बरसात की वह रात छुटकी बहन के साथ
बात तब की है जब मेरी पत्नी अपने मायके गयी हुई थी और मैं पत्नी विहीन घर पर था l
काफी दिनों बाद भी वह वापस नहीं आ पा रही थी,
अब अकेलापन कटाने दौड़ रहा था ; आदमी को कुछ चीजो की
आदत हो जाती है और उनके विछोह में उनकी कीमत समझ में आती है,
अब पत्नी से विछोह त्रास देने लगा था l
उस दुनिया के इर्द गिर्द रहते हुए कभी भान भी नहीं होता
कि हम कितनी संजीदगी से उसमें खो जाते हैं l हम
मात्र उतना देखते हैं जितना हमारी आँख दिखाती हैं
रूह कब खो जाती हैं पता ही नहीं चलता l ये सोचकर
बेचैनी होती हैं कि किस भुलावे में हम जिंदगी को
बस रूटीन में जिए जाते हैं जीवन के सफर में कब
वह युवती हमसफ़र बन गयी कभी अहसास न हुआ l
पर कर भी क्या सकता था ,इंतजार के सिवा l
वही कर रहा था l और किसी तरह दिन तो कट
जाता था ,पर रात बैरन बनी थी .कोई चाहत, कोई हसरत भी नहीं
क्यूँ सुकूँ दिल को मेरे फिर भी नहींपत्नी के साथ रहने पर
उस कमी की कल्पना करना भी सम्भव नहीं है
जिससे मैं दो चार हो रहा था,पत्नी, जिसके हाथों के कोमल स्पर्श, जिसकी
मुस्कान की याद में संपूर्ण जीवन काट दिया था? लगा कि लावण्यमयी
युवती जीवन की राह में कहीं खो गई है ।जिस व्यक्ति के अस्तित्व से
पत्नी माँग में सिंदूर डालने की अधिकारिणी है, समाज में उसकी प्रतिष्ठा है,
उसके सामने वह दो वक्त भोजन की थाली रख देने से सारे कर्तव्यों से छुट्टी पा जाती हैl
अब वही उसकी संपूर्ण दुनिया बन गई है lउस दुनिया के इर्द गिर्द रहते हुए कभी भान भी नहीं होता
कि हम कितनी संजीदगी से उसमें खो जाते हैं l

हम मात्र उतना देखते हैं जितना हमारी आँख दिखाती हैं
रूह कब खो जाती हैं पता ही नहीं चलता l ये सोचकर बेचैनी होती हैं कि किस
भुलावे में हम जिंदगी को बस रूटीन में जिए जाते हैं जीवन के
सफर में कब वह युवती हमसफ़र बन गयी कभी अहसास न हुआ l



वैसे एक सप्ताह बाद ही नींद में खलल पड़ने लगा था।शरीर की माँग एक जैव
आवश्यकता है। विवाह इसकी पूर्ति का आदर्श एवं संतुलित रूप् है।
इस आदर्श के खण्डित होने पर देह केवल देह रह जाती है,इस समय मेरे घर पर बहन थी जिसके
कारण खाने की कोई तकलीफ नहीं थी ।
फिर भी एक अजीब सूनापन और उदासी सी सी छाई थी
शायद सर्दियों की शुरूआत का भी असर था दिन धीरे धीरे
छोटे होने लगे थे।हवा में ठंड का असर आता हुआ दिखाई दे रहा था ।
उस दिन थोड़ा देर से करीब सात बजे घर पहुँचा
,बहन सोफे पर बैठी उपन्यास सा पढ़ रही थी बाहर अंधेरा छा चुका था
सर्दियाँ वैसे तो अच्छी ही होती हैं पर इस बार कुछ सूनी सूनी लग रहीं थी
यदपि घरों में अब बाहर घिर रहे अँधेरे का असर उतना नहीं दिखता l
पर जब अंदर से कुछ खोया हो तो बाहर का शाम का धुंधलका अंतर
मन की उदासी और सूनेपन को और भी बढ़ा देता है ,आज की शाम
उसी मानिंद भीतर घिरने वाले धुंधलके को और बढ़ा रहीं थी l
रहीं सही कसर कटीली हवा की चुभन ने पूरी कर दी थी l
,कुछ नमी लिए हुए हवा चल रही थी
थोड़ी देर तक अनायास चैनल बदलता मैं भी सोफे पर बैठा था ।
ख्याल आया कि अभी शाम तो काट जाएगी
पर रात भर करवटें बदलते बीतने वाली हैं
अतः इस तन्हाई को किस तरह से कम किया
जाये कुछ समझ में नहीं आ रहा था l

आज की शाम तो और भी बोरियत भरी थी चैनलों को बदलते हुए एक
मूवी का विज्ञापन दिखाई दिया,अखबार मे
मूवी का समय देख कर छुटकी से पूछा कि मूवी देखने चलोगी?

उसने कहा'" अब तो देर हो जाएगी "

मैंने कहा ,"अभी एक आध शो मिल सकते है ,"

"चलो जल्दी से तैयार हो जाओ ".


मैं भी जल्दी से हाथ मुहँ धोकर तैयार हुआ और उसे आवाज दी lजल्दी !
"आई"!उसने अन्दर से आवाज़ दी ।
जब वह बाहर आई !
उसे देख कर ! मैं ् अवाक और स्त्बध रह गया
मेरी छोटी बहन बिजलियाँ गिरा रही थी "कहने पर विवश हूँ''
यह समझते हुए कि वह मेरी बहन है ,कहने पर फिर भी मजबूर हूँl

उसके नवयौवन के उठान के युगल वर्तुल उसके दुपट्टे के
के भीतर भी अपने वजूद को प्रकट करने से बाज नहीं आ ते थे
वस्त्रों और अंतःवस्त्रों के आगोश मे अपने
C साइज का आभास देते हुए ,परिवार की
माँसलता का परिचय करा ही देते हैं।

आज कुछ ज्यादा हैरानी हो रही थी अपनी नजर पर जो चीज़ें सामान्य रूप
से हम नज़र अंदाज़ कर देते हैं वे रूप बदल कर
हमें विस्मित करतीं हैं ।
एक बात बताना तो भूल ही गया , उस उदास शाम को कुछ और भारी ,घिर आए बादल बना रहे थे ,जाड़ों की उस शाम को मौसम कुछ अजीब ही बना पड़ रहा था . यद्यपि बरसात अभी तक हुई नही थी पर किसी भी वक्त मौसम क्या रूख ले लेगा ,कुछ भी कहना असम्भव था . घिरे बादलो से आशंका थी कि कब बरस जाएं .....

मै ने छूटकी से पुछा कि मौसम की हालत देखते हुए ,न जाए ,तो उसने बेलौस कहा की घर में बोर होने से अच्छा होगा कि हम लोग चलें


मुझे भी उसकी बात सही लगी कि ,चलना ही बेहतर होगा .

जल्दी से एक ऑटो ले कर हम निकट के मल्टीप्लेक्स में पहुंचे और टिकट खिड़की से जल्दी से टिकट लिया और हाल की और भागे . हाल में पहुचने पर ,चारो ओर अँधेरा था ,बाहर से आने के कारण अभी आँखे अँधेरे के लिए अभ्यस्त नहीं हुई थी और छुटकी दो बार लडखडा कर गिरते गिरते बची

उसने मुझसे कहा ,कि जब कुछ दिखाई नहीँ दे रहा है तो आप मेरा हाथ तो पकड़ लेते .....

अब मैंने तुरंत आगे बढ उसके हाथ को पकड़ लिया और टिकट -चेकर को टिकट दिखाया ,उसने मुस्कराते हुए कहा ,'ऐश करिए " पीछे की करीब करीब सारी सीटे खालीहैं .
मैंने कहा ,क्या मतलब !छुटकी ने मेरा हाथ दब्बते हुए कहा ,"छोड़िये".
और मुझे खीचते हुए आगे ले गयी .
उस समय आपाधापी में मैं किसी भी बात पर ध्यान नहीँ दे पाया
थोड़ी देर बाद अँधेरे में रहने पर आँखे अँधेरे में देखने में अभ्यस्त हुईं तो देखा की
हाल लगभग खाली था और इक्के -दुक्के लोग ही थे .
हमारे आस पास कोई नहीं था .

खैर फिल्म तो पहले ही शुरू हो चुकी थी .अत: हम फिल्म देखने लगे .
फिल्म शुरू हो चुकी थी ,थोड़ी देर देखने के बाद बोरियत होने लगी थी किन्तु साथ में बैठी बहन ध्यान से फिल्म देख रही थी।

मुझे मजबूरी में फिल्म देखनी थी। ऐसा शायद मेरी मनः स्थिति के कारण ऐसा लग रहा था। मैंने स्क्रीन पर अपनी नजरे टिका दीं और फिल्म देखने लगा। हास्य दृश्यों के कारण मेरी बहन बेसाख्ता हंस पड़ती थी जिससे उसके हाथ बार -बार मेरे हाथों से टकरा रहे थे। एक गंभीर दृश्य में उसने अपना सर मरे कंधे पर रख दिया और काफी देर तक ऐसे ही बैठी रही। मै उसके बदन की उष्णता महसूस कर रहा था। यद्यपि न चाहते हुए भी ध्यान उसके बदन की गर्मी की तरफ जा रहा था। मैंने अपना सर झटका और मष्तिष्क में उठने वाले विचारो को रोकने का प्रयास किया। उसने पूछा ,"क्या हुआ। "
मैंने कहा ,"कुछ नहीं। " "फिल्म कैसी है। "
उसने कहा ,"अच्छी है। "और फिर पूरी तन्मयता से फिल्म देखने लगी।

मेरा मष्तिष्क पुनः भटकने लगा ,और उसके लड़खड़ाने के समय उसके हाथ पकड़ने पर पहुँच गया ,ऊपर के सर के साथ नीचे का सर भी उसका साथ देने लगा और न चाहते हुए भी विचार बहन के यौवन पर पहुँच गए।

मेरा हाथ न चाहते हुए भी उसके कंधे के पीछे पहुँच गया , मैंने बहना किया की शरीर अकड़ रहा है इसलिए बाहें फैला रहा हूँ। उसने कुछ नहीं किया और पुनः पूरी तन्मयता से फिल्म में सन्नद्ध हो गई।
थोड़ी देर बाद स्वयं से बहस करते हुए कहा ,यह सब गलत है और अपना हाथ समेट लिया ,और स्वयं को धिक्कारा।
ऊपर और नीचे वाले दोनों सिरों में बहस रुकने का नाम न ले रही थी। दोनों में बहस छिड़ी थी कि उसके उरोज विकसित हो कर अपना आकार ले चुके हैं,यौवन के आगमन के साथ उनकी पुष्ठ्ता का जवाब नहीं। काश ! एक बार उनके दर्शन ही हो जाते, बहन होने के कारण उनका स्पर्श वर्जित है।

और अभी भी उसके बदन की गर्मी बहका रही थी। एक बार मेरा हाथ उसके कंधे पर पहुँच गया ,पर वह फिल्म देखने में मशगूल थी , उसे शायद इसका अहसास भी नहीं हुआ था की मेरा हाथ उसके कंधे पर था या शायद वह जन बूझ कर अनजान बन रही है, सच्चाई कौन जान सकता था।

स्वयं को समझा रहा था की कहीं वह चिल्ला पड़े या बाद में मेरी पत्नि को बता दे तो लेने के देने पड़ जायेगें ,इस लिए अपनी सीमा और मर्यादा को बनाये रखना ही उचित होगा। मेरे हाथ के पोर उसके उरोज की ओर जाते -जाते रूक चुके थे। तभी एकाएक वह जोर -जोर से हंसने लगी और जोर से अपनी सीट पर पीछे की ओर हो गई जिससे मेरा हाथ उसकी सीट से उसके उरोज के पास चला गया ,मेरा हाथ अजीब तरह से उसके उरोज को स्पर्श कर रहा था और उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी बांह पर कस कर चिपका लिया ,पर उसकी नजर परदे पर ही लगी थी। मेरी उंगलियों के पीछे का भाग उसके उरोज को स्पर्श कर रहा था।

एक बार फिर मेरे मन -मष्तिष्क में द्वंद की स्थिति थी जिसका वर्णन शब्दों में कर पाना अत्यंत दुष्कर प्रतीत हो रहा है। मन हो रहा था की अब तो उसके स्तनों के आकर का पता इन उंगलियों को लग ही जानना चाहिए ,पर मन में बैठा पहरेदार ,मन के चोर को रोकने का प्रयास कर रहा था।

ऐसा लग रहा था कि हाथ में भी मस्तिष्क है और उसके उरोज के स्पर्श के लोभ को संवरण नहीं कर पा रहा है ,मेरी उंगलियाँ कांप रही थी और उसके गुदाज स्पर्श का अनुभव ,अवर्णनीय लग रहा था


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