पांच पापी
साधूराम होतचन्दानी के बंगले के ड्राइंगरूम के तमाम खिड़कियां दरवाजे बन्द थे। भीतर उसके सामने एक आदमी ज्वेलर ग्लास आंख से लगाए मेज पर अपने सामने बिखरे, चमचम करते हीरे जवाहरात परख रहा था और दूसरा आदमी होतचन्दानी के पहलू में बैठा होतचन्दानी की ही तरह अपलक हीरे जवाहरात परखे जाते देख रहा था।

हीरों के पारखी का नाम विवेक जालान था। वह एक लगभग तीस साल का सुन्दर युवक था।

हीरे जवाहरात जिनमें अधिकतर मानक और नीलम थे—साधूराम होतचन्दानी की मिल्कियत थे जोकि पचास से ऊपर आयु का निहायत हट्टा-कट्टा, तन्दुरुस्त आदमी था। उस उम्र में भी न तो वह चश्मा लगाता था, न उसके सिर का कोई बाल सफेद था और न ही उसके चेहरे पर बुढ़ापे के आगमन की बल्कि पहुंच चुके होने की—चुगली करने वाली कोई झुर्री थी। शायद वह नेपाल की—जहां कि उसने अपनी आधी जिन्दगी गुजारी थी—ठण्डी, स्वास्थ्यदायक आबोहवा का असर था।

तीसरे—होतचन्दानी के पहलू में बैठे—आदमी का नाम दामोदर खेतान था और वह परखे जा रहे माल का सम्भावित खरीददार था। वह कोई चालीस साल का भारी-भरकम आदमी था जोकि उस बन्द खिड़कियों और दरवाजों वाले कमरे में भी आंखों पर स्याह काला चश्मा लगाए था।

दोपहर बाद से हीरे जवाहरात की परख का वह जटिल काम चल रहा था और अब शाम होने को आ रही थी। तब से अब तक विवेक जालान ने कभी अपने काम से सिर उठाया था तो नया सिगरेट सुलगाने के लिए या नेपाली बियर का दर्जा रखने वाले जौ से बने मादक तरल पदार्थ झांग का घूंट भरने के लिए जोकि होतचन्दानी का नेपाली नौकर हनुमान अपने मालिक के इशारे पर या इशारे के बिना भी; सबको सर्व कर देता था।

एक बात विवेक जालान के बिना तब तक मुंह खोले ही साफ पता लग रही थी।

वो हीरे जवाहरात मालिक द्वारा बड़े यत्न से छांट छांटकर जमा किए गए थे और यकीनन बेशकीमती थे।

हर स्टोन की परख के बाद विवेक जालान करीब पड़ी एक कापी पर कुछ आंकड़े नोट करता जाता था और उन आंकड़ों के कालम की लम्बाई बढ़ती ही जा रही थी।

अन्त में उसने ज्वेलर ग्लास आंख से हटाकर एक ओर रख दिया और अपने सामने पड़ा जौहरियों वाला नाजुक तराजू भी परे सरका दिया।

साधूराम होतचन्दानी और दामोदर खेतान ने आशापूर्ण नेत्रों से उसकी तरफ देखा।

‘जो’—विवेक जालान खंखारकर गला साफ करता हुआ बोला—‘एक कैरेट से कम वजन के स्टोन हैं, उनकी कीमत का मैं महज अन्दाजा लगाऊंगा।’

‘ठीक है।’—होतचन्दानी बोला।

‘ऐसे स्टोन कितने हैं?’—दामोदर खेतान ने पूछा।

विवेक जालान ने कापी पर लिखे आंकड़ों पर निगाह दौड़ाई और बोला—‘पचपन। मैं इनको भी बाकी स्टोंस की तरह जाचूंगा तो रात हो जाएगी।’

‘जरूरत नहीं।’—खेतान बोला—‘उनकी कीमत का मुझे अन्दाजा मंजूर है।’

‘मुझे भी।’—होतचन्दानी बोला।

विवेक ने सहमति में सिर हिलाया; उसने एक नया सिगरेट सुलगा लिया और पेंसिल लेकर कापी में लिखे आंकड़ों से उलझ गया।

अन्त में उसने कॉपी पेंसिल परे रख दी।

‘क्या परखा?’—दामोदर खेतान उतावले स्वर में बोला।

उत्तर देने के स्थान पर विवेक ने सिगरेट का एक लम्बा कश लगाया। जिस काम को वह अभी अन्जाम देकर हटा था उसे करने के लिए उसे दामोदर खेतान ने चुना था क्योंकि, बकौल उसके, वहां परदेश में किसी स्थानीय नेपाली जौहरी के मुकाबले में उसे अपने ‘जात भाई’ का ज्यादा भरोसा था।

अपने कथित जात भाई से विवेक की जुम्मा जुम्मा आठ रोज की वाकफियत थी। होटल क्रिस्टल में—जिसके एक कमरे में विवेक रहता था—वह पिछले ही महीने आया था। काठमाण्डू के क्रिस्टल जैसे मध्यम दर्जे के होटल में एकाध दिन के आवास के बाद ही हिन्दोस्तानियों की—वो भी जात भाइयों की—वाकफियत हो जाना मामूली बात थी। दामोदर खेतान ने अपने आपको एक व्यापारी बताया था जोकि नेपाल में किसी व्यापार की—किसी भी व्यापार की—सम्भावनाओं पर विचार करने के लिए काठमाण्डू आया था। बकौल उसके भारत में उसका होजियरी का बिजनेस था।

दामोदर खेतान नाम के उस शख्स को बातचीत का कुछ ऐसा ढंग आता था कि चाहकर भी विवेक अपने बारे में उससे कोई सीक्रेट नहीं रख पाया था। अपने बारे में वह यह तक नहीं छुपा पाया था कि अपने घर से, अपने वतन से इतनी दूर परदेस में इन दिनों वो बेकार था और उसकी आर्थिक स्थिति इतनी शोचनीय हो चली थी आइन्दा दिनों में उसे अपने होटल का बिल भरना भी दूभर लग सकता था। दामोदर खेतान बतौर ट्रेंड जियोलोजिस्ट और जैम एक्सपर्ट उसकी योग्यताओं से बहुत प्रभावित हुए था और उसने आशा व्यक्त की थी कि विवेक जैसे ‘गुणी’ आदमी को नेपाली या हिन्दोस्तान में कोई नयी नौकरी ढूंढ़ने में दिक्कत नहीं होने वाली थी। तब विवेक ने उसे बताया था कि नयी नौकरी की आफर उसे मिल चुकी थी और वह उसी को ज्वाइन करने के लिए सोमवार को दिल्ली जा रहा था।

अब उस रोज दामोदर खेतान के कहने पर पांच हजार रुपये की निर्धारित फीस पर वो वहां साधूराम होतचन्दानी के बंगले में उसके जवाहरात की परख करके उसकी कीमत लगाने के लिए हाजिर हुआ था।

होतचन्दानी से भी विवेक नावाकिफ नहीं था—न सिर्फ नावाकिफ नहीं था, बल्कि खेतान के मुकाबले में उससे कहीं ज्यादा, कहीं पुराना वाकिफ था। हकीकत होतचन्दानी ही उसकी मौजूदा बेकारी की वजह था। होतचन्दानी वो शख्स था जिसके पार्टनरशिप के झांसे में आकर वह दिल्ली छोड़कर नेपाल आया था और जिससे धोखा खाकर वो अपनी मौजूदा दुश्वारी की हालत में पहुंचा था।

‘क्या परखा?’—दामोदर खेतान ने पूर्ववत् उतावले स्वर में अपना सवाल दोहराया।

‘मैं सिर्फ अपना जाती अन्दाजा बता सकता हूं।’—विवेक बोला।

‘ठीक है।’—होतचन्दानी तनिक तिक्तताभरे स्वर में बोला—‘जवाहरात का सारा धन्धा ही जाती अन्दाजों पर मुनइसर होता है। औरतों और घड़ियों की तरह जैम एक्सपर्ट्स में भी काफी इत्तफाक नहीं होता। एक ही हीरा दो अलग-अलग पारखियों को दिखाओ, कभी ऐसा नहीं होगा कि दोनों उसकी एक ही कीमत बतायें। बहरहाल मेरे में और दामोदर खेतान में यह फैसला पहले ही हो चुका है कि हम दोनों को तुम्हारा अन्दाजा मंजूर होगा। अब बोलो क्या है तुम्हारा अन्दाजा?’

‘उनचास लाख तिहत्तर हजार चार सौ रुपये।’

‘इन्डियन या नेपाली?’—दामोदर खेतान बोला।

‘इन्डियन।’
विवेक ने साफ महसूस किया कि उसका जवाब सुनकर होतचन्दानी ने चैन की बड़ी लम्बी सांस ली थी। वजह विवेक जानता था। जरूर होतचन्दानी समझ रहा था कि उससे बदला निकालने के लिए वह जानबूझकर जवाहरात की कीमत कम करके आंक सकता था और उसे इस सेवा की दामोदर खेतान से कोई फीस हासिल हो सकती थी।

हकीकतन ऐसा नहीं था। हकीकतन विवेक ने पूरी ईमानदारी से जवाहरात को परखा था और अपने पूरे कारोबारी तजुर्बे से उनकी कीमत आंकी थी।

‘राजी?’—होतचन्दानी दामोदर खेतान से बोला।

खेतान ने तुरन्त उत्तर न दिया। उसने अपनी आंखों पर से अपना काला चश्मा उतारा और नेत्र सिकोड़कर कई बार अपने मेजबान की सूरत को और जवाहरात को देखा।

‘कमाल है, साईं!’—वह धीरे से बोला—‘छोटे, बड़े कई किस्म के जवाहरात की एक पोटली यह कहकर मेरे सामने फेंकी जाती है कि इसमें पचास लाख का माल है और परखे जाने पर माल पचास लाख का ही निकलता है। मेरा मतलब है तकरीबन।’
‘विवेक तुम्हारा आदमी है।’—होतचन्दानी तनिक सख्ती से बोला—‘इसे तुम्हीं ने चुना है और तुम्हीं इसे यहां लाए हो।’ जब तुम्हें अपने ही आदमी की परख पर एतबार नहीं तो…’

‘मुझे पूरा एतबार है।’

‘तो फिर?’

दामोदर खेतान खामोश रहा।

‘सच पूछो तो मेरा अन्दाजा इसके अन्दाजे से कदरन ज्यादा था। विवेक मुझे पसन्द नहीं करता। इसको मेरे से जाती रंजिश है। इसकी जगह कोई जूसरा जैम एक्सपर्ट होता तो मुमकिन है कि माल की कीमत दो चार लाख रुपये ज्यादा आंकता।’

‘या शायद’—दामोदर खेतान बोला—‘दो चार लाख रुपये कम आंकता।’

‘शायद।’

दामोदर खेतान फिर खामोश हो गया। उसके चेहरे से सन्देह और चिन्ता के भाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे थे। कुछ क्षण बड़ा बोझिल सा सन्नाटा छाया रहा।

‘ठीक है।’—आखिरकार खेतान ने चश्मा वापिस अपनी आंखों पर चढ़ा लिया और निर्णायक स्वर में बोला—‘मुझे सौदा मंजूर है। अब अगली बात।’

‘क्या?’—होतचन्दानी सशंक स्वर में बोला।

‘कैश डाउन पर रियायत की बात हुई थी?’

‘रियायत?’
‘जो कि कम से कम दस फीसदी तो होनी ही चाहिए।’

‘मुझे मंजूर है। लेकिन रियायत का तरीका जुदा होगा।’

‘क्या?’

‘रकम में कमी करने की जगह मैं माल में इजाफा कर देता हूं।’

‘मैं समझा नहीं।’

‘अभी समझाता हूं।’

होतचन्दानी अपने स्थान से उठा और ड्राईंगरूम के पिछवाड़े के एक बन्द दरवाजे की तरफ बढ़ा। उसने वह दरवाजा खोला तो आगे एक लम्बा गलियारा प्रकट हुआ। होतचन्दानी ने गलियारे में कदम रखा और अपने पीछे दरवाजा भिड़का दिया।

होतचन्दानी के दृष्टि से ओझल होते ही दामोदर खेतान अपने स्थान से उठा और आकर विवेक वाले सोफे पर उसके पहलू में बैठ गया।

‘भाई मेरे।’—वह विवेक के कन्धे पर हाथ रखता हुआ चिन्तित स्वर में बोला—‘मुझे ठीक राय दे रहा है न? अपने जात भाई को घाटे के सौदे में तो नहीं फंसा रहा?’

‘मुझे क्या जरूरत पड़ी है तुम्हें घाटे के सौदे में फंसाने की?’ विवेक भुनभुनाया।

‘जरूरत तो नहीं पड़ी लेकिन...यानी कि तुम्हारी राय में सौदा बुरा नहीं।’

‘मुझे नहीं मालूम सौदा बुरा है या अच्छा। मैंने सौदे के बारे में कोई राय नहीं दी। मैंने माल के बारे में राय दी है। और अपनी राय की बाबत भी मैंने यह दावा नहीं किया कि वो सौ फीसदी दुरुस्त है।’

‘वो तो होतचन्दानी भी कहता था कि किसी एक एक्सपर्ट की राय सौ फीसदी दुरुस्त नहीं हो सकती। थोड़ी बहुत कमी बेशी चलेगी। उससे मुझे एतराज नहीं। मैं ये पूछ रहा हूँ, भाई मेरे, कि मेरी जगह अगर तुम खरीदार होते तो जो कीमत तुमने माल की लगाई है, वो तुम अदा कर देते?’

‘मेरे पास ऐसी कीमत सात जन्म में नहीं हो सकती।’

‘हो सकती तो अदा कर देते?’

‘तुम मुझे बातों में न फंसाओ। मैं तुम्हारे सवाल का जवाब नहीं दे सकता। मेरा जवाब ये है कि जो काम तुमने मुझे करने के लिए दिया था, उसे मैंने अपनी पूरी काबिलियत और ईमानदारी से अंजाम दिया है और मैं बहुत सोच समझ कर इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि इन जवाहरात की कीमत उनचास लाख तिहत्तर हजार चार सौ रुपये से किसी सूरत में कम नहीं। अब मेरे नतीजे से इत्तफाक करना या न करना, मेरी आंकी हुई कीमत पर एतबार करना या न करना तुम्हारी अपनी मर्जी पर मुनहसर है।’

‘बात तो तुम ठीक कह रहे हो।’

विवेक खामोश रहा।

‘कोई वजह तो नहीं दिखाई देती तुम्हारी काबिलियत या ईमानदारी पर एतबार न करने की।’

विवेक कोई जवाब देने की जगह नया सिगरेट सुलगाने में मशगूल हो गया।
दामोदर खेतान ने अपना बटुवा निकाला और गिन कर उसमें से सौ सौ के पच्चीस नोट निकाले।

‘ये रही तुम्हारी आधी फीस।’—वह नोट विवेक की तरफ बढ़ाता हुआ बोला—‘बाकी आधी फीस सौदा चुकता होने के बाद।’

‘थैंक्यू।’—विवेक नोट थमाता हुआ बोला।

तभी होतचन्दानी वापिस लौटा। उसके हाथ में टीन का एक छोटा सा डिब्बा था। वह सैन्टर टेबल के करीब पहुंचा। उसने डिब्बे का ढक्कन खोला और डिब्बे को मेज पर उलटा कर दिया।

मेज पर मटमैले कंकड़ से लुढ़क पड़े।
आम निगाह के लिए वो कंकड़ थे लेकिन विवेक की पारखी निगाह ने तत्काल पहचाना कि वे मानक और नीलम थे जो कि अभी तराशे नहीं गये थे।

‘ये क्या है?’—दामोदर खेतान बड़बड़ाये स्वर में बोला।

‘रियासत।’—होतचन्दानी बड़े इत्मीनान से बोला।

‘क्या मतलब?’

‘ये वर्मा की खानों से निकले नीलम और मानक हैं। तराशे जा चुकने पर इनकी कीमत दस लाख से ऊपर बनेगी लेकिन अपनी मौजूदा हालत में भी पांच लाख से कम का माल ये किसी सूरत में नहीं। विवेक से पूछ लो।’

पूछे जाने से पहले ही विवेक का सिर सहमति में हिलने लगा।

‘तुम्हें कैश डाउन कीमत में दस फीसदी की रियासत चाहिये थी’—होतचन्दानी बोला—‘उसकी जगह मैं तुम्हें ये पांच लाख से कहीं ऊपर का एक्स्ट्रा माल दे रहा हूं। कीमत वही रहेगी जो विवेक ने लगाई। उनचास लाख तिहत्तर हजार चार सौ रुपये। ठीक है?’

‘ठीक तो है लेकिन…’

‘क्या लेकिन? हमारे बीच कैश डाउन पर रियासत की बात हुई थी लेकिन ऐसा कुछ तय नहीं हुआ था कि वो रियासत इतनी होगी, किस सूरत में होगी। कहो कि मैं गलत कह रहा हूं।’

गलत तो तुम नहीं कह रहे हो साईं, लेकिन…।’

‘अगर मैं गलत नहीं कह रहा हूं तो कैश निकालो।’

‘कैश निकालूं?’

‘और क्या?’

‘कैश मेरी जेब में थोड़े ही है! पचास लाख के नोट कोई जेब में रखकर लाये जा सकते हैं?’

‘तो?’

‘सुबह! कैश मेरे पास सवेरे आयेगा और तुम जब चाहोगे तुम्हारे पास पहुंचा दिया जायेगा।’

‘हूं!’—होतचन्दानी विचारपूर्ण स्वर में बोला। फिर वह मेज पर फैले जवाहरात को गिनकर, जुदा जुदा कागजों में लपेट कर काले रंग की शनील की एक थैली में बन्द करने लगा। उसके द्वारा बाद में लाये, बिना तराशे, जवाहरात उसने अलग शनील की थैली में बन्द किये। उसने दोनों थैलियों को उनकी डोरियां खींच कर मजबूती से बन्द किया। फिर वह एक कोने में लगी एक आफिसनुमा टेबल के करीब पहुंचा और उसका इकलौता दराज खोल कर उसने उसमें से एक बड़ा मजबूत भूरा लिफाफा, लाख की एक स्टिक और एक मोमबत्ती बरामद की। वो सब सामान सम्भाल कर वापिस सैन्टर टेबल पर लौटा। उसने शनील की दोनों थैलियां भूरे लिफाफे में बन्द कीं और लिफाफे का फ्लैप गीला करके उसे मोड़ कर लिफाफे के साथ चिपका दिया।
‘जरा अपनी अंगूठी उतारो।’—होतचन्दानी बोला।

‘क्यों?’—दामोदर खेतान हड़बड़ा कर बोला।

‘इस पर मुझे बेलबूटियों की नक्काशी के बीच में तुम्हारे नाम का पहला हरफ ‘डी’ गुदा दिखाई दे रहा है। लिफाफा बन्द करने में तुम्हारी ये अंगूठी सील का काम देगी।’

‘ओह!’

दामोदर खेतान ने अंगूठी उतार कर मेज पर रखी दी।

होतचन्दानी ने विवेक से लाइटर लेकर मोमबत्ती जलाई और फिर लाख और अंगूठी की सहायता से लिफाफे को सील करने लगा। लिफाफे पर आठ दस जगह लाख की सील लग चुकी तो उसने अंगूठी वापिस दामोदर खेतान को लौटा दी और मोमबत्ती बुझा दी।

‘अब ये लिफाफा’—वह बोला—‘सील तोड़े बिना नहीं खोला जा सकता।’

‘फायदा!’—दामोदर खेतान बोला—‘फायदा क्या हुआ?’

‘फायदा ये हुआ कि अब सुबह तुम्हारे कैश लेकर आने पर मेरे पर इलजाम नहीं लगाया जा सकेगा कि जिन जवाहरात की परख आज हम सब के सामने हुई थी वो तुम्हारे यहां से चले जाने के बाद मैंने बदल दिये थे या इनमें मैंने कोई घट बढ़ कर दी थी।’

‘ओह!’

‘अब कल माल को दोबारा परखने के लिए विवेक को तकलीफ देने की जरूरत नहीं रहेगी। सुबह अगर ये सील तुम्हें बरकरार मिलेंगी तो यह इस बात का सबूत होगा कि जो माल अभी इसमें रखा गया है, ऐन वही इसमें से बरामद होगा।’

‘तुम इस लिफाफे को फाड़ कर फेंक सकते हो और ऐसा एक नया लिफाफा लेकर उस पर नयी सीलें लगा सकते हो।’

‘नहीं लगा सकता। अंगूठी तो तुम्हारे पास होगी। और बेलबूटों की ऐसी पेचीदा निक्काशी वाली, तुम्हारे नाम वाली ऐन ऐसी ही अंगूठी ओवरनाइट नहीं बनवायी जा सकती। विवेक से पूछ लो।’

विवेक ने सहमति में सिर हिलाया।

‘ठीक।’—दामोदर खेतान गम्भीरता से बोला।

लिफाफा सम्भाले बोतचन्दानी वापिस आफिस टेबल पर पहुंचा। टेबल के इकलौते दराज के नीचे अलमारी की तरह खुलने वाला एक पल्ला लगा हुआ था। उसने उसे खोला तो पीछे से एक नन्हीं सी मजबूत सेफ बरामद हुई। उसने सेफ पर लगे डायल पर एक नम्बर घुमाया और सेफ का दरवाजा खींचा। भारी दरवाजा निःशब्द खुल गया। उसने सील बन्द लिफाफा सेफ में रखा, सेफ को बन्द किया और उसके मुंह पर मेज का पल्ला भी बन्द कर दिया। सेफ दृष्टि से ओझल हो गयी।

वह वापिस लौटा।
‘अब’—वह बोला—‘नेपाली झांग की जगह विलायती विस्की हो जाये।’

‘मेरे लिये नहीं।’—दामोदर खेतान एकाएक उठ खड़ा हुआ—‘मैं चलता हूँ।’

‘जल्दी क्या है?’

‘मुझे है। सॉरी अब कल मुलाकात होगी।

‘मर्जी तुम्हारी।’—फिर विवेक को भी उठने का उपक्रम करते पाकर वह बोला—‘तुम तो रुको।’

‘मैं भी चलता ही हूं।’—विवेक अनिश्चित भाव से बोला।

‘थोड़ी देर रुको। प्लीज! एकाध ड्रिंक तो मेरे साथ लेते जाओ। फिर बेशक चले जाना।’

‘अच्छी बात है। एकाध ड्रिंक के लिए रुक जाता हूं मैं।’

‘शुक्रिया।’
होतचन्दानी दामोदर खेतान को विदा करने के लिए उसके साथ बाहर बंगले के बरामदे तक गया। कुछ क्षण बाद वह अकेला वापिस लौटा

‘हनुमान!’—वापिस विवेक के करीब पहुंचकर उसने जोर से आवाज लगायी।

जवाब में उसका सफेद बालों वाला अति विशालकाय बूढ़ा नेपाली नौकर ड्राईंगरूम में पहुंचा।

‘विस्की लाओ।—होतचन्दानी ने आदेश दिया।

हनुमान तत्काल वापिस लौट गया।
होतचन्दानी विवेक के करीब आ बैठा। वह कुछ क्षण अपलक विवेक को देखता रहा और फिर धीरे से बोला—‘मेरे माल की सही कीमत आंक कर आज तुमने मेरे ऊपर बहुत मेहरबानी की है। उस मेहरबानी का मैं एक छोटा सा बदला चुकाना चाहता हूं।’

विवेक ने उत्तर न दिया। उसने ये भी न पूछा कि वो कैसे बदला चुकाना चाहता था। इसके विपरीत वह उसके बारे में सोचने लगा। कैसा आदमी था ये साधूराम होतचन्दानी जो कि आज से तीस साल पहले अपनी नौजवानी में अपने घर से भाग कर नेपाल आया था और कुछ अपनी मेहनत से और अधिकतर अपनी चालाकी, बेईमानी और ठगी की अद्भुत क्षमता से जमीन से उठ कर आसमान पर पहुंच गया था। कहने को वो आढ़त का दलाल और हिन्दोस्तानी कपड़े का व्यापारी था लेकिन हकीकत वो स्मगलरों का शरणदाता और ठगों और उठाईगीरों का सरपरस्त था। भारत के अलावा बर्मा, बंगला देश और थाईलैंड तक में उसके सम्पर्क बताये जाते थे। अपनी आधी जिन्दगी नेपाल में गुजारने के बाद अब वह अपना तमाम तामझाम बेचकर और बुढ़ौती में एक थाई हसीना से शादी करके हिन्दोस्तान वापिस लौट जाने की तैयारी कर रहा था। अपना मौजूदा बंगला तक वह बेच चुका था। उन जवाहरात की बिक्री आखिरी सौदा था जिसे उसने अभी थोड़ी देर पहले अंजाम दिया था।

‘अगर’—होतचन्दानी कह रहा था—तुमने मेरे से बदला उतारने की कोशिश की होती तो मेरे माल की कीमत तुम पचास की जगह चालीस लाख भी लगा सकते थे, पैंतीस लाख भी लगा सकते थे।’

‘मेरी लगायी कीमत मंजूर करना’—विवेक बोला—‘आपके लिये जरूरी नहीं था।’

‘मौजूदा हालात में जरूरी था। मैं कीमत नामन्जूर करता तो सौदा टूट जाता। फिर हिन्दोस्तानी रुपये में कैश डाउन पेमेन्ट करने वाला अपने माल का दूसरा ग्राहक ढूंढ़ने में मुझे महीनों लग जाते जब कि मैं तो इसी हफ्ते यहां से कूच कर जाना चाहता हूं।’

‘इतना रुपया आप यूं यहां से ले जा सकते हैं?’

‘ले जा सकता हूं। सबको मालूम है मैं अपना बिजनेस; घर बार सब कुछ बेचकर यहां से जा रहा हूं। पूछे जाने पर मैं जवाहरात का नाम भी नहीं लूंगा। पूछे जाने पर यही कहूंगा कि मुझे सारी रकम अपना घर बार, अपना बिजनेस और उसकी गुडविल बेच कर हासिल हुई।’

‘खेतान जवाहरात का क्या करेगा?’

‘पता नहीं। मैंने नहीं पूछा। मुझे अपनी रकम से मतलब है। वो जवाहरात को ले जाकर चाहे दरिया में फेंके। वैसे नेपाल से बाहर उन जवाहरात की कीमत एक करोड़ से ऊपर होगी।’

‘वो जरूर कोई तरीका होगा उसकी निगाह में उन्हें नेपाल से बाहर ले जा सकने का।’

‘हूं!’

‘बहरहाल मैंने तुम्हारी ईमानदारी पर दांव खेला था।’

‘जानकर खुशी हुई’—विवेक शुष्क स्वर में बोला—‘कि एक बेईमान आदमी को, एक ऐसे बेईमान आदमी को जो खुद मेरे से बेईमानी कर चुका है, अब मेरी ईमानदारी की कद्र हुई, उसे उसकी जरूरत महसूस हुई।’

‘व्यापार में ऊंचनीच होती ही है।’
‘जो हरकत आपने मेरे साथ की थी वो व्यापार में हुई ऊंचनीच का नहीं, गुण्डागर्दी, धांधली और साफ बेईमानी का दर्जा रखती है। मेरे साथ पार्टनरशिप का एग्रीमेंट बनवाया, मेरे साइन करने का वक्त आया तो मेरी आंखों में धूल झोंक कर उसे बदल दिया और मेरे से उस कागज पर साइन करवा लिये जिसके मुताबिक मैं आपका पार्टनर नहीं, आपका मुलाजिम था। ये गुण्डागर्दी, धाँधली और बेईमानी नहीं तो और क्या है।’

‘अच्छे व्यापारी को एक ये भी तो सीख होती है कि वो अपनी आंखें खुली रखे और किसी को उसमें धूल न झोंकने दे!

‘एतबार भी तो कोई चीज होती है!’

‘धन्धे में नहीं होती। होती है तो साधूराम होतचन्दानी के धन्धे में नहीं होती। मैं भी तुम्हारी तरह होता तो आज भी मैं नंगे पांव, खाली जेब, दो जून की रोटी लिए काठमाण्डू की सड़कों पर दुर-दुर करता फिर रहा होता।’

‘आप बेईमानी को अपनी खूबी बता रहे हैं?’

‘नहीं। वक्त की जरूरत।’

‘मैं आपसे सहमत नहीं।’

‘जाहिर है। तभी तो कुछ दिन पहले आंखों में खून लिए तुम यहां आ धमके थे। मेरा नौकर हनुमान ऐन मौके पर बीच में न आ गया होता तो उस दिन पता नहीं तुम मेरी क्या गत बनाते। शायद मार ही डालते। बावजूद पीछे हो चुकी इतनी बड़ी घटना के तुमने मेरे से सहयोग किया, मेरे माल की सही कीमत आंकी, इसके लिए मैं तुम्हारा अहसानमन्द हूं और इसका मैं बदला चुकाना चाहता हूं।’

‘यह आपने पहले भी कहा।’
तभी एक ट्रे पर उम्दा स्काच विस्की, सोडा साइफन और दो ग्लास रखे हनुमान वहां पहुंचा। उसने ट्रे का सामान सैन्टर टेबल पर स्थानान्तरित किया और खाली ट्रे के साथ वहां से विदा हो गया।

होतचन्दानी ने विस्की के दो बड़े पैग बनाये।

दोनों ने चियर्स बोला।

‘किसी की’—विस्की का एक घूंट पीने के बाद होतचन्दानी बोला—‘मेहरबानी का बदला चुकाने की जरूरत समझने वाली किस्म का आदमी मैं नहीं। लेकिन लगता है इस उम्र में हुए इश्क ने और तीस साल बाद अपने वतन लौटने की खुशी ने मुझे नर्मदिल बना दिया है।’—उसने जेब से एक रंगीन कागज में बंधी पुड़िया निकालकर उसे खोला और खुले कागज को विवेक के सामने किया—‘पन्ना है। दस कैरेट से ऊपर है। एक फैस में जरा से नुक्स है लेकिन वो सैटिंग में छुप जायेगा। इसकी अंगूठी बनवाकर अपनी होने वाली बीवी को देना। मेरे आशीर्वाद के साथ। लो।’

‘सूम का माल है।’—विवेक कागज समेत पन्ने को थामता हुआ बोला—‘छोड़ूंगा तो नहीं। लेकिन ये न समझिएगा कि इसी में उस धोखाधड़ी और बेईमानी का भी बदला चुक गया जो कि आप मेरे साथ कर चुके हैं। आपकी उस करतूत के लिए तो मैं जब तक जिन्दा रहूंगा आपकी तत्काल मृत्यु की कामना करूंगा।’

‘पुटड़े!—होतचन्दानी शिकायतभरे स्वर में बोला—‘मेरे घर में बैठकर, मेरी मेहमाननवाजी कबूलते हुए तो ऐसा बुरा बोल न बोल।’

‘मैं ऐसा ही बुरा बोल बोलूंगा। अलबत्ता आप अपनी विस्की का गिलास मेरे से छीन सकते हैं और मुझे घर से निकाल सकते हैं।’
‘अरे, नहीं। मैं ऐसा क्यों करूंगा। मैं तो तुम्हारे अपने बीच में अमन शान्ति का माहौल देखना चाहता हूं।’

‘वो नहीं हो सकता।’

‘और दो दिन का तो दाना पानी रह गया है नेपाल में मेरा। उसके बाद पता नहीं जिन्दगी में हम दोनों कभी एक दूसरे की सूरत भी देख पाएंगे कि नहीं।’

‘तभी तो इस कोशिश में हूं कि आपको अभी जी भर के कोस लूं।’

होतचन्दानी हंसा।

‘बहरहाल पन्ने का शुक्रिया। मेरी खुद की औकात तो पता नहीं कब होती इतने खूबसूरत और कीमती नग वाली अंगूठी श्वेता को भेंट करने की।’—उसने विस्की का गिलास खाली किया और उठ खड़ा हुआ—‘अब मैं चलता हूं।’

‘अरे, एक ड्रिंक तो और लो।’

‘नहीं। मेहरबानी।’

उसने पन्ने को कागज में वापिस लपेट कर पुड़िया अपनी जेब में रख ली और बिना अपने मेजबान से हाथ मिलाने का या उसका अभिवादन करने का उपक्रम किए दरवाजे की ओर बढ़ा।

‘डार्लिंग।’—तभी बाहर बरामदे पर से एक सुरीली आवाज आयी—‘कहां हो!’

फिर दरवाजा खुला और एक अतिसुन्दर, अतिआधुनिक, विलायती परिधानधारी युवती ने भीतर कदम रखा। उसका रंग गोरा था, नयन नक्श बहुत तीखे थे और स्याह काले बालों का सजधज ऐसी थी जैसे वह उसी घड़ी उन्हें किसी ब्यूटी पार्लर से सैट कराकर आयी थी। आयु में वो लगभग तीस वर्ष की थी लेकिन उम्र से आया ठहराव और शाइस्तगी उसकी खूबसूरती को दोबाला ही कर रहे थे।

वह अचरा योसविचित नाम की वो थाई युवती थी जिससे जवान, उम्रदराज, दो बच्चों का बाप साधूराम होतचन्दानी शादी करने जा रहा था।

‘हल्लो डार्लिंग। हल्लो जालान!’—वह पहले होतचन्दानी और फिर विवेक से बोली—‘मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया! मेरे आने से विघ्न तो नहीं पड़ा!’

‘कतई नहीं। कतई नहीं!’—होतचन्दानी उठकर उसका स्वागत करता हुआ बोला। वह करीब आयी तो उसने बड़े अनुरागपूर्ण भाव से उसे अपनी एक बांह के घेरे में ले लिया।

अपनी नस्ल के लिहाज से अचरा खूब लम्बी थी। उसका कद होतचन्दानी से ज्यादा नहीं तो उसके बराबर जरूर था। कुछ ज्यादा लम्बी वह अपने बालों की वजह से भी लग रही थी। जिसे उसने माथे के ऊपर से गोलाई में घुमाकर सैट करवाया हुआ था।

होतचन्दानी की आंखों में उस घड़ी जो गुलाबी डोरे तैरते विवेक को दिखाई दिए, वह समझ न सका कि वे विस्की की वजह से थे या अचरा के आगमन की वजह से। उसने जोर से अचरा को अपने पहलू के साथ भींचा।

‘मेरे बाल न बिगाड़ देना।’—अचरा चेतावनीपूर्ण स्वर में बोली—‘एक घन्टा लगा है इन्हें सैट करवाने में।’

होतचन्दानी ने उसे अपने पहलू से निकल जाने दिया।

‘क्या बात है!’—वह मदभरे स्वर में बोला—‘आज कुछ ज्यादा ही हसीन लग रही हो।’

‘इसमें मेरा क्या कमाल है?’—वह खनकती हुई हंसी हंसती हुई बोली—‘सब ब्यूटी पार्लर का कमाल है जहां से मैं बाल सैट करवाकर आयी हूं। लेकिन तुम मेरे मेकअप की तारीफ कर रहे हो या मेरी पोशाक की! वैसे ये पोशाक भी नयी है। आज ही पहनी है पहली बार।’

पोशाक एक बहुत भड़कीली स्कर्ट और पीले रंग का ऊनी ब्लाउज थी।’ ब्लाउज की फिटिंग कुछ ऐसी थी कि उसका सुडौल उन्नत वक्ष और भी सुडौल और उन्नत लग रहा था।

‘मेरे लिए काबिलेतारीफ’—होतचन्दानी यूं बोला जैसे बीस साल का छोकरा हो—‘न तुम्हारी पोशाक है और न तुम्हारा मेकअप। मेरे लिए तो काबिलेतारीफ सिर्फ तुम हो।’

‘थैंक्यू!’—वह बोली—‘थैंक्यू डार्लिंग।’

विवेक फिर दरवाजे की तरफ बढ़ा।

‘जा रहे हो?’—अचरा बोली।

‘हां।’—वह बोला।

‘क्यों?’

‘क्योंकि कबाब में हड्डी बनने का मेरा कोई इरादा नहीं।’

‘कबाव से क्या? हड्डी क्या?’

‘डैडी से समझना।’

और विवेक वहां से विदा हो गया।

विवेक जालान होटल क्रिस्टल के डायनिंग हाल में श्वेता शाह के साथ बैठा था। वे डिनर कर चुके थे और अब काफी की प्रतीक्षा कर रहे थे।

श्वेता शाह वो नेपाली युवती थी जिस पर विवेक दिलोजान से फिदा था और जिससे शादी करने का वह बड़ा मजबूत इरादा रखता था।

श्वेता से उसकी पहली मुलाकात होतचन्दानी के आफिस में हुई थी जहां कि वह अपने एम्पलायर के भेजे होतचन्दानी से कुछ कागजात साइन करवाने आयी थी। होतचन्दानी उस घड़ी कहीं गया हुआ था इसलिए उसके इन्तजार में वह विवेक के केबिन में उसके पास बैठी रही थी।

विवेक को पहली नजर में उससे प्यार हो गया था।

वो प्यार अब इस कदर परवान चढ़ चुका था कि विवेक उसके बिना अपनी कल्पना नहीं कर सकता था।

होतचन्दानी के बंगले पर हुए अपने दिन भर के काम और पच्चीस सौ रुपये की कमाई की बाबत वह सविस्तार श्वेता को बता चुका था। श्वेता की सूरत से साफ जाहिर हो रहा था कि विवेक की वो एडवेंचर उसे कोई खास पसन्द नहीं आई थी।

‘तुम्हें तो’—श्वेता बोली—‘होतचन्दानी से सख्त नफरत थी।’

‘मुझे किसी से नफरत नहीं।’—बात को मजाक में उड़ाने की गरज से विवेक बोला—‘मैं महात्मा बुद्ध हूं।’

‘उस शख्स ने तुम्हें इतना बड़ा धोखा दिया, बल्कि साफ-साफ तुम्हें ठगा फिर भी तुम्हें उसका काम करना मंजूर हुआ!’

‘उसका नहीं डार्लिंग, दामोदर खेतान का।’
‘वो कौन सा कम है। मुझे तो वो तुम्हारे मुल्क की फिल्मों के उन गुण्डों जैसा लगता है जो क्लाइमेक्स में थोक में हीरो से मार खाते हैं। गौंगस्टर्स की तरह हर वक्त काला चश्मा लगाये रहता है।

विवेक हंसा।

‘हंसने की बात नहीं है।’—श्वेता बोली—‘हीरे जवाहरात जंचवाने के लिए क्यों उसने तुम्हें चुना? ऐसे कामों के लिए लोग साख वाली फर्म में जाते हैं जहां कि सरकारी मान्यताप्राप्त जैम एक्सपर्ट उपलब्ध होते हैं। इतने बड़े सौदे की आफर वाले माल को परखवाने के लिए उसे लिच्छवी ज्वेलर्स के पास जाना चाहिए था।’

‘मैं भी जैम एक्सपर्ट हूं।’

‘हो। लेकिन तुम सरकारी मान्यताप्राप्त जैम, एक्सपर्ट नहीं हो।’

‘लेकिन जैम एक्सपर्ट हूं। लिच्छवी के जैम एक्सपर्ट मेरे से ज्यादा ज्ञानी नहीं हो सकते। ऊपर से मैं क्वालीफाइड जियोलोजिस्ट हूं। जेम्स की बावत कितनी ही बातें मैं दुकानदारी वाले जौहरियों से ज्यादा जानता हूं।’

‘ओफ्फोह! बावजूद अपनी सारी काबलियत के तुम माल की बाबत कोई सर्टिफिकेट तो इशू नहीं कर सकते।

‘दामोदर खेतान को किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं थी। उसका काम मेरी जुबानी राय पर ही चल सकता है।’

‘इसी से साबित होता है कि ये कोई घोटाले का सौदा है। कोई गैरकानूनी सौदा है।’

‘होता रहे। मुझे क्या! मेरी तरफ से बेशक वो जवाहरात चोरी का माल हों। ये खरीदने वाले की सिरदर्द है कि वह चोरी के माल का क्या करेगा या उससे क्या फायदा उठायेगा। मैंने बेचने वाले को बेचने की राय नहीं दी, खरीदने वाले को खरीदने की राय नहीं दी। मेरे से महज एक आइटम के बारे में सवाल किया गया कि वो सोना है या पीतल है, मैंने बता दिया।’

तभी वेटर काफी ले आया।

वेटर के काफी सर्व करके चले जाने तक दोनों खामोश रहे।

‘श्वेता, माई डार्लिंग’—फिर विवेक उसे समझाता हुआ बोला—‘तुम बात को यूं समझो कि एक जरूरतमन्द आदमी ने ओवरटाइम किया, अपनी मेहनत की फीस कमाई। मुझे इससे क्या कि साधूराम होतचन्दानी चोर है या दामोदर खेतान उठाईगीरा। मैंने पच्चीस सौ रुपए कमा लिए हैं। इतने ही रुपए कल अभी और मिलेंगे मुझे। अब ये क्या तुम्हें भी बताने की जरूरत है कि ये रकम मेरे कितने काम आ सकती है!’

श्वेता ने उत्तर न दिया। उसने खामोशी से काफी का एक घूंट पिया।

‘मैंने दिल्ली जाकर अपना कोई घर-बार जमाना है। कोई टीन टप्पर खड़ा करना है जिसमें कि मैं तुम्हें रख सकूं। मेरे इस अभियान में ये रकम कितनी कारगर साबित हो सकती है, इसे तुम तो समझो! जितने मेरे पास पैसे ज्यादा होंगे उतनी ही जल्दी मैं तुम्हें अपनी बीवी बनाने की स्थिति में होऊंगा।’

‘तुम यहीं क्यों नहीं रह जाते?’

‘क्योंकि जितना मैं यहां रह चुका हूं, उतने से मैंने बखूबी जान लिया है कि यहां कुछ नहीं रखा।’

‘तुम्हें यहां नौकरी मिल सकती है।’

‘लेकिन मामूली। काम चलाऊ। जो मेरा सिर्फ इतना भला करेगी कि मैं बेरोजगार नहीं कहलाऊंगा। ऐसी खानापूरी का दर्जा रखने वाली नौकरी के लिए, जिसमें तरक्की के भी कोई आसार नहीं, परदेस में धक्के खाने का क्या फायदा! यहां होतचन्दानी ने धोखा न दिया होता, तो बात कुछ और होती।’

‘हूं।’

‘अब तुम इसे भी मेरी खुशकिस्मती समझो कि दिल्ली के सबसे बड़े ज्वेलर के पास मेरी बड़ी इज्जतदार नौकरी लग रही है। जाते जाते मैंने पांच हजार रुपए कमा लिये तो क्या बुरा किया।’

श्वेता ने उत्तर न दिया।

‘बोलो।’

‘तुम’—श्वेता बोली तो उसने नया ही सवाल किया—‘अभी मुझे साथ क्यों नहीं ले जा सकते?’

‘सौ बार बताया। एक सौ एकवीं बार बताता हूं। दिल्ली पहले जाकर तुम्हें वहां रहने के लिए कोई घर बार जमाना जरूरी है।’

‘मुझे डर लगता है।’

‘किस बात का?

‘तुम्हारे चले जाने के बाद तुम्हारे मुल्क की फिल्मों की तरह कहीं मैं यहां विरह के गीत ही गाती न रह जाऊं।’

‘तुम पागल हो।’—विवेक हंसा।

‘मैं गम्भीर हूं।’

‘मेरा अकेले जाना जरूरी है। सोमवार मैंने ड्यूटी ज्वायन करनी है। न करने पर इतनी बढ़िया नौकरी हाथ से निकल जाने का अन्देशा है। मेरा प्लेन टिकट बुक है। ऊपर से सोमवार तक तुम्हारा चाचा अपनी एवरेस्ट एक्सपीडीशन से वापिस लौटकर नहीं आने वाला। तुम क्या उसे बिना कुछ बताये मेरे साथ चल दोगी! मैं क्या तुम्हें भगाकर ले जा रहा हूं!’

‘मुझे तो कोई एतराज नहीं।’

‘किस बात में?’

‘तुम्हारे साथ भाग चलने में।’

‘पागल हो! जरूरत क्या है ऐसी हरकत की! बस चन्द दिनों की तो बात है। फिर मैं तुम्हें विधिवत् ब्याह कर दिल्ली ले जाऊंगा।’

वह खामोश रही।

‘ओके?’—विवेक बोला।

उसने बड़ी संजीदगी से सहमति में सिर हिलाया।

‘नाओ गिव मी ए स्माइल।’

वह मुस्कराई।
तभी एक वेटर उनकी टेबल के करीब पहुंचा।

‘आपके लिए फोन है, जालान साहब।’—वह बड़े अदब से बोला।

वह तत्काल उठकर लाबी में पहुंचा।

फोन होतचन्दानी का था और आवाज से वह बहुत चिन्तित लग रहा था।

‘तुम थोड़ी देर के लिए यहां आ सकते हो?’—वह बोला।

‘यहां कहां?’—विवेक बोला।

‘मेरे बंगले पर।’

‘क्यों?’

‘एक बहुत जरूरी काम है।’

‘कैसा काम?’

‘कुछ मशवरा लेना है।’

‘कैसा मशवरा? आप कुछ बता नहीं रहे हैं।’

‘आओगे तो बताऊंगा। फोन पर ज्यादा सवाल न करो। थोड़ी तकलीफ करो मेरी खातिर।’

‘कब आऊं?’

‘साढ़े नौ बजे आ सकते हो?’

‘आ सकता हूं।’

‘ठीक है। आना। साढ़े नौ बजे। मैं तुम्हारा इन्तजार करूंगा।’

लाइन कट गई।

रिसीवर वापिस क्रेडिल पर रखकर वह वापिस अपनी टेबल पर लौटा।

श्वेता अपनी काफी खत्म कर चुकी थी। उसके संकेत पर वह उठी और दोनों वहां से बाहर निकल कर सड़क पर आ गए।

डिनर के बाद वाक करके श्वेता को उसके घर तक छोड़ कर आना विवेक का रोज का दस्तूर था।

श्वेता अनाथ थी। उसकी मां उसके बचपन में ही मर गयी थी और उसका पिता एक हिमालयन एक्सीपीडीशन में भूसंस्खलन का शिकार होकर मर गया था। और कोई भाई बहन उसका था नहीं। उसका पालन पोषण उसके विधुर चाचा ने किया था जो कि उसके पिता की ही तरह शेरपा था और माउन्ट एवरेस्ट अन्नपूर्णा, कंचनजंगा, धौलगिरी और मच्छपुच्छल जैसी पर्वत श्रृंखलाओं के आरोहण अभियान दलों के साथ जाता था।

‘बारिश न हो जाये।’—श्वेता झुरझुरी लेती हुई बोली।

‘मानसून का मौसम आ गया है।—विवेक बोला—‘अब न हो जाये कहने से थोड़े ही बारिश कहना मान जायेगी।’

‘ये भी ठीक है।’

दोनों श्वेता के घर पहुंचे। वह लकड़ी का बना, कई देवी-देवताओं की मूर्तियों से सजा ऐसा घर था जो घर कम, छोटा-मोटा मन्दिर ज्यादा लगता था।

श्वेता ने दरवाजे का ताला खोला और उसकी तरफ घूमी।

विवेक ने सहज ही उसे अपनी बांहों में भर लिया और उसके शहद से मीठे होंठों पर अपने आतुर होंठ रख दिये। कितनी ही देर दोनों एक दूसरे के आलिंगन में बन्धे रहे। फिर विवेक ने ही उसे अपने से अलग किया।

‘मैं चलता हूं।’—वह बोला—‘काम है। कल लंच पर मुलाकात होगी।’

श्वेता ने सहमति में सिर हिलाया।

‘गुड नाइट। स्वीट ड्रीम्स।’

वह वहां से विदा हो गया। साढ़े नौ बजने में अभी काफी वक्त था इसलिए वह वापिस अपने होटल में आ गया। वह बार में गया। उसने गर्म पानी ब्रांडी हासिल की और उसे चुसकता और सिगरेट के कश लगाता वहां बैठा रहा।

मुलाकात के निर्धारित समय में केवल तीन मिनट बाकी रह गये तो वह बार से विदा हुआ।

होतचन्दानी का बंगला उसके होटल से थोड़ी ही दूर था।

लम्बे डग भरता हुआ वह बंगले की तरफ बढ़ चला।

वह अभी आधे रास्ते में ही था कि एकाएक बिना किसी चेतावनी के पानी बरसने लगा। वह बौखलाया। बारिश एकाएक इस तेजी से होनी शुरू हुई थी कि वह दौड़ कर भी होतचन्दानी के बंगले तक पहुंचता तो भी पूरी तरह से भीग चुका होता। किसी ओट में शरण लेने में ही उसे अपना कल्याण लगा। सौभाग्यवश ऐसी ओट ऐन वहीं मौजूद थी जहां कि बारिश शुरू होते ही वह ठिठका था। सड़क से कुछ ही फुट परे एक लगभग खंडहर हो चुका अंधेरा खाली मकान था जिसे विवेक ने पहले भी कई बार देखा था। वह लपक कर उसके बरामदे में पहुंच गया जो कि मकान से कहीं बेहतर स्थिति में था।

उसने एक सिगरेट सुलगा लिया और बारिश के रुकने की प्रतीक्षा करने लगा।

वह जानता था कि वह मानसून की बरसात थी जो कि घन्टों भी बरसती रह सकती थी या फिर जैसे एकाएक शुरू हुई थी वैसे ही एकाएक बन्द भी हो सकती थी। न बन्द होती तो वह सड़क से गुजरती किसी साइकिल रिक्शा को रोक कर होतचन्दानी के बंगले तक पहुंच सकता था। बहरहाल उसका बारिश में भीगने का कोई इरादा नहीं था।

सिगरेट के कश लगाता वह बरामदे में ठिठका खड़ा रहा।

बारिश शुरू होते ही उसकी तरह और लोग भी इधर उधर पनाह मांगते सड़क से गायब होने लगे थे। पानी से बुरी तरह तर एक बाइसिकल वाला सिर नीचा किये पूरी शक्ति से पैडल मारता सड़क पर जा रहा था। वैसी ही दशा में एक औरत छाती से कोई बंडल सा चिपकाये, सिर नीचे किये, सड़क पर चली जा रही थी। वह इस बुरी तरह भीग चुकी थी कि उसके गीले बाल लटों की सूरत में उसके चेहरे पर लटक आये थे और उनमें से पानी बह रहा था। उसकी पोशाक भीग कर पलस्तर की तरह उसके बदन से चिपक चुकी थी।

तभी सड़क पर एक कार प्रकट हुई जिसकी हैडलाइट्स की तीखी रोशनी सीधे बरामदे में खड़े विवेक के चेहरे पर पड़ी। उसने आंखें मिचमिचायीं। जब तक वह ठीक से आंखें खोल पाया तब तक कार सड़क से गुजर चुकी थी और अब सिर्फ उसकी दूर होती टेल लाइट उसे दिखाई दे रही थी।

उसने बड़े बेसब्रेपन से सिगरेट का आखिरी कश लगाया और उसे एक ओर उछाल दिया।

तभी एकाएक बारिश यूं बन्द हुई जैसे किसी ने शावर बाथ की टूटी बन्द कर दी हो। अभी बारिश का भीषण शोर था तो अभी सन्नाटा था। केवल पेड़ों से टपकते पानी की टप टप की आवाज वातावरण में गूंज रही थी।

वह बरामदे की ओट छोड़ कर वापिस सड़क पर पहुंचा।
उसी की तरह और लोग भी किसी पेड़ के नीचे से, किसी इमारत की ओट में से निकल कर सड़क पर आने लगे। और थोड़ी देर में फिर पहले जैसी चहल पहल हो जाने वाली थी।

गीली सड़क पर सावधानी से चलता हुआ वह होतचन्दानी के बंगले पर पहुंचा। उसने देखा कि बंगले का मुख्यद्वार खुला था और भीतर रोशनी थी। उसने हिचकिचाते हुए दरवाजे पर दस्तक दी। कोई उत्तर न मिला तो उसने दरवाजे को धकेल कर पूरा खोला और भीतर क़दम रखा। ड्राइंगरूम में उसने दो ही कदम आगे बढ़ाये थे कि वह थमक कर खड़ा हो गया।

उसे होतचन्दानी दिखाई दिया।

वह अपनी आफिस टेबल के करीब फर्श पर एक पहलू के बल लुढ़का पड़ा था। उसकी टांगें घुटनों पर से मुड़ी हुई थीं और उसकी एक बांह उसके जिस्म के नीचे कहीं दबी हुई थी। दरवाजे की तरफ उसकी पीठ थी इसलिये विवेक को उसका चेहरा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था।

‘होतचन्दानी साहब!’—वह व्याकुल भाव से बोला—‘होतचन्दानी साहब! क्या हुआ?’

कोई उत्तर न मिला।

झिझकता हुआ वह फर्श पर निश्चेष्ट लुढ़के पड़े शरीर के करीब पहुंचा। वह एक घुटने के बल नीचे झुक कर उसके करीब बैठ गया। उसने एक बार फिर उसे नाम लेकर पुकारा और फिर हौले से उसके कन्धे को छुआ।

कन्धे को हाथ लगते ही होतचन्दानी के शरीर में यूं हरकत हुई कि विवेक ने चिहुंक कर अपना हाथ वापिस खींच लिया। उसके देखते देखते होतचन्दानी का शरीर हौले से फिरा और फिर पीठ के बल लुढ़क कर स्थिर हो गया। तब विवेक को उसकी पथराई हुई आंखें और खून से तर कमीज दिखाई दी।

आतंकित भाव से विवेक कुछ क्षण अपलक उसे देखता रहा, फिर उसने हिम्मत करके हाथ बढ़ा कर लाश की कलाई को छुआ। नब्ज गायब थी लेकिन जिस्म अभी गर्म था। उसने कलाई छोड़ दी जो कि एक धप्प की आवाज से कालीन बिछे फर्श पर जाकर गिरी। उसने उसकी छाती पर निगाह डाली तो पाया कि खून का दायरा अभी भी बड़ा होता जा रहा था। उस दायरे के ऐन बीच में एक काला सा सुराख दिखाई दे रहा था। जाहिर था कि उसके वहां आगमन से कुछ ही क्षण पहले किसी ने होतचन्दानी को शूट किया था।

वह घबरा कर उठ खड़ा हुआ।

तब उसकी निगाह आफिस टेबल पर पड़ी। उसने देखा कि टेबल का कपबोर्ड जैसा पल्ला पूरा खुला था और उसके पीछे से सेफ झांक रही थी जो कि पता नहीं खुली थी या बन्द थी। उस घड़ी उसे सेफ की जगह यह सूझ रहा था कि होतचन्दानी से कुछ दिन पहले हुए झगड़े फसाद की वजह से, जिसका कि उसका नौकर हनुमान गवाह था, विवेक का वहां ताजे ताजे कत्ल हुए होतचन्दानी के पहलू में खड़ा पाया जाना उसे भारी मुसीबत में डाल सकता था। हनुमान अभी वहां प्रकट हो सकता था और उसे अपने हनुमान जैसे ही बाहुपाश में बांध सकता था।

इसी भय से आंदोलित विवेक वहां से भाग खड़ा हुआ।

वह यूं यन्त्रचालित सा वहां से भागा कि सड़क पर पहुंच कर ही उसे अपनी उस हरकत का अहसास हुआ। तब सब से पहले तो उसने दौड़ना बन्द किया लेकिन चाल उसकी फिर भी तेज ही रही। कोई अज्ञात भय उसे वहां से उड़न छू हो जाने के लिए प्रेरित कर रहा था।

सड़क पर जगह जगह जमा हो गए पानी में पड़ने से अपने पैरों को बचाता हुआ वह बंगले से परे चलता रहा।

उसे सामने अपना होटल दिखाई देने लगा तो वह ठिठका।

तब कहीं जाकर उस पर से भय का भूत उतरा और उसकी अक्ल ने काम करना शुरू किया। तब उसने महसूस किया कि उसे यूं होतचन्दानी के बंगले से भाग नहीं खड़ा होना चाहिए था। क्या पता उसने नब्ज ठीक से देखी हो, क्या पता होतचन्दानी तब भी जिन्दा हो और फौरन डाक्टरी इमदाद हासिल हो जाने पर उसकी जान बच सकती हो।

ऊपर से हो सकता था किसी ने उसे होतचन्दानी के बंगले में दाखिल होते और फिर वहां से कूच करते देखा हो। इस तथ्य का बाद में उजागर होना उसके लिए भारी दुश्वारी का बायस बन सकता था।

उसे लौटने में ही अपना कल्याण दिखाई दिया।

वह घूमा और होतचन्दानी के बंगले की ओर बढ़ चला।

बंगला करीब आने लगा तो उसके दिल की धड़कन तेज होने लगी। उसकी व्याकुल निगाह इधर उधर फिरने लगी। आगे बंगले के करीब एक ओर बड़ के एक विशाल पेड़ की ओट में एक ट्योटा कार खड़ी थी जिसके बारे में वह फैसला न कर सका कि वह पहले भी वहां थी या बाद में आकर खड़ी हुई थी। पेड़ की ओट की वजह से कार का नम्बर पूरा नहीं दिखाई दे रहा था। जो दिखाई दे रहा था, वह था डी—१२


इससी पहले कि वह आगे बढ़कर बाकी का नम्बर पढ़ने की कोशिश करता, उसकी तवज्जो बायीं ओर से आती एक सरसराहट जैसी आवाज की तरफ गई। उसने उस तरफ देखा तो फुटपाथ से आगे उगी घास पर एक परछाईं सी पड़ती महसूस की। उसने आंखें फाड़-फाड़ कर उधर उगे पेड़ों की तरफ निगाह दौड़ाई तो पाया कि एक पेड़ के नीचे पेड़ के तने की तरह ही गतिहीन एक आदमी खड़ा था। उसके कपड़ों की रंगत काली थी और वह पेड़ के नीचे के अन्धेरे के साथ यूं हिलमिल गई थी कि बहुत अधिक गौर करने पर ही उसकी वहां मौजूदगी का आभास मिलता था।

किसी अज्ञात भावना से प्रेरित होकर वह जानबूझकर उस पेड़ के करीब से गुजरने का उपक्रम करने लगा। उसने जेब में हाथ डाल कर अपना सिगरेट का पैकेट निकाला, उसमें से एक सिगरेट निकाल कर होंठों से लगाया और पेड़ के करीब ठिठका।

‘माचिस होगी?’—वह बोला।

तने के साथ लगा खड़ा आदमी सीधा हुआ।

‘हां।’—वह जेब में हाथ डालता हुआ बोला।

‘आप सिगरेट लो।’—विवेक उसकी तरफ पैकेट बढ़ाता हुआ बोला।

‘नहीं। मेहरबानी।’

उसने माचिस विवेक को थमा दी।

विवेक ने एक तीली चलाकर सिगरेट सुलगाया। यू हुई क्षणिक रोशनी में उसने देखा कि वह डबल रोटी की तरह फूले चेहरे वाला एक विशालकाय नेपाली था जो काली जीन, काली कमीज और चमड़े की काली जैकेट पहने था। उसके सिर पर नेपाली स्टाइल की खुखरी जैसे बिल्ले वाली काली टोपी थी। उसकी टोपी कन्धे वगैरह सब सूखे थे जिससे जाहिर होता था कि वह तभी होकर हटी बारिश की चपेट में नहीं आया था। पेड़ में से टपकती बूंदें बता रही थीं कि बारिश के दौरान अगर वह यहीं भी मौजूद होता तो भी भीगने से न बच पाया होता।

‘शुक्रिया।’—विवेक उसे मासिच लौटाता हुआ बोला।

नेपाली ने खामोशी से माचिस ले ली।
‘बहुत जोर की बारिश हुई।’—विवेक बोला।

‘हां।’

‘आप नहीं भीगे।’

‘हां।’

‘यहां किसी का इन्तजार कर रहे हैं?’

‘इन्तजार! नहीं, नहीं। मैं तो यूं ही जूते के तस्मे बांधने के लिए रुक गया था।’

फिर विवेक के दोबारा बोल पाने से पहले ही वह वहां से हटा और लम्बे डग भरता हुआ एक ओर बढ़ गया। विवेक तत्काल फैसला न कर सका कि वह उसे रोके कि जाने दे। जब तक उसके मन में उसे रोकने की इच्छा जागृत हुई, तब तक वह सड़क पर बहुत दूर निकल चुका था।

विवेक ने एक गहरी सांस ली और सिगरेट का आखिरी कश लगा कर उसे फेंक दिया। वह घूमा और आगे बढ़कर बंगले में दाखिल हो गया। उसने राहदारी पार की और सीढ़ियां चढ़कर बरामदे में पहुंच गया। उसने ड्राइंगरूम में कदम रखा। उसकी निगाह पैन होती हुई चारों तरफ घूमी।

तत्काल उसे आभास हुआ कि कमरा ऐन वैसी ही हालत में नहीं था जैसी में वो उसे अभी थोड़ी देर पहले छोड़कर गया था। अब आफिस टेबल का सेफ के ऊपर का इकलौता दराज खुला हुआ था और मेज पर तरह-तरह के कागजात और लिफाफे पड़े थे। कागज इतने अधिक थे कि कुछ मेज पर से सरक कर नीचे फर्श पर जा गिरे थे।

तब उसका ध्यान हीरों की दो थैलियों से भरे भूरे रंग के उस सीलबन्द लिफाफे की तरफ गया जिसके दिन में उसके सामने होतचन्दानी ने मेज की सेफ में बन्द किया था।

क्या लिफाफा भीतर था?

उस घड़ी सेफ खुली थी या बन्द थी?

बहुत चाहते हुए भी उसने सेफ को चेक न किया। उसकी अक्ल यही कह रही थी कि उसे वहां की किसी चीज को नहीं छूना चाहिये था।

फिर वह दोबारा लाश के करीब उकड़ू बैठ गया और उसमें जीवन के कोई लक्षण तलाश करने का उपक्रम करने लगा।

तभी एक हल्की सी आहट उसके कानों से टकरायी।

वह स्तब्ध हो गया और कान लगाकर सुनने लगा।

कहां से आई थी वो आहट!

आहट इतनी हल्की थी कि संयोगवश ही वह उसे सुनाई दे गई थी।

उसकी सतर्क निगाह चारों तरफ घूमी।

कहीं कोई नहीं था।

आहट फिर हुई।

इस बार उसे अहसास हुआ कि आहट बंगले के पृष्ठभाग से कहीं से आई थी।

क्या बंगले में कोई था?

क्या कोई कहीं छुपा उसकी निगहबीनी कर रहा था?

बंगले के चारों तरफ बरामदा था और बंगले का कोई न कोई दरवाजा किसी न किसी तरफ के बरामदे में खुलता था इसलिए जरूरी नहीं था कि बंगले में प्रवेश केवल सामने के दरवाजे से ही किया जाता।

अपनी पसलियों में धाड़-धाड़ बजते दिल को काबू करता हुआ वह उठ कर सीधा हुआ।

जिस किसी ने भी आफिस टेबल की वो हालत बनायी थी; वह जरूर अभी भी वहीं था। जरूर विवेक के दोबारा वहां आगमन से उसके काम में व्यवधान पड़ गया था।

क्या वही आदमी हत्यारा भी हो सकता था?

अगर वही आदमी हत्यारा था तो फिर तो उससे वहां उस घड़ी आमना सामना हो जाने पर खुद उसकी भी जान जा सकती थी। जैसे उसने होतचन्दानी को शूट किया था, वैसे ही वह उसे भी शूट कर सकता था।

वो क्या करे?

क्या वह फिर वहां से भाग खड़ा हो?

नहीं।

अब तो उसकी वहाँ मौजूदगी निश्चय ही किसी की निगाह में थी।

फिर बहुत हिम्मत करके उसने आगे बढ़कर कमरे का पिछला दरवाजा खोला।

आगे गलियारा खाली था।

वह लम्बे डग भरता हुआ उसके दूसरे सिरे पर पहुंचा। उसने पाया कि वह दरवाजा चौखट से लगा हुआ था लेकिन बन्द नहीं था। उसने उसे खोल कर बाहर बरामदे में कदम रखा।

कहीं कोई नहीं था।

तभी पहले जैसी आहट उसे फिर सुनाई दी। इस बार उसे लगा कि आहट बंगले के सामने भाग से कहीं से आई थी। वापिस गलियारे में दाखिल होने की जगह वह दबे पांव बरामदे में आगे लपका और बंगले का घेरा काटकर सामने बरामदे की ओर बढ़ा।

तभी एक कार स्टार्ट होने की आवाज आयी।

वह लगभग दौड़ता हुआ सामने बरामदे में पहुंच और आंखें फाड़-फाड़ कर सड़क की तरफ देखने लगा।

सड़क खाली थी।

जो ट्पोटा कार उसने बड़ के पेड़ के नीचे खड़ी देखी थी, वह अपने स्थान से गायब थी।

क्या वह हत्यारे की कार थी?

क्या उसी पर अभी अभी हत्यारा वहां से भागा था?

काश वह उसकी सूरत देख पाता!

वह कुछ क्षण वहीं स्तब्ध वातावरण में ठिठका खड़ा रहा, फिर भारी कदमों से वापिस ड्राइंग रूम में लौटा।

उसने वहां से पुलिस को टोलीफोन किया और तमाम वाक्या बयान किया। उसको हिदायत मिली कि वह पुलिस के आगमन तक वहीं रहे और किसी चीज को न छुए।

वह फोन यथास्थान रखकर आफिस टेबल के करीब पहुंचा। उसकी खोजपूर्ण निगाह मेज पर बिखरे कागजात पर पड़ी। उन कागजात में बेशुमार टाइपशुदा पृष्ठ थे, बैंक स्टेट-मेंट्स थीं, रसीदें थीं, चिट्ठियां थीं, एक लम्बी सूची थी जिसमें होतचन्दानी की नेपाल में तमाम चल अचल सम्पत्ति का विवरण दर्ज था।
इससे पहले कि वह उस सूची का और गौर से मुआयना कर पाता उसे बाहर से आती एक कार की आवाज सुनायी दी। उसे लगा कि कार का इंजन ऐन बंगले के सामने आकर बन्द हुआ था।

वह फौरन मेज से परे हट गया।

किसी के बरामदे की सीढ़ियां चढ़ने की आवाज आयी। फिर दरवाजे पर एक दस्तक पड़ी।

‘भई, कोई है घर पर!’

फिर मछेन्द्रनाथ राणा ने भीतर कदम रखा।

मछेन्द्रनाथ राणा से विवेक बखूबी वाकिफ था। वह होतचन्दानी का वकील था और श्वेता उसके आफिस में बतौर उसकी सैक्रेटी नौकरी करती थी। वह एक लगभग पचास साल का हट्टा-कट्टा नेपाली था। वह मोटी मूंछें रखता था और सोने के फ्रेम का चश्मा लगाता था। उस घड़ी वह बहुत शानदार भारी थ्री पीस सूट पहने था।

उसकी निगाह पहले विवेक पर, फिर फर्श पर पड़े होतचन्दानी पर और फिर विवेक पर पड़ी।

‘क्या बात है?’—वह तीखे स्वर में बोला—‘क्या हुआ इसे?’

‘मर गया!’—विवेक धीरे से बोला।

‘मर गया?’—राणा ने दोहराया। तब तक उसकी निगाह उसकी खून में रंगी छाती पर पड़ चुकी थी—‘हे भगवान! ये

‘हां।’

‘क्या हुआ? कैसे हुआ’

‘पता नहीं। मुझे तो ये यहां यूं ही पड़े मिले थे। मैं अभी आप के आगे-आगे ही यहां आया हूं।’

‘पुलिस को खबर करनी चाहिए।’

‘मैंने कर दी है। वो लोग आते ही होंगे।’—तभी बाहर से फिर एक कार के इन्जन की आवाज आई—‘लगता है आ ही गये।’

उसने आगे बढ़कर खुले दरवाजे में से बरामदे में कदम रखा।

पुलिस की जीप वहां पहुंची थी और तब उसमें से कई पुलसिये बाहर निकल रहे थे।

पुलिस पार्टी के इंचार्ज इन्सपेक्टर का नाम त्रिभुवन देवा था। वह एक कोई पैंतीस-छत्तीस साल का, अभी से सिर से गंजा हो चला, दुबला-पतला आदमी था। उसके सहायक सब इन्स्पेक्टर का नाम कुमार बहादुर था और वह कोई पुलिस फोर्स में जाता जाता भरती हुआ युवक लगता था।

विवेक और मछेन्द्र नाथ राणा को पुलिस की तफ्तीश पूरी होने तक वहीं टिके रहने का आदेश हुआ था।

पुलिस का डाक्टर आकर इस बात की तसदीक कर चुका था कि साधूराम होतचन्दानी कब का इस फानी दुनिया से रुख्सत हो चुका था।

फिर होतचन्दानी के नौकर हनुमान को तलब किया गया।

हनुमान बंगले के पिछले कम्पाउण्ड के कोने में बने लकड़ी के केबिन में रहता था और उसे तभी पुलिस वालों के बताये पता लगा था कि वहां क्या हो गया था।

उसका बयान लेने के लिये इन्स्पेक्टर देवा उसे पिछवाड़े के एक कमरे में ले गया।

विवेक और राणा ड्राइंगरूम में एक कोने में बैठे रहे।

पुलिस का एक फोटोग्राफर विभिन्न कोणों से लाश की तस्वीरें खींच रहा था। एक फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट कई स्थानों से उंगलियों के निशान उठाने की कोशिश कर रहा था। एक अन्य व्यक्ति आफिस टेबल पर बिखरे कागजात का मुआयना कर रहा था।

फिर वहां एम्बूलेंस पहुंची और लाश उठवा दी गयी।

फिर डाक्टर, फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट भी वहां से विदा हो गये।

तभी हनुमान के साथ इन्सपेक्टर देवा वापिस ड्राईंग रूम में लौटा। हनुमान एक ओर खड़ा हो गया। इन्स्पेक्टर अपने दो पुलिसियों से सम्बोधित हुआ—‘मानक होतचन्दानी। कैप्टन बिलियम मूंग बिन। अचरा योसविचित। सब को यहां ले के आओ।’

दोनों पुलिसिये सहमति में सिर हिलाते हुए वहां से विदा हो गये।

फिर इन्स्पेक्टर विवेक की तरफ आकर्षित हुआ।

‘लाश आपने कैसे बरामद की?’—उसने सवाल किया—‘मेरा मतलब है यहां कैसे आना हुआ आपका?’

‘मुझे होतचन्दानी साहब ने फोन करके बुलाया था।’–विवेक बोला।

‘कहां फोन किया था उन्होंने आपको?

‘मेरे होटल में। जहां कि मैं अपनी मंगेतर श्वेता शाहू के साथ डिनर कर रहा था।’

‘किस वक्त फोन आया था?’

‘साढ़े आठ के करीब।’

‘आप को किसी भी वक्त यहां चले आने को कहा गया था या मुलाकात का कोई वक्त मुकर्रर हुआ था?’

‘वक्त मुकर्रर हुआ था।’

‘कितने बजे का?

‘साढ़े नौ बजे का?

‘साढ़े नौ बजे का।’—इन्स्पेक्टर बड़े विचारपूर्ण भाव से बोला था—‘तो साढ़े नौ बजे जब आप यहां आये तो आपने होतचन्दानी साहब को यहां मरा पड़ा पाया?’

विवेक हिचकिचाया।

क्या वह बताये कि उसके वहां दो फेरे लगे थे, कि पहली बार जब वह वहाँ आया था तो लाश पर निगाह पड़ते ही वहाँ से भाग खड़ा हुआ था और होश ठिकाने आ जाने के बाद फिर दोबारा वहां वापिस लौटा था। उसे लगा कि अपने दो फेरों की बाबत पुलिस को बताना उसके लिए कई अनजानी दुश्वारियां खड़ी कर सकता था।

उसने अपने हित में अपने पहले फेरे को गोल कर जाना ही मुनासिब समझा।

‘निर्धारित वक्त पर’—वह बोला—’ मैं यहां नहीं पहुंच सका था।’

‘क्या?’

‘मैंने अर्ज किया कि मैं यहां साढ़े नौ बजे नहीं आ सका था।’


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