कॉरपोरेट कल्चर की चुदाईयाँ
कॉरपोरेट कल्चर की चुदाईयाँ -1


तो दोस्तो, पहले मेरा थोड़ा सा परिचय.. मैं वंशिका कपूर हूँ.. मेरी उम्र 29 साल है.. दिल्ली में रहती हूँ। मेरी शादी को 7 साल हो गए हैं.. मेरा रंग साफ़ है और फिगर 34-30-34 की है। एक बेटी के जन्म के बाद थोड़ी सी मोटी हो गई हूँ।
मेरे पति वरुण दिखने में बहुत ही आकर्षक हैं.. जरा शौकीन मिजाज आदमी हैं। घूमना-फिरना.. नए लोगों से मिलना.. आदि उनके शौक हैं। मेरे पति वरुण बिज़नेस में हैं, दिल्ली में हमारा अपना फ्लैट.. गाड़ी.. सब कुछ है।

मेरे पति वरुण सेक्स में भी काफी अच्छे हैं। इनके ऑफिस के स्टाफ में भी ज्यादातर लड़कियाँ ही हैं। शादी के लगभग दो साल बाद मुझे शक हुआ कि इनके अपने ऑफिस में किसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध हैं.. हालांकि इस बात का फर्क हमारी शादीशुदा लाइफ या सेक्स लाइफ पर नहीं पड़ा… पर मुझे यह बात सही नहीं लग रही थी।

एक दिन वरुण ने मेरे साथ सेक्स करते हुए.. किसी और के साथ सेक्स करने की इच्छा ज़ाहिर की। मैंने उनकी यह बात पकड़ ली और बाद में अगले दिन डिनर करते हुए यही बात छेड़ दी..
वरुण ने कहा- देखो वंशिका.. ज़िन्दगी बहुत छोटी है और हमें इसे एन्जॉय करना चाहिए.. मेरे ऑफिस में लड़कियाँ हैं.. मेरा भी मन करता है और तुम भी जवान हो.. तुम्हें भी लाइफ के मज़े लेने चाहिए। किसी अन्य के साथ सिर्फ सेक्स करने से हम किसी और के नहीं हो जायेंगे.. हम दोनों एक हैं और हमेशा एक रहेंगे।

इस बात पर मुझे लगा कि अगर वरुण चाहे तो जैसे अब तक मुझसे छुपा कर बाहर मज़े लेते रहे.. आगे भी ले सकते हैं.. पर यह इनका प्यार है.. जो ये मुझे बता कर सब करना चाहते हैं और इसीलिए मुझे भी इसमें शामिल कर रहे हैं।

मुझे सही लगा.. पर मैंने इन्हें कोई जवाब नहीं दिया। खाना खा कर मैं अपने बिस्तर पर आकर लेट गई.. पर नींद तो कोसों दूर थी। दिमाग में नए-नए ख्याल आ रहे थे कि जब ये मेरे सामने किसी को चुम्बन करेंगे.. किसी के मम्मों को भींचेंगे या चूसेंगे.. तो मुझे बुरा लगेगा या मज़ा आएगा और कोई और मेरे साथ ऐसा करेगा.. तो इन्हें कैसा लगेगा। इसी उधेड़बुन में मैं देर रात तक जागती रही… फिर अंततः सो गई।

फिर एक दिन वरुण ने मुझे बताया कि उन्होंने अपने स्टाफ के लिए इस रविवार को एक पार्टी रखी है।
मेरे पूछने पर कि कौन-कौन होगा इस पार्टी में.. इन्होंने मुझे कुछ मिले-जुले नाम बताए.. जिनमें ऑफिस के कुछ लड़के.. कुछ लड़कियाँ.. कुछ इनके मिलने-जुलने वाले.. दोस्त वगैरह थे।

मुझे इस पार्टी में वरुण क्यों ले जाना चाहते हैं.. यह मैं समझ चुकी थी।
तो रविवार को मैं भी अच्छे से तैयार हुई। मैंने कट स्लीप सफ़ेद ब्लाउज.. उसके नीचे डिज़ाइनर ब्रा.. और नाभि से नीचे बाँधी हुई सफ़ेद साड़ी.. हाथों में अपना शादी वाला चूड़ा.. हाई हील के सैंडल्स.. डार्क लिप्स्टिक.. छोटी सी बिंदी.. और गले में सिर्फ एक नेकलेस पहना।

कुल मिलाकर पूरा अपना पंजाबी लुक बना लिया। वैसे भी हम पंजाबिनें जब तैयार होती हैं तो गज़ब की माल लगती हैं।

जब मैं तैयार होकर निकली.. तो वरुण हल्के से मुस्कुराए.. इनकी मुस्कराहट का जवाब मैंने भी मुस्कुरा कर दिया।

हम पार्टी में पहुँच गए। वरुण ने मुझे सबसे मिलवाया.. पर यहाँ तो सभी खूब सज-धज कर आए हुए थे। इनके ऑफिस की मैनेजर श्रुति.. कुछ अलग ही दिख रही थी.. नेवी ब्लू कलर की साड़ी में खुले हुए घुंघराले बाल.. डार्क लिपस्टिक.. हाथ में वोदका का गिलास..

मुझे देखते ही वो मेरी तरफ बढ़ी.. और बोली- हैलो वंशिका..
मैंने उसकी तरफ देखा.. क्योंकि आज से पहले जब भी मिले.. उसने मुझे ‘मैम’ या ‘मैडम’ ही बोला था.. पर आज मेरा नाम ले रही थी।
मेरी कुछ समझ में नहीं आया.. फिर भी मैंने उसे ‘हैलो’ किया।

इनका एक दोस्त नितेश.. मेरी तरफ बढ़ा.. और मेरी कमर में हाथ डालकर गाल पर चुम्बन करते हुए मुझे ‘हैलो’ किया।
उसकी इस हरकत से मैं एक पल के लिए काँप सी गई.. सच बताऊँ तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए और निप्पल्स टाइट हो गए।
फिर नितेश ने मुझे ड्रिंक ऑफर की.. मैंने मना किया.. पर उसके जोर देने पर मैंने एक वोदका का पैग ले लिया।

अब पार्टी अपने शवाब पर थी.. मुझे नहीं पता था कि उस समय वरुण कहाँ है, वो मुझे काफी देर से दिखाई नहीं दे रहे थे। मैंने दिमाग पर जोर डाला.. तो देखा कि श्रुति भी कहीं नहीं दिख रही थी।
मैं एकदम से खड़ी हुई और उन्हें ढूँढते हुए गार्डन में आ गई।
वो कहीं नहीं दिखे.. पर मेरे पीछे-पीछे नितेश जरूर गार्डन तक आ गया।

मुझे परेशान देखकर उसने पूछा- भाभी क्या हुआ?
मैंने कहा- वरुण बहुत देर से नहीं दिख रहे हैं।
तो वो बोला- अन्दर ही किसी कोने में बैठकर ड्रिंक ले रहा होगा.. अन्दर बहुत शोर है.. आओ कुछ देर गार्डन में इस झूले पर बैठते हैं।
गार्डन मे सोफे वाला झूला पड़ा था.. जिस पर बैठकर आगे-पीछे झूला जा सकता था। हम दोनों उस पर बैठ गए।

यूँ ही बात करते-करते अचानक नितेश मेरी तरफ देखने लगा और चुप हो गया। उसे ऐसे देखकर मैं भी चुपचाप उसे देखने लगी।
पता नहीं कब हमारी आँखें बंद हो गईं और होंठ आपस में मिल गए।
नितेश ने मेरे होंठ चूसते हुए मेरे गाल पर जब हाथ रखा.. तब मुझे होश आया.. हम तुरंत अलग हुए और नितेश मुझे ‘सॉरी’ बोलकर एकदम ही अन्दर चला गया।

पर नितेश के साथ इस दो मिनट के चुम्बन ने मेरे अन्दर की वासना को हिला कर रख दिया था। शादी के बाद पहली बार किसी पराए मर्द का स्पर्श मुझे अच्छा लगा। मैं भी मुस्कुरा कर अन्दर पार्टी हॉल में आ गई।

अब नितेश मुझसे नजरें चुरा रहा था। मैंने भी नज़रें मिलने पर उत्तर में अपनी पलकें झुका लीं।
अचानक नितेश अपनी जगह से दो कदम साइड में हट कर खड़ा हो गया.. पर उसके पीछे का दृश्य मैं देख नहीं पाई।

सोफे पर मेरे पति वरुण और उनकी मैनेजर श्रुति चिपके हुए थे। वरुण उसके होंठ चूस रहे थे.. वरुण का हाथ उसके घुंघराले बालों में था और श्रुति का हाथ वरुण की शर्ट के अन्दर उनके सीने पर घूम रहा था।

यह दृश्य देख कर मेरी आँखों में आंसू आ गए। मैं वहाँ से भागते हुए पीछे की तरफ जहाँ वाशरूम थे.. उधर पहुँच गई।

एक दीवार का सहारा ले कर खड़ी हो गई.. तभी अचानक मेरे कंधे पर एक हाथ का अहसास हुआ। मुझे लगा कि नितेश होगा.. पर जैसे ही मैं पीछे मुड़ी.. मैंने देखा कि उन्हीं के ऑफिस का एक लड़का अमन था। अमन ने अचानक ही मेरे आँसू पोंछे.. न जाने उसमें इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई थी और न जाने मैं क्यों उसमें इतना खो गई थी कि उसके कंधे पर सिर रख कर रोने लगी।

तभी अचानक वहाँ नितेश आ गया.. हमें ऐसे देख कर वो बोला- सॉरी.. लगता है मैं गलत वक़्त पर आ गया हूँ।

मैं कुछ बोल पाती.. उससे पहले ही नितेश वहाँ से चला गया। मेरे ऊपर तो जैसे पहाड़ टूट गया हो.. मुझे न जाने क्यों वरुण से ज्यादा नितेश की चिंता हो रही थी.. पर यह भी वक़्त की एक विडम्बना थी कि मैं वरुण और नितेश के बारे में सोचते हुए अमन की बाँहों में थी।

अमन ने मुझसे कहा- मैडम मुझे आपसे कुछ पर्सनल बात करनी है.. जो मैं अभी नहीं कर सकता। क्या आप मुझे अपना नंबर दे सकती हैं?
मैंने सोचा शायद यह मुझे कुछ बताना चाहता है.. इसलिए मैंने अमन को अपना नंबर दे दिया।
अगले दिन व्हाट्सएप्प पर अमन ने मुझे मैसेज किया- हैलो मैडम.. अमन दिस साइड..
मैंने भी रिप्लाई में ‘हैलो’ कर दिया।

फिर उसने कहा- मैडम मैं तो आपके घर आ नहीं सकता.. क्योंकि बॉस ऑफिस से कभी भी आ जाते हैं.. तो क्या आप मेरे घर आ सकती हो?

मैंने पूछा- क्यों?
तो उसने जवाब दिया- जो बात मैं आप को बताना चाहता हूँ.. वो मिल कर ही हो सकती है।
मैंने पूछा- तुम मेरी मदद क्यों करना चाहते हो?
तो उसने कहा- क्योंकि इसमें मेरा भी कुछ फायदा है।

मैंने उससे उसका पता लेकर टाइम ले लिया.. और तय टाइम पर उसके घर पहुँच गई। उसका दो कमरे का घर उसने अच्छे से रख रखा था। उसने अपने और मेरे लिए चाय बनाई।
मैंने कहा- बताओ तुम क्या बताना चाह रहे थे?

दोस्तो, यह मेरे जीवन की एक सत्य घटना है मैं किस तरह इस संस्कृति का हिस्सा बनती चली गई.. इसका पूर्ण विवरण अगले भाग में लिखूँगी.. जरूर पढ़िए।
कहानी जारी है।

 
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