देसी भाभी अमेरिकन चुदाई
आंटी से मुलाकातें कम होने लगीं लेकिन जाते जाते आंटी और अंकल मेरे कम्पूटर ज्ञान
और इंग्लिश ज्ञान की चर्चा कंपनी के मालिक रवि भय्या से अक्सर करते हैं ,ऐसा पिता जी
ने बताया सुनकर में मुस्कुरा दिया क्यूंकि इस इंग्लिश ज्ञान पर मेरी गुरु यानि रवि भैय्या की
बीवी शशिकला जो की कान्वेंट में पढ़ी थी ,शुरू में जब मुझे इंग्लिश में मुश्किल होती थी ,
तो उन्होंने मेरी काफी मदद की थी , नहीं तो मुझे तो अपने महाराजा शिवाजी राव के स्कूल के सर
की न ग्रामर समझ आती थी न उच्चारण वैसे उस समय युवाओं में इंग्लिश का क्रेज़ कोर्स के कारण
नहीं बल्कि डेबोनियर, औ- बॉय जैसी मैगज़ीन पढने समझने के लिए ज्यादा होता था क्यूंकि मस्तराम
के एक् जैसे कथानक और घटिया कागज़ और प्रिंट और टाइप में ढेर सारी त्रुटियों के चलते खीज सी होती थी ,
औ- बॉय मुझे एक सेंट-पॉल में पढने वाले दोस्त से मिली थी बड़ी ही ज़बरदस्त मेगज़िन हुवा करती थी,
उस के बाद बहुत ढुंढा पर वो मैगज़ीन नहीं मिली लेकिन ये भी कटु सत्य है की इन मेग्ज़ीनों को पढने के बाद भी
मुठ मारने के लिए मस्तराम की ही सहायता लेनी पढ़ती थी , NOW A DAYS चूत लंड आज बड़ी आसानी से
लिख दिए जाते है उस समय बुर और पेल दिया जैसे शब्द मस्तराम की ही दैन हैं
एक दिन पिताजी मुझ से बोले तू रवि को थोड़ी कंप्यूटर e -mail वगैरा हेल्प कर दिया कर डील
और बिज़नेस सीक्रेट रहे इस लिए वो किसी और को इन्वाल्व नहीं करना चाहता बात आयी गयी हो गयी
,व्यापार मेले में हमारी कंपनी की भी स्टाल लगी थी ,आई डी होल्डर को लाल फीते से लटकाए उसे सही
कर रहा था किसी ने पीछे से जोर से फीता खेंचा कुछ समझ पाता पलट कर देखा कोई भरे बदन की गजगामिनी
मस्त गांड मटकाती चली जा रही है ,सुनहरे रंग की सिल्की साड़ी में से नितम्ब बाहर आने को बेताब थे,
मैं पहचान नहीं पाया पीछे नितम्बो पे हाथ रख हाथ हिलाया जा रहा था ये वेविंग मेरे लिए ही थी उसे भी मालूम था ,
में देख रहा हूँ फिर काम में बिजी हो गया लंच टाइम बुफ़े में अचानक रवि भैय्या टकरा गये उनसे बात कर ही रहा था ,
के भाभी अच्छा तो भाभी को मेरी आई डी का लाल फीता पसंद आया था अपनी प्लेट, साड़ी का पल्लु और लोगो के स्पर्श से खुद को संभालती हुवी
(स्पर्श और अपरिचित नारी बदन को छूने की चाह जो ऐसे समय लोगो को किसी भी खाने से ज्यादा मजेदार लगते हैं और जिस की भूख कभी ख़त्म नहीं होती)
शादी के बाद भाभी का रंग साफ़ हो गया था ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने दूध में गुलाल घोल दिया हो उनके
मीडियम साइज़ के बूब इस कढाईदार ब्लाऊज में ऐसे लग रहे थे जैसे ज़बरदस्ती ठूँस दिए गए हो अच्छा था
कोई मानवाधिकार संगठन का सदस्य वहाँ नहीं था नहीं तो स्वतः-स्फूर्त संज्ञान लेते हुवे इनको आज़ाद ज़रूर
करवा देता वैसे में ऐसी किसी सदस्यता के लिए स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर रहा था ,शारीरिक रूप से तो
बाबुराव अंडी में वैसे ही सर टकरा कर सदस्यता ले भी चुका ,कड़क टेनिस बाल से बूब किसी माँ के पीछे से शर्मीले
बच्चे की तरह थोडा थोडा लो कट ब्लाऊज़ से झांकते हुवे ,चूतड देखकर लग रहा था किसी भी बहाने हाथ फेर दूँ ,
चेहरे पर देखा तो वही कमान दार आँखे जो उनकी राजस्थानी पृष्ठभूमि की चुगली सी करतीं और उनके
सुतवाँ किताबी चेहरे में मुझे कामसूत्र की नायिकाओं सा लुक हमेशा से लुभाता था & इन सब का में बचपन
से दीवाना था ,पहले भाभी का वज़न इतना न था लेकिन अब नितम्बो और छाती का ये भारीपन उनकी
चाल और ढाल में यानि उन्हें रागेश्वरी से कुछ कुछ बिपाशा बनाने में कामयाब रहा था ,लेकिन सपाट पेट नाभि दर्शना
साड़ी अभी भी सुष्मिता से ही उन को ज्यादा मिलाता था ,हर कदम और मूव पर बदन में एक मस्त लहर सी दौड़ जाती
और नितम्ब और बूब ऐसे रिदम में उठते गिरते के देखने वाले की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती ,
जैसे ही थोड़ी मुड़ी उनके नितम्बो के उभार का साइड व्यू जेनेफर लोपेज़ की माँ चोद गया और में
स्वदेशी अपनाओ के नारे में विश्वास जताने लग गया इधर अंडरवियर में बाबुराम भाभी के बूब्स से प्रतिस्पर्धा कर रहा था
मैं भी आता हूँ ठहर ! तेरी तो मय्या का भोसड़ा भाभी की नज़र मेरे लंड पर ही थी मेरे लटकते आई डी कार्ड को पकड़ते हुवे
जानबूझकर अपनी उंगलियाँ को लौड़े से टच करते हुवे देखने लगी फोटो में तो बड़े गुस्से में दिख रहे हो में तो उन्हें देखकर
मुस्कुरा ही रहा था ये बात मुझ से कह रहीं थी या बाबुराव से पहले मुझे लगा मेरा भ्रम है ,लेकिन पेंट पर सब्जी वाले
तेल का धब्बा साफ़ दिखाई देता था ,अजंता एलोरा की ये सजीव मूरत पार्टी का केंद्र बिंदु थी हालांकि दो चार पटाखे और
माल थे भी लेकिन वो भी भाभी को कितने लोग देख रहें हैं इस में स्वयं से ज्यादा रूचि ले रहीं थी ,कनखियों से उठती भैय्या की ऑंखें
इन सब से अनजान नहीं थी लेकिन शुक्र है मुझे परिवार के सदस्य जैसा मान कर मुझ पर नज़र नहीं रख रहे थे
वैसे रवि भय्या सामान्य कद काठी 40 या 42 साल के लेकिन बलिष्ठ कसरती बदन के मालिक थे
कानपुर के पास के किसी गाँव से आकर जब उन्होंने इस मालवा के इस शहर और मध्य भारत की व्यवसायिक नगरी को अपनी कर्मभूमि
बनाया तो लक्ष्मी उन पर टूट के बरसी पैसा बढ़ने और व्यस्त दिनचर्या से थोड़ी तोंद निकल आयी थी जो उनके सफारी सूट से भी साफ़ दिखाई देती थी
भाभी की आँखों में मैंने झाँका तो भैय्या के इस पार्टी पार्टनर नुमा asset की आँखों में मुस्कुराने पर
गालों में पढने वाले गड्ढों की खूबसूरती के बावजूद एक खालीपन था ,,
सोने में सजी ये गुडिया...शायद मेरी आँखों की भाषा समझ गयी मानसिक स्तर पर आप तरस खा लो
लेकिन जब ये विचार शारीरिक हो जाता है तो किसी के बाप की नहीं सुनता यही हाल लौड़े का था जो
भाभी की सुन्दरता को सहन नहीं कर पा रहा था अचानक मेरा सहयोगी राजू आया पापा ने कुछ
गिफ्ट आर्टिकल मंगाए थे जो मेहमानों को दिये जा रहे था ये सारा कार्यक्रम होटल के खुले हिस्से में स्टाल
लगा कर हो रहा था ,पोर्च में लान के पास बुफ़े हो रहा था ऊपर होटल में हर स्टाल का एक कमरा बुक था
मुझ से जब उस ने चाबी मांगी तो मैंने मौका गनीमत जाना और प्लेट रखते हुवे ढेर सारे टिश्यु पेपर उठाता हुवा
कमरे की तरफ दौड़ पड़ा जल्दी जल्दी हाथ धोये कहीं लंड पे मिर्ची न लग जाये पहले बड़ी जोर की सू सू लगी थी
लेकिन अब लन्ड बाहर निकला तो मूत बाहर आने को नहीं तैयार ठंडी सांस भर कर शीशे में देखा तो
भाभी का गदराया बदन दिखने लगा अच्छा अब समझ आया बाबुराव को हाथ में लिया तो वो थोडा
गनगनाया pulsating like anything जैसे बाबुराव कह रहा हो मय्या का भोसड़ा तुम तो बुफ़े में अपनी पसंद की चीज़ खा रहे थे
हमारी पसंद का ध्यान कौन रखेगा ! अरे ! तेरी माँ की इसी लिए हाथ ने ज्यादा टिश्यु पेपर उठाये थे ,
सुपाडे की चमड़ी को हाथ लगाया तो पट से लाल टोपा बहार कूद पड़ा अभी ढंग से टच भी नहीं किया था की यशवंत सागर का सायफन चल पढ़ा
वेग से सीधा मिरर पर भाभी की काल्पनिकछवि मनी/मूठ कूद के बाहर निकली
फिर बड़ी जोर जोर से मैंने लौड़े को हिला हिला कर पूरी तरह स्खलित हो गया फिर देर तक लंड को लटकाए मूतता रहा
टायलेट के एयर कंडिशनर के बावजूद पसीने पसीने हो गया अच्छे से मुंह हाथ धोया कमोड पर बैठ के लौडा साफ़ किया रिलेक्स हुवा तो
पेट के निचले हिस्से की आग बुझते ही ऊपर से गुड़ गुड़ की आवाजें आने लगी भूख के मारे पेट में चूहे कूद रहे थे ..
अबे !मैंने तो भाभी को देखने के चक्कर में कुछ खाया ही नहीं वापस नीचे लिफ्ट से आया सहायक मेरा ही रास्ता देख रहा था
उसने मेरे खाली हाथ देख कर प्रश्नवाचक नज़रों से मेरी और देखा मैंने उसे चाबी देते हुवे कहा मेरी समझ नहीं आया क्या लेने आया था
मुझे असल में टायलेट जाना था .वो कुछ भुनभुनाता सा पैर पटकता लिफ्ट की और बढ़ा अब जहाँ वो खड़ा था में वही खड़ा होकर लाऊंज में देखने लगा
भाभी सामने ही एक कुर्सी पर बैठे रसगुल्ले खा रही थी अच्छा तो वो मादरचोद यहाँ खड़ा हो के भाभी को टाप रहा था ,
मिल गयी शांति - भाभी की आवाज़ से उन्हें एकटक देखते मेरी तन्द्रा टूटी ,तुमने कुछ खाया नहीं
यही प्लेट लेकर आ जाओ उन्होंने पास ख़ाली पड़ी एक कुर्सी की और इशारा किया
प्लेट ले कर बैठ गया और हाथ से निवाले बनाकर मुंह में ऐसे डालने लगे जैसे
शोले में डाकुओं द्वारा पीछा करती ट्रेन की भट्टी में धर्मेंदर कोयले डाल रहा हो ,
भाभी-धीरे धीरे खाओ कुछ जल्दी है या मुझ से भाग रहे हो मैं उन्हें देखकर मुस्कुराया और
छोटे छोटे कौर मुंह में डालते हुवे चबाने लगा मेरी नज़रें भाभी पर थी लेकिन उन की नज़रें
प्याली में चाशनी कपड़ों पर न गिर जाये इस लिए जब भी चम्मच पास लाती थोडा झुक जाती थी ,
और भाभी के साँची स्तूपों की बीच की घाटियाँ दर्शनीय हो जाती थी आँखें उन को आँखों ही आँखों चोद रहीं थी रहीं थी
लेकिन बाबुराव की हालत ऐसी हो रही थी जैसे डेढ़ दो हफ्ते पहले लाकर भुला दिया बैंगन फ्रिज़ की सफाई में बरामद हुवा हो
और उस मुरझाये को dust-bin में डालने के लिए साइड में कर दिया गया हो ,
नसें तनी हुईं मुंह लाल लाल लौड़े का
मारी है हमने उधारी में इस कदर
क़र्ज़ में है बाल बाल लौड़े का


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