भांजे के लंड कि प्यासी
चंदर एक कोन्त्रक्टोर के यहाँ सूपरवाइज़र था. तनख्वाह ठीक ठाक थी. बेटी तारा के जन्म के बाद चंदर ने नसबंदी करा ली थी. वो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था, परन्तु समझदार था. शादी के बाद जब तक की उसकी आमदनी नहीं बढ़ी उसने कोप्पर-टी का प्रयोग करवाया था. तारा शादी के चार साल बाद जन्मी थी.

तारा भी अब ५ साल की हो गयी थी, और स्कूल जाने लगी थी. दोपहर में घर काटने को दौड़ता था. पड़ोस की औरतों से वो घुल मिल नहीं पायी थी. पति और बच्ची ही उसका सारा संसार थे. उनके एक रिश्तेदार थे मुंबई में. लेकिन शहर की भाग-दौड में उनसे भी महीनों में कभी मिल पाते थे. चंदर ने उसे एक मोबाइल फोन दिया हुआ था जिससे की वो गांव में जब रहा नहीं जाता, कॉल कर लेती थी. लेकिन वो भी उसके अकेलेपन को काटने के लिए काफी नहीं था. ऐसे में कल शाम चंदर ने उसे बताया की महेश आ रहा है. उसे काफी खुशी हुई की चलो उसे भी बतियाने के लिए कोई मिल जायेगा, कुछ दिन तो मन लगा रहेगा!

महेश चंदर की सगी दीदी का लड़का यानी की उनका भांजा था. उसे याद था जब उनका विवाह हुआ था तो महेश ७ साल का गोल मटोल बच्चा था. बहुत गोरा, बिखरे बाल और मोती मोती आँखें. बहुत शर्मीला था. मोटा होने के कारण बिलकुल किसी गुड्डे की तरह दीखता था. वो शादी के लिए तैयार हो रही थी तो दीदी के साथ वो भी उसके कमरे में आया था. तब वो शर्माता हुआ दीदी के पीछे छुप रहा था. दीदी झल्लाते हुए बोली,
"अरे महेश क्या कर रहे हो, मामी हैं तुम्हारी. चलो नमस्ते कहो... जल्दी नमस्ते बोलो नहीं तो मामी को बुरा लगेगा."
"नहीं दीदी बुरा क्यों लगेगा. यह गोलू तो अपनी मामी को एक पप्पी देगा. देगा न गोलू?"
फिर उसने महेश के गाल खींच के उसे एक गाल में पप्पी दे दी. वो शर्मा के कमरे से भाग गया था!

उसके बाद भी कई दफा वो उससे मिली थी. हमेश उसे छेडा करती थी और गाल पे पप्पी देने के बाद उसे हलके से काट देती, जिससे वो रोने लगता. फिर उसे चोकलेट और टोफी का लालच दे दे के मनाती.

एक बार उसने बड़े ही भोलेपन से सबके सामने कहा था,
"चंदा मामी कितनी सुन्दर हैं. मैं बड़ा हो जाऊँगा तो सिर्फ चंदा मामी से शादी करूँगा."
हँसते हँसते सब के पेट में बल पड़ गए थे और सब के चेहरे लाल हो गए थे.

वो प्यारा शर्मीला मामी का चहेता गोलू उनके पास कुछ दिनों के लिए आ रहा था, कुछ काम था उसे. चंदर ने बताया तो था, लेकिन उसके आने की खबर की खुशी में उसने ध्यान नहीं दिया था. बस पुछा था कि कितने दिन रहेगा तो पता चला कि करीब पन्द्रह दिन रहेगा उनके पास. लाडले भांजे के स्वागत कि तैयारी में लग गयी.महेश के आने का वक्त हो रहा था. चंदर लेने गए थे उसे. वो भी जाना चाहती थी लेकिन ट्रेन रात को देर से आने वाली थी. लौटते-लौटते १२ बज जाते. वो बोले कि तुम्हें साथ नहीं ले जा सकता. वो समझती थी. बरसात शुरू होने वाली थी और जिस बिल्डिंग का काम चंदर देख रहा था वो बीच में कुछ कारण से रुक गया था. अब जब काम फिर शुरू हुआ तो बिल्डर चाहता था कि बरसात से पहले बिल्डिंग कड़ी हो जाए क्योंकि फिर बरसात में ज्यादा काम नहीं हो पाता. इस कारण काम २४ घंटे चलता और चंदर कई बार रात-रात भर काम करते.

एक महीना भर था बरसात शुरू होने में.

खैर, दरवाज़े पे टकटकी लगाये बैठी थी. तारा खाना खा कर सो रही थी. नींद उसे भी आ रही थी, लेकिन भांजे को खिला-पिला के ही सोने वाली थी वो.

तभी दरवाज़े में चाभी घूमी और दरवाज़ा खुला, चंदर एक बड़ा सा बैग उठाए घर में घुसे. वो उठ के उनसे बैग लेने बढ़ी. बैग हाथ में लेते ही, चंदर के पीछे जह्न्कने लगी, वहाँ कोई नहीं था.
"बैग ले आये, भांजे को कहाँ छोड़ आये?"
"अरे आ रहा है, थोड़ी देर पहले बोलने लगा, 'मामा, पेशाब करके आता हूँ!'. मैंने कहा घर तो आ ही गया है, घर में कर लेना. पर बोलता है..." चंदर हसने लगे, "... बोलता है, एक सेकंड कि और देर हो गयी तो पैंट में हो जायेगी. मामी के सोचेंगी?"
सुन कर वो भी हसने लगी.
"तुम खाना परोसो, तब तक वो आ जायेगा, मैं भी हाथ पैर धो लेता हूँ."

बैग को एक कुर्सी के बगल में रख कर वो रसोई घर चली गयी और दोनों कि थालियाँ लगाने लगी.

"चंदर मामा!", उसने जब यह आवाज़ सुनी तो एक पल के लिए वो अटक गई. यह तो किसी वयस्क पुरुष कि आवाज़ थी. वो बाहर आई तो उसने देखा कि एक लंबा सा, पतला सा लड़का था. उसकी हलकी हलकी मूंछे थी. दाढ़ी अभी ठीक से नहीं आई थी. उसे देखते ही वो मुस्कुराया और उसके पैर छूने के लिए झुक गया.

"अरे मामी के पैर नहीं छूते बेटा. कितना बड़ा हो गया है तू तो. कितने साल का हो गया रे?"
"१६ साल का, मामी, हमेशा गोलू बच्चा थोड़ी न रहूँगा!" वो उठते हुए बोला.
"धत तेरी की! अब गाल किसके नोचुंगी?"
"मेरे तो नहीं नोच पाओगी!" वो हँसते हँसते बोला.

"हो गया मामी भांजे का मेल मिलाप तो खाना खा लें?" चंदर हाथ पैर धो चुके थे.
"मैं तो पहले नहाऊंगा मामा."
"अरे हाँथ-पैर धो के खाना खा लो, कल नहा लेना. थक गए होगे, जल्दी सो जाओ", चंदा बोली.
"भूख तो तेज लगी है लेकिन नहाये बिना नहीं रहा जायेगा. पांच मिनट में नहा के आता हूँ.", बोलते हुए महेश ने बैग खोला और उसमे से तौलिया और कुछ कपडे ले बाथरूम कि और चल दिया.

घर बहुत बड़ा नहीं था उनका. एक बिल्डिंग के तीसरी और आखरी मंजिल पर उनका घर था. एक बेडरूम, एक हॉल और एक किचन. पति पत्नी और बेटी तीनों एक ही कमरे में सोते थे. महेश के लिए उसने एक गद्दा निकल दिया था. उसी को हॉल में बिछा कर उसके सोने का इंतज़ाम होना था.


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