Post Reply 
देवर की कशिश
02-01-2013, 07:58 AM
Post: #1
देवर की कशिश
मुझे चार दिन से वायरल बुखार चल रहा था। मेरे पति राजेश को अपने रूटीन कार्य सर्वे के लिये जाना जरूरी था। वो मुझे अकेला छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे। पर मेरी सुविधा के लिये मेरे पति ने अपने पापा को अपने गांव फ़ोन कर दिया और परिणाम स्वरूप मेरे पति का छोटा भाई रोहन सवेरे ही पहुँच गया। उसे देख कर मेरे पति की सांस में सांस आई। मेरा देवर रोहन उस समय कॉलेज में पढ़ता था। अब तो वो जवान हो रहा था, उसका तो कॉलेज में जाकर पहनने ओढ़ने का तरीका, बोलने-चालने का ढंग सब ही बदल गया था।
राजेश ने रोहन को मेरी सारी दवाईयाँ कब कब देनी हैं ... खाने में क्या क्या देना है, सब समझा दिया था। पर आज मेरा बुखार का पांचवां दिन भी चल रहा था तो मेरा बुखार भी उतर चुका था, बस कमजोरी सी लग रही थी।
दोपहर में उनकी जीप आ गई थी सो वो दिन के भोजन के उपरान्त रवाना हो गये थे। मैंने भी आज तो दिन को खाना ठीक से खाया था। रात को बुखार वाली नींद नहीं आई थी बल्कि एक अत्यन्त सुहावनी और गहरी नींद आई थी। अगली सुबह से मुझे फ़्रेशनेस सी लग रही थी। मैंने तो सवेरे ही गीजर ऑन करके गर्म पानी से स्नान कर लिया था। फिर डी ओ भी लगा लिया था। अपने वस्त्र भी बदल लिये थे... पहले पहने वस्त्रों से अब तो दवाईयों की, बुखार की सी महक आने लगी थी।
"आपको एक दिन और रुक जाना चाहिये था ... जल्दी क्या थी?" रोहन मुझे समझा रहा था।
"शरीर में दवाईयों की बहुत महक आने लगी थी, पर अब तो मुझे अच्छा लग रहा है। जा चाय बना ला ...।"
चाय पी कर मैंने उठ कर परांठा, आमलेट और अचार का नाश्ता तैयार कर दिया था। लगभग नौ बजे हमने नाश्ता भी कर लिया था। अब मुझे बहुत अच्छा लगने लगा था। दिन भर मैंने काम किया, मुझे जरा भी थकान नहीं आई थी। दिन को भी अच्छी नींद आई थी। राहुल ने अपना पलंग मेरे पलंग के पास ही लगा लिया था ताकि समय असमय वो मेरे काम आ सके।
कई दिनों तक मैंने आराम भी बहुत किया, आज तो मैं भोजन के बाद मैं दिन को आराम करके उठी तो राहुल मेरे पास बिस्तर पर ही बैठा हुआ घूर रहा था।
मैंने अंगड़ाई लेते हुये कहा-रोहन... क्या बात है ... कोई खास बात है क्या?
"ओह, नहीं ... वैसे ही ... भाभी आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं।"
"ओ हो ! यह तो मुझे पता ही नहीं था? फिर मैंने हंस कर उसे अपनी गोदी में खींच लिया। वो तो जैसे जान कर मेरी गोदी में लुढ़क सा गया और अपना सर मेरी गोदी में छुपा लिया।
मैंने प्यार से उसके बालों में हाथ फ़ेरा... वो तो अपन सर मेरी गोदी में छुपा कर जैसे आँखें बन्द करके लेट गया। मैं कभी उसकी पीठ पर तो कभी उसके बालों को प्यार से सहलाने लगी। भूल गई कि अब वो भी जवान है। मैंने देखा कि कुछ ही समय में तो जैसे वो सो ही गया था। पर अचानक ही मुझे उसका सर अपनी चूत के आसपास रगड़ खाता सा महसूस हुआ।
मुझे रोमांच सा हो आया ! मैंने उसे नजदीक से देखा ... उसकी सांसें तेज थी ... और वो बार बार अपना सर मेरी चूत पर दबाने लगा था। मेरे शरीर में जैसे सनसनाहट सी होने लगी ... नीचे चूत के आसपास मुझे गुदगुदी सी लगने लगी। मैंने धीरे से उसके बाल जकड़ लिये ... उसकी पीठ पर अपनी अंगुलियाँ गड़ा कर चलाने लगी। तभी मुझे उसके लण्ड के उभार की ओर ध्यान गया। उसका पजामा धीरे धीरे तम्बू की तरह ऊपर उठने लगा था। कुछ ही देर में वो कड़क हो कर तन सा गया। मेरे दिल में एक कसक सी उठ गई। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। दिल पर जैसे काबू नहीं रख पा रही थी मैं।
अचानक मुझे एक झटका सा लगा ... मैं एकदम सम्भल गई।
"ऐ मुन्ना ! सो गया क्या ...चल उठ ... बहुत लाड़ हो गया !"
रोहन ने अपनी आंखे खोली, उसकी आंखे गुलाबी हो रही थी।
"उंह भाभी ... कितना अच्छा लग रहा था ! लगता था कि आपके साथ ही सो जाऊँ !"
"चल उठ चाय बनाते हैं, फिर शाम का भोजन भी तो बनाना है।"
"धत्त धत्त, भाभी आप तो बस ... रोटी भाजी ... दाल चावल ... अच्छा चलो !"
रोहन ने अपना मुँह बनाया और उठ गया। रोहन ने मेरे दिल में हलचल मचा दी थी। अब वो मुझे किसी हीरो की तरह लगने लगा था। वो मुझे सुन्दर लगने लगा था। उसका क्या तो चेहरा ... क्या तो बाल, उसकी मुस्कान, उसका बदन तो मुझे सलमान खान जैसा लगने लगा था। मेरे दिल में एक मीठा मीठा सा दर्द होने लगा था। वो मुझे भाने लगा था। संध्या को भोजन से पहले वो जैसे ही स्नान करके निकला, उसका गीला शरीर और उसकी चिपकी हुई चड्डी, उसके लण्ड का सॉलिड उभार ... उसका मोटा आकार बता रहा था। मुझे देखते ही वो घूम गया।
"अरे रे भाभी, सॉरी ... मैं तो ऐसे ही निकल आया !"
पर वो तो स्नानघर से रोज ही ऐसे ही निकलता था। शायद उसके मन में भी चोर था। उफ़्फ़ ! उसके पीछे घूमते ही उसके दो कठोर चूतड़ मेरे सामने आ गये। कितने सुन्दर थे ... सॉलिड ... कामदेव की तरह ... मेरे दिल में तीर से चल गये ... जैसे कई सुईयाँ दिल में एक साथ घुस गई। ये साले मर्द इतने नासमझ क्यों होते हैं।
मैंने पास पड़ा तौलिया उठा कर उसे दे दिया ...
"लपेट लो मुन्ना जी ... ऐसे मत घूमा करो ... किसी की नजर लग जायेगी।"
"भाभी, अब आपके अलावा यहाँ कौन है ... लगा लो नजर ... मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ने वाला ..."
मैंने हंसते हुये बाहर निकलते हुये कहा ... "वो तो नीचे देख लो ... पता चल जायेगा कि क्या हाल है?"
उसने नीचे देखा और अपने खड़े हुये लण्ड को जल्दी से छुपा लिया।
उसके स्नान के बाद मैंने भी स्नान कर लिया और खूब खुशबू लगा कर महकने लगी। सोच रही थी अगर मुन्ना मुझे रात को जबरदस्ती चोद भी देता है तो क्या मैं इन्कार कर पाऊँगी। हाय रे ! ये कैसा विचार आ गया मन में। मैंने घर के कपड़े पहन लिये, उत्तेजना से भरी हुई जान करके एक नीचे गले का ब्लाऊज ... बिना ब्रा के, जिसमे से मेरा उन्नत स्तन आकर्षित करें, पेटीकोट बिना चड्डी के ... बहुत हल्की फ़ुल्की सी ... । यदि वो चोदना चाहे तो मैं तो बिलकुल तैयार हूँ। उफ़्फ़, हाय राम ... मैं यह क्या सोचने लगी।
रोहन भी आज मस्ती में लग रहा था। जब हम भोजन के लिये बैठे, मुझे तुरन्त पता चल गया था कि उसने भी चड्डी नहीं पहनी हुई है। उसका सफ़ेद पतला पजामा उसके लण्ड का साफ़ पता बता रहा था। उसे देख कर मेरे मन में जैसे बिजलियाँ लहराने लगी। मुझे चूत में खुजली सी लगने लगी। उसे देख देख कर मेरी चूत पानी छोड़ने लगी थी। बार बार मेरा हाथ पेटीकोट के ऊपर चूत पर चला जाता था। मैं गीलेपन को बार बार साफ़ कर रही थी। कैसा सुन्दर बुलावा था यह?
मुझे भी आश्चर्य हो रहा था कि मुझे जाने क्या होने लगा था? मैं इतनी बहक क्यों रही हूँ। शायद चुदे हुये काफ़ी समय हो गया था ! क्या मुझे अब एक अदद लण्ड की जरूरत थी। मेरा दिल यह सब जानते हुये भी काबू से बाहर होता जा रहा था। कुछ देर टीवी देखने के बाद मैं विचलित सी अपने कमरे में आ गई। मुझसे दिल की बेताबी छुपाये नहीं छुप रही थी। सोचा कि चूत में अंगुली घुसा कर पानी निकाल लूंगी, पर मुझे इसका मौका ही नहीं मिला। रोहन भी टीवी बन्द करके कमरे में आ गया।
"भाभी, आज तो मुझे आप पर बहुत प्यार आ रहा है, अपनी गोदी में सुला लो...।"
यह सुनते ही जैसे मेरी रूह कांप गई ... जाने आज क्या होने वाला है ... गोदी में ! फिर जाने वो क्या करेगा ? कहीं मैं बहक जाऊँ ? कैसे सम्भालूंगी अपने आप को.?. क्या चुदवा लूँ? कौन रोकेगा मुझे? किसे पता चलेगा? सवालों से मन घिरा हुआ था। फिर मुझे लगा कि वो कुछ कह रहा था।
"चुप शैतान, भाभी के साथ सोयेगा? शरम नहीं आयेगी?"
"भाभी, आप कितनी अच्छी है, बस थोड़ी देर के लिये ही सही ..."
"बस थोड़ी देर ही ना ... तो आजा ... मेरे साथ मेरी बगल में लेट जा ! बहुत प्यार आ रहा है ना !!"
मेरे लेटते ही रोहन भी मेरी बगल में लेट गया। फिर उसने अपना सर नीचे किया और मेरी चूचियों में अपना चेहरा दबा कर करवट पर लेट गया। उफ़्फ़ ! इतना बड़ा लड़का ... और मेरी चूचियों में सर घुसा कर ... मैं भी प्यार से अभीभूत होने लगी। मैंने धीरे से उसके सर को अपने सीने से और भींच लिया। अपने दूसरे हाथ उसकी पीठ सहलाने लगी। वो मुझसे और चिपक सा गया। उसकी अब एक टांग मेरी कमर पर आ गई और अपना एक हाथ मेरे चूतड़ पर रख कर मुझे अपनी ओर दबा लिया। उफ़्फ़ ! कैसे शरीर से शरीर कस कर चिपक गये थे।
मेरे तन में जैसे ज्वाला धधक उठी। मेरा दिल घायल हो कर जैसे लहूलुहान होने लगा। ये कैसी जलन ! ये कैसी अगन ! चूत में तेज खुजली उठने लगी।
तभी जाने कैसे मेरे गहरे गले का ढीला ढाला सा ब्लाऊज़ एक तरफ़ हो गया और मेरी एक चूची उसने अपने मुख में भर ली और वो चूसने लगा। मैंने भी अपनी चूची उसके मुख में और ठूंसते हुये आह भरी...
"मुन्ना ! यह मत करो... आह्ह्ह... अब बहुत हो गया सीऽऽऽ... अब हट जाओ ना अहःहः"
"प्लीज भाभी, बहुत आनन्द आ रहा है... बस थोड़ी देर और..."
इस थोड़ी देर में तो मेरी जान निकल जाने वाली थी... मैंने कुछ नहीं कहा। मुझे बहुत ही तेज मज़ा आने लगा था... मैं उसे हटने को नहीं बल्कि लण्ड घुसेड़ने को कह रही थी।अब उसने ताकत से मुझे सीधे लेटा दिया था और अपना मुख मेरे मुख से मिला दिया था। मेरे होंठ थरथराने लगे थे। लण्ड घुसने की चाह में मैं तो पागल हुई जा रही थी। पर अब जोर से पुच्च पुच्च की चूमने की आवाजें आने लगी थी। मैं नीचे दब सी गई थी। मैं इधर उधर बल खाकर, अपने शरीर को उसके शरीर से रगड़ कर अपनी उत्तेजना बढ़ा रही थी। उसे लगा कि शायद मैं अपने आप को बचाने में लगी हूँ... सो उसने अपना शरीर खींच कर मेरे ऊपर ले लिया और मुझे अपने कब्जे में ले लिया। अब तो उसका लण्ड भी मेरे पेट के निकट रगड़ खा रहा था। मेरी चूत बल खाकर उसे अपने कब्जे में लेने का प्रयत्न करने लगी थी। पर उसने अब मेरी टांगें भी दबा ली थी। अब लण्ड ठीक चूत के ऊपर आ गया था। जैसे ही उसका लण्ड पेटीकोट के ऊपर से मेरी चूत पर टकराया... मैंने चूत को ऊपर उठा कर जोर से रगड़ मारी।
"भाभी... मुझे तो आपको चोदना है... हः हः... बस लण्ड धुसेड़ना है..."
"मुन्ना... आह्ह्ह्ह मुन्ना... मेरी जान..."
वो अपना लण्ड बड़े प्यार से धीरे धीरे मेरी चूत पर घिसने लगा, मैं भी उसका साथ देने लगी थी। पता नहीं कैसे मेरा पेटीकोट कमर तक उठ गया। उसका पजामा खुल कर पैरों पर सिमट आया था। उसका नंगा गरम लण्ड का मोटा सुपाड़ा अचानक मेरी चूत से टकरा गया। उसने मुझे देखा... मैंने भी उसे देखा और फिर मेरी चूत पर दबाव बढ़ने लगा।



भाभी, बहुत गर्म है आपकी चूत तो...।
"उह्ह्ह्ह... हच्च्च... मां मेरी..." मेरे मुख से निकल पड़ा।
उसका मोटा लण्ड मेरी चूत में धंस गया था। मेरी तो खुशी के मारे जैसे जान निकली जा रही थी। हाय ! कितने दिनों के बाद कोई बढ़िया लण्ड खाया था मेरी चूत ने...
"हिस्स्स ! क्या कर रहे हो रोहन, सी... मैं तो तुम्हारी भाभी हूँ।" वासना से तड़पती हुई हाँ और ना करती हुई हकलाने लगी।
"हाँ भाभी... मैं तो आपका देवर हूँ ना !"
"जानते हो भाभी किसके बराबर होती है... इस्स्स्स... धीरे से डालो..."
"पता नहीं, पर देवर-भाभी के किस्से तो मैंने बहुत सुने हैं..."
"आह्ह्ह्ह इस्स्स्स, धीरे से... कैसा कैसा लग रहा है ना मुन्ना !!"
"हाँ, बहुत मजा आ रहा है भाभी..."
"तो देख क्या रहा है... चोद दे अपनी प्यारी भाभी को।"
तभी उसने एक शॉट मारा...
"उईईईई मर गई मुन्ना... जरा और मस्ती से..." मेरी चूत की ज्वाला और तेज भड़क उठी।
उसने अपना लण्ड बाहर निकाला और सरररररर करते हुये उसने पूरा ही घुसा दिया।
"ई ईई ईई... साले मुन्ने... मजा आ गया... पहले कहाँ था रे... चोद जरा मस्ती से..." शरीर आग हुआ जा रहा था।
अब रोहन ने अपने दोनों हाथों को सीधा करके अपना शरीर ऊपर उठा लिया और अपने लण्ड को बिना किसी अंग को छुये हल्के हल्के से चूत में चलाने लगा। इस मधुर चुदाई की मैं तो कायल हो गई। इंजन की धीमी गति, एक सी मंथर गति लिये हुये... मेरे शरीर के अंगों में जादू जगाता हुआ उसके शरीर का लण्ड वाला हिस्सा लयबद्ध तरीके से चल रहा था और लण्ड मेरी चूत की सही मायने में खुजली को मिटा रहा था।
तन में मिठास भरती जा रही थी... मैं अपनी दोनों टांगें पूरी उठाये हुये, चित्त लेटी हुई... चुदाई का मस्त मजा ले रही थी। मन में कोई बात नहीं, कोई संकोच नहीं... कोई गलत भावना नहीं... बस शून्य में मुस्काती हुई, गुदगुदाती हुई मधुर वासना में अभिभूत... आनन्द भोग रही थी।
आनन्द मेरी चुदाई की सीमा को तोड़ने लगी थी। मुझे लग रहा था कि बस मैं चरम सीमा तक पहुँच चुकी हूँ। मेरा जोश उबाल पर था। उसके शॉट बहुत तीव्रता से चलने लगे थे। मैं तो जैसे बल खा कर अपने आप को झड़ाना चाह रही थी।फिर आह्ह्ह्ह्ह ! मैं जोर से झड़ ही गई। पर वो रोहन, मुस्टण्डा जैसा, दे शॉट पर शॉट मुझे चोदे जा रहा था। हाँ, मेरे झड़ने का अहसास उसे हो गया था। उसने अपना फ़ूला हुआ लण्ड चूत से बाहर खींच लिया। मैं लस्त सी पड़ गई।
रोहन ने मुझे जल्दी से पलट दिया... मैं समझ गई थी कि अब मेरी गाण्ड चोद देगा...
"अरे मुन्ना, बस अब नहीं... अरे मैं मर जाऊंगी...!"
"नहीं... नहीं बस भाभी... बस दो मिनट की बात और है... मैं भी झड़ने वाला हूँ... प्लीज !"
फिर तो मेरे मुख से चीख निकल पड़ी। उसके लण्ड ने जबरदस्ती अपना लण्ड मेरी गाण्ड दबा दिया।
"ठहरो तो... मुझे रिलेक्स तो होने दो... "
मैं क्या करती? मैंने अपनी गाण्ड के छेद को ढीला छोड़ा... तो उसका लण्ड अन्दर घुस पड़ा। मेरी आँखें फ़ैलने लगी। मुख से एक चीख निकल गई। उसका सुपारा मुझे बहुत ही मोटा महसूस हो रहा था। लण्ड था या लक्कड़ था ! उसके लण्ड पर मेरी चूत की कुछ चिकनाई भी लगी थी सो रोहन ने थोड़ी सी कोशिश से उसे धीरे धीरे करके अपने लण्ड को पूरा ही अन्दर घुसेड़ दिया। फिर मुझे अधिक तकलीफ़ नहीं हुई। मुझे वो दिन याद आ गये जब शादी के पहले मेरे गर्भ ठहरने के डर से मेरे एक मित्र ने मेरी गाण्ड बहुत प्यार से मारी थी। मुझे उस समय लगा था कि लड़कियाँ सिर्फ़ चूत ही क्यों चुदाती हैं जब गाण्ड मरवाना कितना सुरक्षित और आनन्ददायक था।
फिर तो रोहन ने मेरी गाण्ड को खूब पीटा... खूब पीटा... मुझे तो ऐसा लगने लगा था कि चुद तो मेरी गाण्ड रही है पर मैं चूत से झड़ने वाली हूँ। रोहन के मुख से तेज सिसकारियाँ निकलने लगी थी। उसने बड़े ही जोर से मेरे चूचक को दबाना शुरू कर दिया। मुझे इस बेतरतीब चूचियों के तोड़ने मरोड़ने से बहुत ही तकलीफ़ और दर्द होने लगा था। पर झड़ते हुये मर्द को कौन रोक सका है। फिर एकाएक जोर की हुंकार भरता हुआ उसने अपना लण्ड बाहर खींच लिया और फिर जोर जोर से उसने अपनी लण्ड से पिचकारियों के रूप में वीर्य फ़ेंकने लगा। मेरी क्या तो गाण्ड के गोले और क्या तो पीठ, सारी जैसे कीचड़ से भर गई।
उसने अपनी एक अंगुली में वीर्य को भर कर मेरे मुख में डाल दी।
"अरे... छीः ये क्या कर रहे हो...?"
"फ़्रेश माल है भाभी... चखो तो सही...!"
"दूर करो, मुझे तो घिन आती है..."
पर उसका रस मेरे मुख में तो आ ही चुका था। रोहन ठीक कह रहा था। मुझे वो बेस्वाद जरूर लगा... पर मुझे एक तरह से आनन्द भी आया।
"मुन्ना, जरा एक अंगुली और चटाना...!"
"... प्लीज एक और..."
फिर तो उसे कहना ही पड़ा- अरे भाभी... ये कोई फ़ेक्टरी थोड़े ही है... जितना था सब तो चटा दिया...
"धत्त मुन्ना... अब की बार मुझे सीधा खिला देना...अंगुली से नहीं...!"
"भाभी मुझे तो लगता है कि जैसे आप अंगुली नहीं, मेरा लण्ड चाट रही हो..."
"अरे बदमाश... अब इतना तो कर लिया, अब क्या लण्ड भी चटायेगा...?"
पर मन में तो था ही ना... मैं झट से उसे सीधा लेटा कर उसका लण्ड अपने मुख में लेकर चाटने लगी। उसका तो एकदम लण्ड तन्ना गया। उसे क्या मालूम था कि मैं तो लण्ड चुसाई में एक्सपर्ट हूँ... कुछ ही देर में मैंने उसका वीर्य एक बार फिर से निकाल कर खूब स्वाद ले लेकर धीरे धीरे पिया। मुझे अच्छा लगा... ओह्ह मैंने बेकार ही कितना वीर्य नष्ट किया...
मेरे पति राजेश जब तक सर्वे पूरा करके लौटे तो मुझे स्वस्थ्य और प्रसन्नचित देख कर बहुत खुश हुये। अब तो मैं और रोहन इनके ऑफ़िस जाने पर खूब जम कर चुदाई किया करते थे। पर वो दिन भी आना ही था कि रोहन को जाना पड़ा।
रोहन तो उस दिन खूब रोया... राजेश ने उसे समझाया कि भई हम तो यहीं है ना... कॉलेज की छुट्टियाँ हो तो आ जाया करना।
"मुन्ना जी, छुट्टियाँ होते ही आ जाना... प्लीज...!"
राहुल का चेहरा मेरी विनती पर खिल गया... और वो खुशी खुशी लौट पड़ा। अब इस दिल की कशिश का क्या करूँ ? मेरा देवर तो मेरा दिल ले गया था। बस अब तो मुझे उसी से चुदना है...

Find all posts by this user
Quote this message in a reply
Post Reply 


Possibly Related Threads...
Thread:AuthorReplies:Views:Last Post
  देवर राजा ने माँ बनाया Sex-Stories 0 21,862 08-24-2012 07:22 AM
Last Post: Sex-Stories
  मेरे जीजू और देवर ने खेली होली SexStories 6 33,893 01-12-2012 06:32 PM
Last Post: SexStories
  भाभी की देवर को ट्रेनिंग Sexy Legs 0 18,783 10-06-2011 04:32 AM
Last Post: Sexy Legs
  देवर भाभी Sexy Legs 3 21,201 08-30-2011 09:04 PM
Last Post: Sexy Legs
  दीवाना देवर Sexy Legs 3 14,088 08-30-2011 09:02 PM
Last Post: Sexy Legs
  घोंसले की तलाश में कशिश Sexy Legs 2 3,975 07-31-2011 05:53 PM
Last Post: Sexy Legs
  मेरा देवर राज Sexy Legs 0 12,389 06-24-2011 09:09 PM
Last Post: Sexy Legs
  चचेरा देवर Hotfile 0 8,789 11-17-2010 06:34 PM
Last Post: Hotfile