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दो बेटों की विधवा मा
10-22-2018, 10:07 AM
Post: #31
RE: दो बेटों की विधवा मा
अगली सुबह रचना जब जागी तो उसने पाया की उसके ब्लाउज के तिन बटन्स खुले हुए थे और उसकी एक चूची पूरी तरह से बाहर लटक रही थी वो हरबरा कर उठती है और बाथरूम की और जाती है जहा सम्भूनाथ पहले से दातुन कर रहा था..रचना मन ही मन ये सोचती है की जब बाबूजी कमरे से बहार आए होंगे तब्ब उन्होंने मेरी चुचिया जरुर नजर आई होंगी हे भगवान् ये क्या हो गया वो नजरे चुराते हुए कहती है बाबूजी आप कब उठे हमे आवाज लगा दिया होता.......

संभु - नाही बहुरानी तू नींद में रहलू तो तहरा के तंग करल ठीक न सोचिनी एही से न उठावनी ह और मुस्कुरा देता है ...रचना बखूबी समझ जाती है की बाबूजी के मुस्कुराना किस और इशारा कर रहा था खैर वो भी नित्य क्रिया में लग गयी और फिर सब से नाश्ते के समय भेट हुयी जहा सौरव ने बोला की आज वो दादू के ऑफिस में एप्लीकेशन डालने जा रहा और वो रवि को कहता है की भईया तुम भी चलना मेरे साथ
रवि - ठीक है
संभु - बबुआ कोसिस करिह की काम जल्दी से जल्दी हो जाए ताकि हमहू तू लोगन के साथे पटना चल सकी ....और रचना की तरफ देख कर मुस्कुरा देता है....रचना इस बार बुरी तरह झेप जाती है
और कुछ देर बाद दोनों भाई अपने काम के लिए निकल जाते है........नाश्ते के बाद रचना दोपहर के खाने की तयारी कर के नहाने के लिए जाती है और इस समय संभु अपने बरामदे में बैठा अखबार पढ़ रहा था...........तभी उसका ध्यान रचना की तरफ गया जो नहाने के लिए गुस्सल्खाने में जा चुकी थी.संभु के मन में खुराफात ने दस्तक दी और वो दबे पाँव बाथरूम की तरफ चल पड़ा अपनी बहु के जिस्म को निहारने जहा रचना बेफिक्र हो कर नहा रही थी.....संभुनाथ उधर जा ही रहा था कि तभी सौरव और रवि आवाज लगते हुए घर मे आते है और संभुनाथ हड़बड़ा कर वापस बरामदे में दौरा आता है जहाँ रवि और सौरव एक साथ कहते है कि दादा जी माफ करियेगा काम मे देरी होगी आपके दफ्तर वालो ने कहा कि इस काम मे समय लगेगा कम से कम दो महीने कागजी काम है ऊपर आए पेंशन वाली इसलिए संभुनाथ बेचारा ये बात सुन कर मायूस हो जाता है कहा वो रचना को भोगने की तैयारी में थे और अब उसे यही रहना था अब इन दो महीनों में उसका काम बिगाड़ दिया था खैर वो अब नही जा सकेगा ये तय हो गया था और तभी रचना नहा कर वहा आती है और उसे भी ये खबर मिलती है तो वो मन ही मन सोची की चलो बला टली.....
उसके बाद सभी खाना खाने बैठते है और रचना ने आज ही निकलने का सोच लिया था और हुआ भी ऐसा ही संभुनाथ बेचारा करता भी क्या.....
मगर इन् सब पचड़ों में पड़ कर रवि के एक महीने की छुट्टी की वाट लग गयी थी और उसे अगले हफ्ते से काम पे जाना था....रचना और सौरभ रवि तीनो के मुह लटके हुए थे.....इसी तरह वो देर रात घर पहुचे......घर की हालत भी खस्ता हो चुकी थी मगर रचना अभी बहूत थकी हुई थी और दोनो बेटे भी बिना किसी शरारत के वो नींद की आगोश में समा गए.....
सुबह रचना की आंख खुली तो पाया कि उसकी दोनो चुचिया उसके बेटो के मुह में है और सौरभ के हाथ उसकी चुत के दरार पर घूम रहे है जिसका आभास होते ही रचना ने अपनी टांगे खोल दी और फिर शुरू हुआ घमासान चुदाई का दौर....अगले कुछ ही पलों में रचना नंगी हो चुकी थी और रवि रचना की चुत चाट रहा था और सौरव उसकी चुचिया को बेदर्दी से चूस चाट रहा था कुछ देर में दोनो के लौड़े रचना के दोनों छेदों को फाड़ने के लिए तैयार थे और अगले कुछ देर के लिए रचना की दर्द और लिज्जत भरी सिसकियों से कमर गूंजता रहा.....दोनो छेदों को अदल बदल कर अपने माल से भरने के बाद वो दोनो उठे और रचना को भी साथ मे ले कर बाथरूम में घुस गए जहाँ नहाते वक्त भी एक राउंड चुदाई और हुई और फिर नहाने के बाद रचना ने एक पेटिकोट पहन लिया और रवि ने टॉवल लपेट लिया और घर की साफ़ाई में लग गए जबकि सौरव नास्ता का प्रबंध करने चला गया.....घर की साफ़ाई और नास्ता के बाद तीनों हॉल में बैठे थे जहाँ रचना बोली.....बनारस में बाबूजी ने मेरी चुचिया नंगी देख ली थी....और वो उसके बाद से मुझे अजीब नजरो से देख रहे थे......मुझे बहुत शर्म आ रही थी।
सौरव- कोई बात नही माँ देख ही लिया तो क्या हो गया.......तुम्हारी ये चुचिया है ही देखने के लिए....औऱ उसकी एक चुची को पेटिकोट के बंधन से बाहर निकाल देता है.....और दबाने लगता है.....
रचना कुछ कहती इससे पहले रवि - मुझे तो इस बात का डर है कि दादू के यह आने के बाद हमारा ये प्यार से भरा रिश्ता कैसे चलेगा.....उफ्फ माँ और वो भी उसकी दूसरी चुची पे अपने होठ जामाता है.......सौरव के मन मे कुछ और ही था...
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10-22-2018, 10:07 AM
Post: #32
RE: दो बेटों की विधवा मा
इधर वाराणसी में संभु अपनी पूरी कोसिस में लगा था की कैसे भी कर के वो अपनी पेनशन की राशी का भुगतान पटना करवा ले मगर विभाग उसकी सुन ही नही रहा था....उसे खाने पकाने की काफी दिक्कते आ रही थी मगर जीना तो था ही ........संभु ने सोचा की अभी पेंशन आने में काफी वक़्त है सो वो पटना हो आये और पेंशन आने के समय पर यहाँ वापिस आ जाएगा और पेंशन ले कर वापिस पटना लौट जायेगा उसने सोचा की अब वो ऐसा ही करेगा मगर दिक्कत थी की उसके घर की देखभाल कौन करेगा उसे अभी तक कोई किरायदार नहीं मिला था ..............उसने सोचा की इसकी चिंता आने के बाद सोचेंगे अभी फ़िलहाल पटना हो कर आया जाए...और वो निकल पड़ता है पटना की ओर.....

रवि आज अपने ऑफिस जाने की तयारी में लगा था और रचना किचन में केवल एक पेटीकोट में नास्ते का प्रबंध कर रही थी सौरव अपने कमरे में अपने काम को अंजाम दे रहा था जिसे उसे अपनी पार्ट टाइम जॉब वाली कंपनी में पहुचना था और उसे आज पैसे भी मिलने वाले थे इधर से रचना के साथ सम्बन्ध ब्वान्ने के बाद से वो सही से ध्यान नहीं दे पाया था मगर अब काम भी जरुरी है रचना नास्ता टेबल पर लगते हुए आवाज लगती है रवि सौरव कहा हो आओ दोनों नास्ता कर लो फिर मै नहाने जाउंगी......रवि और सौरव दोनों टेबल पर आते है.
रवि - ये क्या माँ तुम हमारे साथ नहीं खाओगी ऐसे में हम भी नहीं खाएंगे....
रचना - एक थप्पड़ लगाउंगी सारी की सारी बेहूदगी धरी की धरी रह जाएगी समझा दिन भर ऑफिस में काम करना होता है और जनाब खाने नहीं खाएंगे चुप चाप खाओ समझे न ....रवि रचना की ओर देख कर मुस्कुराता है और कहता है मेरी प्यारी माँ हमारे बारे में कितना सोचती है और उसे खीच कर अपनी गोद में बैठा लेता है .
सौरव - माँ नास्ते के साथ अगर दूध भी मिल जाता तो मजा आ जाता नास्ते का इतना सुनना था की रचना अपनी पेटीकोट की डोरी खीच देती है और पेटीकोट सरक कर उसके कमर तक आ जाता है रवि तुरत एक चूची की मुह में भर लेता हिया उर सौरव कहता है वाह भाई वाह डिमांड मैंने की और मिल तुम्हे गया .........माँ ये गलत बात है रचना हस्ते हुए अपनी बाहे फैला कर उसको अपने पास बुलाती है सौरव अपनी थाली लोए कर वेअही रवि के कुर्सी के पास आ जाता है और रचना की दूसरी चूची की अपने मुह में भर लेता है और रचना की सिसकी निकालनी चालू हो जाती है कुछ देर के बाद रचना को बर्दास्त करना मुस्किल हो रहा था इसलिए उसने उन् दोनों को खुद से अलग किआ और कहा की ऑफिस नहीं जाना क्या और उनक्लो खाने के लिए बोलती है और सौरव कहता है माँ कुछ देर मेरे गोद में भी आओ न ऐसे ही दूध पिते पिते नास्ता करूँगा इस पर रवि कुछ नहीं बोलता रचना उसके गोद से इसके गोद में आ जाती है और फिर नास्ता ख़तम होने तक वो बारी बारी से दोनों बेटो की गोद में आती जाती रही नास्ता के बाद वो अपनी पेटीकोट को बिना बांधे उठ खड़ी हुयी और अपने पेटीकोट को पकरे पकरे ही टेबल से झूठे बर्तन उठा कर किचन में रख आई और फिर रचना बोली की अब तुम दोनों जाओ और जल्दी आना ....
सौरव - माँ मै तो दो घंटो में आ जाऊंगा ज्यादा देर हुयी तो मै तुम्हे फोने कर दूंगा ....
रवि - माँ मै तो सीधे रात को ही मिलूँगा सौरव के तो मजे ही मजे है और उसकी तरफ देख कर मुह बनता है जैसे उसे जलन हो रही हो....रचना उन्न्दोनो को कहती है की चलो अब ख़ुशी ख़ुशी जाओ और शाम को कुछ अछि सी चीज खाने को ले आना मेरे लिए .
रवि सौरव - ठीक है माँ वो दोनों घूमते है और आगे चलते है रचना उनके पीछे पीछे मगर चलने से पहले उसने अपनी पेटीकोट वही गिरा दी नंगी ही उन्न्दोनो के पीछे पीछे चल दी मगर उन्न्दोनो को जरा भी आभास नहीं हुआ की रचना नंगी हो चुकी है गेट पे पहुचने के बाद वो दोनों पीछे घूमते है और रचना को देख कर उनके लंड में तूफ़ान खड़ा हो जाता है मगर रचना उन्हें धकेल कर बाहर कर देती है और दरवाजे से सर निकालती है साथ ही साथ अपनी एक चूची पूरी की पूरी और अपनी एक टांग भी निकलती है जिससे उसकी चूत का कुछ भाग दर्शनीय हो जाता है उन्हें कहती है सुभह सुभह बिना दर्शन के कैसे जाने देती और हस देती है....रचना की घर के दरवाजे पे ऐसे खड़े होना बहुत ही कामुक दृश्य था उन्न्दोनो के लिए मगर तुरत ही रचना दरवाजा बंद कर देती है.......उन्न्दोनो के जाने के बाद रचना नंगी ही घर के बाकी काम करती है और फिर नहाने चली जाती है नहाने के बाद वो बाथरूम से नंगी ही अपने कमरे में आती है जहा वो एक पेटीकोट ही पहनती है और अपने बाल कंघी करने लगती है तभी दरवाजे पे दस्तक होती है...........
रचना सोचती है की लगता है सुबह का दृश्य सौरव को बेचैन कर दिया है इसलिए जनाब तिन घंटे का बोल कर गए थे मगर एक घंटे में ही वापिस आ गये वो सोची की जैसे सुबह में विदा की थी वैसे ही स्वागत भी करू और वो अपनी पेटीकोट वही खोल कर गिरा देती है और पूरी नंगी सुलझे हुए बाल नहाने के बाद साबुन की खुसबू में सराबोर बदन लिए चल पड़ी दरवाजे की तरफ जहा दस्तक तेज होती जा रही थी वो चिल्ला कर बोली हा बाबा आ रही हु थोरा सबर तो करो बेटा और वो दरवाजा खोलती है जहा सामने देख कर रचना की आँखे घूम जाती है......
सामने सम्भूनाथ खड़ा था और रचना को पूर्ण रूप से नंगी पा कर सम्भूनाथ की सासे अटकने लगती है की वो ये क्या देख रहा है कही ये सपना तो नहीं रचना का भी कमोबेश यही हाल था कुछ देर के लिए दोनों की आँखे एक दुसरे को ही देखती रहती है तभी सम्भूनाथ दरवाजे को धकेलता हुआ घर में प्रवेश कर जाता है रचना बेसुध सी उसकी किसी भी हरकत का कोई जवाब न देते हुए पीछे हट जाती है जब सम्भूनाथ उसे पुकारता है तब रचना की निद्रा टूटती है और उसे ख्याल आता है की वो नंगी खड़ी है अपने बूढ़े ससुर के सामने और भाग कर कमरे में जाने के लिए मुडती है रचना के हिलते चुतर सम्भूनाथ पे कहर ढा रहे थे और तभी उसका पैर खाने की मेज से टकराता है और वो नंगी धम्म से गिर पड़ती है रचना की दर्द के मारे चीख निकल जाती है.......सम्भूनाथ दौड़ कर रचना के पास जाता है और उसकी टांग को उठता है और रचना दर्द से कराहती हुयी वही जमीं पे नंगी लेटी रहती है और वो कराहते हुए कहती है की बाबूजी मुझे छोड़ दीजिए मै ठीक हु और उठने की कोशिश करती है मगर दर्द के साथ वो वापिस से जमीन पे आ जाती है
संभु - बहु तुम चिंता मत करो मै कुछ नहीं करूँगा और वो पूछता है की तुम्हारे कपरे कहा है रचना इशारो में कमरे की तरफ इशारा करती है संभु उठ कर जाता है और वह से एक साडी उठा कर लाता है और रचना के बदन पे डाल देता है और फिर पूछता है की बेटा शायद मोच आ गयी है कोई बाम हो तो बताओ मै मालिश कर देता हु रचना कोई चारा न देखते हुए सामने दराज की तरफ इशारा करती है और फिर साडी को अच्छे से अपने बदन पे लपेटने लगती है मगर साडी ठहरी पारदर्शी पीले रंग की जिसमें से रचना का जिस्म का एक एक कतरा दिख रहा था उस साडी का होना ना होना सब एक ही था रचना मन ही मन सोच रही थी की ये क्या हो गया कैसे हो गया अब बाबूजी क्या करेंगे साडी में से रचना की चुचियो के निप्पल और चूत की दरार साफ़ साफ़ दिख रही थी जिसका नतीजा ये हुआ की सम्भूनाथ के धोती में तम्बू बनना शुरू हो गया मगर संभु ने उसे छुपाने की कोशिश बिलकुल नहीं करी क्योकि कही न कही उसकी तो आज चांदी चांदी हो गयी थी...........
संभु - बहु कमरे में चलो मै वहा तुमारी चोट की मालिश कर दूंगा जिससे तुम्हे आराम मिलेगा और वो उसे उठाने लगता है रचना बेमन से संभु की बाहों का साहारा ले कर खड़ी होती है मगर अगले ही पल उसके बदन की साडी जमीं पे गिर जाती है औरे वो एक बार फिर अपने ससुर की बाहों में नंगी खड़ी थी रचना बेबस सी सम्भूनाथ की और देखती है मगर संभु उसकी साडी को उठा कर उसके बदन के बजाय अपने कंधे पर रखता है और उसके नंगे बदन को ले कर कमरे में चल पड़ता है चलते वक़्त रचना की एक चूची पूरी की पूरी संभु की छाती से रगड़ खा रही थी जिसका एहसास दोनों को हो रहा था.....कमरे में पहुच कर उसको बिस्तर पर लिटा देता है और रचना शर्म से गडी जा रही थी मगर वो कुछ करने में असमर्थ थी अपने दर्द के सामने संभु ने उसके बदन को फिर से साडी से ढक दिया और उसके पैरो की मालिश करने लगा....अभी उसने पैरो को पकड़ा ही था की दरवाजे पे दस्तक होती है......
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10-22-2018, 10:07 AM
Post: #33
RE: दो बेटों की विधवा मा
सम्भूनाथ रचना को उसी हालत में छोड़ कर दरवाजा खोलने पहुचता है.....दरवाजे पे डाकिया खड़ा होता है संभु से मुखातिब होते हुए वो कहता है रवि कुमार का एक ख़त आया है और उसे लेने के बाद संभु वापिस कमरे में आता है जहा रचना अब्ब भी उसी हालत में लेटी हुयी थी संभु उसके पास आ कर कहता है की रवि बाबु के दफ्तर से एक ख़त आया है ...रचना धीमी आवाज में उसे कहती है सामने टेबल पर रख दीजिए रवि आएअगा तो खुद खोल कर देखेगा और चुप हो जाती है अब संभु ने सोचा की अब बहु की दुखती नब्ज पकडनी ही होगी वरना ये ऐसे मेरे हत्थे नहीं चढ़ने वाली वो उसके नजदीक आ कर उसके पैर को अपने हाथो में लेते हुए कहता है..........

संभु - बहु तुम अभी पूरी नंगी हो कर दरवाजा खोलने कैसे आ गयी और तुम पूरी नंगी थी ही क्यों.........
रचना को जैसे इस सवाल से साप सूंघ गया हो उसे कोई जवाब देते न बन रहा था वो चुप चाप लेती रही और संभु अपनी बहु की चोटिल पाँव को मालिश करता रहा और वो उसे जवाब मांगने लगा मगर रचना ने कोई जवाब न दिया आखिर अंत में संभु ने ये बात कह ही दिया की उसे मालूम है की उसके जिस्मानी सम्बन्ध है रवि और सौरव के साथ..........कमरे में सन्नाटा छा गया मगर संभु उसके पाँव की मालिश करता रहा......
रचना - मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी मैंने ये जान बुझ कर नहीं किया पता नहीं मई कैसे बहेक गयी और मेरे और उन्न्दोनो के बिच ये रिश्ता कायम हो गया वो अब उठ कर बैठ गयी थी और साथ ही साथ अपने बदन पर एकमात्र कपडे वो पिली साड़ी को अछे से अपने ऊपर ले लिया महार रचना की भारी और गोरी मुलायम चुचिया उस पीले पारदर्शी कपडे से नुमयिन्दा हो रही थी जिसपे संभु की नजर अनायास ही चली जा रही थी और इधर रचना अपने सफाई में बोले ही जा रही थी......एक कमरे में एक औरत अधनंगी हालत में अपने बूढ़े ससुर के सामने बैठी थी और अपने चोटिल पाँव की मालिश करवा रही थी उफ़....काफी कामुक दृश्य था ये संभु की हालत काफी ख़राब हो चुकी थी जिसको संभालना अब संभु के बस की बात नहीं थी मगर फिर भी वो अपने पे काबू किये हुए था.....रचना की सारी बात सुनने के बाद संभु को सारा माजरा समझते देर न लगा की सारा का सारा किया धरा दोनों भाइयो का ही है सालो ने अपनी माँ को ही शीशी में उतर लिया वाह रे मेरे चोदु पोतो क्या खूब कमाल किया वो मन ही मन बोला और फिर वो रचना से मुखातिब होते हुए बोला बहु कोई बात नहीं अक्सर ऐसी गलती बच्चे जवानी में कर बैठते है मगर तुम्हे समझाना चाहिए थे उन्हें की ये रिश्ता सही नहीं है मगर तुम भी क्या करती मेरे बेटे के बाद से तुम भी तो अकेली ही जीवन बिता रही थी और तो और सौरव और रवि जैसे जवान लंड मिले तो तुम्हारा भी मन व्याकुल हो गया मै समझ सकता हु क्युकी मेरी बीवी को गए हुए अभी कुछ ही हफ्ते गुजरे है मगर मुझे उसकी कमी बहुत खलती है और तुम तो...... और वो मुह घुमा लेता है रचना के मन से एक बोझ हल्का हो जाता है की उसके ससुर ने उसे समझा उसे गलत नहीं ठहराया संभु अब उसके पाँव को छोर देता है और रचना से कहता है बहु अब आराम मिला दर्द से रचना अपने पाँव को हिला कर देखती है और कहती है जी बाबूजी संभु अब उसको कहता है की बहु मै अभी यही रहूँगा अगर तुम्हे बुरा न लगे तो क्योकि मुझे वह रहने खाने की काफी दिक्कत हो रही थी और अब मेरी सरला के बगैर वो घर काटने को दौड़ता है मै महीने के महीने वह जा कर अपने पेंशन की राशि ले आया करूँगा.......
रचना को ये सुन कर थोरा धक्का लगता है क्योकि वो ये नहीं चाहती थी की बाबूजी यहाँ आ कर रहे मगर अब वो यहाँ आ चुके थे और अब यही रहने भी वाले थे मगर साथ ही साथ उसे ये तसल्ली थी की सम्भूनाथ उसे समझता है और उसके और उसके बेटो के बिच के सम्बन्ध को ले कर उसने कुछ गलत नहीं बोला नाही कोई ऐसी वैसी हरकत करी उसके साथ जबकि वो नंगी बैठी है उसके सामने इसलिए वो थोरी निश्चिंत हो गयी थी मगर टेंशन ये थी की उसके सामने वो चुदाई कैसे करवाएगी तभी वो सोचती है की सौरव और रवि कोई न कोई उपाय निकाल ही लेंगे और वो संभु से कहती है .......
रचना - कोई बात नहीं बाबूजी ये भी आपका ही घर है आपको पूछने की कोई जरूरत नहीं है आप आराम से यहाँ रहिये .....
अब सौरव कुछ देर में आने वाला था....
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10-22-2018, 10:08 AM
Post: #34
RE: दो बेटों की विधवा मा
रचना को उसी हाल में छोड़ कर संभु अपने सामान को सहेजने चला जाता है कुछ हीदर में दरवाजे पे दस्तक होती है संभु जा कर दरवाजा खोलता है सामने सौरव था......वो सम्भूनाथ को देख कर थोडा सा आश्चर्यचकित हो जाता है मगर फिर अगले ही पल वो दादू कहते हुए उसके पाँव छूता है

सौरव - दादू आप कब आये अचानक न कोई फोन ना कोई खबर
सम्भूनाथ - वो बेटा अचानक से प्लान बन गया तो आ गया यहाँ क्यों नहीं आना चाहिए था क्या और वो सौरव की तरफ कोताहुल भरी निगाहों से देखता है
सौरव - नहीं दादू कैसी बाते करते है आप भी ये आपका ही तो घर है ...माँ कहा है नजर नहीं आ रही....
माँ ओ माँ कहा हो माँ
रचना रूम से इधर बैठी हु सौरव बेटा कमरे में
सौरव - क्या हुआ माँ तुम्हारी आवाज कुछ अलग प्रतीत हो रही है और कमरे की तरफ कदम बढाता है
कमरे में पहुचते ही वो रचना की हालत को देख कर सब समझ जाता है की यहाँ क्या हुआ होगा मगर वो फिर भी पूछता है की क्या हुआ माँ ऐसे हालत में क्यों बैठी हो वो भी तब जब दादाजी यहाँ मौजूद है तुम पागल तो नहीं हो गयी न माँ क्या हुआ रचना की आँखों में आसू आ जाते है और संभु भी कमरे के बहार ही खड़ा रह कर माँ बेटे की सारी बाते सुनता है की आखिर रचना क्या कहती है......
रचना ने एक ही सास में सारी की सारी कहानी बयां कर डाली........सौरव भी थोडा परेशां हो गया मगर अगले ही पल संभु कमरे में आया और बोला की बेटा मुझे गलत मत समझना मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिससे तुम्हे या रचना बहु को शर्मिन्दा होना पड़े और एक बात और बेटा मुझे तुमलोगों के इस रिश्ते पे कोई आपत्ति नहीं है बल्कि मै तो खुश हु की बहु की प्यास किसी और बहार के व्यक्ति से ना बुझ कर खुद उसके दोनों बेटो से बुझ रही है इस बात को भी ले कर कोई मलाल न रखना बेटा अपने मन में......सौरव भला क्या कहता वो चुप ही खड़ा रहा वहा पे.....संभु रचना के पास जा कर बोला....बहु तुम्हारा पैर कैसा है अब
रचना - ठीक है बाबूजी
संभु - बेटा खाना लगा दोगी क्या भूक लगी है सुभ का ही खाया हुआ हु.....
रचना जो अभी तक केवल उसी साडी में बैठी थी जिए संभु ने उसके बदन पे लपेटा था वो उठती है और धीरे से कराहती हुयी किचन की और जाती है .......उस साडी में से रचना का गोरा बदन छिप कम दिख ज्यादा रहा था उसकी उभरी हुयी गांड और उसकी गांड की दरार में फस हुआ साड़ी का कपडा उफ्फ्फ और सामने से उसकी झूलती हुयी चुचिया और कपडे के भीतर से उसकी चुचियो के निप्पल उन् दोनों पे कहर धा रहे थे मगर सौरव अभी कुछ करने में हिचकिचा रहा था वही संभु की हालत काफी ख़राब थी उसी वक़्त से जिस वक़्त वसे उसने रचना को नंगी देखा था और अभी का सीन ने तो जैसे आग में घी का काम किया था......
रचना उसी तरह कराहते हुए किचन में चली जाती है और कुछ देर बाद वो हॉल से आवाज लगाती है...बाबूजी सौरव खाना लग गया है...दोनों दादा पोता कमरे से साथ ही बाहर आते है मगर दोनों में कोई बात चित नहीं होती है रचना सोचती है की माहोल थोडा तनावपूर्ण हो गया है इसे थोडा हल्का किया जाए वे दोनों आ कर टेबल के दो कोनो को पकड़ लेते है और रचना खाना परोसने लगती है और परोसते वक़्त वो जान बुझ कर अपना पल्लू गिरा देती है जिससे उसकी दोनों दूध की टंकिया बहार की और लटक जाती है जिसे देख कर दोनों मर्दों के हलक सुख जाते है सौरव कुछ करता उससे पहले संभु उसका पल्लू उठा कर उसके कंधे पे रख देता है मगर ठीक से ना रख पाने के कारण एक चूची पूर्णतः नंगी हो कर लटकती रहती है जिसे रचना छुपाने की कोशिश बिलकुल भी नहीं करती
सौरव - माँ पल्लू ठीक कर लो वरना हम खाना ठीक से नहीं खा पायेंगे
संभु जिसकी आँख रचना पे ही जमी हुयी थी वो इ बात से अपनी अखे हटाते हुए कहता है की हां बहु पल्लू सही कर लो
रचना - जी करती हु खाना तो परोस लू पहले ....वैसे भी यह आप लोगो के अलावा कौन है ही और...
रचना बिलकुल ही निश्चिन्त थी संभु को ले कर क्योकि वो जान गयी थी की अम्भु कुछ गलत हरकत उसके साथ सोच भी नहीं सकता जब तक की वो खुद न झुके उसके आगे या उसे कोई मौका दे और तो और रचना के रिश्ते बारे में जान लेने के बाद रचना का बचा कूचा डर भी निकल गया था इसलिए वो बेफिक्र थी......
उन्न्दोनो को खाना देने के बाद वो वही एक कुर्सी पे बैठ गयी और अपनी अधनंगा बदन लिए अपने चोटिल पैर का मुआयना करने लगी....
वे दोनो खाते हुए रचना को भी निहार रहे थे कुर्सी पे बैठी हुयी नंगी रचना बहुत ही कामुक लग रही थी सौरव के लिए खुद को रोकना बहुत ही मुश्किल हो रहा था तभी वो जल्दी से खाना ख़त्म कर के रचना को बोलता है आओ मई कमरे में चलो तुमरे पैर की मोच को ठीक किये देता हु और उसकी एक बाह को पकड़ कर कमरे में ले जाता है....संभु ये कहते हुए दुसरे कमरे में चला जाता है की वो थोड़ी देर सोयेगा.....
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10-22-2018, 10:09 AM
Post: #35
RE: दो बेटों की विधवा मा
कमरे में ले जा कर सौरव रचना को पूरी नंगी कर देता है जबकि सम्भूनाथ अपने कमरे में ना जा कर उन्न्दोनो को कमरे के बाहर से देखने लगता है की कमरे में क्या हो रहा है .........

सौरव - माँ ये सब अचानक से क्या हुआ उस दिन तो तुम दादा को ले कर इतनी परेशां थी और अभी उनके सामने इस हालत में होने पे भी तुम्हे कोई दिक्कत नहीं .......
रचना जो बिलकुल नंगी थी वो सौरव से गले मिलते हुए कहती है की बेटा पहले मई इसलिए परेशां थी की कही बाबूजी मुझे गलत औरत न समझ बैठे और मेरा गलत फायदा न उठाए मगर वो ऐसे नहीं है तभी मई थोरी निश्चिंत हो कर रह पायी वरना तुम मुझे जानते हो.......
संभु इधर मन ही मन सोचता है की अगर थोड़ी कोशिश की जाए तो शायद मै भी बहु की जवानी का स्वाद चख सकू ....और वो वही खड़े रह कर आगे की बात सुनता है ......
सौरव - वो अब तो ठीक है माँ मगर रवि भईया का क्या उनको क्या बोलोगी......
रचना - रवि को समझाने में देर नहीं लगेगी और वैसे भी बाबूजी के पेंशन के पैसो से हमे भी थोड़ी आर्थिक मदद हो जाएगी
सौरव भी सोचा की बात तो सही कह रही थी रचना और अगर दादू ने माँ के साथ कुछ किया भी तो कौन सी आफत आ जनि है उसने भी आगे बात को नहीं बढाया और रचना के नंगे बदन को ले कर बिस्तर पे आ गया और कुछ ही पलो में दोनों माँ बेटे अपने काम क्रीडा में लीन हो गये जबकि सम्भूनाथ दरवाजे पे खड़े हो कर ही मुठ मरने लगा पौने घंटे की चुदाई के बाद रचना और सौरव वैसे ही नंगे एक दुसरे से लिपटे सो गये और संभु भी अपने कमरे में चला गया ......
शाम के छह बजे सब कोई उठे और रचना अपने हालत ठीक कर के बाहर आई और सब के लिए चाई बनायीं और फिर खाने की तैयारी में जुट गयी ...
कुछ ही देर में रवि ऑफिस से वापिस आया और घर पे दादा को देख कर चौक गया की अचानक ये कहा से
.....
रवि - अरे दादू आप यहाँ अचानक क्या बात है अच्छा लगा आपको यहाँ देख कर....
संभु - हां बेटा वो वहा काफी अकेला महुसू हो रहा था तूमलोगो के बिना इसलिए यहाँ रहने चला आया और जब पेंशन की तारीख आएगी तो मै जा कर ले आया करूँगा......
रवि - अछि बात है दादू आपको अब खाने पिने की कोई दिक्कत नहीं होगी आराम से यहाँ रहिये .....
संभु - हा बेटा अब तो आराम ही आराम है और किचन में काम कर रही रचना को दख कर मुस्कुरा देता है .....
रचना की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए देख कर रवि को अटपटा सा लगा जिसे सौरव देख कर मुस्कुरा दिया और उसने रवि को सारी की सारी वारदात एक ही साँस में बता डाली रवि ने सोचा भी नहीं था की एक ही दिन में उसकी माँ के साथ क्या क्या हो गया खैर उसने उन् दोनों से आगे कोई भी बात नहीं की वो उठा कर सीधा किचन में चला गया रचना से पूछने की आखिर उसकी चोट अब कैसी है .....
रचना - अरे बेटा तुम कब आये ...
रवि - वो सब छोड़ो माँ ये बताओ की तुम्हारी पाव की चोट अब कैसी है....रचना बोली की पहले से बेहतर है वो बेटा सब इतनी जल्दी जल्दी हुआ की कुछ समझने से पहले मुझे चोट लग गयी और फिर तेरे दादाजी का कोई गलत मंसूबा भी नहीं है मुहे ले कर ....मगर रवि जनता था की दादा ने काफी दूर की सोची है....
मगर वो इस बात के लिए अभी से ही तैयार था की कभी भी दादा के निचे मेरी माँ नहीं जाएगी वो सिर्फ हुमदोनो भाइयो की ही है और हमारी ही रहेगी .....
रवि को ऐसे सोचते देख कर रचना बोली की मै जानती हु रवि की तू क्या सोच रहा है मगर बेटा दादा जी को मैंने पहले ही इस बात के लिए तैयार कर लिया है और उन्होंने भी हमारे इस रिश्ते पे कोई आपत्ति नहीं जताई है उलटे उन्होने मेरी हालत को समझा है इसलिए उनको ले कर तू अपने मन में कोई गुबार मत रखना ठीक है चलो अब जादा मत सोचो और मुह हाथ धो कर खाने के लिए बैठो मई खाना लगा रही हु और रवि उसके गले लग कर कहता है की माँ तुम हमारी ही हो किसिस और का साया भी नहीं पड़ने देंगे तुम पर हम याद है न वादा किआ था हम दोनों भाइयो ने ...
रच्जना - नहा बाबा याद है और उस वादे पे पूरा भरोसा भी है ...चलो अब जाओ ...
खाने की मेज पे आज कई दिनों के बाद रचना पुरे कपड़ो में थी आज ....सब ने मिल कर खाना खाया और उसके बाद अब हॉल में बैठे टीवी देखने के लिए हमेशा की तरह रचना अपने दोनों शेरो के बिच बैठी थी और संभु नाथ बगल के सोफे पे बेचारा मन ही मन सोच रहा थी की एक दिन उसके गोद में ये रचना नंगी बैठ कर उसे खाना खिलाएगी .....
इधर रवि का मन थोडा उदास था दादा के आने से की कहा अभी वो अपनी माँ को बड़े ही प्यार से उसके बदन से खेल रहा होता और इनके आ जाने से सारा कार्यक्रम बिगड़ गया है ....उसका मन बहुत ही उत्तेजित था अन्दर से मगर बाहर से बिलकुल शांत प्रतीत हो रहा था....सौरव ने रवि की हालत को भाप लिया और वो उठा और हॉल की बत्ती बुझा दी मगर किचन की रौशनी और टीवी की रौशनी से सोफे को अछि तरह से देखा जा सकता था सौरव की इस हरकत से रचना समझ गयी थी की क्या होने वाला है मगर रवि का ध्यान इस ओर बिलकुल भी नहीं गया था....
इधर सौरव ने रचना की साडी का पल्लू गिरा दिया और रचना के स्तनों को ब्लाउज के ऊपर से ही दबाने लगा
और अथ ही साथ उसकी चूत को साडी के ऊपर से मसलने लगा और गर्दन पे होठ रगड़ने लगा जिससे रचना को बैठना अब मुकिल हो रहा था ...कुछ ही देर में रचना भी हवस के खेल में बहने लगी और रचना ने सौरव का पूरा साथ दिया और उसने अपने ब्लाउज के दो बटन खोल दिए और अपनी टाँगे भी हलकी खोल दी सौरव ने एक एक कर क पूरा ब्लाउज खोल दिया अब ब्लाउज केवल रचना के कंधो पर अटका हुआ था .....
इस बात से रवि और संभु दोनों बेखबर थे ...
तभी रचना की एक चूची को सौरव ने कस कर मरोड़ दिया जिसे रचना की हलकी चीख निकल गयी और साथ ही साथ रचना ने टाँगे उत्तेजना में थोड़ी और फैला दी जिसे संभु और रवि दोने ने देख लिया ...
अब हॉल में रचना ऊपर से नंगी अपनी चूची अपने छोटे बेटे से मसलवा रही थी औरव को इस खेल में मजा आ रहा था ...रवि ने जब रचना की खुली चुचिया देखि तो उससे रहा नहीं गया और झट से उसने अपने होठ रचना की एक चूची पे जमा दिए इधर संभु की हालत ख़राब हो गयी थी ऐसे दृश्य को देख कर ....अब सोफे पे ही सौरव ने रचना का ब्लाउज उसके बदन से अलग कर दिया और रवि ने फटाफट उसकी साडी को निकाल फेका अब रचना केवल पेटीकोट में हॉल में अपने ससुर और दोनों बेटो के सामने बैठी थी......
अब रवि पे उसकी उत्तेजना पूरी तरह हावी हो चुकी थी उसने पेटीकोट के ऊपर से रचना की चूत को इतनी जोर से रगर की पेटीकोट का कपर उसकी चूत में घुस गया और उसकी चूत की दरार कपडे के ऊपर से साफ़ साफ़ दिखने लगी संभु की भी हालत अब काफी ख़राब हो चली थी थी उसने भी विवश हो कर अपने मुसल को धोती के ऊपर से सहलाना शुरू कर दिया था किसिस का भी ध्यान अब टीवी की तरफ नहीं था.....
सौरव उठा और रचना को उठाया और रवि ने उसकी पेटीकोट का नाडा खोल दिया पेटीकोट सरसराता हुआ रचना के पैरो में आ गिरा रचना ने उसके अपने पैरो की गिरफ्त से अलग कर दिया और पूरी नंगी हो जाती है .....
सौरव और रवि भी बिना देर किये नंगे हो जाते है उनहे इस बात जरा भी ध्यान नहीं रहा की उनके दादू वही पे है ....
मगर संभु नाथ अपने जज्बातों के गिरफ्त से बाहर आ गया था और वो भी नंगा हो कर अपने लंड को मसल रहा था जिसने पूरा नाग का रूप धारण कर लिया था......
इधर रचना को सौरव सोफे पे ही लिटा कर उकी चूत को चाटने लगता है जिससे रचना की तेज तेज आवाजे आने लगती है और रवि उसकी चुचिओ को मसलने चूसने लगता है कुछ मिनट की कहाई के बाद सौरव उठ खड़ा होता है और अपना फनफनाया हुआ लंड रचना की चूत में एक ही झटके में पेल देता है जसी रचना की चिख निकल जाती है और सौरव बिना रुके धराधर पेलने लगता है .....रवि औरव को रुकने बोलता है और ...सौरव रचना को लिए ही सोफे पे लेट जाता है...जिससे रचना की गांड रवि की तरफ हो जाती है और रचना खुद अपने हाथो से अपनी गांड फैला कर रवि को छेद दिखाती है ....
संभु ये देख कर काफी उत्तेजित हो जाता है की रचना खुद डबल चुदाई चाहती है उफ़......
रवि भी निचे झुक कर रचना की गांड को अपने ठुक से हल्का गिला करता है और अगले ही पल वो रचना के गांड में अपना लंड उतर देता है ...और फिर दोनों लग जाते है अपनी चहेती माँ की कुटाई में ......इधर संभु ऐसे दृश्य से खुद को रोक नहीं पाटा और वही पे झड जाता है ....इधर रचना दोनों के लंड ले ले कर दो बार झड चुकी थी और अब दोनों शेरो की बारी थी कुछ देर में वो भी झड जाते है रचना की चूत और गांड उन्न्दोनो के वीर्य से भर जाती है रचना सौरव के ऊपर बेहाल सी पड़ी अपनी सासों को काबू करने लगी होती है यही हाल बाकी तीनो मर्दों का भी था अम्भु वही सोफे पे नंगा बैठा था और ऊपर की तरफ देख रहा था जबकि रवि रचना और सौरव के बगल में जमीं पे बैठा हुआ था और उसका मुह रचना की जांघ पे था.....
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10-22-2018, 10:09 AM
Post: #36
RE: दो बेटों की विधवा मा
कुछ देर के बाद रचना को ख्याल आता है की वेलोग संभु के सामने ही चुदाई कर रहे थे और वो जल्दी से उठती है और इसी जल्दी में उसके मुह से बाबूजी निकल जाता है......उसकी इस आवाज से सब की निद्रा टूटती है और सभी अपने होश में वापिस आते है .....

रवि अपने दादा की हालत देख कर हस्ते हुए कहता है की दादा आपको भी इतनी तारक चढ़ी की यही हमारे सामने ही मुठ मार दिया हां .....
रचना बेचारी शर्म के मारे वही सोफे पे सिकुड़ कर बैठ जाती है हालाकि उसने अपने बदन पे कोई भी कपडा नहीं लिया था वो अभी भी नंगी ही थी .....सौरब उठ कर हॉल की बत्ती जला देता है और पूरा हॉल रौशनी में जगमगा जाता है ....और संभु की निगाहें रचना की एक लटकती हुयी चूची पे जम जाती है ....और उसके लंड में फिर से कसाव आना शुरू हो जाता है और रचना की गांड की दरार जो आधी नजर आ रही थी ऊपर से रचना की नंगी पीठ और उसपे खुले काले बिखरे बाल उफ्फ्फ्फ़ संभु के लंड पुरे तनाव में आ गया ....
रचना - सौरव बत्ती क्यों जला दी तुमने बंद करो उसे मुझे शर्म आ रही है ......बेटा क्या करता है तू भी .....
सौरव हस्त है और कहता है माँ जरा घूम कर दादा की हालत देखो बेचारे मरे जा रहे है तुम्हे देख देख कर .....
रवि - सौरव पागल मत बन तुझे शायद याद नहीं हमने माँ से एक वादा किया था की माँ केवल हमदोनो भाइयो की ही रहेगी उसके ऊपर कभी किसी की नजर नहीं पड़ेगी ना ही कोई आंच आने देंगे ......और वो थोरा गुस्से में आ जाता है ....सौरव की इस हरकत पे मगर सौरव कहता है ....
सौरव - भईया मुझे अछे से याद है उस वादे के बारे में और वो वादा कभी नहीं टूटेगा मगर भाई आप दादा की हालत देखो जरा उनको हमारी ऐसी धुआदार चुदाई देख कर क्या हालत हो गयी है बिचारे नंगे खरे है ऊपर से उनके हथियार को तो देखो जरा कितने गुस्से में माँ को निहार रहा है ...और हस देता है ....
रवि भी घूम कर देखता है और सोचता है की बात तो सही है दादू की हालत काफी ख़राब थी ...
इधर संभु अपनी हो रही इस जयजयकार को देख कर मासूम कुत्ते के जैसी शकल बनता है ....
सौरब - माँ थोडा दादा जी के बारे में भी सोचो न और वो रचना को जोर से हिला देता है जिससे रचना सोफे पे सिकुड़ी बैठी थी वो अपनी एक टांग फर्श पर टिका देती है जिससे उसकी एक पूरी टांग मरकरी की रौशनी में चमक उठती है वो इस झटके से संतुलन बिगड़ने लगता है इसलिए वो झुन्झुला कर उठ खड़ी होती है और संभु की तरफ घूम जाती है .....
रचना - मै इसमें बाबूजी की क्या मदद कर सकती हु मै पहले ही बोल चुकी हु की मेरे तरफ से किसी भी तरह की उम्मीद मत रखियेगा..और इन्होने हामी भी भरी थी और अब मै ऐसा कुछ नहीं करने वाली.....मै सिर्फ तुमदोनो की ही हु और तुम्हारी ही रहूंगी ...और अपने पैर पटकते हुए नंगी ही वहां से कमरे में चली जाती है और तीनो मर्द उसके थिरकते चुतर देखते रहते है जो को अभी कुछ ही देर पहले बज रही थी .....
आगे क्या होने वाला था ये आने वाला वक़्त ही बताएगा.....
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10-22-2018, 10:10 AM
Post: #37
RE: दो बेटों की विधवा मा
रचना कमरे में जा कर नंगी बैठी होती है सर को पकड़ कर क्योकि उसे इस बात की बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी की सौरव ऐसे पलटवार करेगा अपनी माँ को ही रंडी बन्ने पे मजबूर करेगा वो भी अपने ही दादा के लिए ...जबकि वो सारी की सारी बात से अवगत है फिर भी....हे भगवान् अब मै क्या करू ....

सौरव वही हॉल में में बैठ कर रवि को समझा रहा होता है की आखिर दादा भी एक इन्सान ही है वही संभु अपनी धोती को कमर पे लपेट कर वहा से चला जाता है अपने कमरे में क्योकि उसने अपनी पहल शुरू कर दी थी अब बस जो होना था वो हो कर ही रहेगा या तो आर या पार .....
रवि सौरव की बात सुनने के बाद ....
रवि - मै समझता हु दादू भी एक इंसान ही है मगर हमारी माँ केवल हमारी ही रहेगी और इस बात को जितनी जल्दी तू समझ लेगा उतना ही बेहतर होगा समझा न .....
और उठ कर कमरे में चला जाता है .....
सौरव सोचता है की भईया दादा को ऐसे छोरना कही से भी इन्साफ नहीं होगा उनके लिए चुदाई न सही थोड़ी थोड़ी सी चुहलबाजी ही कम से कम उनके लंड को ऐसे खरे खरे तो नहीं रहना परेगा और वैसे भी मेरी माँ चीज ही ऐसी है की किसी का भी खड़ा कर दे और तो और दादा के सामने तो उनके दोनों छेदों को बजा चुके है .... खैर उसने अभी इस वक़्त जादा बेहेस करने सही नहीं सोचा और वैसे भी अभी रचना को एक बार और बजना था वो भी झटपट कमरे की ओर बढ़ गया ....कमरे में पंहुचा तो देखा की रचना नंगी बिस्तर पे बैठी है और रवि उसे कुछ समझा रहा था कमरे में सौरव के आते ही रचना उठ कर सौरव के करीब आती है और उसके छाती पे मुक्के बरसाने सुरु कर देती है की उसने कैसे ये सोच लिया की वो संभु को भी अपने बदन सौप देगी और सुबुकते हुए सौरव को मरने लगती है सौरव उसका हाथ पकड़ कर रोकता है और सीधे उस्के होठो पे होठ जमा देता है रचना उसे धकेलती है मगर कुछ ही सेकंड्स के बाद रचना अपनी दोनों टाँगे फैला कर उचक कर सौरव के कमर पे चढ जाती है सौरव भी उसके दोनों गांड की फाको को फैला कर उसके छेद को रवि की तरफ करते हुए उसको थम लेता है ....और उसकी दोनों चुचिया सौरव के सिने में धस जाती है....इधर रवि भी उन्न्दोनो को ऐसे करता देख कर पीछे से आ कर रचना की खुली हुयी चूत और गांड के छेद में ऊँगली घुसा कर चूसने लगता है जिसे रचना और उत्तेजित हो कर भयंकर तरीके से सौरव के होठ चूसने लगती है वे तीनो फिर से हवस की नदी में गोते लगाने लगे थे जबकि अभी तुरंत वे चुदाई से फारिग हुए थे .....उधर संभु इस बात से अनजान अपने नींद की आगोश में जा चूका था.....सौरव अब चुम्बन तोड़ता है और रचना अपनी चूत और गांड पे हो रहे हमले से उत्तेजना पे चीख पड़ती है ......
रचना - ऊओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् बेटा आआअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् आऔऊउर्र्र च्च्छ्हूस्स्स हाआआआआअह् आआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्.....
सौरव रवि को उठने कहता है और रचना को ले कर बिस्तर पे गिरा देता है और कहता है माफ़ करना मै तुम्हे रुलाना नहीं चाहता था वो तो मै दादा की हालत देख कर थोडा जज्बाती हो गया था ........
रचना - मुझे उस बारे में अभी कोई बात नहीं करनी आओ जल्दी से इधर तुमदोनो ....
उस रात कमरे में चुदाई का दौर दो राउंड और चलता है और फिर आने वाली सुभ सौरव ने अपने दादा के लिए कुछ सोच रखा था क्योकि कल उसको कही नहीं जाना था और रवि की गैर मौझुदगी में वो रचना को पॉट सकता था ......
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10-22-2018, 10:10 AM
Post: #38
RE: दो बेटों की विधवा मा
सुबह सुबह सब अपने अपने समय पर जाग गए......सौरव और रवि अज कई दिनों बाद जॉगिंग पर गये थे .....इधर रचना बिलकुल नंगी थी उसने आज कुछ भी पहनने की जेहमत नहीं उठाई कल रात के बाद से उसने सोच लिया था की अब बाबूजी से कोई पर्दा करना बेफिजूल है इसलिए आज से मेरा जब मन होगा तब ही कुछ पहनूंगी या कही बहार जाने वक़्त .......इस वक़्त वो किचन में नंगी खड़ी हो कर रात के झूठे बर्तन धो रही थी ...संभु अपने कमरे से बाहर निकला और बाथरूम जाते वक़्त अपनी आखो के सामने ऐसे नज़ारे की उम्मीद नहीं की थी और अभी रचना को नंगी देख कर उसके लंड में जैसे तूफ़ान आ गया और वो .....बहू......कहते हुए अपने लंड को वही पे मुठीयाने लगता है रचना अपने ससुर की आवाज सुन कर घूम कर देखती है और वो उस दृश्य को देख कर लजा जाती है....खैर वो अगले ही पल किचन का काम छोड़ कर किचन के दरवाजे पे आ कर खड़ी हो कर कहती है .....

रचना - बाबूजी ये आप क्या कर रहे है ...जाइये बाथरूम में और नाहा धो कर बहार आईये फिर नास्ता करियेगा....जाइये ....
रचना की इस बेशर्मी पर संभु ने भी बेबाकी से जवाब दिया बहु सुबह सुबह ऐसे नज़ारे की उम्मीद नहीं थी अभी जब तक अपने इस उस्ताद को शांत न कर दू तब तक हमसे कोई दूसरा काम नहीं होगा ...और वो अपने धोती को पूरी तरह से खोल कर वही गिरा कर बिना किसी संशय के रचना को देखते हुए लंड हिलाने लगता है ...रचना कुछ देर वही मुह बनाये खड़ी रहती है और फिर हल्का सा मुस्कुराते हुए घूम जाती है ...और अब रचना की गांड संभु की तरफ थी और रचना कहती है ...जल्दी निप्तायिए अपने उस्ताद को और नाहा धो कर तैयार हो जाइये ...मुझे और भी काम है .....दरसल रचना को संभु की उत्तेजना को जल्द से जल्द चरम पे लाना था इसलिए उसने अपने नंगे बदन की नुमाईश संभु के सामने की थी ...और हुआ भी ऐसा ही संभु कुछ ही पलो में अपने चरम पे आ गया और वही पे झड गया और झरते वक़्त रचना का नाम पुकारा था.....
रचना ये दृश्य देख कर हस दी और ..अंदर ही अंदर उसे अपने बदन पे नाज हो रहा था की मै अभी भी मर्दों को पागल कर सकती हु..........थोड़ी देर बाद सौरव और रवि जॉगिंग से लौट आते है और दरवाजा पे दस्तक देते है...रचना बेधरक नंगी ही दरवाजा खोलने पहुचती है और तभी संभु भी बाथरूम से नंगा ही निकलता है और उसकी नजर दरवाजे की ओर जा रही नंगी रचना पे पडती है ...वो मन ही मन बोलता है ये औरत तो खड़े खड़े ही लौड़े में आग लगा देगी उफ्फ्फ और तभी रचना पूछती है कौन ....उधर से रवि और सौरव कहते है हम है माँ तुम्हारे लाल .......
रचना नंगी दरवाजा खोलते हुए दरवाजे की ओट में आ जाती है और वो दोनों अन्दर आ जाते है और आते के साथ सौरव रचना की बाह पकड़ कर उसको खीच कर अपने बदन से चिपका लेता है और दरवाजे पे ही उसके होठ चूसने लगता है और रवि भी उसकी चुचियो को मसलने लगता है....... उधर संभु इस माहोल को देख कर अपने कमरे में सरक लेता है उधर थोड़ी सी गरर्माह्त लेने के बाद वो रचना से अलग हो कर कहते है ....वाह माँ सुबह से ही नंगी हो कर घूम रही हो ....दादा जी कहा है .....वो कहती है की वो नहा कर शायद अपने कमरे में गये है .....
सौरव - तो इसका मतलब दादा को सुभह सुभह दर्शन दे दिए वाह....वैसे माँ कुछ बात बढा भी दी क्या हमारी गैर्मौझुदगी में ....रचना अपनी आखे गोल करते हुए उसके कान पकड़ कर कहती है ऐसा कुछ भी नहीं किया है मैंने बस उन्होंने मुझे देख कर मेरे सामने ही अपने उस्ताद मिया को शांत करवाया...औउर मुसकुरा देती है ....
रवि - वाह भाई वाह अब मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है मै तो अब जिंदगी को ऐसे ही जिना चाहता हु ...और मई अब ऑफिस निकलने की तयारी करने जा रहा हु माँ मेरा नाश्ता निकाल दो जल्दी .....और तू सौरव अब कोई चापलूसी नहीं करना वरना देर हो जाएगी ....
सौरव - जी भाई आप जाइये वैसे भी माँ के साथ मै यही रहने वाला हु दिन भर ...मेरे तो मजे ही मजे है ...और वो रचना की चूची को भीच देता है ...
रचना - अआह्ह्ह बेटा धीरे दर्द होता है न ...उफ़ और वो किचन में जाने लगती है तभी सौरव उसके चुतरो पे एक जोरदार थप्पर लगता है रचना उचल जाती है और अपने हाथ से चुतरो को सहलाने लगती है कहती है की क्या करता ही कम्कने अपनी माँ को मारता है ...
सौरव - क्या करू माँ तुम्हारे ये चुतर आपस में लडाई कर रहे थे ....और हस देता है .....नाश्ते के टेबल पे कुछ खास नहीं होता रचना वैसे ही नंगी रहती है जिसे देह देख कर तीनो मर्दों को खाने में काफी मशाकत करनी पड़ती है....... कुछ देर बाद रवि ऑफिस चला जाता है और अब घर में संभु और सौरव ही थे और अब रचना नहाने जाने वाली थी.....तभी सौरव के दिमाग में एक खुराफात सूझती है.....
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10-22-2018, 10:10 AM
Post: #39
RE: दो बेटों की विधवा मा
रचना नंगी ही नहाने के लिए बाथरूम की और जा रही थी तभी सौरव रचना को कहता है माँ....रुको तुम्हारी आज तेल मालिश कर देता हु .....

रचना - वाह मेरे लाल तूने तो बिन मांगी मुराद पूरी कर दी मेरी ....चल आ जा कमरे में मै आती हु .....
सौरव - दादू आप क्या कर रहे है इधर आइये न आपकी जरुरत पड़ेगी
संभु - आता हु बेटा.....तुम बस बोलो क्या काम है ....
रचना - सौरव ये क्या कर रहा है ....बाबूजी को क्यों बुला रहा है .....
और वो थोड़े नाराजगी के साथ सौरव को देखने लगती है .....
सौरव - क्या माँ तुम भी बच्चो के जैसे मुह बनाती हो दादा ही तो है वैसे भी वो तुम्हे नंगी देख तो रहे ही है ....मालिश में हाथ लगा देंगे तो क्या हो जायेगा ....रचना बेमन से कमरे में चली जाती है और वहा संभु पहले से मौझुद रहता है और उसने अपना बनियान और कुरता धोती सहित उतर रखा था जिसे रचना पूछती है की ये कपडे क्यों उतार दिए बाबूजी आपने .....
संभु - बहु वो इसलिए की तुम्हारी मालिश के वक़्त कपडे ख़राब न हो जाए और वो रचना को देख कर हस देता है
रचना भी अपनी मुस्कान को बिखेरते हुए नंगी ही बिस्तर पे लेट जाती है....इसी बिच सौरव भी कमरे में आ जाता है वो भी केवल चड्डी में था जिसमे से उसका लंड साफ़ साफ़ देखा जा सकता था ....उधर वही हाल संभु का भी था .....
सौरव रचना को उलटी होने के लिए कहता है रचना उलटी हो जाती है और सौरव संभु को इशारा करता है की वो तेल गिराए और मालिश करना शुरू करे संभु आज दूसरी बार रचना के बदन को छूने जा रहा था .....सौरव ने रचना के पीठ के बाल हटाने को संभु को बोला संभु ने कापते हाथो से बालो को हटाया और सौरव ने उसकी पीठ से होते हुए रचना की गांड तक तेल की एक पतली सी धार गिराई और रचना की गांड की दरार में कुछ देर तक तेल की धार गिराई जिसे रचना बखूबी समझ रही थी की सौरव क्या कर रहा है ....संभु बेचारा सूखे हलक से थूक घोट रहा था आगे होने वाले घटनाओं को ले कर वो काफी रोमांचित हो रहा था .....अब सौरव ने संभु से कहा की वो अब मालिश करे....वो भी रचना के दूसरी तरफ जा कर बैठ जाता है और अब वो रचना के पैरो को हाथो में ले कर अपने हाथ से मालिश करने लगता है जबकि संभु रचना की पियत पे लगे तेल को फैला के मालिश शुरू करता है......
रचना अपने बदन पे चार चार हाथ लगते ही सिहर जाती है और वो अपने गांड को अन्दर की ओर सिकोर लेती जिसे संभु और सौरव दोनों ने देखा .....वो दोनों हल्के से मुस्कुरा देते है.....
अब संभु रचना की पीठ से होते हुए रचना की गांड की तरफ बढ़ रहा था वही सौरव भी रचना की गांड की तरफ ही आ रहा था जबकि रचना की सासे भारी होती जा रही थी ......तभी संभु ने अपने दोनों हाथो की उंगलिया रचना की गांड की दरार में घुसेर दिए और सौरव ने अपने दोनों हाथो की उंगलिया रचना की चूत वाले हिस्से पे घुसेर दिया और अब संभु ने तेल में चुपड़े हाथो को तेज तेज रचना की चुतरो में घुमाना चालू किया उधर वही काम सौरव भी अब कर रहा था अब रचना की हलकी हल्की सिसकिया उठनी चालू हो गयी थी ज्यो ज्यो रचना की चूत और गांड में दोनों के हाथो की गति बढती जा रही थी त्यों त्यों रचना की सिसकिया तेज होती जा रही थी तभी सौरव ने रचना की टांगो को फैला देता है जिसे रचना तुरत फैला देती है........और अब संभु रचना के चुतरो को फैला देता है और उसके छेद को कुरेदने लगता है और अब वो उसके छेद में अपनी उंगलिया घुसाने लगता है .... और सौरव रचना की चूत के दाने को रगड़ने लगता है
रचना - आह माँ आह बाबूजी आह सुरु आह ओह्ह आह आह उफ्फ्फ ....
ये असर दोनों की मालिश का हो रहा था अब सौरव ने रचना को तद्पाने की नियत से उसके बदन को रगड़ना रोक दिया और संभु को भी रोक दिया ....वो तो उसके गांड को चोदना ही नहीं चाहता था मगर सौरव के कहे अनुसार चलने में उसकी भलाई थी इसलिए उसने छोर दिया...........इधर अब सौरव रचना को आवाज दे कर बोला की माँ अब आगे क और घूम जाओ आगे की तरफ भी तेल लगा दू तभी रचना घूमी और सीधे घूम कर अपनी टांगो को फैलाते हुए सौरव को अपने ऊपर एक झटके में खीच कर बोली इतनी जोर से मालिश कर रहे थे अभी ही क्यों रुक गए हां ........
सौरव अपने माँ के इस कदम से थोडा हैरान होता है उधर वही हाल संभु का भी होता है ........
तभी रचना कहती है की अब मेरी मालिश इससे करो और वो भी जल्दी .........वो सौरव के लंड को पकरते हुए कहती है और संभु वह से जाने लगता है तभी सौरव कहता है की दादू आप कहा जाने लगे अभी यही रुकिये दादू आप कहा चल दिए इधर आइये हमारी मदद करिए मालिश में .........
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10-22-2018, 10:11 AM
Post: #40
RE: दो बेटों की विधवा मा
संभु के नजदीक आते ही सौरव उसे गिरेबान से पकड़ कर खीच कर कहता है आप माँ की पैरो की उंगलियों को मुह में ले कर चूसिये और मै उनकी मालिश अपने इस हथियार से करता हु और वो अगले ही पल रचना की चूत को दना दन चोदने लगता है और कमरा रचना की कामुक सिसकियो से गुंज उठता है ......

संभु उसके पैरो की उंगलियो को मुह में चूसने लगता है जबकि उसका ध्यान इस बात पे बिलकुल नहीं था की सौरव ने उसके गिरेबान को पकड़ कर खीचा था ........उधर रचना भी इस बात को नहीं पूछी थी की उसने ऐसा क्यों किया अभी वो चुदने की खुमारी में डूबी हिय थी ......संभु उसके पैरो की उंगलियों को चुसे ही जा रहा था तभी सौरव घूम कर संभु को खीच कर कहता है की अब उसके पैरो को ही चूसते रहिएगा की कुछ और भी करियेगा ......
संभु उसकी तरफ कातर निगाहों से देखता है जैसे वो पूछ रहा हो की आगे मै ऐसा क्या करू की रचना की चूत का स्वाद मै भी चख सकू.तभी सौरव कहता है की आप निचे झुक कर मेरे आड़ और माँ की चूत को चूसिये जिसे उसे और उत्तेजना आये और मजा आये और उसके झड़ने में मदद मिले इसे आपको भी माँ की चूत दुबारा से चूसने का मौका मिल जायेगा .........संभु उसके आड़ चूसने वाली बात से थोडा अजीब महसूस करता है मगर वो अगले ही पल चूसने के लिए निचे बैठ जाता है और चूसने लगता है वही रचना अपनी कमर उठा उठा कर चुद रही थी ....अब वे दोनों झड़ने के करीब थे और संभु अभी भी उन् दोनों के टांगो के बिच चुसे ही जा रहा था तभी सौरव झड जाता है साथ ही साथ रचना भी और उन् दोनों के रस की कुछ फुहारे संभु के चेहरे पे भी पड़ती है जिसे वो उठते हुए चाट लेता है ......अभी तीनो अपनी जी तोड़ म्हणत के बाद हाफ रहे था उअर अपनी सासों को नियंत्रित करने में लगे थे

कुछ देर बाद संभु मायूस चेहरा ले कर कमरे से ये बोलते हुए बाहर चला जाता है की बहु अब तुम नहा लो और फिर नाश्ता कर लो जायदा देर भूखी रहना सही नहीं है इतना काम करती हो सब का ख्याल रखती हो ...जाओ बेटा जल्दी कर लो ....और कमरे से निकल जाता है.....सौरव अभी भी वही नंगा आपनी नंगी माँ के साथ खड़ा था ......

रचना - सौरव तूने दादाजी के गिरेबान को क्यों पकड़ कर खीचा था ये क्या बदतमीजी किए हो तुम ......इतने भी अंधे न बनो तुम की बड़े छोटो का लिहाज ही भूल जाओ समझे ना........सौरव चुप चाप अपनी माँ की बातो को सुन रहा था......क्योकि गलती तो उसने किआ था मगर उसकी मंशा कुछ और की थी जिससे अभी रचना अनजान थी .....
रचना - अब बोलो भी चुप क्यों हो और वो उसका हाथ पकडे उसको बाथरूम की तरफ ले कर चल देती है.....
वहां पहुच कर रचना नंगी बाथरूम में नहाने घुस जाती है जबकि सौरव वही दरवाजे पे खड़ा रहता है ....रचना बाल्टी में पानी भरने के लिए नल खोल देती है और चुपचाप खड़े सौरव को झकझोर कर पूछती है की बोलोगे या नहीं .....
सौरव - माँ कैसा रहेगा अगर दादाजी को हमलोग एक गुलाम के रूप में इस्तेमाल करे वैसे भी तुम उसको अपना बदन सौपने वाली नहीं हो तो कम से कम उनसे ऐसे ऐसे काम ले कर ही उन्की भी आत्मा को संतुष्ट कर दिया करेंगे या कहो की उन्के लौड़े को आराम मिल जाया करेगा ......
रचना मुह फाड़े सौरव की बातो को सुन रही थी ......
रचना - तू पागल हो गया है क्या क्या बोले जा रहा है समझ भी आ रहा है की क्या बक रहा है तू वो हमारे घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति है और उनको ऐसे जलील करना चाहता है तू .....
सौरव - माँ मै जलील नहीं करने कह रहा है मै तो बस उनके हित के बारे सोच रहा हु और मेरे नजरिये से तुम देखो इसमें कुछ गलत नहीं है ....अच्छा मेरी बात का जवाब देना अगर दादा जी तुम्हे सामने से आ कर ऐसे ही कुछ करने लगे तो तुम उन्हें हाथ लगाने दोगी....
रचना कुछ सोचते हुए ....नहीं नहीं दूंगी मगर फिर भी बेटा ऐसे कैसे करोगे उनके साथ बताओ ....
सौरव - माँ तुम बस देखती जाओ और जैसे जैसे मै करूँगा मेरा साथ देना तुम बस अब तुम जल्दी से नहा कर बहार आओ और हां अब कुछ पहन लेना .....
रचना - मगर रवि का क्या उसको कैसे समझाओगे
सौरव - वो भी मै संभाल लूँगा.....
और वो अपने कमरे में चला जाता है .....
उस दिन कुछ खास नहीं होता है शाम को सब मार्केट जाते है और संभु सामान की थैली धोते हुए चलता रहता है रवि को कुछ समझ नहीं आता है की आखिर सौरव ने मुझे मना क्यों किया सामान की थैली उठाने से और दादा को पकड़ा दिया आखिर ये माजरा क्या है ......घर जा कर उससे पूछता हु ......
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