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बीच रात की बात
04-13-2016, 11:40 AM
Post: #1
बीच रात की बात
यह बात तब की है जब हम अपनी कोठी की मरम्मत करवा रहे थे, जिसके लि*ए बहुत सारे मजदूर लगे थे। उनमें से एक बिहारी मजदूर हमारी कोठी के पीछे बनी शेड के पास कमरे में रहता था।

एक दिन सुबह मैं अपनी एक सहेली की बहन की शादी में लुधियाना गयी थी। हमारे गाँव से मुश्किल से घंटे भर का रास्ता है और दिन की शादी थी इसलिये शाम को अंधेरे से पहले ही वापस आने वाली थी तो ससुर जी के कहने पर उस दिन मैं अकेली ही होंडा सिटी ड्राइव करके गयी थी। शादी में कुछ सहेलियाँ तो मुझे बहुत अर्से के बाद मिली थी तो उन्होंने जोर दे कर मुझे रात के खाने के लिये रोक लिया। मैंने फोन करके ससुर जी को बता दिया कि मुझे आने में रात हो जायेगी और चिंता न करें।

पंजाबी शादियों में पीना-पिलाना तो आम बात है। आज कल तो लड़कियाँ भी पीछे नहीं रहतीं। कुछ खुल्ले*आम पैग लगाती हैं और जिनको रिश्तेदारों या बुजुर्गों की शरम होती है, वो कोक या जूस में शराब मिला कर मज़ा लेती हैं। वैसे तो आप सब जानते ही हैं कि मैं अपनी लिमिट के हिसाब से एक या दो पैग पी लेती हूँ मगर उस दिन कुछ ज्यादा ही हो गयी। हुआ ये कि सहेलियों के साथ मौज-मस्ती और नाच गाने में चार-पाँच पैग हो गये और नशे का कुछ खास एहसास भी नहीं हुआ। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

जब मैं वहाँ से रात के दस बजे निकल रही थी तब भी बहुत ही हल्का सा ही नशा था। पूरा भरोसा था कि कार चलाने में कोई दिक्कात नहीं होगी। लेकिन कार चलाते हुए आधे रास्ते, फगवाड़े के पास, ही पहुँची थी कि अचानक तेज़ नशा छाने लगा। रात के वक्त कुछ खास ट्रैफिक नहीं था और मैं हाई-वे पर नशे में बिना किसी चिंता के गाने सुनती हुई अपनी धुन में कार चला रही थी। उस दिन सुबह से चूत रानी की मुठ भी नहीं मारी थी तो नशे में अब चुत भी बिलबिलाने लगी थी। कार चलाते-चलाते ही एक हाथ से मैंने अपनी चूड़ीदार सलवार का नाड़ा ढीला कर दिया और चूतड़ उचका कर सलवार और पैंटी जाँघों तक खिसका दीं... और फिर एक हाथ से स्टेरिंग संभाले हुए अपनी चूत सहलने लगी।

खैर, कोई दुर्घटना नहीं हुई और मैं सही सलामत धीरे-धीरे घर पहुँची। रात के साढ़े-ग्यारह बज गये थे और कोठी में अंधेरा था। सास ससुर सो गये थे। मैंने कार लेजा कर कोठी के पिछले हिस्से में पार्क की। अपनी पैंटी और सलवार ठीक करके कार से उतरने लगी तो एहसास हुआ कि कितने नशे में थी। कार से उतर कर चलने लगी तो नशे में बुरी तरह डगमगा रही थी। साढ़े चार इंच ऊँची पेंसिल हील के सैंडल में मेरी चाल और ज्यादा बहक रही थी लेकिन इस वक्त मुझे सबसे बड़ी चिंता यह थी कि अगर मेरे सास या ससुर उठ गये और इस हालत में देख लिया तो क्या होगा। मेरे पीने पर उन्हें कोई एतराज़ नहीं था लेकिन इतनी ज्यादा शराब पी कर नशे में धुत्त होना और उस पर ऐसी हालत में इतनी दूर से रात को कार चला कर आना तो उन्हें बेशक मंज़ूर नहीं होगा। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

इसलिये मैंने सोचा कि कोठी के दूसरी तरफ पीछे के दरवज़े से अंदर जाती हूँ ताकि किसी को मेरे आने का पता न चले। वैसे ही नशे में लड़खड़ाती मैं रास्ते में उस शेड की पास पहुँची जिसमें वो बिहारी मजदूर रहता था। मजदूर के कमरे में हल्की सी रौशनी हो रही थी। मैं उसके कमरे के पास पहुँची ही थी कि किसी ने मेरे ऊपर टार्च की ला*इट मारी।

अचानक आ*ई इस ला*इट से मईं चौंक उठी.... डर से मेरा बदन पसीने-पसीने हो रहा था...

ला*इट मेरी ओर आ रही थी... और मैंने अपने हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया.... मैं सोच रही थी कि कहीं कोई चोर लुटेरा तो नहीं है... क्योंकि मैंने उस वक्त कीमती गहने और कपड़े पहने हुए थे।

ला*इट मेरे पास पहुँच चुकी थी और फिर बंद हो ग*ई। मुझे कुछ दिखा*ई नहीं दे रहा था। किसी ने मेरे बालों को पकड़ लिया.... तो मेरी हल्की सी चीख निकल ग*ई। फिर किसी ने मेरे होंठों पर होंठ रख दि*ए और बेतहाशा चूसने लगा। मैं उसके बदन को अपने हाथ से दूर हटा रही थी और पहचानने की कोशिश कर रही थी कि यह कौन है।

किसी मर्द की मजबूत बाँहों में कसती जा रही थी मैं... आखिर कौन है... मैं सोच-सोच कर पागल हो रही थी.... अब तक उसका हाथ मेरे मम्मों तक पहुँच चुका था। मैं अपने आपको छुड़ाने की कोशिश कर रही थी कि अचानक मेरा हाथ उसकी टार्च पर लगा। मैंने जोर से उसके हाथ से टार्च खींची और उसके चेहरे की तरफ करके आन कर दी...उफ़ यह....यह मजदूर......यह कहाँ से आ गया। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

ओह्ह्ह.... यह मेरे मम्मे ऐसे मसल रहा है जैसे मैं इसकी बीवी हूँ। मैंने उसे धक्का मारा और मेरे मुँह से आवाज निकली- “छोड़ो मुझे... क्या कर रहे हो...?”

मगर मेरे धक्के का जैसे उस पर को*ई असर नहीं हु*आ। नशे की हालत में उसकी मजबूत बाँहों से निकल पाना मेरे लि*ए मुश्किल था। उसने मुझ से टार्च छीन ली और बंद कर दी और बोला- “अरे रानी... तू इतनी रात को नशे में झूमती हुई इधर क्या कर रही है?”

मेरी जुबान भी लड़खड़ा रही थी- “क्या.. बक..बक्क.. बकवास कर रहे हो?”

मेरे इतना कहते ही उसने मुझे अपनी बाँहों में उठा लिया और अपने कमरे की ओर चल दिया। वो मुझे अपने कमरे में ले गया और मुझे उठाये हु*ए ही दरवाजे की कुण्डी लगा दी। फिर मुझे चारपा*ई पर फेंक दिया... और खुद भी मेरे ऊपर ही गिर गया।

मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि मैं क्या करूं। मैं चुपचाप उसके नीचे लेटी रही और वो अपने लण्ड का दबाव मेरी चूत पर डाल रहा था और मेरे बदन को चाटने और नोचने लगा और बोला- “तो बता रानी.. दारू पी कर क्या करने आ*ई थी इतनी रात को...?” लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मैं कुछ नहीं बोली....बस लेटी रही.....मुझे पता था कि आज मेरी चूत में यह अपना लौड़ा घुसा कर ही छोड़ेगा। मेर तो खुद का बदन गर्म हो रहा था।

वो प्यार से मेरे बदन को चूमने लगा। अब तक मेरा दिल जो जोर-जोर से धड़क रहा था, शांत होने लगा और डर भी कम हो गया था। यही नहीं, उसकी हरकतों से मेरा ध्यान भी उसकी तरफ जा रहा था...

उसके लण्ड का अपनी चिकनी चूत पर दबाव, मेरे मस्त मोटे चूचों को दबा रहा उसका हाथ, मेरी पतली कमर को जकड़ कर अपनी ओर खींच रहा उसका दूसरा हाथ और उसकी जुबान जो मेरे गुलाब की पंखड़ियों जैसे होंठों का रसपान कर रही थी। यह सब मुझको बहका रहा था। अब तो मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी चूत भी उसका साथ दे रही थी।

उसका लण्ड मुझे कुछ ज्यादा ही तगड़ा महसूस हो रहा था... पता नहीं क्यों… जैसे उसका लण्ड ना होकर कुछ और मोटी और लम्बी चीज़ हो। मेरी गर्मी को वो भी समझ चुका था...वो बोला- “जानेमन, प्यार का मजा तुम्हें भी चाहि*ए और मुझे भी, फिर क्यों ना दिल भर के मजे लि*ए जायें.. ऐसे घुट घुट कर प्यार करने से क्या मजा आ*एगा।”

मैं भी अब अपने आप को रोक नहीं सकती थी...

!!! क्रमशः !!!
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04-13-2016, 11:40 AM
Post: #2
RE: बीच रात की बात
मैंने अपनी बांहें उसके गले में डाल दी... फिर तो जैसे वो पागल हो कर मुझे चूमने चाटने लगा। मैं भी बहुत दिनों से रात-दिन मुठ मार-मार कर काम चल रही थी और लण्ड की प्यासी थी... मुझे भी ऐसे ही प्यार की जरूरत थी जो मुझे मदहोश कर डाले और मेरी चूत की प्यास बुझा दे। मैं भी उसका साथ दे रही थी। मैंने उसकी टी-शर्ट उतार दी। नीचे उसने लुंगी और कच्छा पहना हु*आ था...उसकी लुंगी भी मैंने खींच कर निकाल दी।

अब उसके कच्छे में से बड़ा सा लण्ड मेरी जांघों में घुसने की कोशिश कर रहा था। उसने भी मेरी कमीज़ नोच कर फाड़ते हुए उतार दी और वैसे ही मेरी सलवार के भी नोच-नोच कर चिथड़े करके उतार दी... अब में ब्रा और पैंटी और सैंडल में थी और वो कच्छे में। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मेरी ब्रा के ऊपर से ही वो मेरे मम्मों को मसलने लगा और फिर ब्रा को नोच दिया। अब मेरे मोटे-मोटे मम्मे उसके मुँह के सामने तने हु*ए हिल रहे थे। उसने मेरे एक मम्मे को मुँह में ले लिया और दूसरे को हाथ से मसलने लगा। फिर बारी-बारी दोनों को चूसते हु*ए, मसलते हु*ए धीरे-धीरे मेरे पेट को चूमता हु*आ मेरी चूत तक पहुँच गया।

वो पैंटी के ऊपर से ही मेरी चूत को चूम रहा था... मैंने खुद ही अपने हाथों से अपनी पैंटी को नीचे कर दिया और अपनी चूत को उठा कर उसके मुँह के साथ जोड़ दिया। उसने भी अपनी जुबान निकाली और चूत के चारों तरफ घुमाते हु*ए चूत में घुसा दी।

“अहहहा अहहहह!” मैंने भी अपनी कमर उठा कर उसका साथ दिया। काफी देर तक मेरी चूत के होंठों और उस मजदूर के होंठों में प्यार की जंग होती रही। अब मेरी चूत अपना लावा छोड़ चुकी थी और उसकी जुबान मेरी चूत को चाट-चाट कर बेहाल किये जा रही थी।

अब मैं उसके लण्ड का रसपान करने के लि*ए उठी... हम दोनों खड़े हो गये। मैं नशे में डगमगाने लगी तो उसने फिर से मेरे बदन को अपनी बांहों में ले लिया। मैं भी उसकी बांहों में सिमट ग*ई। उसका बड़ा सा लण्ड मेरी जांघों के साथ टकरा रहा था जैसे मुझे बुला रहा हो कि आ*ओ मुझे अपने नाजुक होंठों में भर लो।

वो मजदूर अपनी टाँगें फैला कर चारपा*ई पर बैठ गया। मैं उसके सामने अपने घुटनों के बल जमीन पर बैठ ग*ई। उसके कच्छे का बहुत बड़ा टैंट बना हु*आ था, जो मेरी उम्मीद से काफी बड़ा था।

मैंने कच्छे के ऊपर से ही उसके लण्ड पर हाथ रखा... लेखिका : कोमलप्रीत कौर

“ओह्ह्ह...” मैं तो मर जा*ऊँगी... यह लण्ड नहीं था... महालण्ड था... पूरा तना हु*आ और लोहे की छड़ जैसा.... मगर उसको हाथ में पकड़ने का मजा कुछ नया ही था। मैंने दोनों हाथों से लण्ड को पकड़ लिया। मेरे दोनों हाथों में भी लण्ड मुझे बड़ा लग रहा था।

मैंने मजदूर की ओर देखा, वो भी मेरी तरफ देख रहा था, बोला- “क्यों जानेमन, इतना बड़ा लौड़ा पहले कभी नहीं लिया क्या?”

मैंने कहा- “नहीं... लेना तो दूर, मैंने तो कभी देखा भी नहीं।” नशे और उत्तेजना से मेरी ज़ुबान लड़खड़ा रही थी।

वो बोला- “जानेमन, इसको बाहर तो निकालो.. फिर प्यार से देखो.... और अपने होंठ लगा कर इसे मदहोश कर दो... यह तुमको प्यार करने के लि*ए है.....तुमको तकलीफ देने के लि*ए नहीं!” लेखिका : कोमलप्रीत कौर

मुझे भी इतना बड़ा लौड़ा देखने की इच्छा हो रही थी। मैंने उसके कच्छे को उतार दिया। उसका फनफनाता हु*आ काले सांप जैसे लौड़ा मेरे मुँह के सामने खड़ा हो गया। ऐसा लौडा मैंने कभी नहीं देखा था... कम से कम ग्यारह-बारह इंच था या शायद उससे भी बड़ा।

मैं अभी उस काले नाग को देख ही रही थी कि उसने मेरे सर को पकड़ा और अपने लौड़े के साथ मेरे मुँह को लगाते हु*ए बोला... “जानेमन अब और मत तड़पा*ओ... इसे अपने होंठो में भर लो और निकाल दो अपनी सारी हसरतें...!”

मैंने भी उसके काले लौड़े को अपने मुँह में ले लिया। मेरे मुंह में वो पूरा आ पाना तो नामुमकिन था, फिर भी मैं उसको अपने मुँह में भरने की कोशिश में थी। ऊपर से वो भी मेरे बालों को पकड़ कर मेरे सर को अपने लण्ड पर दबा रहा था। जैसे वो मेरे मुँह की चुदा*ई कर रहा था, उससे लगता था कि मेरी चूत की बहुत बुरी हालत होने वाली है।

वो कभी मेरे चूचों, कभी मेरी पीठ और कभी मेरे रेशमी काले बालों में हाथ घुमा रहा था... मैं जोर-जोर से उसके लण्ड को चूस रही थी। फिर अचानक वो खड़ा हो गया और मेरे मुँह से अपना लण्ड निकाल कर मुझे नीचे ही एक चादर बिछा कर लिटा दिया। मैं सीधी लेट ग*ई, वो मेरी दोनों टांगों के बीच में बैठ गया और अपना लौड़ा मेरी चूत पर रख दिया। मेरी चूत तो पहले से ही पानी-पानी हो रही थी... अपने अन्दर लण्ड लेने के लि*ए बेचैन हो रही थी... मगर मैं नशे में भी इतने बड़े लण्ड से डर रही थी। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

फिर उसने मेरी चूत पर अपने लण्ड रखा और धीरे से लण्ड को अन्दर धकेला। थोड़ा दर्द हु*आ... मीठा-मीठा। फिर थोड़ा सा और अन्दर गया... और दर्द भी बढ़ने लगा। वो मजदूर बहुत धीरे-धीरे लण्ड को चूत में घुसा रहा था, इसलि*ए मैं दर्द सह पा रही थी।

मगर कब तक....

मेरी चूत में अभी आधा लण्ड ही गया था कि मेरी चूत जैसे फट रही थी। मैंने अपने हाथ से उसका लण्ड पकड़ लिया और बोली- “बस करो, मैं और नहीं ले पा*ऊँगी...”

वो बोला- “जानेमन, अभी तो पूरा अन्दर भी नहीं गया...और तुम अभी से...?”

मैंने कहा- “नहीं और नहीं... मेरी चूत फट जा*एगी!”

उसने कहा- “ठीक है, इतना ही सही...!”

और फिर वो मेरे होंठों को चूमने लगा। मैं भी उसका साथ देने लगी। फिर वो आधे लण्ड को ही अन्दर-बाहर करने लगा, मेरा दर्द कम होता जा रहा था। मैं भी अपनी गाण्ड हिला-हिला कर उसका साथ देने लगी। साथ क्या अब तो मैं उसका लण्ड और अन्दर लेना चाहती थी। वो भी इस बात को समझ गया और लण्ड को और अन्दर धकेलने लगा। मैं अपनी टाँगें और खोल रही थी ताकि आराम से लण्ड अन्दर जा सके।

मुझे फिर से दर्द होने लगा था। आधे से ज्यादा लण्ड अंदर जा चुका था। मेरा दर्द बढ़ता जा रहा था। मैंने फिर से उसका लण्ड पकड़ लिया और रुकने को कहा। वो फिर रुक गया और धीरे-धीरे लण्ड अन्दर बाहर करने लगा। थोड़ी देर के बाद जब मुझे दर्द कम होने लगा तो मैंने अपनी टाँगें उसकी कमर के साथ लपेट ली और अपनी गाण्ड को हिलाने लगी। वो समझ गया कि मैं उसका पूरा लण्ड लेने के लि*ए अब तैयार थी। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

तभी उसने एक जोर का झटका दिया और पूरा लण्ड मेरी चूत के अन्दर घुसेड़ दिया।

“अहहहहा..आहहहहा..!” मेरी चींख निकलने वाली थी कि उसने मेरे मुँह पर हाथ रख दिया। मेरे मुँह से “आहहहहा आहहहहहा” की आवाजें निकल रही थी। पूरा लण्ड अन्दर धकेलने के बाद वो कुछ देर शांत रहा और फिर लण्ड अंदर-बाहर करने लगा। इस तेज प्रहार से मुझे दर्द तो बहुत हु*आ... मगर थोड़ी देर के बाद मुझे उससे कहीं ज्यादा मजा आ रहा था, क्योंकि अब मैं पूरे लण्ड का मजा ले रही थी जो मेरी चूत के बीचों-बीच अन्दर-बाहर हो रहा था।

उसका लण्ड मेरी चूत में जहाँ तक घुस रहा था वहाँ तक आज तक किसी का लण्ड नहीं पहुँचा था.. ऐसा में महसूस कर सकती थी। मेरी चूत तब तक दो बार झड़ चुकी थी और बहुत चिकनी भी हो ग*ई थी। इसलि*ए अब उसका लण्ड फच-फच की आवाजें निकाल रहा था। मैं फिर से झड़ने वाली थी मगर उसका लण्ड तो जैसे कभी झड़ने वाला ही नहीं था। मैं अपनी गाण्ड को जोर-जोर से ऊपर-नीचे करने लगी। उसका लण्ड मेरी चूत के अन्दर तक चोट मार रहा था। मेरी चूत का पानी छूटने वाला था और मैं और उछल-उछल कर अपनी चूत में उसका लण्ड घुसवाने लगी। फिर मेरा लावा छूट गया और मैं बेहाल होकर उसके सामने लेटी रही, मगर उसके धक्के अभी भी चालू थे।

फिर उसने अपना लण्ड बाहर निकाल लिया और मुझे घोड़ी बन जाने को कहा। मैं उठी और घोड़ी बन ग*ई और अपने हाथ आगे पड़ी चारपा*ई पर रख लि*ए। वो मेरे पीछे आया और फिर से मेरी चूत में लण्ड घुसेड़ दिया... इस बार मुझे थोड़ा सा ही दर्द हु*आ। उसने धीरे-धीरे सारा लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया। मैंने अपने हाथ नीचे जमीन पर रख दि*ए ताकि मेरी चूत थोड़ी और खुल जाये और दर्द कम हो। मैंने अपनी कमर पूरी नीचे की तरफ झुका दी। उसका लण्ड फिर से रफ़्तार पकड़ चुका था। मैं भी अपनी गाण्ड को उसके लण्ड के साथ गोल-गोल घुमा रही थी। जब लण्ड चूत में गोल-गोल घूमता है तो मुझे बहुत मजा आता है। मैं लण्ड का पूरा मजा ले रही थी। उसके धक्के तेज होने लगे थे जैसे वो छूटने वाला हो।

मैं भी पूरी रफ़्तार से उसका साथ देने लगी ताकि हम एक साथ ही पानी छोड़ें। इस तरह से दोनों तेज-तेज धक्के मारने लगे। जिससे मेरी चूत में ही नहीं गाण्ड में भी दर्द हो रहा था... जैसे चूत के साथ-साथ गाण्ड भी फट रही हो। मेरा पानी फिर से निकल गया।

तभी उसका भी ज्वालामुखी फ़ूट गया और मेरी चूत में गर्म बीज की बौछार होने लगी। उसका लण्ड मेरी चूत के अन्दर तक घुसा हु*आ था इसलि*ए आज लण्ड के पानी का कुछ और ही मजा आ रहा था। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

हम दोनों वैसे ही जमीन पर गिर गये। मैं नीचे और वो मेरे ऊपर। उसका लण्ड धीरे-धीरे सुकड़ कर बाहर आ रहा था। मैं नशे में थी और मुझे नींद आने लगी थी… मगर वहाँ पर तो नहीं सो सकती थी। इसलि*ए मैं उठने लगी। उसने मुझे रोका और पूछा- “रानी, कल फिर आ*एगी या मैं तेरे कमरे में आ*ऊँ?”

मैंने कहा- “आज तो बच ग*ई! कल क्या फाड़ कर दम लेगा?”

उसने कहा- “रानी, आज तो चूत का मजा लिया, कल तेरी इस मस्त गाण्ड का मजा लेना है!”

मैंने कहा- “कल की कल सोचूँगी!”

मुझे पता था कि आज की चुदा*ई से मुझ से ठीक तरह चला भी नहीं जायेगा तो कल गाण्ड कैसे चुदवा पा*ऊँगी। मैंने देखा की मेरी नयी सलवार कमीज़ तो चिथड़े-चिथड़े हो गयी थी। ब्रा के भी हुक टूट गये थे। वो मेरे चूचों को फिर मसलने लगा।

सिर्फ पैंटी ही ऐसी थी जो फटी नहीं थी। वो पैंटी पकड़ कर मुझे पहनाने लगा और फिर मेरी चूत पर हाथ घिसते हु*ए मेरी पैंटी पहना दी। रात के अंधेरे में मैं ऐसे ही नंगी छिपछिपा कर कोठी के पीछे के दरवाजे से चुपचाप अपने कमरे तक पहुँच सकती थी। लेखिका : कोमलप्रीत कौर

फिर वो मेरे बालों को सँवारने लगा, मेरे बालों में हाथ घुमाते हु*ए वो मेरे मुँह और होंठों को भी चूम रहा था। फिर मैं वहाँ से सिर्फ पैंटी और सैंडल पहने ही बाहर आ ग*ई और अपने कमरे की तरफ चल दी... मेरी चूत में इतना दर्द हो रहा था कि ऊँची ऐड़ी के सैंडल में चलते हुए कमरे तक मुश्किल से पहुँची मैं... और कुण्डी लगा कर सो ग*ई.. अगले दिन भी मेरी चूत दर्द करती रही..

!!! क्रमशः !!!
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