो बोला- “चूस ले रानी! और चूस! बहुत मज़ा आ रहा है!”



मैंने कहा- “क्यों नहीं राजा! आज मैं रस पीने और पिलाने ही तो आ*ई हूँ!”



फिर उसने मेरे बालों को मेरे चेहरे पर बिखेर दिया और मुझे बाहर कुछ भी नहीं दिख रहा था। सिर्फ मेरे सामने उसका लण्ड था। एक तरफ उसका पेट और दूसरी तरफ मेरे काले घने बाल थे। मैं उसका लण्ड लगातार चूसे जा रही थी। फिर उसने मेरी पीठ पर से मेरा ब्ला*उज खोल दिया और दूर फेंक दिया। फिर मेरी ब्रा का हुक भी खोल दिया, जिसके खुलते ही मेरे दो बड़े-बड़े कबूतर उसकी टांग पर जा गिरे और उसने भी अपना हाथ मेरे दोनों कबूतरों पर रख दि*ए। वो मेरी और सीधा हो कर बैठ गया और मेरे चूचों को जोर जोर से मसलना चालू कर दिया।



उसका हाथ कभी मेरे मम्मों पर, कभी मेरी पीठ पर और कभी मेरी गाण्ड पर चल रहा था। फिर उसने मेरी साड़ी उतार कर मेरे पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया। मैंने भी एक हाथ से उसको निकाल दिया और एक तरफ फ़ेंक दिया। अब मेरे बदन पर एक पैंटी ही बची थी उसने उसको भी उतार दिया। मगर मेरी पैंटी उतारते समय वो जरा सा भी आगे नहीं हु*आ। मैं हैरान थी कि उसने मेरी पैंटी मेरी गाण्ड से बिना हिले कैसे नीचे कर दी।



अभी मैं सोच ही रही थी की मेरी पैंटी जो अभी जांघों पर थी, उसमें दो उंगलियाँ घुसी और मेरी पैंटी और नीचे जाने लगी और मेरे घुटनों से होती हुई मेरे पैरों में सैंडलों पर आकर रुक ग*ई। मुझे लगा कि जैसे किसी और ने मेरी पैंटी उतारी हो।



मैंने झटके से सर को उठाया और पीछे मूड़ कर देखा तो मैं हैरान रह ग*ई। वहाँ पर एक और बुड्ढा कच्छे और बनियान में खड़ा था।



मैंने फिर अपने आशिक की तरफ देखा तो वो बोला- “जाने मन... सॉरी, मैंने तुम्हें अपने इस दोस्त के बारे में बताया नहीं। दर*असल यह कल से मेरे घर में है और आज जब सुबह तूने मुझे बताया कि तू मुझसे मिलने आ रही है तो मैंने इसे भेजने की कोशिश की मगर शायद इसने हमारी बातें सुन ली थी इसलि*ए यह मुझसे बोला कि एक बार इसे भी चूत दिला दूँ, काफी अरसे से चूत नहीं मारी। मुझे इस पर तरस आ गया।”



उसने कहा- “जान, मैं तुम्हें रास्ते में ही इसके बारे में बताने वाला था मगर डर गया कि कहीं तुम रूठ कर वापिस न चली जा*ओ, इसलि*ए घर आकर सोचा कि पहले मैं तुमसे मज़े कर लूँ फिर इसके बारे में बता*ऊँगा, मगर यह साला अभी आ गया।”



मैं अभी कुछ बोली नहीं थी कि वो दूसरा बुड्ढा बोल पड़ा- “यार क्या करता? इसकी मस्त गाण्ड देख कर मुझसे रहा नहीं गया।”



वो दोनों अब मेरे मुँह की तरफ देख रहे थे कि मैं क्या जवाब देती हूँ। मगर मैंने जो शराब के तगड़े पैग पिये थे उसका नशा मुझ पर चढ़ने लगा था और फिर अगर मैं उस वक्त मना भी करती तो फिर भी वो दोनों मुझे नहीं छोड़ते और मुझे जबरदस्ती ही चोद लेते। मैंने उस दूसरे बूढ़े की ओर देखा। वो ज्यादा सेहतमंद नहीं लग रहा था। मैंने सोचा पता नहीं ये बूढा मेरी प्यास बुझा भी पायेगा कि नहीं मगर मेरे मन में भी दो-दो लण्डों का लालच आ गया।



इसलि*ए मैंने कहा- “को*ई बात नहीं, मुझे तुम दोनों इक्कठे ही मजा दो। मैं तुम दोनों को आज खुश कर दूंगी।”



वैसे भी अगर मैं उनकी बात नहीं मानती तो मेरी चूत भी प्यासी रह जाती जो मुझे कभी गंवारा नहीं था।



मेरी बात सुनते ही वो दोनों फिर से मुझ पर टूट पड़े। एक ने मेरे मम्मों को और दूसरा मेरे सैंडलों और उनकी ऊँची ऐड़ियों में फंसी मेरी पैंटी खींच कर फेंक दी और मेरी गाण्ड को सहलाने लगा। मैं भी अपना काम चालू रखते हु*ए फिर से लण्ड को सहलाने लगी।



हमारी बातचीत में लण्ड थोड़ा ढीला हो गया था जो फिर से जोश में आ रहा था।



थोड़ी ही देर में मुझे दोनों लण्ड पूरे तने हु*ए महसूस होने लगे। एक मेरी जांघों पर और दूसरा मेरे मुँह में था। अब मुझे दूसरे बूढ़े का लण्ड देखने की इच्छा होने लगी। तभी पहले वाले लण्ड में हलचल होने लगी और वो बुड्ढा जल्दी-जल्दी मेरे मुँह को चोदने लगा। मैं भी जोर-जोर से उसके लण्ड को अपने हाथों और मुँह में लेने लगी। फिर उसका भरपूर माल मेरे मुँह में था। मैं उसको चाट ग*ई।



उधर दूसरा बुड्ढा जो मेरी चूत और गाण्ड को चाट रहा था, उसने भी अपनी जुबान का कमाल दिखाया और मेरी चूत में से पानी निकल गया। मेरी चूत में से निकल रहे पानी को वो चाट रहा था। इससे मुझे कुछ थकावट महसूस हु*ई और मैं सोफे पर ठीक से बैठ ग*ई। एक लण्ड तो ढीला हो गया था मगर दूसरे में अभी दम था। वो बुड्ढा अपना नंगा लण्ड मेरे मुँह के सामने ले कर खड़ा हो गया। उसका लण्ड मैं सोच रही थी कि ज्यादा बड़ा नहीं होगा मगर नौ इन्च का लण्ड देख कर मैं हैरान रह ग*ई। बूढ़े की सेहत कमजोर थी मगर उसके लण्ड की नहीं।



मैंने अभी उसका लण्ड हाथ में पकड़ा ही था कि मेरे सामने एक और जाम लेकर वो पहले वाला बुड्ढा खड़ा था। बीयर मिले हुए व्हिस्की के दो जाम पीने के बाद मैं पहले ही नशे में मस्त थी लेकिन मैंने भी बिना सोचे समझे तीसरा जाम हाथ में ले लिया। मैं जानती थी कि मुझे और नहीं पीना चाहिये मगर पता नहीं क्यों मैंने मना नहीं किया।



मैंने उस बूढ़े का लण्ड जाम में डुबो दिया और फिर बाहर निकाल कर उसे चाटने लगी। मैं बार बार ऐसे कर रही थी और बूढ़े का लण्ड और भी बड़ा होता लग रहा था। फिर मैंने एक ही घूंट में पूरा जाम ख़त्म कर दिया।



बूढ़े ने मुझे अपनी गोद में उठाना चाहा, वो शायद मुझे बेडरूम में उठा कर ले जाना चाहता था। उसने मुझे अपनी बाँहों में उठा तो लिया मगर उसे चलने में परेशानी हो रही थी। उसने मुझे गोद से उतार दिया पर मैं तो इतने नशे में थी कि खुद से चार कदम भी चलने के काबिल नहीं थी। जैसे ही उसने मुझे उतारा तो मैं नशे में इतनी ऊँची ऐड़ी के सैंडल में लड़खड़ा गयी। तभी पहले वाला बुड्ढा भी आ गया और बोला- “यार, संभल के! बहुत कोमल माल है, कहीं गिर ना जा*ए।”



फिर उन दोनों ने मिलकर मुझे अपनी बाँहों में उठा लिया, बेडरूम में ले गये और मुझे बैड पर लिटा दिया।



मैंने दोनों लण्डों की तरफ देखा। एक लण्ड अभी भी ढीला था और दूसरा अभी पूरा कड़क। दूसरे बूढ़े ने मेरा सर पकड़ा और अपनी तरफ कर लिया। मेरा पूरा बदन बेड पर था मगर मेरा सर बैड से नीचे लटक रहा था मगर मेरा मुँह ऊपर की तरफ था। मेरे मुँह के ऊपर बूढ़े का लण्ड तना हु*आ था। नशे में भी मुझे पता था कि अब क्या करना है। बूढ़े ने अपना लण्ड मेरे चेहरे पर घुमाते हु*ए मेरे होंठों पर रख दिया। मैं भी अपने होंठों से उसको चूमने लगी और अपने होंठ खोल दिये। बुड्ढा भी समझदार था। उसने एक हाथ से मेरे सर को सहारा दिया और अपना लण्ड मेरे होंठों में घुसा दिया और फिर ऐसे अन्दर-बाहर करने लगा जैसे किसी गोल खुली हु*ई चूत में लण्ड घुसाते हैं। फिर उसने मेरे सर को छोड़ कर मेरे दोनों मम्मों को अपने हाथों में भर लिया। मेरा सर लटक रहा था और उस पर बूढ़े के लण्ड के धक्के। उसके दोनों हाथ मेरे मम्मों को मसल रहे थे।



अब दूसरा बुड्ढा भी बैड पर आ गया और मेरी टाँगे खोल कर मेरी चूत पर अपना मुँह रख दिया। वो मेरी चूत के ऊपर बीयर डाल रहा था और फिर उसे चाट रहा था। कभी-कभी वो मेरे पेट पर मेरी नाभि में भी बीयर डाल कर उसे चाटता। उसकी जुबान जब मेरी चूत के अन्दर जाती तो मचल कर मैं अपनी गाण्ड ऊपर को उठाती मगर ऐसा करने से मेरे मुँह में घुस रहा लण्ड और आगे मेरे गले तक उतर जाता।



फिर उन दोनों ने मुझे पकड़ कर बैड पर ठीक तरह से लिटा दिया। अब दूसरा लण्ड भी कड़क हो चुका था और पहले वाला तो पहले से ही कड़क था। अब मेरी चूत की बारी थी चुदने की। मैं बैड पर अभी ठीक से बैठने की कोशिश ही रही थी कि वो सेहत से कमजोर बुड्ढा मुझ पर टूट पड़ा और मुझे नीचे लिटा कर खुद मेरे ऊपर आ गया। मेरी चूत तो पहले से लण्ड के लि*ए बेकरार हो रही थी। इस लि*ए मैंने भी अपनी टाँगें ऊपर उठा*ई और उसने अपना लण्ड मेरी चूत के मुँह पर रख कर धक्का मारा। उसका लण्ड मेरी चूत की दीवारों को चीरता हु*आ आधा घुस गया। मैं इस धक्के से थोड़ी घबरा ग*ई और अपने आप को सँभालने लगी। मगर फिर दूसरा धक्का में पूरा लण्ड मेरी चूत के बीचोंबीच सुरंग बनाता हु*आ अन्दर तक घुस गया।



मुझे लगा जैसे मेरी चूत फट जायेगी।



मेरे मुँह से निकला- “अबे साले, मेरी फाड़ डालेगा क्या.... आराम से डाल! मैं कहीं भाग तो नहीं रही!”



वो बोला- “अरे रानी.... तेरी जैसी मस्त भोसड़ी देख कर सब्र नहीं होता.... दिल करता है कि सारा दिन तुझे चोदता रहूँ।”



मैं बोली- “क्या लण्ड में इतना दम है कि सारा दिन मुझे चोद सके?’’ नशे में मैं बेबाक हो गयी थी।



इस बात से वो गुस्से में बोला- “वो तो साली अभी पता चल जा*एगा तुझे...!” और मुझे और जोर से चोदने लगा।



मुझमें भी आग थी। मैं भी उसका साथ कमर हिला-हिला कर दे रही थी। आखिर मेरा माल छुटने लगा और मैं उसके सामने निढाल हो कर पड़ ग*ई मगर वो अभी भी मुझे रोंदे जा रहा था। मेरी चूत से फच-फच की आवाजें तेज हो ग*ई थी। मैं उसके नीचे मरी जा रही थी।



तभी दूसरा बुड्ढा आया और उसको बोला- “चल, अब मुझे भी कुछ करने दे।”



मैं भी बोली- “अरे अब बस कर! तू तो सच में मुझे मार डालेगा... पता नहीं तेरा लण्ड है या डंडा?’’



वो बोला- “साली, अभी तो तुझे मैं और चोदूँगा... तुझे बता*ऊँगा कि मुझमें कितना दम है!”



फिर दूसरा बुड्ढा बिस्तर पर लेट गया और बोला- “चल, मेरे लण्ड पर बैठ जा!”



मैंने वैसे ही किया। उसका लण्ड पूरा डंडे जैसा खड़ा था। मैं झूमती हुई उस पर बैठ ग*ई और उसका लण्ड मेरी गीली चूत में आराम से घुस गया। मैं उसका लण्ड मजे से ऊपर नीचे होकर अन्दर बाहर कर रही थी।



वो मेरे नीचे बोला- “आह... आह रानी... बहुत मजा आ रहा है... प्यार से मुझसे चुदती जा.... मैं भी तुझे प्यार से चोदूँगा।”



वो मेरी छाती पर हाथ घुमाता हु*आ बोला- “ये अपने मम्मे मेरे मुँह में डाल दे रानी।”



मैंने भी अपनी एक चूची उसके मुँह पर रख दी जिससे मेरी गाण्ड पीछे खड़े बूढ़े के सामने आ ग*ई और वो मेरी गाण्ड में उंगली घुसाने लगा। उसकी इस हरकत से मुझे भी मजा आया मगर मैंने यूँ ही उसको कहा- “बूढ़े... अब भी पंगे लि*ए जा रहा है... तूने पहले अपने दिल की कर तो ली है मेरे साथ।”



तो वो बोला- “अभी कहाँ की है... अभी तो मेरा माल भी नहीं निकला है!” और वो मेरी गाण्ड में तेजी से उंगली अन्दर-बाहर करने लगा।



मैं सिसक-सिसक कर दोनों छेदों की चुदा*ई का मजा ले रही थी। मगर अब जो होने वाला था वो मेरे लि*ए सहन करना नामुमकिन था। पीछे वाले बूढ़े ने मेरी गाण्ड पर को*ई क्रीम लगा*ई और अपने लण्ड का सुपारा मेरी गाण्ड में घुसेड़ दिया। मेरी जैसे गाण्ड ही फट ग*ई हो। एक लण्ड मेरी चूत में था और दूसरा मेरी गाण्ड में जाने वाला था। मैंने पहले भी कईं बार गाण्ड मरवायी थी पर ऐसे मोटे लौड़े से नहीं।



मैं दोनों बुड्डों के बीच में फंसी हु*ई चिल्ला रही थी- “अरे मादरचोद! छोड़ दे मुझे... तुम दोनों मुझे मार डालोगे।”



मगर उन पर जैसे मेरी बातों का को*ई असर नहीं हो रहा था। दोनों ही अपना-अपना लण्ड अन्दर घुसेड़ रहे थे। पीछे वाला बुड्ढा तो मुझे गाली दे-दे कर चोद रहा था और नीचे वाला भी मुझे बोल रहा था- “बस रानी, थोड़ी देर में सब ठीक हो जा*एगा।”



और वैसे ही हु*आ, थोड़ी देर में मैं दोनों छेदों से मजे लेने लगी। मैं अपनी गाण्ड और चूत धक्के मार-मार कर चुदवा रही थी।



फिर पीछे वाले बूढ़े ने मेरी गाण्ड में अपना माल निकाल दिया। गाण्ड में गर्म-गर्म माल जाते ही मुझे और सुख मिलने लगा। अब मैं भी फिर से छुटने वाली थी। मैं जोर-जोर से धक्के मारने लगी और मेरा पानी नीचे वाले बूढ़े के लण्ड पर बहने लगा। उसने मेरी चूत में से लण्ड निकाला और मुझे घोड़ी बना लिया और फिर उसने मेरी गाण्ड में लण्ड पेल दिया।



मैं भी घोड़ी बन कर अपनी गाण्ड के चुदने का मजा ले रही थी। वो मुझे जोर-जोर से धक्के मार रहा था। पर अब मेरी गाण्ड का मुँह खुल चुका था और मुझे को*ई तकलीफ नहीं हो रही थी। फिर जब उसका भी छूटने लगा तो उसने अपना लण्ड बाहर निकाल कर मेरे मम्मों पर वीर्य की बौछार कर दी। मैं भी उसका लण्ड जीभ से चाटने लगी।



शाम तक मैं वहाँ पर चुदती रही और फिर वो दोनों मुझे गाड़ी में बिठा कर मेरे मायके छोड़ने आये। उन्होंने मुझे गाँव से पीछे ही उतार दिया और वहाँ से मैं पैदल अपने घर चली ग*ई। मगर मुझसे ठीक से चला भी नहीं जा रहा था। मेरी गाण्ड और चूत का बुरा हाल हो रहा था। ऊपर से उस दिन शराब भी कुछ ज्यादा हो गयी थी कि नशा अभी भी पूरी तरह उतरा नहीं था। गाण्ड और चूत का दर्द और नशे की हालत में ऊँची पेंसिल हील की सैंडल में मेरी चाल बहक रही थी... बीच-बीच में कदम लड़खड़ा जाते थे।



मेरी बिगड़ी हु*ई चाल देख कर मुझे मेरी भाभी ने पूछा भी था- “क्या बात है...?” तो मैंने कहा- “बस से उतरते समय पैर में मोच आ ग*ई थी।” वो तो अच्छा हुआ कि एन.आर.आ*ई बुड्ढे ने मुझे अमेरिका से लायी पेपरमिंट की खास गोलियों का एक डब्बा गिफ्ट में दिया था। दो गोलियाँ खाने के वजह से भाभी को मेरी साँसों में शराब की बदबू नहीं आयी।



फिर मैं कमरे में जा कर चुपचाप बिस्तर पर लेट ग*ई। तब जाकर कहीं मेरी चूत और गाण्ड को कुछ राहत मिलने लगी।



!!! क्रमशः !!!
Find all posts by this user
Quote this message in a reply
04-13-2016, 11:38 AM
Post: #3
RE: मेरी चुदाई
भाग-३: मेरा प्यारा देवर
पिछली गर्मियों की बात है जब मेरे पति की मौसी का लड़का विकास हमारे घर आया हु*आ था। वो बहुत ही सीधा साधा और भोला सा है। उसकी उम्र करीब सत्रह-अठारह की होगी, मगर उसका बदन ऐसा कि किसी भी औरत को आकर्षित कर ले। मगर वो ऐसा था कि लड़की को देख कर उनके सामने भी नहीं आता था। मगर मैं उस से चुदने के लि*ए तड़प रही थी और वो ऐसा बुद्धू था कि उसको मेरी जवानी दिख ही नहीं रही थी। मैं उसको अपनी गाण्ड हिला हिला कर दिखाती रहती मगर वो देख कर भी दूसरी और मुँह फेर लेता। मैं समझ चुकी थी कि यह शर्मीला लड़का कुछ नहीं करेगा, जो करना है मुझे ही करना है।

एक दिन सुबह के करीब नौ बजे का वक्त था। सास और ससुर चाय-नाश्ता करके तैयार हो गुरुद्वारे और खेतों के लिये निकल गये थे। मैं भी नहा-धो कर सज-संवर कर तैयार हुई। फिर नौकरानी से चाय लेकर जब उसके कमरे में ग*ई तो वो सो रहा था मगर उसका बड़ा सा कड़क लौड़ा जाग रहा था। मेरा मतलब कि उसका लौड़ा पजामे के अन्दर खड़ा था और पजामे को टैंट बना रखा था।

लण्ड तो मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। मेरा मन उसका लौड़ा देख कर बेहाल हो रहा था। अचानक उसकी आँख खुल ग*ई। वो अपने लौड़े को देख कर घबरा गया और झट से अपने ऊपर चादर लेकर अपने लौड़े को छुपा लिया। मैं चाय लेकर बैड पर ही बैठ ग*ई और अपनी कमर उसकी टांगों से लगा दी। वो अपनी टाँगें दूर हटाने की कोशिश कर रहा था मगर मैं ऊपर उठ कर उसके पेट से अपनी गाण्ड लगा कर बैठ ग*ई।

उसकी परेशानी बढ़ती जा रही थी और शायद मेरे गरम बदन के छूने से उसका लौड़ा भी बड़ा हो रहा था जिसको वो चादर से छिपा रहा था। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मैंने उसको कहा- “विकास उठो और चाय पी लो!”

मगर वो उठता कैसे... उसके पजामे में तो टैंट बना हु*आ था। वो बोला- “भाभी! चाय रख दो, मैं पी लूँगा।”

मैंने कहा- “नहीं! पहले तुम उठो, फिर मैं जा*ऊँगी।”

तो वो अपनी टांगों को जोड़ कर बैठ गया और बोला- “ला*ओ भाभी, चाय दो।”

मैंने कहा- “नहीं! पहले अपना मुँह धोकर आ*ओ, फिर चाय पीना।”

अब तो मानो उसको को*ई जवाब नहीं सूझ रहा था। वो बोला- “नहीं भाभी! ऐसे ही पी लेता हूँ, तुम चाय दे दो।”

मैंने चाय एक तरफ़ रख दी और उसका हाथ पकड़ कर उसको खींचते हु*ए कहा- “नहीं! पहले मुंह धोकर आ*ओ फिर चाय मिलेगी।”

वो एक हाथ से अपने लौड़े पर रखी हु*ई चादर को संभाल रहा था और बैड से उठने का नाम नहीं ले रहा था। मैंने उसको पूछा- “विकास! यह चादर में क्या छुपा रहे हो?” लेखिका : कोमलप्रीत कौर

तो वो बोला- “भाभी कुछ नहीं है।”

मगर मैंने उसकी चादर पकड़ कर खींच दी तो वो दौड़ कर बाथरूम में घुस गया। मुझे उस पर बहुत हंसी आ रही थी। वो काफी देर के बाद बाथरूम से निकला जब उसका लौड़ा बैठ गया।

ऐसे ही एक दिन मैंने अपने कमरे के पंखे की तार डंडे से तोड़ दी और फिर विकास को कहा- “तार लगा दो।”

वो मेरे कमरे में आया और बोला- “भाभी, को*ई स्टूल चाहि*ए... जिस पर मैं खड़ा हो सकूँ।”

मैंने स्टूल ला कर दिया और विकास उस पर चढ़ गया। मैंने नीचे से उसकी टाँगें पकड़ लीं। मेरा हाथ लगते ही जैसे उसको करंट लग गया हो, वो झट से नीचे उतर गया।

मैंने पूछा- “क्या हु*आ देवर जी? नीचे क्यों उतर गये?”

तो वो बोला- “भाभी जी, आप मुझे मत पकड़ो, मैं ठीक हूँ।”

जैसे ही वो फिर से ऊपर चढ़ा, मैंने फिर से उसकी टाँगें पकड़ ली। वो फिर से घबरा गया और बोला- “भाभी जी, आप छोड़ दो मुझे, मैं ठीक हूँ।”

मैंने कहा- “नहीं विकास, अगर तुम गिर गये तो...?”

वो बोला- “नहीं गिरता.. आप स्टूल को पकड़ लीजिये...!”

मैंने फिर से शरारत भरी हंसी हसंते हु*ए कहा- “अरे स्टूल गिर जाये तो गिर जाये, मैं अपने प्यारे देवर को नहीं गिरने दूंगी...!”

मेरी हंसी देख कर वो समझ गया कि भाभी मुझे नहीं छोड़ेंगी और वो चुपचाप फिर से तार ठीक करने लगा।

मैं धीरे-धीरे उसकी टांगों पर हाथ ऊपर ले जाने लगी जिससे उसकी हालत फिर से पतली होती मुझे दिख रही थी। मैं धीरे-धीरे अपने हाथ उसकी जाँघों तक ले आ*ई मगर उसके पसीने गर्मी से कम मेरा हाथ लगने से ज्यादा छुट रहे थे। वो जल्दी से तार ठीक करके बाहर जाने लगा तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली- “देवर जी, आपने मेरा पंखा तो ठीक कर दिया, अब बोलो मैं आपकी क्या सेवा करूँ?”

तो वो बोला- “नहीं भाभी, मैं को*ई दुकानदार थोड़े ही हूँ जो आपसे पैसे लूँगा।”

मैंने कहा- “तो मैं कौन से पैसे दे रही हूँ, मैं तो सिर्फ सेवा के बारे में पूछ रही हूँ, जैसे आपको कुछ खिला*ऊँ या पिला*ऊँ?”

वो बोला- “नहीं भाभी, अभी मैंने कुछ नहीं पीना!” और बाहर भाग गया।

मैं उसको हर रोज ऐसे ही सताती रहती जिसका कुछ असर भी दिखने लगा क्योंकि उसने चोरी-चोरी मुझे देखना शुरू कर दिया। मैं जब भी उसकी ओर अचानक देखती तो वो मेरी गाण्ड या मेरी छाती की तरफ नजरें टिकाये देख रहा होता और मुझे देख कर नजर दूसरी ओर कर लेता। मैं भी जानबूझ कर उसको खाना खिलाते समय अपनी छाती झुक-झुक कर दिखाती, क*ई बार तो बैठे-बैठे ही उसकी पैंट में तम्बू बन जाता और मुझसे छिपाने की कोशिश करता।

मेरा खुद का हाल भी बहुत खराब था। वो जितना मुझसे दूर भागता, उसके लिये मेरी प्यास उतनी ही ज्यादा भड़क रही थी। उसके लण्ड की कल्पना करके दिन रात मुठ मारती। मैं तो उसका लौड़ा अपनी चूत में घुसवाने के लि*ए इतनी बेक़रार थी, अगर सास-ससुर का डर न होता तो अब तक मैंने ही उसका बलात्कार कर दिया होता। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मैं भूखी शेरनी की तरह उस पर नज़र रखे हुए मौके के इंतज़ार में थी। मगर जल्दी मुझे ऐसा मौका मिल गया। एक दिन हमारे रिश्तेदारों में किसी की मौत हो ग*ई और मेरे सास ससुर को वहाँ जाना पड़ गया।

मैंने आपने मन में ठान ली थी कि आज मैं इस लौन्डे से चुद कर ही रहूंगी... चाहे मुझे उसके साथ कितनी भी जबरदस्ती करनी पड़े, उसके कुँवारे लण्ड से अपनी चूत की आग बुझा कर ही रहुँगी। जो होगा बाद में देखा जायेगा।

सास-ससुर के जाते ही विकास भी मुझसे बचने के लि*ए बहाने की तलाश में था। पहले तो वो काफी देर तक घर से बाहर रहा। एक घंटे बाद जब मैंने उसके मोबा*इल पर फोन किया और खाना खाने के लि*ए घर बुलाया तब जाकर वो घर आया।

उसके आने के पहले ही मैं फटाफट तैयार हुई। उसे रिझाने के लिये मैंने नेट का बहुत ही झीना और कसा हुआ सलवार-कमीज़ पहन लिया। मेरी कमीज़ का गला कुछ ज्यादा ही गहरा था उर उसके नीचे मेरी ब्रा की झलक बिल्कुल साफ नज़र आ रही थी। अपनी टांगों और गाण्ड की खूबसूरती बढ़ाने के लिये ऊँची ऐड़ी की सैंडल भी पहन ली और थोड़ा मेक-अप भी किया। फिर मूड बनाने के लिये शराब का पैग भी मार लिया।

जब वो आया तो मैं अपना और उसका खाना अपने कमरे में ही ले ग*ई और उसको अपने कमरे में बुला लिया। मगर वो अपना खाना उठा कर अपने कमरे की ओर चल दिया। मेरे लाख कहने के बाद भी वो नहीं रुका तब मैं भी अपना खाना उसके कमरे में ले ग*ई और बिस्तर पर उसके साथ बैठ ग*ई।

वो फिर भी मुझसे शरमा रहा था। मैंने अपना दुपट्टा भी अपनी छाती से हटा लिया मगर वो आज मुझसे बहुत शरमा रहा था। उसको भी पता था कि आज मैं उसको ज्यादा परेशान करूँगी।

मैंने उससे पूछा- “विकास.. मैं तुम को अच्छी नहीं लगती क्या...?”

तो वो बोला- “नहीं भाभी, आप तो बहुत अच्छी हैं...!”

मैंने कहा- “तो फिर तुम मुझसे हमेशा भागते क्यों रहते हो...?”

वो बोला- “भाभी, मैं कहाँ आपसे भागता हूँ?”

मैंने कहा- “फिर अभी क्यों मेरे कमरे से भाग आये थे? शायद मैं तुम को अच्छी नहीं लगती, तभी तो तुम मुझसे ठीक तरह से बात भी नहीं करते!” लेखिका : कोमलप्रीत कौर

“नहीं भाभी, अभी तो मैं बस यूँ ही अपने कमरे में आ गया था.. आप तो बहुत अच्छी हैं…”

मैंने थोड़ा डाँटते हुए कहा- “झूठ मत बोलो! मैं तुम को अच्छी नहीं लगती, तभी तो मेरे पास भी नहीं बैठते। अभी भी देखो कैसे दूर होकर बैठे हो? अगर मैं सच में तुम को अच्छी लगती हूँ तो मेरे पास आकर बैठो....!”

मेरी बात सुन कर वो थोड़ा सा मेरी ओर सरक गया।

यह देख कर मैं बिलकुल उसके साथ जुड़ कर बैठ ग*ई जिससे मेरी गाण्ड उसकी जांघ को और मेरी छाती के उभार उसकी बाजू को छूने लगे।

मैंने कहा- “ऐसे बैठते हैं देवर भाभियों के पास.... अब बोलो ऐसे ही बैठो करोगे या दूर दूर...?”

वो बोला- “भाभी, ऐसे ही बैठूँगा मगर मौसी मुझसे गुस्सा तो नहीं होगी? क्योंकि लड़कियों के साथ ऐसे को*ई नहीं बैठता।”

मैंने कहा- “अच्छा अगर तुम अपनी मौसी से डरते हो तो उनके सामने मत बैठना। मगर आज वो घर पर नहीं है इसलि*ए आज जो मैं तुम को कहूँगी वैसा ही करना।”

उसने भी शरमाते हु*ए हाँ में सर हिला दिया।

अब हम खाना खा चुके थे, मैंने उसे कहा- “अब मेरे कमरे में आ जा*ओ... वहाँ एयर-कन्डिशनर है!

वो बोला- “भाभी, आप जा*ओ, मैं आता हूँ।”

उसकी बात सुन कर जब मैंने उसकी पैंट की ओर देखा तो मैं समझ ग*ई कि यह अब उठने की हालत में नहीं है।

मैंने बर्तन उठाये और रसो*ई में छोड़ कर अपने सैंडल टकटकाती अपने कमरे में आ ग*ई। थोड़ी देर बाद ही विकास भी मेरे कमरे में आ गया और बिस्तर के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मैंने टीवी चालू किया और बिस्तर पर टाँगें लंबी करके बैठ ग*ई और विकास को भी बिस्तर पर आने के लि*ए कहा।

वो बोला- “नहीं भाभी, मैं यहाँ ठीक हूँ।”

मैंने कहा- “अच्छा तो अपना वादा भूल गये कि तुम मेरे पास बैठोगे...?”

यह सुन कर उसको बिस्तर पर आना ही पड़ा! मगर फिर भी वो मुझसे दूर ही बैठा। मैंने उसको और नजदीक आने के लि*ए कहा, वो थोड़ा सा और पास आ गया। मैंने फिर कहा तो थोड़ा ओर वो मेरे पास आ गया, बाकी जो थोड़ी बहुत कसर रहती थी वो मैंने खुद उसके साथ जुड़ कर निकाल दी।

वो नज़रें झुकाये बस मेरे पैरों को ही ताक रहा था। मैंने अपनी एक टाँग थोड़ी उठा कर लचकाते हुए अपना सैंडल पहना हुआ पैर हवा में उसकी नज़रों के सामने मरोड़ा और बोली- “क्यों विकास! सैक्सी हैं ना?”

ये शब्द सुनकर वो सकपक गया! “क.... क... कौन... भाभी!”

मुझे हंसी आ गयी और मैं बोली- “सैंडल! अपने सैंडलों के बारे में पूछ रही हूँ मेरे भोले देवर...! बताओ इनमें मेरे पैर सैक्सी लग रहे हैं कि नहीं?”

“जी..जी भाभी! बहुत सुंदर हैं...!” लेखिका : कोमलप्रीत कौर

इसी तरह मैं बीच-बीच में उसे उकसाने के लिये छेड़ रही थी लेकिन वो ऐसे ही छोटे-छोटे जवाब दे कर चुप हो जाता। मेरा सब्र अब जवाब देने लगा था। मैं समझ गयी कि अब तो मुझे इसके साथ जबरदस्ती करनी ही पड़ेगी... पता नहीं फिर मौका मिले या ना मिले। अगर मैं बिल्कुल नंगी भी इसके सामने कड़ी हो जाऊँ तो भी ये चूतिया ऐसे ही नज़रें झुकाये बैठ रहेगा।

टीवी में भी जब भी को*ई गर्म नजारा आता तो वो अपना ध्यान दूसरी ओर कर लेता... मगर उसके लौड़े पर मेरा और उन नजारों का असर हो रहा था, जिसको वो बड़ी मुश्किल से अपनी टांगों में छिपा रहा था।

मैंने अपना सर उसके कंधे पर रख दिया और बोली- “विकास आज तो बहुत गर्मी है...”

उसने बस सिर हिला हाँ में जवाब दे दिया। वैसे तो कमरे में ए-सी चल रहा था और गर्मी तो बस मेरे बदन में ही थी।

फिर मैंने अपना दुप्पटा अपने गले से निकाल दिया, जिससे मेरे मम्मे उसके सामने आ गये, वो कभी-कभी मेरे मम्मों की ओर देखता और फिर टीवी देखने लगता। ए-सी में भी उसके पसीने छुटने शुरू हो गये थे।

मैंने कहा- “विकास, तुमको तो बहुत पसीना आ रहा है, तुम अपनी टी-शर्ट उतार लो।”

यह सुनकर तो उसके और छक्के छुट गये, बोला- “नहीं भाभी, मैं ऐसे ही ठीक हूँ।”

मैंने उसकी टी-शर्ट में हाथ घुसा कर उसकी छाती पर हाथ रगड़ कर कहा- “कैसे ठीक हो, यह देखो, कितना पसीना है?” और अपने हाथ से उसकी टी-शर्ट ऊपर उठाने लगी...

वो अपनी टी-शर्ट उतारने को नहीं मान रहा था, तो मैंने उसकी टी-शर्ट अपने दोनों हाथों से ऊपर उठा दी। वो टी-शर्ट को नीचे खींच रहा था और मैं ऊपर.. इसी बीच मैं अपने मम्मे कभी उसकी बाजू पर लगाती और कभी उसकी पीठ पर... और कभी उसके सर से लगाती...

जब वो नहीं माना तो मैंने उसे जबरदस्ती बिस्तर पर गिरा दिया और... खुद उसके ऊपर लेट ग*ई जिससे अब मेरे मम्मे उसकी छाती पर टकरा रहे थे और मैं लगातार उसकी टी-शर्ट ऊपर खींच रही थी। उसके गिरने के कारण उसका लौड़ा भी पैंट में उछल रहा था, जो मेरे पेट से कभी-कभी रगड़ जाता, मगर विकास अपनी कमर को दूसरी ओर घुमा रहा था ताकि उसका लौड़ा मेरे बदन के साथ न लग सके...। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

आखिर में उसने हर मान ली और मैंने उसकी टी-शर्ट उतार दी।

अब उसकी छाती जिस पर छोटे-छोटे बाल थे मेरे मम्मों के नीचे थी.. मगर मैंने अभी उसको और गर्म करना चाहा ताकि मुझे उसका बलात्कार ना करना पड़े और वो खुद मुझे चोदने के लि*ए मान जाये।

मैं उसके ऊपर से उठी और रसो*ई में गयी। मेरी साँसें तेज़ चल रही थी और चेहरा उत्तेजना से तमतमया हुआ था। मैंने शराब का एक पैग बना कर जल्दी से पिया तो कुछ अच्छा लगा। मैंने सोचा कि एक बार फिर रिझाने की कोशिश करके देखती हूँ क्योंकि कुँवारा लौंडा है... कहीं जबरदस्ती करने जल्दी ना झड़ जाये... सब चौपट हो जायेगा।

फिर आ*ईसक्रीम एक ही कप में ले आ*ई। मेरे आने तक वह बैठ चुका था। मैं फिर से उसके साथ बैठ ग*ई और खुद एक चम्मच खाकर कप उसके आगे कर दिया। उसने चम्मच उठाया और आ*ईसक्रीम खाने लगा तो मैंने उसको अपना कंधा मारा जिससे उसकी आ*ईस क्रीम उसके पेट पर गिर ग*ई। मैंने झट से उसके पेट से ऊँगली के साथ आ*ईस क्रीम उठा*ई और उसी के मुँह की ओर कर दी। उसको समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ आज क्या हो रहा है।

फिर उसने मेरी ऊँगली अपने मुँह में ली और चाट ली मगर मैं अपनी ऊँगली उसके मुँह से नहीं निकाल रही थी। उसने मेरा हाथ पकड़ कर मेरी ऊँगली मुँह से बाहर निकाली।

अब मैंने जानबूझ कर एक बार आ*ईसक्रीम अपनी छाती पर गिरा दी जो मेरे बड़े से गोल उभार पर टिक ग*ई। मैंने एक हाथ में कप पकड़ा था और दूसरे में चम्मच।

मैंने विकास को कहा- “विकास यह देखो, आ*ईसक्रीम गिर ग*ई... इसे उठा कर मेरे मुँह में डाल दो।”

यह देख कर तो विकास की हालत बहुत खराब हो गयी। उसका लौड़ा अब उससे भी नहीं संभल रहा था। उसने डरते हु*ए मेरे हाथ से चम्मच लेने की कोशिश की मगर मैंने कहा- “अरे विकास, हाथ से डाल दो। चम्मच से तो खुद भी डाल सकती थी।”

यह सुन कर तो वो और चौंक गया..

फिर उसका कांपता हु*आ हाथ मेरे मम्मे की तरफ बढ़ा और एक ऊँगली से उसने आ*ईसक्रीम उठा*ई और फिर मेरे मुँह में डाल दी। मैंने उसकी ऊँगली अपने दांतों के नीचे दबा ली और अपनी जुबान से चाटने लगी। उसने खींच कर अपनी ऊँगली बाहर निकल ली तो मैंने कहा- “क्यों देवर जी दर्द तो नहीं हु*आ..?”

उसने कहा- “नहीं भाभी...!”.

मैंने कहा- “फिर इतना डर क्यों रहे हो...?”.

उसने कांपते हु*ए होंठों से कहा- “नहीं भाभी, डर कैसा...?”

मैंने कहा- “मुझे तो ऐसा ही लग रहा है...!”

फिर मैंने चम्मच फेंक दी और अपनी ऊँगली से उसको आ*ईसक्रीम चटाने लगी। वो डर भी रहा और शरमा भी रहा था और चुपचाप मेरी ऊँगली चाट रहा था।

मैंने कहा- “अब मुझे भी खिला*ओ....!” लेखिका : कोमलप्रीत कौर

तो उसने भी ऊँगली से मुझे आ*ईसक्रीम खिलानी शुरू कर दी। मैं हर बार उससे को*ई ना को*ई शरारत कर रही थी और वो और घबरा रहा था। आखिर आ*ईसक्रीम ख़त्म हो ग*ई और हम ठीक से बैठ गये।

मैंने उसको कहा- “विकास, मैं तुम को कैसी लगती हूँ?”

उसने कहा- “बहुत अच्छी!”

तो मैंने पूछा- “कितनी अच्छी?”

उसने फिर कहा- “बहुत अच्छी! भाभी....!”

फिर मैंने कहा- “मेरी एक बात मानोगे..?”

उसने कहा- “हाँ बोलो भाभी...?”

मैंने कहा- “तुम्हारे साथ घुलामस्ती करने से मेरी कमर में दर्द हो रहा है, तुम दबा दोगे...?”

उसने कहा- “ठीक है...”

तो मैं उलटी होकर लेट ग*ई... वो मेरी कमर दबाने लगा।

फिर मैंने कहा- “वो क्रीम भी मेरी कमर पर लगा दो!”

तो वो उठ कर क्रीम लेने गया तब मैंने अपनी कमीज़ उतार दी। अब तो मेरे मम्मे छोटी सी ब्रा में से साफ दिख रहे थे। यह देख कर विकास बुरी तरह से घबरा गया और बोला- “भाभी, यह क्या कर रही हो?”

मैंने कहा- “तुम क्रीम लगा*ओगे तो कमीज उतारनी ही पड़ेगी... नहीं तो तुम क्रीम कैसे लगा*ओगे?”

वो चुपचाप बैठ गया और मेरी कमर पर अपना हाथ चलाने लग। फिर मैं उसके सामने सीधी हो ग*ई और कहा- “विकास रहने दो, आ*ओ मेरे साथ ही लेट जा*ओ।” लेखिका : कोमलप्रीत कौर

उसने कहा- “नहीं भाभी! मैं आपके साथ कैसे सो सकता हूँ!”

मैंने कहा- “क्यों नहीं सो सकते...?”

तो वो बोला- “भाभी आप औरत हो और मैं आपके साथ नहीं सो सकता...!”

मैंने उसकी बाजू पकड़ी और अपने ऊपर गिरा लिया और कस कर पकड़ लिया। मैंने कहा- “विकास तुम्हारी को*ई सहेली नहीं है क्या?”

उसने कहा- “नहीं भाभी....अब मुझे छोड़ो...!”

मैंने कहा- “नहीं विकास, पहले मुझे अपनी पैंट में दिखा*ओ कि क्या है जो तो मुझ से छिपा रहे हो...?”

वो बोला- “नहीं भाभी, कुछ नहीं है...!”

मैंने कहा- “नहीं मैं देख कर ही छोड़ूंगी.. मुझे दिखा*ओ क्या है इसमें...!”

वो बोला- “भाभी, इससे पेशाब करते है... आपने भैया का देखा होगा...!”

मैंने फिर कहा- “मुझे तुम्हारा भी देखना है...!” और पैंट के ऊपर से ही उसको अपने हाथ में पकड़ लिया। हाथ में लेते ही मुझे उसकी गर्मी का एहसास हो गया।

विकास अपना लौड़ा छुड़ाने की कोशिश करने लगा मगर मेरे आगे उसकी एक ना चली! ना चाहते हुए भी उसने मुझे जबरदस्ती करने के लिये मजबूर कर दिया था।

फिर वो बोला- “भाभी अगर किसी को पता चल गया कि मैंने आपको यह दिखाया है तो मुझे बहुत मार पड़ेगी।”

मैंने कहा- “विकास, अगर किसी को पता चलेगा तो मार पड़ेगी... मगर हम किसी को नहीं बता*येंगे।”

फिर मैंने उसकी पैंट की हुक खोली और पैंट नीचे सरका दी। उसका कच्छा भी नीचे सरका दिया... और उसका बड़ा सा लौड़ा मेरे सामने था.... इतना बड़ा लौड़ा मैंने आज तक नहीं देखा था।

मैं बोली- “विकास, तुम मुझसे इसे छिपाने की कोशिश कर रहे थे मगर यह तो अपने आप ही बाहर भाग रहा है....”

विकास ने जल्दी से अपने हाथ से उसको छुपा लिया और पैंट पहनने लगा मगर मैंने खींच कर उसकी पैंट उतार दी और कच्छा भी उतार दिया। अब मैं और सब्र नहीं कर सकती थी और यह मौका हाथ से नहीं जाने दिया और उसका लौड़ा झट से मुँह में ले लिया और जोर-जोर से चूसने लगी।

पहले तो वो मेरे सर को पकड़ कर मुझे दूर करने लगा मगर थोड़ी देर में ही वो शान्त हो गया क्योंकि मेरी जुबान ने अपना जादू दिखा दिया था। अब वो अपना लौड़ा चुसवाने का मजा ले रहा था। मैं उसके लौड़े को जोर-जोर से चूस रही थी और विकास बिस्तर पर बेहाल हो रहा था... उसे भी अपने लौड़ा चुसवाने में मजा आ रहा था। उसके मुँह से सिसकारियाँ निकल रही थी। फिर उसके लौड़े ने अपना सारा माल मेरे मुँह में उगल दिया और मेरा मुँह उसके माल से भर गया। मैंने सारा माल पी लिया। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मैं अपने हाथों को चाटती हु*ई उठी और बोली- “विकास अब तुमको कुछ देखना है तो बता*ओ? मैं दिखाती हूँ!”

उसने मेरे मम्मों की ओर देखा और बोला- “भाभी, आपके ये तो मैंने देख लि*ए...!”

मैंने कहा- “कुछ और भी देखोगे...?”

उसने कहा- “क्या...?”

मैंने उसको कहा- “मेरी कमर से ब्रा की हुक खोलो!”

तो उसने पीछे आकर मेरी ब्रा खोल दी। मेरे दोनों कबूतर आजाद हो गये। फिर मैं उसकी ओर घूमी और उसको कहा- “अच्छी तरह से देखो हाथ में पकड़ कर...!”

उसने हाथ लगाया और फिर मुझसे बोला- “भाभी, मुझे बहुत डर लग रहा है...!”

मैंने कहा- किसी से मत डरो! किसी को पता नहीं चलेगा! और जैसे मैं कहती हूँ तुम वैसे ही करो, देखना तुम को कितना मजा आता है...!”

फिर मैंने उसका सर अपनी छाती से दबा लिया और अपने मम्मे उसके मुँह पर रगड़ने लगी।

वो भी अब शर्म छोड़ कर मेरे मम्मों का मजा ले रहा था। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मैंने अपनी सलवार का नाड़ा खोलते हुए उसको कहा- “मेरी सलवार उतार दो!”

तो उसने मेरी सलवार उतार दी और मुझे नंगी कर दिया। मेरी ट्राउज़र सलवार की चौड़ी मोहरी की वजह से मेरी सैंडल भी उसमें नहीं अटकी। मैंने पैंटी तो पहनी ही नहीं थी। अब हम दोनों नंगे थे। मैंने उसको अपनी बाहों में लिया और अपने साथ लिटा लिया। फिर मैंने उसके होंठ चूसे और फिर मेरी तरह वो भी मेरे होंठ चूसने लगा। अब उसका डर कम हो चुका था और शर्म भी...

अब मैं उसके मुँह के ऊपर अपनी चूत रख कर बैठ ग*ई और कहा- “जैसे मैंने तुम्हारे लौड़े को चूसा है तुम भी मेरी चूत को चाटो और अपनी जुबान मेरी चूत के अन्दर घुसा*ओ।”

वो मेरी चूत चाटने लगा। उसको अभी तक चूत चाटना नहीं आता था मगर फिर भी वो पूरा मजा दे रहा था। मेरी चूत से पानी निकल रहा था जिसको वो चाटता जा रहा था और कभी-कभी तो मेरी चूत के होंठो को अपने दांतों से काट भी देता था जो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। उसका लौड़ा फिर से तन चुका था।

अब मैं उठी और अपनी चूत को उसके लौड़े के ऊपर सैट करके बैठ ग*ई, मेरी गीली चूत में उसका लौड़ा आराम से घुस गया पर उसका लौड़ा बहुत बड़ा था। थोड़ा ही अन्दर जाने के बाद मुझे लगने लगा कि यह तो मेरी चूत को फाड़ डालेगा।

शायद उसको भी तकलीफ हो रही थी, वो बोला- “भाभी, मेरा लौड़ा आपकी चूत से दब रहा है।”

मैंने कहा- “बस थोड़ी देर में ठीक हो जायेगा... पहली बार में सबको तकलीफ होती है।” लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मैंने थोड़ी देर आराम से लौड़ा अन्दर-बाहर किया। फिर जब वो भी नीचे से अपने लौड़े को अन्दर धकेलने लगा तो मैं भी अपनी गाण्ड उठा-उठा कर उसके लौड़े का मजा लेने लगी। अब तक वो भी पूरा गर्म हो चुका था, उसने मुझे अपने नीचे आने के लि*ए कहा तो मैं वैसे ही लौड़े अन्दर लि*ए ही एक तरफ़ से होकर उसके नीचे आ ग*ई और वो ऊपर आ गया।

वो मुझे जोर-जोर से धक्के मारना चाहता था। उसका लौड़ा बाहर ना निकल सके इसलिये मैंने अपनी टांगों को उसकी कमर में घुमा लिया कैंची की तरह कस लीं। फिर वो आगे-पीछे होकर धक्के मारने लगा। मैं भी नीचे से उसका साथ दे रही थी, अपनी गाण्ड को हिला-हिला कर। उसके हर धक्के के साथ मेरी सैंडलों की ऊँची ऐड़ियाँ उसके चूतड़ों में गड़ जाती थीं।

काफी देर तक हमारी चुदा*ई चलती रही और फिर हम दोनों झड़ गये और वैसे ही लेट रहे।

मेरी इस एक चुदा*ई से अभी प्यास नहीं बुझी थी। इसलि*ए मैंने फिर से विकास के ऊपर जाकर उसका गर्म करना शुरू किया मगर वो तो पहले से ही तैयार था। अब उसने को*ई शर्म नहीं दिखा*ई और मुझे घोड़ी बनने के लि*ए बोल दिया।

मैंने भी उसके सामने अपनी गाण्ड उठा*ई और सर को नीचे झुका दिया और फिर उसने अपना बड़ा सा लौड़ा मेरी चूत में पेल दिया। उसके पहले धक्के ने ही मेरी जान ले ली। उसका लौड़ा मेरी चूत फाड़ कर अन्दर घुस गया। मगर मैं ऐसी ही चुदा*ई चाहती थी।

उस रात विकास ने मुझे तीन बार चोदा। मैं तो उससे गाण्ड भी मरवाना चाहती थी मगर वो एक बार मेरे मुँह में और तीन बार मेरी चूत में झड़ चुका था और उसमे अब हिम्मत बाकी नहीं थी। फिर सुबह-सुबह नौकरानी के आने का वक्त भी हो गया था और मेरे सास-ससुर भी वापस आने वाले थे इसलिये सोचा कि फिर मौका मिलेगा तो गाँड जरूर मरवा*उँगी उससे।

!!! क्रमशः !!!
Find all posts by this user
Quote this message in a reply
04-13-2016, 11:42 AM
Post: #4
RE: मेरी चुदाई
बीच रात की बात
Find all posts by this user
Quote this message in a reply
04-13-2016, 11:43 AM
Post: #5
RE: मेरी चुदाई
भाग ५. चार फौजी और चूत का मैदान (1)
सर्दियों के दिन थे, मैं अपने मायके ग*ई हु*ई थी, मेरे भैया भाभी के साथ ससुराल गये थे और घर में मैं, मम्मी और पापा ही थे। उस दिन ठण्ड बहुत थी, मेरा दिल कर रहा था कि आज को*ई मेरी गरमागरम चुदा*ई कर दे। कईं बार चूत में केला और बीयर की बोतल डाल कर मुठ मार चुकी थी लेकिन चूत में चैन नहीं पड़ रहा था। मैं दिल ही दिल में सोच रही थी कि को*ई आये और मेरी चुदा*ई करे.. कि अचानक दरवाजे की घण्टी बजी।

मैंने दरवाजा खोला तो सामने चार आदमी खड़े थे। एकदम तंदरुस्त और चौड़ी छातियाँ!

फिर पीछे से पापा की आवाज आ*ई- “ओये मेरे जिगरी यारो, आज कैसे रास्ता भूल गये?”

वो भी हंसते हु*ए अन्दर आ गये और पापा को मिलने लगे...

पापा ने बताया कि “हम सब आर्मी में इकट्ठे ही थे.. एक राठौड़ अंकल, दूसरे शर्मा अंकल, तीसरे सिंह अंकल और चौथे राणा अंकल ! सभी एक्स आर्मी मैन हैं।”

वो सभी मुझे मिले और सभी ने मुझे गले से लगाया। गले से क्या लगाया, सबने अपनी छाती से मेरे चूचों को दबाया।

मैं समझ ग*ई कि ये सभी ठरकी हैं। अगर किसी को भी ला*इन दूँगी तो झट से मुझे चोद देगा। मैं खुश हो ग*ई कि कहाँ एक लौड़ा मांग रही थी और कहाँ चार-चार लौड़े आ गये। पापा उनके साथ अन्दर बैठे थे और मैं चाय लेकर ग*ई। जैसे ही मैं चाय रखने के लि*ए झुकी तो साथ ही बैठे राठौड़ अंकल ने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हु*ए कहा- “कोमल बेटी.. तुम बता*ओ क्या करती हो...?”

मैं चाय रख कर राठौड़ अंकल के पास ही सोफे के हत्थे पर बैठ ग*ई और अपने बारे में बताने लगी। साथ ही राठौड़ अंकल मेरी पीठ पर हाथ चलाते रहे और फिर बातों-बातों में उनका हाथ मेरी कमर से होता हु*आ मेरे कूल्हों तक पहुँच गया।

यह बात बाकी फौजियों ने भी नोट कर ली सिवा*ए मेरे पापा के। फिर मम्मी की आवाज आ*ई तो मैं बाहर चली ग*ई और फिर कुछ खाने के लि*ए लेकर आ ग*ई। जब मैं झुक कर नाश्ता परोस रही थी तो उन चारों का ध्यान मेरे मम्मों की तरफ ही था और मैं भी उनकी पैंट में हलचल होती देख रही थी।

अब फिर मैं राठौड़ अंकल के पास ही बैठ ग*ई ताकि वो भी मेरे दिल की बात समझ सकें। मगर वो ही क्या उनके सारे दोस्त मेरे दिल की बात समझ गये। वो सारे मेरे गहरे गले में से दिख रहे मेरे कबूतर, मेरी गाण्ड और मेरी मदमस्त जवानी को बेचैन निगाहों से देख रहे थे और राठौड़ अंकल तो मेरी पीठ से हाथ ही नहीं हटा रहे थे।

फिर मैं रसो*ई में उनके लि*ए खाना बनाने में मम्मी की मदद करने लगी। बीच में ही मम्मी ने मुझे कहा- “पुत्तर! घर में महमान आये हैं... तू भी खाने के पहले मुँह हाथ धो कर कुछ अच्छे कपड़े पहन कर तैयार हो जा।”

मम्मी ना भी कहती तो मै तो उन चारों को लट्टू करने के लिये तैयार होने ही वाली थि। मैंने चुन कर झीनी सी सबसे गहरे गले वाली कमीज़ और कसी हुई चुड़ीदार सलवार पहन ली। अपने मम्मों को मैंने चुन्नी से ढक लिया जिससे मम्मी को शक ना हो।

हमने उनके पीने का इंतजाम ऊपर के कमरे में कर दिया। शराब के एक दौर के बाद सबने खाना खा लिया।

फिर मैंने और मम्मी ने भी खाना खाया और फिर मम्मी तो जाकर लेट ग*ई। मम्मी ने तो नींद की गोली खा*ई और सो ग*ई पर मुझे कहाँ नींद आने वाली थी... घर में चार लौड़े हों और मैं बिना चुदे सो जा*ऊँ! ऐसा कैसे हो सकता है....?

मैं ऊपर के कमरे में चली ग*ई, वहाँ पर फ़िर शराब का दौर चल रहा था। मुझे देख कर पापा ने तो मुझे जा कर सो जाने के लि*ए बोला, मगर सिंह अंकल ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने साथ सटा कर बिठा लिया और बोले- “अरे यार, बच्ची को हमारे पास बैठने दे, हम इसके अंकल ही तो हैं!” तो पापा मान गये और फिर सिंह अंकल मुझे बोले – “आओ हमारे साथ भी एक पैग लगाओ!” मैंने मुस्कुरा कर हामी भरी तो उन्होंने खुद शराब का एक बड़ा पैग बना कर मुझे पकड़ा दिया और उसके बद सारे अंकल मुझे फ़ौज की बातें सुनाने लगे।

फिर हम सभी शराब पीते रहे। मैं तो पहला ही पैग बहुत धीरे-धीरे पी रही थी, मगर वो सभी पापा को बड़े-बड़े पैग दे रहे थे और खुद छोटे-छोटे पैग ले रहे थे। मैं समझ ग*ई कि वो चारों पापा को जल्दी लुढ़काने के चक्कर में हैं।

फिर सिंह अंकल ने भी अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया। वो मेरी पीठ पर बिखरे मेरे बालों में हाथ घुमाने लगे। जब मेरी तरफ से को*ई विरोध नहीं देखा तो वो मेरी गाण्ड पर भी हाथ घुमाने लगे। पापा का चेहरा हमारी तरफ सीधा नहीं था मगर फिर भी अंकल सावधानी से अपना काम कर रहे थे।

फिर वो मेरी बगल में से हाथ घुसा कर मेरी चूची को टटोलने लगे मगर अपना हाथ मेरी चूची पर नहीं ला सकते थे क्योंकि पापा देख लेते तो सारा काम बिगड़ सकता था। उधर मेरा भी बुरा हाल हो रहा था। मेरा भी मन कर रहा था कि अंकल मेरे चूचों को कस कर दबा दें। फिर मैंने अपनी पीठ पर बिखड़े बाल कंधे के ऊपर से आगे को लटका दि*ए जिससे मेरा एक मम्मा मेरे बालों से ढक गया।

सिंह अंकल तो मेरे इस कारनामे से खुश हो गये। उन्होंने अपना हाथ मेरी बगल में से आगे निकाला और बालों के नीचे से मेरी चूची को मसल दिया। मेरी आह निकल ग*ई... मगर मेरे होंठों में ही दब ग*ई।

मैं भी टाँग पर टाँग रख कर बैठी थी और बीच-बीच में सिंह अंकल की टाँग पर घुटने के नीचे प्यार से अपने सैंडल से सहला रही थी। हमारी हरकतें पापा के दूसरे दोस्त भी देख रहे थे मगर उनको पता था कि आज रात उनका नंबर भी आ*एगा। अब मेरा मन दोनों मम्मे एक साथ मसलवाने का कर रहा था। मैं बेचैन हो रही थी मगर पापा तो इतनी शराब पी कर भी नहीं लुढ़क रहे थे। मेरा भी दूसरा पैग चल रहा था और नशा छाने लगा था।

मैं दूसरा पैग खतम करके उठी और बाहर आ ग*ई और साथ ही सिंह अंकल को बाहर आने का इशारा कर दिया और पापा को बोल दिया- “मैं सोने जा रही हूँ।”

मैं बाहर आ*ई और अँधेरे की तरफ खड़ी हो ग*ई। थोड़ी देर में ही सिंह अंकल भी फ़ोन पर बात करने के बहाने बाहर आ गये। मैंने उनको धीमी सी आवाज दी। वो मेरी तरफ आ गये और आते ही मुझको अपनी बाँहों में भर लिया और मेरे होंठ अपने मुँह में लेकर जोर-जोर से चूसने लगे। फिर मेरे बड़े-बड़े चूचे अपने हाथों में लेकर मसल कर रख दि*ए। मैं भी उनका लौड़ा अपनी चूत से टकराता हु*आ महसूस कर रही थी और फिर मैंने भी उनका लौड़ा पैंट के ऊपर से हाथ में पकड़ लिया।

अभी पांच मिनट ही हु*ए थे कि पापा बाहर आ गये और सिंह अंकल को आवाज दी- “ओये सिंह! यार कहाँ बात कर रहा है इतनी लम्बी.. जल्दी अन्दर आ....!”

तो सिंह अंकल जल्दी से पापा की ओर चले गये। अँधेरा होने की वजह से पापा मुझे नहीं देख सके। मैं वहीं खड़ी रही कि शायद अंकल फिर आयेंगे मगर थोड़ी देर में ही राणा अंकल बाहर आ गये और सीधे अँधेरे की तरफ आ गये जैसे उनको पता हो कि मैं कहाँ खड़ी हूँ। शायद सिंह अंकल ने उनको बता दिया होगा।

आते ही वो भी मुझ पर टूट पड़े और मेरी गाण्ड, चूचियाँ, जांघों को जोर-जोर से मसलने लगे और मेरे होंठों का रसपान करने लगे। वो मेरी कमीज़ को ऊपर उठा कर मेरे दोनों निप्पल को मुँह में डाल कर चूसने लगे। मैं भी उनके सर के बालों को सहलाने लगी।

तभी शर्मा अंकल की आवाज आ*ई- “अरे राणा तू चल अब अन्दर, मेरी बारी आ ग*ई!” अचानक आ*ई आवाज से हम लोग डर गये। हमें पता ही नहीं चला था कि को*ई आ रहा है।

फिर राणा अंकल चले गये और शर्मा अंकल मेरे होंठ चूसने लगे। मेरे मम्मे, गाण्ड, चूत और मेरे सारे बदन को मसलते हु*ए वो भी मुझे पूरा मजा देने लगे। शर्मा अंकल ने पजामा पहना था। मैंने पजामे में हाथ डाल कर उनके लण्ड को पकड़ लिया। खूब कड़क और लम्बा लण्ड हाथ में आते ही मैंने उसको बाहर निकाल लिया और नीचे बैठ कर मुँह में ले लिया।

शर्मा अंकल भी मेरे बालों को पकड़ कर मेरा सर अपने लण्ड पर दबाने लगे। मैं उनका लण्ड अपने होंठों और जीभ से खूब चूस रही थी। वो भी मेरे मुँह में अपने लण्ड के धक्के लगा रहे थे। फिर अंकल ने अपना पूरा लावा मेरे मुँह में छोड़ दिया और मेरा सर कस के अपने लण्ड पर दबा दिया। मैंने भी उनका सारा माल पी लिया। उनका लण्ड ढीला हो गया तो उन्होंने अपना लण्ड मेरे मुँह से निकाल लिया और फिर मेरे होंठों को चूसने लगे और फिर बोले- “मैं राठौड़ को भेजता हूँ...!” और अन्दर चले गये।

फिर राठौड़ अंकल आ गये। वो भी आते ही मुझे बेतहाशा चूमने लगे। मगर मैंने कहा- “अंकल ऐसा कब तक करोगे?”

वो रुक गये और बोले- “क्या मतलब?”

मैंने कहा- “अंकल, मैं सारी रात यहाँ पर खड़ी रहूँगी क्या? इससे अच्छा है कि मैं चूत में केला डाल कर सो जाती हूँ।”

तो वो बोले- “अरे क्या करें, तेरा बाप लुढ़क ही नहीं रहा! हम तो कब से तेरी चूत में लौड़ा घुसाने के लि*ए हाथ में पकड़ कर बैठे हैं!”

मैंने कहा – “तो को*ई बात नहीं... मैं जाकर सोती हूँ! केले से ही काम चला लुँगी!” मैंने आगे बढ़ते हु*ए कहा। मैं हल्के नशे में थी और चूत की बेचैनी अब सहन नहीं हो रही थी।

अंकल ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले- “बस तू पांच मिनट रुक... मैं देखता हूँ वो कैसे नहीं लुढ़कता!” और अन्दर चले गये।

फिर पांच मिनट में ही राणा और राठौड़ अंकल बाहर आये और बोले- “चल छमक-छल्लो! तुझे उठा कर अन्दर लेकर जा*एँ जा खुद चलेगी?”

मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि पापा इतनी जल्दी लुढ़क गये। फिर राणा अंकल ने मुझे गोद में उठा लिया और मुझे अन्दर ले गये। पापा सच में कुर्सी पर ही लुढ़के पड़े थे।

मैंने कहा- “पहले पापा को दूसरे कमरे में छोड़ कर आ*ओ।”

तो राणा और राठौड़ अंकल ने पापा को पकड़ा और दूसरे कमरे में ले गये। फिर शर्मा और सिंह अंकल ने मुझे आगे पीछे से अपनी बाँहों में ले लिया और मुझे उठा कर बिस्तर पर लिटा दिया। शर्मा अंकल मेरे होंठों को चूसने लगे और सिंह अंकल मेरे ऊपर बैठ गये। तभी राणा और राठौड़ अंकल अन्दर आये और बोले- “अरे सालो, रुक जा*ओ, सारी रात पड़ी है! इतने बेसबरे क्यों होते हो, पहले थोड़ा मज़ा तो कर लें!”

वो मेरे ऊपर से उठ गये और मैं भी बिस्तर पर बैठ ग*ई। मैंने कहा- “थैंक्स अंकल, आपने मुझे बचा लिया, नहीं तो ये मुझे को*ई मजा नहीं लेने देते...!”

फिर राणा अंकल ने पांच पैग बनाये और सब को उठाने के लि*ए कहा। मैं पहले ही दो बड़े पैग पी चुकी थी और ठीक-ठाक नशे में थी इसलिये मैंने नहीं उठाया तो अंकल बोले- “अरे अब नखरे छोड़ो और पैग उठा लो। चार चार फौजी तुमको चोदेंगे। नहीं तो झेल नहीं पा*ओगी....!”

नशे में अगर कोई ज्यादा पीने के लिये ज़ोर दे तो काबू नहीं रहता। मैंने भी पैग उठा लिया और पूरा पी लिया। राणा अंकल ने फिर से मुझे पैग बनाने को कहा तो मैंने सिर्फ चार ही पैग बना*ए। राणा अंकल बोले- “बस एक ही पैग लेना था?”

तो मैंने कहा- “नहीं!... अभी तो चार पैग और लुँगी!”

!!! क्रमशः !!!
Find all posts by this user
Quote this message in a reply
04-13-2016, 11:44 AM
Post: #6
RE: मेरी चुदाई
भाग ५. चार फौजी और चूत का मैदान (2)
मैं राणा अंकल के सामने जाकर नीचे बैठ ग*ई। अंकल की पैंट खोल कर और उतार दी। वो सभी मेरी ओर देख रहे थे। फिर मैंने अंकल का कच्छा नीचे किया और उनका सात-आठ इंच का लौड़ा मेरे सामने तन गया।

फिर मैंने अंकल के हाथ से पैग लिया और उनके लण्ड को पैग में डुबो दिया और फिर लण्ड अपने मुँह में ले लिया। मैं बार-बार ऐसा कर रही थी। राणा अंकल तो मेरी इस हरकत से बुरी तरह आहें भर रहे थे। मैं जब भी उनका लण्ड मुँह में लेती तो वो अपने चूतड़ उठा कर अपना लण्ड मेरे मुँह में धकेलने की कोशिश करते।

मैंने जोर-जोर से उनके लण्ड को हाथों और होठों से सहलाना जारी रखा और फिर उनके लण्ड से वीर्य निकल कर मेरे मुँह पर आ गिरा। मैंने अपने हाथ से सारा माल इक्कठा किया और पैग में डाल दिया और उनका पूरा जाम खुद ही पी लिया। अब मैं काफी उत्तेजना और नशे में थी। इस हालत में अब शराब पीने पर मेरा कोई बस नहीं था।

फिर मैं राठौड़ अंकल के सामने चली ग*ई। वो लुंगी पहन कर बैठे थे। मैंने उनकी लुंगी खींच कर उतार दी और फिर उनका लण्ड भी शराब में डाल-डाल कर चूसने लगी। उनका वीर्य भी मैंने मुँह में ही निगल लिया और उनका पैग भी।

फिर सिंह अंकल, जो कब से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, उनका लण्ड भी मैंने अपने हाथों में ले लिया और उन्होंने मेरी कमीज को उतार दिया। अब मैं सलवार और ब्रा में थी.. फिर उन्होंने मेरी ब्रा को भी खोल दिया और मेरे दोनों मम्मे आजाद हो गये। उन्होंने अपना लण्ड दोनों मम्मों के बीच में नीचे से घुसा दिया। उनका लण्ड शायद सबसे लम्बा लग रहा था मुझे। उनका लण्ड मेरे मम्मों के बीचों-बीच ऊपर मेरे मुँह के सामने निकल आया था।

मैंने फिर से अपना मुँह खोला और उनका लण्ड अपने मुँह में ले लिया। वो अपने लण्ड और मेरे मम्मों के ऊपर शराब गिरा रहे थे जिसको मैं साथ-साथ ही चाटे जा रही थी। मैं अपने दोनों मम्मों को साथ में जोड़ कर उनके सामने बैठी थी और वो अपनी गाण्ड को ऊपर नीचे करके मेरे मम्मों को ऐसे चोद रहे थे जैसे चूत में लण्ड अन्दर-बाहर करते हों।... और जब उनका लण्ड ऊपर निकल आता तो वो मेरे गुलाब जैसे लाल होंठों घुस जाता और उसके साथ लगी हु*ई शराब भी मैं चख लेती।

आखिर वो भी जोर-जोर से धक्के मारने लगे। मैं समझ ग*ई कि वो भी झड़ने वाले हैं। मैंने उनके लण्ड को हाथों में लेकर सीधा मुँह में डाल लिया। अब उनका लण्ड मेरे गले तक पहुँच रहा था और फिर उनका भी लावा मेरे मुँह में फ़ूट गया। वीर्य गले में से सीधा नीचे उतर गया।

अब शर्मा अंकल ने मुझे उठा लिया और मुझे बैड पर बिठा कर मेरी सलवार उतार दी। वो मेरी जांघों को मसलने लगे। फिर राठौड़ अंकल ने मेरी पैंटी उतार दी। अब मैं मादरजात नंगी थी... बस पैरों में ऊँची ऐड़ी के सैंडल पहने हुए थे। सिंह अंकल भी मेरे सर की तरफ बैठ गये और मेरे मुँह में शराब डाल कर पिलाने लगे।

मैंने सभी के लण्ड देखे… सारे तने हु*ए थे।

शर्मा अंकल का नंबर पहला था। मैं उठी और शर्मा अंकल को नीचे लिटा कर उनके लण्ड पर अपनी चूत टिका दी और धीरे-धीरे उस पर बैठने लगी। शर्मा अंकल का पूरा लण्ड मेरी चूत में घुस गया। मैं उनके लण्ड को अपनी चूत में चारों ओर घुमाने लगी। फिर मैं ऊपर नीचे होकर शर्मा अंकल को चोदने लगी। शर्मा अंकल भी मेरी गाण्ड को पकड़ कर मुझे ऊपर नीचे कर रहे थे और अपनी गाण्ड भी नीचे से उछाल-उछाल कर मुझे चोद रहे थे। मेरे उछलने से मेरे चूचे भी उछल रहे थे जो राणा अंकल ने पकड़ लि*ए और उनके साथ खेलने लगे।

फिर राणा अंकल ने मुझे आगे की तरफ झुका दिया और खुद मेरे पीछे आ गये जिससे मेरी गाण्ड उनके सामने आ ग*ई और वो अपना लण्ड मेरी गाण्ड में घुसाने लगे। मगर उनका लौड़ा मेरी कसी सूखी गाण्ड में आसानी से नहीं घुसने वाला था। फिर उन्होंने और जोर से धक्का मारा तो मुझे बहुत दर्द हु*आ जैसे मेरी गाण्ड फट ग*ई हो। मैं उनका लण्ड बाहर निकालना चाहती थी मगर उन्होंने नहीं निकालने दिया और फिर मुझे भी पता था कि दर्द तो कुछ देर का ही है।

वैसा ही हु*आ, थोड़ी देर में ही उनका पूरा लण्ड मेरी सूखी गाण्ड में था। दोनों तरफ से लग रहे धक्कों से मेरे मुँह से “आह आह” की आवाजें निकल रही थी। फिर राठौड़ अंकल ने मेरे सामने आकर अपना तना हु*आ लण्ड मेरे मुँह के सामने कर दिया। मैंने उनका लण्ड अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगी।

जब राणा अंकल मेरी गाण्ड में अपना लण्ड पेलने के लि*ए धक्का मारते तो सामने खड़े राठौड़ अंकल का लण्ड मेरे मुँह के अन्दर तक घुस जाता। मेरी “आह आह” की आवाजें कमरे में गूंजने लगी। मेरा बुरा हाल हो रहा था। उनका लण्ड मेरी गाण्ड में और भी अन्दर तक चोट कर रहा था। फिर उनका आखरी धक्का तो मेरे होश उड़ा गया। उनका लण्ड मेरी गाण्ड के सबसे अन्दर तक पहुँच गया था। मुझ में और घोड़ी बने रहने की ताकत नहीं बची थी। मैं नीचे गिर गयी मगर राणा अंकल ने मेरी गाण्ड को तब तक नहीं छोड़ा जब तक उनके वीर्य का एक-एक कतरा मेरी गाण्ड में ना उतर गया।

मैं बहुत थक ग*ई थी। हम सभी ने एक-एक पैग और लगाया। मेरी गाण्ड अभी भी दर्द कर रही थी मगर मैं इतने सारे पैग ले चुकी थी और नशे में इतनी धुत्त थी कि सब कुछ अच्छा-अच्छा ही लग रहा था।

मैं अंकल राठौड़ के आगे उनकी जांघों पर सर रख के लेट ग*ई और उनके लण्ड से खेलने लगी। सिंह अंकल मेरी टांगो की तरफ आकर बैठ गये। मैंने अपनी टांगे सिंह अंकल के आगे खोल दी और अपना सर राठौड़ अंकल के आगे रख दिया।

सिंह अंकल मेरे ऊपर आ गये और अपना लण्ड मेरी चूत के ऊपर रख कर धीरे-धीरे से अन्दर डाल दिया और फिर अन्दर बाहर करने लगे और झड़ ग*ए।

फ़िर राठौड़ अंकल ने मुझे अपने नीचे लिटा दिया और खुद मेरे ऊपर आकर मेरी चूत चोदने लगे। मेरी टांगों को उठा कर उन्होंने ने भी मुझे पूरे जोर से चोदा। फिर उन्होंने ने मेरी गाण्ड को भी चोदा और मेरी गाण्ड में ही झड़ गये। मैं कितनी बार झड़ चुकी थी, मुझे याद भी नहीं था।

मेरा इतना बुरा हाल था कि अब मुझसे खड़ा होना भी मुशकिल लग रहा था। मैं वहीं पर लेट ग*ई। हम सभी नंगे ही एक ही बिस्तर में सो गये। फिर अचानक मेरी आँख खुली और मैंने समय देखा तो सुबह के तीन बजे थे।

मैंने अपने कपड़े उठाये और बिल्कुल नंगी ही नीचे आने लगी। मगर सीढ़ियाँ उतरते वक्त मेरी टांगें नशे में बुरी कांप रही थी और चूत और गाण्ड में भी दर्द हो रहा था। नशे में बिल्कुल चूर थी और ऊँची ऐड़ी के सैंडलों में नंगी ही लड़खड़ती हुई कमरे तक आयी। रास्ते में तीन-चार बार लुढ़की भी।

सुबह मैं काफी देर से उठी और मुझ से चला भी नहीं जा रहा था। इसलि*ए मैं बुखार का बहाना करके बिस्तर पर ही लेटी रही। जब अंकल जाने लगे तो वो मुझसे मिलने आये। पापा और मम्मी भी साथ थे, इसलि*ए उन्होंने मेरे सर को चूमा और फिर जल्दी आने को बोल कर चले गये।

मगर मैं पूरा दिन और पूरी रात बिस्तर पर ही अपनी चूत और गाण्ड को पलोसती रही।

!!! क्रमशः !!!
Find all posts by this user
Quote this message in a reply
04-13-2016, 11:46 AM
Post: #7
RE: मेरी चुदाई
भाग ६. कॉलेज़ के गबरू
यह बात तब की है जब मेरी सासु जी जालंधर के एक अस्पताल में दाखिल थी और मेरे ससुर जी भी रात को उनके पास ही रहते थे। मैं सुबह घर से खाना वगैरह लेकर बस में जाती थी। वैसे तो मैं ड्राइविंग जानती थी लेकिन अस्पताल में और उसके आसपास पार्किंग की बहुत ही दिक्कत थी। एक दिन मैं सुबह जब बस में चढ़ी तो बस में बहुत भीड़ थी, जिनमें ज्यादा स्कूल और कॉलेज के लड़के थे।

उस दिन मैंने गहरे गले वाला सफ़ेद और गुलाबी रंग का पटियाला सलवार कमीज़ पहन रखा था और हमेशा की तरह पैरों में सफ़ेद रंग के ही काफी ऊँची ऐड़ी के सैंडल पहने हुए थे। जहाँ पर मैं खड़ी थी वहां पर मेरे आगे एक बूढ़ी औरत और मेरे पीछे एक लड़का था। कुछ देर बाद उस लड़के ने अपना लण्ड मेरी गाँड से लगा लिया। बस में इतनी भीड़ थी कि ऐसा होना आम था और किसी को पता भी नहीं चल सकता था। यह तो मुझे और उस लड़के को ही पता था।

मेरी तरफ से को*ई विरोध ना देख कर लड़के ने अपना लण्ड मेरी गाण्ड पर रगड़ा। मेरे बदन में एक करंट सा दौड़ गया। मुझे लण्ड के स्पर्श से बहुत मजा आया! और आता भी क्यों ना? लण्ड होता ही मजे के लि*ए है.. खासकर मेरे लि*ए...। लड़के का लण्ड सख्त हो चुका था और बेकाबू भी होता जा रहा था क्योंकि अब उसकी छलांगे मेरी गाण्ड महसूस कर रही थी। उस दिन मैंने पैंटी भी नहीं पहनी थी और कॉटन की पटियाला सलवार के नीछे मेरी गाँड बिल्कुल नंगी थी। इसके अलावा ऊँची ऐड़ी के सैंडल की वजह से मेरी बड़ी गाँड और भी ज्यादा पीछे की ओर उभरी हुई थी। जब भी बस में कहीं धक्का लगता तो मैं भी उसके लण्ड पर दबाव डाल देती। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

हम दोनों लण्ड और गाण्ड की रगड़ा*ई के मजे ले रहे थे। अब बस जालंधर पहुँच चुकी थी और सब बस से उतर रहे थे, मुझे भी उतरना था और उस लड़के को भी। बस से उतरते ही लड़का पता नहीं कहाँ चला गया। मेरी चूत मेरा चुदने का मन कर रहा था, मगर वो लड़का तो अब कॉलेज चला गया होगा, यह सोच कर मैं उदास हो ग*ई।

अब मुझे अस्पताल जाना था। मैं बस स्टैंड से बाहर आ ग*ई और ऑटो में बैठने ही वाली थी कि वही लड़का बा*ईक लेकर मेरे पास आकर खड़ा हो गया। मैं उसे देख कर हैरान हो गयी। वो बोला- “भाभी जी आ*ओ, मैं आपको छोड़ देता हूँ।”

पहले तो मैंने मना कर दिया, मगर फिर उसने कहा- “आप जहाँ कहोगी मैं वहीं छोड़ दूँगा!”

वैसे भी लड़का इतना सैक्सी था कि उसको मना करना मुश्किल था। तो मैं उसकी बा*ईक की सीट पर उसके पीछे बैठ ग*ई। उसकी बा*ईक में पैर रखने के लिये सिर्फ एक छोटा सा खूँटा था तो मैंने उस खूँटे पर अपना एक सैंडल टिका लिया और उस टाँग पर अपनी दूसरी टाँग चढ़ा कर बैठी थी और सहारे के लिये मैंने उसके कंधे पर हाथ रख लिया। सीट की ढलान की वजह से मैं उससे सटी हुई थी और जब उसने बाइक की स्पीड बढ़ा दी तो मुझे सहरे के लिये उसकी कमर में अपनी दोनों बाँहें डालने पड़ीं। बीच-बीच में मैं उसकी टाँगों के बीच में भी हाथ फिरा कर उसके सख्त लण्ड का जायज़ा ले लेती थी।

रास्ते में उसने अपना नाम अनिल बताया। मैंने भी अपने बारे में बताया। थोड़ी आगे जाकर उसने कहा- “भाभी अगर आप गुस्सा ना करो तो यहीं पास में से मैंने अपने दोस्त से कुछ किताबें लेनी थी...!”

मैंने कहा- “को*ई बात नहीं, ले लो...” लेखिका : कोमलप्रीत कौर

फिर आगे जाकर उसने एक बड़े से शानदार घर के आगे बा*ईक रोकी। गेट खुला था तो वो बा*ईक और मुझे भी अंदर ले गया। उसका दोस्त सामने ही खड़ा था। वो दोनों मुझसे थोड़ी दूर खड़े होकर कुछ बातें करने लगे। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मुझे चोदने की बातें कर रहे हों। काश यह दोनों लड़के आज मेरी चुदा*ई कर दें! बस में और फिर बा*ईक पर अनिल को खुल्ले*आम सिगनल तो मैंने दे ही दिया था।

फिर अनिल ने अपने दोस्त से मिलवाया। उसका नाम सुनील था। सुनील ने मुझे अंदर आने को कहा मगर मैंने सोचा कि सुनील के घर वाले क्या सोचेंगे। इसलि*ए मैंने कहा- “नहीं मैं ठीक हूँ!” और फिर अनिल को भी जल्दी चलने को कहा।

तो अनिल मुझसे बोला – “भाभी जी, दो मिनट बैठते हैं, सुनील घर में अकेला ही है।”

यह सुनकर तो मैं बहुत खुश हो ग*ई कि यहाँ पर तो बड़े आराम से चुदा*ई करवा*ई जा सकती है। मैं उनके साथ अंदर चली ग*ई और सोफे पर बैठ ग*ई। सुनील कोल्ड ड्रिंक लेकर आया और हम कोल्ड ड्रिंक पीते हु*ए आपस में बातें करने लगे।

अनिल मेरे साथ बैठा था और सुनील मेरे सामने। वो दोनों घुमा फिरा कर बात मेरी सुन्दरता की करते। अनिल ने कहा- “भाभी, आप बहुत सुन्दर हो, जब आप बस में आ*ई थी तो मैं आपको देखता ही रह गया था!”

मैंने कहा- “अच्छा तो इसी लि*ए मेरे पास आकर खड़े हो गये थे?”

अनिल बोला- “नहीं भाभी, वो तो बस में काफी भीड़ थी, इस लि*ए...”

फिर मुझे वही पल याद आ गये जो बस में गुजरे थे इसलि*ए मैं शरमाते हु*ए चुप रही। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

फिर अनिल बोला- “भाभी वैसे बस में काफी मजा था... मेरा मतलब इतनी भीड़ थी कि सर्दी का पता ही नहीं चल रहा था!”

मैंने शरमाते हु*ए कहा- “हाँ...! वो... वो... तो है...” मैं समझ ग*ई थी कि वो क्या कहना चाहता है।

उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे हाथ पर रख दिया और बोला- “भाभी अब काफी सर्दी लग रही है, अब क्या करूँ?”

उसका हाथ पड़ते ही मैं शरमा ग*ई और बोली- “क क.. क्या... क्या.. कर.... करना.. है... गर्मी चाहि*ए तो पैग-शैग लगाओ....”

अनिल- “भाभी, मगर मुझे तो वो ही गर्मी चाहि*ए जो बस में थी...”

मैं शरमाते हु*ए अपने बाल ठीक करने लगी। मेरा शरमाना उनको सब कुछ करने की इजाजत दे रहा था। अनिल ने मौके को समझा और अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दि*ए।

मैंने आँखे बंद कर ली और सोफे पर ही लेट ग*ई। अनिल भी मेरे ऊपर ही लेट गया! अब सारी शर्म-हया ख़त्म हो चुकी थी…

अनिल ने मेरे होंठ अपने मुँह में और मेरे चूचे अपने हाथों में पकड़ लि*ए थे। मेरी आँखें बंद थी। इस वक्त सुनील पता नहीं क्या कर रहा था मगर उसने अभी तक मुझे नहीं छु*आ था। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

अनिल मेरे होंठों को जोर जोर से चूस रहा था, मैंने हाथ उसकी कमर पर ढीले से छोड़ रखे थे…

फिर सुनील मेरी सर की तरफ आ गया और मेरे गोरे-गोरे गालों और मेरे बालों में हाथ घुमाने लगा। मेरी आँखें अब भी बंद थीं।

वो दोनों मुझसे प्यार का भरपूर का मजा ले रहे थे... कभी अनिल मेरे होंठ चूसता तो कभी सुनील।

अनिल ने मेरी पजामी और कमीज उतार दी। फिर सुनील ने ब्रा भी उतार दी... पैंटी तो पहनी ही नहीं हुई थी।

मैं बिलकुल नंगी हो चुकी थी। बस गले में सफ़ेद मोतियों की माला, कलाइयों में चूड़ियाँ और पैरों में ऊँची ऐड़ी के सैंडल। दोनों मुँह खोले मेरी साफ-सुथरी और शेव की हुई चिकनी चूत ताकने लगे। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

वासना में मेरी साँसें तेज़ चल रही थीं और आगे बढ़ने से पहले मैंने उनसे कहा – “क्यों ना शराब एक-एक पैग लगा लें! फिर और भी मज़ा आयेगा!” तो दोनों लड़के हैरान हो गये। अनिल बोला- “भाभी आप को शराब पीनी है?” मैंने मुस्कुराते हुए गर्दन हिला कर हामी भरी तो सुनील बोला – “शराब! भाभी… वो भी इतनी सुबह?”

मैं भी थोड़ा गुस्सा होते हुए बोली – “क्यों! अगर इतनी सुबह मेरे साथ ये सब मज़े कर सकते हो तो शराब में क्या बुरायी है... शराब से मज़ा दुगना हो जायेगा।”

अनिल परेशान होते हुए बोला- “भाभी हमने तो पहले कभी पी नहीं है...”

“पीते नहीं पर पिला तो सकते हो!” मैंने थोड़ा ज़ोर दिया तो अनिल ने कहा – “पर इतनी सुबह शराब कहाँ मिलेगी?”

सुनील बोला – “मिल जायेगी! मेरे चाचा जी के कमरे में मिलेगी... मैं ले कर आता हूँ!” फिर वो भगता हूआ अंदर गया और बैगपाइपर व्हिस्की की आधी भरी बोतल ले आया और एक काँच का ग्लास आधा भर कर मुझे पकड़ा दिया। मेरी हँसी छूट गयी- “ये तो पूरा पटियाला पैग ही बना दिया तुमने...!”

सुनील झेंपते हुए बोला- “सॉरी भाभी! मैंने कहाँ कभी पैग बनाया है पहले... लाइये मैं कम कर देता हूँ!”

“रहने दे... अब तूने पटियाला पैग बना ही दिया तो अब पी लुँगी... चीयर्स!” – मैं मुस्कुराते हुए पैग पीने लगी। “किसी को चोदा तो है ना पहले कि वो भी मुझे ही सिखाना पड़ेगा?” मैंने पैग पीते हुए बीच में हंसते हुए पूछा!

तो अनिल बोला- “क.. क.. की तो नहीं है पर हमें सब पता है!”

“हाँ भाभी... हमने ब्लू-फिल्मों में सब देखा है और फिर आप भी तो गाइड करेंगी!” सुनील भी बोला।

मैं तो बस मज़ाक कर रही थी मगर मन ही मन में खुश हो रही थी कि मुझे दो कुँवारे लण्ड चोदने क मिल रहे थे। पैग खत्म करके मैंने ग्लास एक तरफ रख कर फिर मैं सोफे पर घुटनों के बल बैठ ग*ई और सुनील की पैंट उतार दी.. उसका लौड़ा उसके कच्छे में फ़ूला हु*आ था। मैंने झट से उसका लौड़ा निकाला और अपने हाथों में ले लिया और फिर मुँह में डाल कर जोर-जोर से चूसने लगी। मैं सोफे पर ही घोड़ी बन कर उसका लौड़ा चूस रही थी और अनिल मेरे पीछे आकर मेरी चूत चाटने लगा। अनिल जब भी अपनी जीभ मेरी चूत में घुसाता तो मैं मचल उठती और आगे होने से सुनील का लौड़ा मेरे गले तक उतर जाता।

सुनील भी मेरे बालों को पकड़ कर अपना लौड़ा मेरे मुंह में ठूंस रहा था। फिर सुनील का वीर्य निकल गया और मैंने सारा वीर्य चाट लिया। उधर अनिल के चाटने से मैं भी झड़ चुकी थी। इतनी देर में मुझ पर शराब का मस्ती भरा हल्का नशा चढ़ चुका था।

अब अनिल का लौड़ा मुझे शांत करना था। अनिल सोफे पर बैठ गया और मैं अनिल के आगे उसी की तरफ मुंह करके उसके लौड़े पर अपनी चूत टिका कर बैठ ग*ई। उसका लोहे जैसा लौड़ा मेरी चूत में घुस गया। “आहहह!” मुझे दर्द हु*आ मगर मैंने फिर भी उसका पूरा लौड़ा अपनी चूत में घुसा लिया। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मैं ऊपर-नीचे होकर उसके लौड़े से चुदा*ई करवा रही थी और सुनील मेरे मम्मों को अपने हाथों से मसल रहा था।

अनिल भी नीचे से जोर-जोर से मेरी चूत में अपना लौड़ा घुसेड़ रहा था। इसी दौरान मैं फ़िर झड़ ग*ई और अनिल के ऊपर से उठ ग*ई मगर अनिल अभी नहीं झड़ा था तो उसने मुझे घोड़ी बना लिया और अपना लौड़ा मेरी गाण्ड में ठूंस दिया।

उफ़! यह बहुत मजेदार चुदा*ई थी!

अनिल ने मेरी गाण्ड में छः-सात ज़ोरदार धक्के लगाये तो मेरी इच्छा दोहरी चुदाई का मज़ा लेने की हुई। इसलिये मैंने अनिल को लिटाया और मैं उसके लौड़े पर बैठ गयी। अब अनिल मेरे नीचे था और मैं अनिल का लौड़ा अपनी गाण्ड में लि*ए उसके पैरों की ओर मुंह कर के बैठी थी। मैंने इशारा किया तो सुनील मेरे सामने आ कर बैठ गया और अपना लौड़ा मेरी चूत में घुसाने लगा। मैं अनिल पर उलटी लेट ग*ई और सुनील ने मेरे ऊपर आकर अपना लौड़ा मेरी चूत में घुसा दिया। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

उफ़! अब तो मुझे बहुत दर्द हो रहा था और मेरा दिल चिल्लाने को कर रहा था मगर थोड़ी ही देर में चुदा*ई फिर शुरू हो ग*ई। मैं दोनों के बीच चूत और गाण्ड की प्यास एक साथ बुझा रही थी और वो दोनों जोर-जोर से मेरी चुदा*ई कर रहे थे।

मैं दो बार झड़ चुकी थी… फिर अनिल भी झड़ गया और उसके बाद सुनील भी झड़ गया। हम तीनों थक हार कर लेट गये। फिर मैंने अपने कपड़े पहने। हल्का सा नशा अभी भी था मगर मैंने पानी पिया और हस्पताल चली ग*ई।

हस्पताल से निकलने के बाद शाम को और पूरी रात को मैं अकेली ही होती थी इस लि*ए वो अनिल और सुनील दोनों शाम को मुझे हस्पताल से सुनील के घर ले जाते। सुनील के घर वाले दिल्ली गये हुए थे इसलिये कोई पूरी आज़ादी थी। मेरे साथ वो भी शराब पीने लगे। हम तीनों मिलकर ब्लू-फिल्म देखते, शराब पीते और फिर वो दोनों मिलकर सारी रात मेरी चुदा*ई करते। सुबह मैं तैयार होकर हस्पताल आ जाती और वो दोनों कॉलेज इसी तरह पाँच दिन चुदा*ई चलती रही और फिर सासु ठीक होकर घर आ ग*ई तो उन दोनों लड़कों के साथ चुदा*ई भी बंद हो ग*ई।

!!! क्रमशः !!!
Find all posts by this user
Quote this message in a reply
04-13-2016, 11:46 AM
Post: #8
RE: मेरी चुदाई
भाग ७. जब कुत्ते ने मुझे चोदा (Part 1)
जैसे कि अपनी पिछली कहानियों में बता चुकी हूँ कि मेरा नाम कोमल प्रीत कौर है और मेरे पति आर्मी में मेजर है। उनकी पोस्टिंग दूर-दराज़ के सीमावर्ती इलाकों पर होती तहती है और इसलिये मैं अपनी सास और ससुर के साथ जालंधर के पास एक गाँव में रहती हूँ जहाँ हमारी पुश्तैनी कोठी और काफी ज़मीन-जायदाद है। मैं बहुत ही चुदक्कड़ किस्म की औरत हूँ। मेरी चुदाई की प्यास इतनी ज्यादा है कि दिन में कम से कम आठ-दस बार तो मुठ मार कर झड़ती ही हूँ।

मेरी उम्र तीस की है। मैं स्लिम और सैक्सी बदन की मालकिन हूँ। मेरी लम्बाई वास्तव में हालांकि पाँच फुट तीन इंच है पर दिखने मैं पाँच फुट सात इंच के करीब लगती हूँ क्योंकि मुझे हर वक्त ऊँची ऐड़ी की चप्पल सैंडल पहनने का शौक है। मेरा गोरा बदन, बड़े-बड़े गोल मटोल चूतड़ (३६) और उसके ऊपर पतली सी कमर (२८) और फ़िर गठीले तने हुए गोल गोल मम्मे (३४) और मेरी कमर के ऊपर लहराते मेरे चूतड़ों तक लंबे काले घने बाल किसी का भी लंड खड़ा करने के लिये काफी हैं। मगर फ़िर भी जब मैं अपने हुस्न के नखरे और अपनी कातिलाना अदायें बिखेरती हूँ तो बुढ्ढों के भी लंड खड़े होते मैंने देखे हैं। मैंने कईयों से चुदाई भी करवाई है जिसमें से कुछ किस्से पिछली कहानियों में बता चुकी हूँ।

जैसे कि आपको पता है कि रात को बेडरूम में शराब की चुस्कियाँ लेते हुए मुझे कंप्यूटर पर वयस्क वेबसाइटों पर नंगी ब्लू-फिल्में देखते हुए मुठ मारने की आदत है। ऐसे ही एक दिन मैं जब इंटरनेट पर ब्लू-फिल्में देखने के लिये सर्च कर रही थी तो एक वेबसाइट पर कुत्ते के साथ चुदाई की क्लिप मिली जिसमें दो औरतें कुत्ते के लण्ड से चुदवा रही थीं। इसे देख कर मैं बहुत उत्तेजित हो गयी और सोडे की बोतल चूत में घुसेड़ कर खुब मुठ मारी। फिर मेरा भी दिल करने लगा कि मैं भी हमारे कुत्ते रॉकी से चुदाई करवा के देखूँ। मगर घर में सास और ससुर के होते ये होना मुश्किल था।

रॉकी ज्यादातर मेरे ससुर जी के साथ ही रहता था। रात को भी उनके कमरे में ही सोता था। वैसे भी कुत्ते से चुदाई का कोई तजुर्बा तो था नहीं इसलिए रॉकी से जल्दबाज़ी में तो चुदाई हो नहीं सकती थी। रॉकी को किसी तरह फुसला कर अपनी इस कामुक इच्छा को अंजाम देने के लिये मुझे पूरी प्राइवसी की जरूरत थी। अपनी वासना में बहक कर फिर भी मैं मौका देख कर कभी-कभी रॉकी को प्यार से पुचकारती और उसके लंड वाली जगह पर हाथ लगा देती तो रॉकी भी एक बार चिहुंक उठता। मैं तो कुत्ते के लंड कि इतनी प्यासी थी कि मेरा मन हर वक्त रॉकी के लंड वाली जगह पर ही टिका रहता। हर रोज़ रात को इंटरनेट पर कुत्तों से औरतों की चुदाई की फिल्में देख कर मुठ मारने लगी और दिन में कईं बार बाथरूम में या बेडरूम में जा कर रॉकी के बारे में सोचते हुए मुठ मारती।

फिर एक दिन मुझे मौका मिल ही गया। मेरे सास और ससुर को कुछ दिनों के लिये कहीं रिश्तेदारों में जाना था। वो दोपहर घर से करीब तीन बजे निकले और फ़िर मैंने भी जल्दी-जल्दी घर का काम निपटाया। रॉकी उस दिन सुबह से हमारे खेत पर था। मैंने खेतों की देखभाल करने वाले नौकर को फोन करके रॉकी को घर वापस लाने के लिये कह दिया। वो बोला कि कुछ जरूरी काम निपटाने के बाद करीब दो घंटे में रॉकी को घर छोड़ जायेगा। मुझे बहुत गुस्सा आया और एक बार तो मन किया कि खुद ही कार ले कर वहाँ जाऊँ और रॉकी को ले आऊँ। मगर फिर मैंने सोचा कि क्यों ना रॉकी को आकर्षित करने के लिये इतनी देर मैं थोड़ा सज-संवर कर तैयार हो लूँ। हालाँकि कुत्ते के लिये सजने संवरने का ख्याल बेकार का था लेकिन फिर भी मैंने नहा-धो कर अच्छा सा सलवार-कमीज़ और हाई हील के सैंडल पहने और मेक-अप भी किया।

तैयार होने में करीब एक घंटा ही निकला और रॉकी के आने में अभी भी करीब एक और घंटा बाकी था। मुझसे तो उत्तेजना और बेचैनी में इंतज़ार ही नहीं हो रहा था। कुछ और सूझा नहीं तो व्हिस्की का पैग पीते हुए मैं लैपटॉप पर कुत्ते से चुदाई की फिल्म देखने लगी। तीन औरतें दो कुत्तों के साथ चुदाई का मज़ा ले रही थीं। उनमें एक रॉकी कि तरह ही भूरा ऐल्सेशन कुत्ता था और दूसरा बड़ा सफेद कुत्ता शायद लैब्राडोर था। वो तीनों औरतें उनके लंड चूस रही थीं और अपनी चूत भी चटवा रही थीं। फिर उनमें से एक औरत अपनी चूत में कुत्ते का लंड लेकर चुदवाने लगी और एक औरत दूसरे कुत्ते से गाँड मरवाने लगी। मैंने अपनी पजामी में हाथ डाल कर चूत सहलाना शुरू कर दिया। करीब आधे घंटे बाद वो फिल्म खत्म हुई। इस दौरान मेरी चूत तीन बार झड़ी। अब तक मैंने व्हिस्की के दो पैग पी लिये थे और मुझ पे शराब की सुहानी सी खुमारी छा गयी थी। अपनी पिछली कहानियों में मैं ज़िक्र कर चुकी हूँ कि मुझे चुदाई से पहले शराब पीना अच्छा लगता है मगर शराब मैं इतनी ही पीती हूँ कि मुझे इतना ज्यादा नशा ना चढ़े कि मैं खुद को संभाल ना सकूँ। वैसे कईं बार ज्यादा भी हो जाती है।

अगले आधे घंटे में मैंने शराब का एक छोटा पैग और पिया। फिर खेत पे काम करने वाले नौकर ने घंटी बजायी तो रॉकी को अंदर लेकर मैंने दरवाजे को लॉक किया और रॉकी को पुचकारती हुई अपने बेडरूम में ले गयी और उसका भी दरवाजा बंद कर दिया। पहले तो मैंने उसके साथ बहुत प्यार किया और कपड़े उतारे बगैर ही उसे अपने बदन से चिपकती रही। रॉकी भी अपनी जुबान निकाल कर मुझे इधर उधर चाटने लगा। उसकी खुरदरी जुबान जब मेरी गर्दन के ऊपर चलती तो बहुत मज़ा आता। मैं नीचे ही टाँगें फैला कर उसके सामने बैठ गयी और फ़िर अपनी कमीज़ को उतार दिया। मेरे बूब्स मेरी ब्रा में से बाहर आने को थे।

मैंने रॉकी का मुँह पकड़ कर अपने मम्मों की तरफ़ किया तो वो सूँघ कर धीरे-धीरे से अपनी जुबान मेरे मम्मों के ऊपरी हिस्से पर रगड़ने लगा। ‘आअहहह’ क्या एहसास था उसकी खुरदरी जुबान का। वो ब्रा के बीच भी अपना मुँह डालने की कोशिश करता मगर ब्रा टाईट होने के कारण उसका मुँह अंदर नहीं जा पाता था। मगर उसकी जुबान थोड़ी सी निप्पल को छू जाती तो मेरे तन बदन में और भी बिजली दौड़ जाती।

अब मैंने अपनी ब्रा के हुक पीछे सो खोल दिये और फ़िर ब्रा को भी उतार दिया। रॉकी अब इन खुले कबूतरों को देख कर और भी तेजी से निप्पल पर अपनी जुबान चलाने लगा। वो अपनी पूँछ को बड़े अंदाज़ से हिला रहा था। मैं उसकी पीठ पर हाथ घुमाने लगी और फ़िर अपना हाथ उसके लंड कि तरफ़ ले गयी। जब मैंने रॉकी का लंड हाथ में पकड़ा तो शायद वो परेशान हो गया और जल्दी से मुढ़ कर मेरे हाथ की तरफ़ लपका। मैंने उसका लंड छोड़ दिया मगर मुझे उसके लंड की जगह वाला हिस्सा काफी सख्त लगा। रॉकी फ़िर से मेरे निप्पल को चाटने लगा। अब मैंने अपनी पजामी (सलवार) जो मेरी टाँगों से चिपकी हुई थी, उसका नाड़ा खोलना शुरू किया तो रॉकी पहले से ही मेरी पजामी को सूँघने लगा।

मैंने अपने चूतड़ उठा कर अपनी पजामी को नीचे किया और फ़िर अपने सैंडल पहने पैरों से निकाल कर अलग कर दिया। मेरी पैंटी पर चूत वाली जगह पर मेरी चूत का रस लगा हुआ था। रॉकी इसे तेजी से सूँघने लगा और फ़िर मैं खड़ी हो गयी और मैंने अपनी पैंटी भी उतार फेंकी। अब मैं बिल्कुल नंगी थी और बस पैरों में काले रंग के ऊँची पेन्सिल हील के सैंडल पहने हुए थे। मेरी चिकनी चूत को देख कर रॉकी मेरी टाँगों में मुँह घुसाने लगा और मेरी जाँघों पर अपनी जुबान से चाटने लगा।
Find all posts by this user
Quote this message in a reply
04-13-2016, 11:47 AM
Post: #9
RE: मेरी चुदाई
भाग ७. जब कुत्ते ने मुझे चोदा (Part 2)
एक तो पहले से ही शराब का नशा था और रॉकी की हरकतों से तो मैं और ज्यादा मदहोश हुई जा रही थी। मैं बेड के किनारे पर बैठ गयी और अपनी टाँगें फैला दी। रॉकी के सामने मेरी चूत के होंठ खुल गये जिसमें रॉकी ने जल्दी से अपनी जुबान का एक तगड़ा वार किया और मैं सर से पाँव तक उछल पड़ी। मुझे इतना मज़ा तो किसी मर्द से चूत चटवा कर भी नहीं आया था जितना मज़ा रॉकी मेरी चूत चाट कर दे रहा था। जब रॉकी अपनी जुबान को मेरी चूत पर ऊपर नीचे करता और उसकी जुबान मेरी चूत के दाने से टकराती जिसके कारण मैं भी अपनी चूत को मसलने लगी और मेरी चूत में से मेरे चूत-रस की एक तेज धार निकल कर रॉकी की जुबान पर गिरी। रॉकी को तो जैसे मलाई मिल गयी हो। वो और भी तेजी से चूत को चाटने लगा और अपनी जुबान को चूत के अंदर तक घुसेड़ने की कोशिश करने लगा। मैंने देखा रॉकी का लंड भी थोड़ा सा बाहर दिखायी दे रहा था और मुझसे भी अब और सब्र नहीं हो रहा था।

मैं ज़मीन पर ही कुत्तिया की तरह घुटनों के और अपने हाथों के बल बैठ गयी ताकि रॉकी मुझे कुत्तिया समझ कर मेरे पीछे से मेरे ऊपर चढ़ जाये। मगर वो तो मेरी साइड में से होकर मेरी चूत को ही चाटने की कोशिश कर रहा था। मैं कुत्तिया की तरह चल कर घूम गयी और अपनी चूत पीछे से उसके सामने कर दी। वो फ़िर से मेरी चूत को चाटने लगा। रॉकी पालतू कुत्ता था और उसने पहले कभी किसी कुत्तिया को नहीं चोदा था और चुदाई का उसे कोई तजुर्बा नहीं था। काफी देर के बाद भी जब वो मेरे ऊपर नहीं चढ़ा तो मैं अपने पैरों पर गाँड के बल बैठ गयी और मैंने उसके दोनों अगले पाँव पकड़े और उनको अपनी कमर के साथ लपेट लिया और फ़िर से आगे की ओर झुक गयी। इससे वो मेरी कमर पर आ गया, मगर उसका लंड अभी मेरी चूत तो क्या टाँगों से भी नहीं छू रहा था। मैं आगे से और नीचे झुक गयी और ज़मीन पर अपना सर लगा कर रॉकी के दोनों पाँव आगे को खींच लिये, जिससे अब रॉकी का लंड मेरी चूत के साथ टकरा गया। रॉकी को भी ये अच्छा लगा और वो भी अपनी कमर हिला-हिला कर अपना लंड मेरी चूत के इधर-उधर ठोकने लगा और अपने अगले पैरों से मेरी कमर को कस के पकड़ लिया। मगर उसका लंड अभी मेरी चूत में नहीं घुसा था।

मैं अपना एक हाथ पीछे लायी और रॉकी का लंड अपनी उंगलियों में हल्का सा पकड़ लिया। उसके लंड का अगला हिस्सा बहुत पतला महसूस हो रहा था। मेरी उंगलियों के स्पर्श से रॉकी को शायद ऐसा लगा कि उसका लंड मेरी चूत में घुस गया है तो वो जोर-जोर से धक्के मारने लगा और अपने अगले पाँव से मुझे अपनी ओर खींचने लगा। इतने तेज झटकों से मेरे हाथ से भी लंड इधर उधर हो रहा था और चूत में नहीं जा रहा था। मगर फ़िर अचानक रॉकी का लंड सही ठिकाने पर टकराया और तेजी से मेरी चूत में करीब दो इंच तक घुस गया। उसका लंड मेरी चूत की दीवारों से ऐसे टकराया जैसे कोई तेज धार वाला चाकू मेरी चूत में घुस गया हो। इस वार ने मेरा तो बैलेंस ही बिगाड़ कर रख दिया। मैंने जल्दी से लंड को छोड़ा और अपना हाथ आगे ज़मीन पर लगा कर गिरते-गिरते बची। उधर रॉकी भी मुझे अपनी ओर खींच रहा था तो उसका भी सहारा मिल गया। मगर इतनी देर में रॉकी का एक और धक्का लगा और उसका लंड दोबारा मेरी चूत की दीवारों से रगड़ता हुआ पहले से भी ज्यादा अंदर घुस गया। मेरे मुँह से फ़िर ‘आह’ की आवाज़ निकल गयी।

मैं समझ गयी कि कुत्ता तो मुझे कुत्ते की तरह ही चोदेगा। इसलिये मैं झट से संभल गयी और अगले वार के लिये तैयार भी हो गयी। रॉकी ने लंड को थोड़ा सा बाहर निकाल के फ़िर से लंड को मेरी चूत में घुसेड़ दिया। मैंने भी अपनी चूत को हिला कर लंड के धक्के सहने के लिये अड्जस्ट कर लिया। रॉकी के हर वार से मुझे मीठा-मीठा एहसास होने लगा था। रॉकी की ज़ुबान बाहर थी और वो मेरे कंधे के ऊपर से अपना मुँह आगे को निकाले हुए था और अपने अगले दोनों पैरों से मेरी कमर को इस तरह से पकड़े हुए था कि मेरी कमर उसके धक्के से आगे ना जा सके। अब ज़रा भी दर्द बाकी नहीं रहा था, बस मज़ा ही मज़ा था। रॉकी के लंड का आगे वाला पतला नोकीला हिस्सा जब मेरी चूत के अंदर तक जाता तो एक अजीब सा नशा मेरी चूत में घुल जाता था।

मगर अब फ़िर एक दर्दनाक हमला होने वाला था। रॉकी का लंड फूल कर अब मुझे कुछ ज्यादा ही मोटा महसूस होने लगा। मैंने इंटरनेट पे कुत्ते से चुदाई वाली फिल्मों में देखा तो था कि कुत्ते का लंड पीछे से एक गेंद कि तरह फूल जाता है और जो चूत में घुस जाता है। मगर इस हिस्से को चूत में लेने से अब मैं घबरा रही थी। मैंने पीछे हाथ लगा कर देखा तो सच में रॉकी का लंड एक गेंद के जैसे गोल फूला हुआ था और मोटा भी काफी था। रॉकी तो लगातार अपने धक्के तेज कर रहा था, ताकि उसका वो मोटा हिस्सा भी मेरी चूत में घुस जाये। मगर मैं जानबूझ कर उसका झटका लगते ही अपने आप को आगे ढकेल देती ताकि उसका वो मोट हिस्सा मेरी चूत में ना जाये।

पर रॉकी को ये सब मंज़ूर नहीं था। वो अपना काम अधूरा नहीं छोड़ने वाला था। उसने मुझे अपने अगले पैरों से कस के जकड़ लिया और अपने पीछे वाले पैर भी और आगे कर लिये। अब उसकी टाँगें मेरी जाँघों के साथ चिपकी हुई थीं। मुझे एहसास हो गया था कि अब रॉकी मेरे बलात्कार पर उतर आया है। रॉकी फ़िर से अपने मोटे लंड का प्रहार मेरी चूत पर करने लगा था और हर एक धक्के से मुझे एहसास होता कि उसका मोटा गेंद वाला हिस्सा मेरी चूत में घुस रहा है।

मैंने एक बार कोशिश भी कि के रॉकी के आगे वाले पैरों से छूट जाऊँ, मगर उसने मुझे इतनी मजबूती से जकड़ रखा था कि मैं डर गयी कि उसके नाखून मेरे बदन में न लग जायें। अब मैंने मोटे गेंद जैसे हिस्से को चूत में घुसवा लेना ही ठीक समझा। मेरी चूत मुझे फैलती हुई महसूस होने लगी और इससे दर्द भी होने लगा था। मेरे मुँह से ‘आह-आह’ की आवाजें निकलने लगी थी। मगर रॉकी को तो मज़ा आ रहा था। वो हर धक्के के साथ मुझे अपनी ओर खींच लेता और पीछे से जोरदार झटका लगा देता।

फिर एक और झटका लगा और उसका गेंद वाला हिस्सा भी पुरा मेरी चूत में घुस गया। मेरे मुँह से चींख निकल गयी। मेरी चूत का मुँह जो बुरी तरह फैल कर फट रहा था अब फिर से नॉर्मल हो गया जिससे मुझे कुछ राहत मिली। मगर मुझे अपनी चूत में वो गेंद जैसा हिस्सा ठूँसा हुआ थोड़ा अजीब भी लग रहा था और मज़ा भी आ रहा था। अब रॉकी थोड़ी देर के लिये रुका और फ़िर से झटके लगाने लगा।

मैं भी उसके साथ अपनी कमर हिलाने लगी। मगर अब उसका लंड चूत में फंस चुका था। वो बाहर नहीं आ रहा था और अंदर ही अपना कमाल दिखा रहा था। इतनी देर में रॉकी ने तेज-तेज कमर हिलायी और फ़िर अपनी कमर को ऊपर उठा कर मुझे जोरदार धक्का लगाते हुए कस के जकड़ लिया। मुझे भी अपनी चूत में उसके लंड का तेज झटका लगा, जो अब तक के झटकों से सब से आगे तक पहुँचा था और फ़िर रॉकी के लंड का गरम-गरम पानी मैंने अपनी चूत में महसूस किया। रॉकी के तेज झटकों की वजह से मैंने भी एक बार फ़िर से अपना पानी छोड़ दिया। उधर रॉकी ने मेरी चूत में जितनी भी पिचकारियाँ छोड़ी मुझे सब का बारी-बारी एहसास हुआ। मैं बेहद मज़े और मस्ती में थी और थोड़ी देर ऐसे ही लंड को चूत में रखना चाहती थी। मगर रॉकी जो बुरी तरह से हाँफ रहा था, उसने मेरी कमर को छोड़ दिया और एक साइड को उतरने लगा।

मेरी चूत में उसके लंड का गेंद वाला हिस्सा फंसा हुआ था और रॉकी के नीचे उतरने से मेरी चूत पर बहुत प्रेशर पड़ा और दर्द का एहसास होने लगा। इसलिये मैंने झट से उसकी दोनों टाँगें पकड़ी और उसको उतरने से रोक लिया। मगर रॉकी अब रुकने वाला नहीं था, वो बेतहाशा हाँफ रहा था। रॉकी अपने अगले पाँव मेरे ऊपर से हटा कर नीचे उतर गया और घूम कर खड़ा हो गया लेकिन उसका लंड मेरी चूत में वैसे ही फंसा रहा। मुझे एहसास हुआ कि उसके लंड से मेरी चूत में अब भी काफी रस बह रहा था। मैं ऐसे ही पंद्रह-बिस मिनट तक कुत्तिया की तरह रॉकी से जुड़ी रही जैसे कि अक्सर कुत्ते-कुत्तिया आपस में चिपके दिखायी देते हैं। फिर मुझे अपनी चूत में रॉकी के लंड का गेंद वाला हिस्सा थोड़ा ढीला होता महसूस हुआ तो मैंने एक हाथ से उसके लंड को पकड़ा और पीछे कि तरफ़ खींचा तो उसका मोटा हिस्सा बाहर आने लगा। जैसे ही उसका गेंद जैसा मोटा लंड मेरी चूत में से बाहर आया तो मेरी चूत में से ‘फ़च’ की आवाज आयी जैसे की शैम्पेन की बोतल खोली हो। रॉकी भी शायद इसी के इंतज़ार में था। लंड बाहर निकलते ही वो एक कोने में जाकर बैठ गया।

अब मैंने उसका पूरा लंड लटका हुआ देखा। करीब सात-आठ इंच का होगा और आखिर में वो मोटा गेंद वाला हिस्सा अभी भी काफी फूला हुआ था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि इतनी मोटी गेंद मेरी चूत में घुसी थी। मैं उसके लंड की तरफ़ देखती रही और खुद भी सीधी होकर बैठ गयी। मेरी चूत में से मेरा और रॉकी का मिला जुला माल बहने लगा। मैं नीचे ही फ़र्श पर बैठी थी और नीचे ही मेरी चूत में से निकल रहा पानी फ़ैल रहा था। मैं भी निढाल होकर बैठ गयी और रॉकी की तरफ़ देखती रही। रॉकी अपने लंड को चाट रहा था और थोड़ी देर में ही वो अपने पैर पे पैर रख कर सो गया और धीरे धीरे उसका लंड भी छोटा होकर खोल में समा गया।

जब मैं उठ कर खड़ी हुई तो मेरी चूत में से निकलता मेरा और रॉकी का मिला-जुला माल मेरी टाँगों से होता हुआ मेरे पैरों और सैंडलों के बीच में बहने लगा। मैंने बाथरूम में जाकर पेशाब किया। मेरी चूत टाँगें और सैंडलों में मेरे पैर चिपचिपा रहे थे और बेडरूम के फर्श पर भी काफी रस फैला हुआ था मगर उस वक्त मैंने कुछ साफ नहीं किया। बस बेडरूम में आकर धम्म से बेड पर लुढ़क गयी और सो गयी।

!!! समाप्त !!!
Find all posts by this user
Quote this message in a reply
Post Reply 


Possibly Related Threads...
Thread:AuthorReplies:Views:Last Post
  दीदी के यहाँ मेरी चुदाई Penis Fire 5 41,096 02-21-2015 04:02 PM
Last Post: Penis Fire
  मेरी मम्मी नीरजा और शिप्रा आण्टी की बुर की मादरचोद चुदाई Penis Fire 1 62,673 02-10-2014 03:14 PM
Last Post: Penis Fire
  मेरी पहली चुदाई Sex-Stories 0 17,786 01-21-2013 01:37 PM
Last Post: Sex-Stories
  मेरी 50 वर्षीय मौसी की चुदाई SexStories 4 47,280 02-18-2012 01:19 AM
Last Post: SexStories
  मेरी चुदाई की एक और कहानी SexStories 2 21,374 02-12-2012 06:40 AM
Last Post: SexStories
  मेरी मम्मी की चुदाई SexStories 2 67,368 02-02-2012 02:00 PM
Last Post: SexStories
  मेरी बहन है मेरी पत्नी Sexy Legs 12 203,340 08-31-2011 02:05 AM
Last Post: Sexy Legs
  मेरी पहली चुदाई प्रीति भाभी के साथ Sexy Legs 4 23,493 08-31-2011 01:22 AM
Last Post: Sexy Legs
  मेरी बस की चुदाई Sexy Legs 1 10,788 07-31-2011 06:16 PM
Last Post: Sexy Legs
  मेरी साली भैरवी की चुदाई Sexy Legs 0 7,933 07-31-2011 05:29 PM
Last Post: Sexy Legs