कामांजलि
"अब जल्दी करो न जान...!" मीनू ने कहा और अपने नितंबो को कसमसा कर उपर उठा लिया...

"बस एक मिनट...." तरुण ने कहा और अपनी पेंट उतर कर मोबाइल वापस उसकी जेब में रख दिया.... उसका लंड उसके कच्छे को फाड़ कर बाहर आने वाला था... पर उसने खुद ही निकल लिया... उसने झट से मीनू की जाँघों को उपर उठाया अपना लंड चूत के ठीक बीचों बीच रख दिया.. लंड को चूत पर रखे जाते ही मीनू तड़प उठी.. उसका डर अभी तक निकला नहीं था... उसने बाहें फैलाकर चारपाई को कसकर पकड़ लिया," प्लीज.. आराम से जान!"

पता नहीं तरुण ने उसकी बात सुनी या नहीं सुनी.. पर सो रही पिंकी ने मीनू की चीख जरूर सुन ली... वह हडबड़ा कर उठ बैठी और अगले ही पल वो उनकी चारपाई के पास थी... आश्चर्य से उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी.. अपने मुँह पर हाथ रखे वह अजीब सी नजरों से उनको देखने लगी....

अचानक पिंकी के जाग जाने से भौचक्क मीनू को जैसे ही अपनी हालत का ख्याल आया.. उसने धक्का देकर तरुण को पीछे धकेला... मीनू के रस में सान तनतनाया हुआ तरुण का लंड बाहर आकर झूलने लगा...

मैं दम साधे कुछ और तमाशा देखने के चक्कर में चुप चाप पड़ी रही.....
मीनू ने तुरंत अपनी सलवार उपर कर ली और तरुण ने अपना लंड अंदर... सारा मामला समझ में आने पर पिंकी ज्यादा देर वहाँ खड़ी न रह सकी.. मीनू और तरुण को घूर कर वह पलटी और अपने पैर पटकती हुई वापस अपनी रजाई में घुस गयी...

तरुण यूँ रंगे हाथ पकड़े जाने पर भी कुछ खास शर्मिंदा नहीं था पर मीनू की तो हालत ही खराब हो गयी... उसने दीवार का सहारा लेकर अपने घुटने मोड़े और उनमे सर देकर फूट फूट कर रोना शुरू कर दिया...

"अब ऐसे मत करो प्लीज.. वरना अंजु भी जाग गयी तो बात घर से बाहर निकल जायेगी... चुप हो जाओ.. पिंकी को समझा दो की किसी से इस बात का जिकर न करे.. वरना हम दोनों पर मुसीबत आ जायेगी" तरुण मीनू के पास बैठ कर धीरे से बोला....

"अब क्या बोलूँ मैं? क्या समझाऊ उसको? समझाने को रह ही क्या गया है.. ? मैं तो इसको मुँह दिखाने लायक भी नहीं रही... मैंने मना किया था न?.. मना किया था न मैंने? क्यूँ नहीं कंट्रोल हुआ तुमसे..? देख लिया 'तिल'? " मीनू रो रो कर पागल सी हुई जा रही थी.. ," अब मैं क्या करूँ?"

"प्लीज मीनू.. संभालो अपने आपको! वो कोई बच्ची नहीं है.. सब समझती है.. उसको भी पता होगा की लड़के लड़की में ये सब होता है! एक मिनट... प्लीज चुप हो जाओ.. मैं उससे बात करता हूँ" तरुण ने कहते हुए मीनू के सर पर हाथ फेरा तो उसकी सिसकियों में कुछ कमी आई....

तरुण मीनू के पास से उठा और पिंकी की चारपाई के पास आ गया..," पिंकी!" तरुण ने रजाई उसके सर से हटाते हुए प्यार से उसका नाम पुकारा.. पर पिंकी ने रजाई वापस खींच ली.. उसने कोई जवाब नहीं दिया...

"पिंकी.. सुन तो एक बार...!" इस बार तरुण ने रजाई हटाकर जैसे ही उसका हाथ पकड़ा.. वह उठ बैठी.. उसने तरुण से नजरें मिलाने की बजाय अपना चेहरा एक तरफ ही रखा और गरजने लगी," मुझे.. मुझे हाथ लगाने की जरूरत नहीं है.. समझे!"

"पिंकी.. हम एक दूसरे से प्यार करते हैं.. इसीलिए वो सब कर रहे थे.. तुम्हे शायद नहीं पता इस प्यार में कितना मजा आता है.. तुम चाहो तो मैं तुम्हारे साथ भी... सच पिंकी.. इससे ज्यादा मजा दुनिया में किसी चीज में नहीं आता.." तरुण बाज नहीं आ रहा था...

"चुप हो जा कमीने!" पिंकी गुस्से से दांत पिसती हुई बोली....

"समझाने की कोशिश करो यार.. प्यार तो सभी करते हैं..!" तरुण ने इस बार और भी धीमा बोलते हुए उसके गालों को छूने की कोशिश की तो पिंकी का 'वो' रूप देख कर मैं भी सहम गयी..

"ऐ.. यार बोलना अपनी बहन को.. और प्यार भी उसी से करना.. समझे.. मुझे हाथ लगाने की जरूरत नहीं है.. मुझे मेरी दीदी की तरह भोली मत समझना! कमीने कुत्ते.. मैं तुम्हे कितना अच्छा समझती थी.. 'भैया' कहती थी तुम्हे.. मम्मी तुमसे कितना प्यार करती थी.. और तुम क्या निकले? तोओओह !" पिंकी मामले की नजाकत को समझते हुए धीरे बोल रही थी.. पर उसकी आँखों में देखने से ऐसा लगता था जैसे वो आँखें नहीं; जलते हुए अंगारे हों... उसकी उंगली सीधी तरुण की और तनी हुई थी और आखिरी बात कह कर उसने तरुण के चेहरे की और थूक दिया..

तरुण की शक्ल देखने लायक हो गयी थी.. पर वो सच में ही एक नम्बर का कमीना निकला.. उल्टा चोर कोतवाल को साबित करने की कोशिश करने लगा," मुझे क्यूँ भाषण दे रही है? तेरी बहन से पूछ न वो मुझे क्या मानती है.. कल की लौंडिया है, अपनी औकात में रह.. लगता है किसी से टांका नहीं भिड़ा अभी तक.. नहीं तो तुझे भी पता चल जाता इस 'प्यार' की खुजली क्या होती है...
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गुस्से में तमतमाई हुई पिंकी ने चारपाई से उठने की कोशिश की पर तरुण ने उसको उठने ही नहीं दिया.. पिंकी को चारपाई पर ही दबोच कर वो उसके पास बैठ गया और जबरदस्ती उसकी छातीयों को मसलने लगा.. पिंकी घिघिया उठी.. वह अपने हाथों और लातों को बेबस होकर इधर उधर मारने लगी.. पर वह उसके शिकंजे से छूटने में कामयाब न हुई...

तरुण कुछ देर उसके अंगों को यूँही मसलता रहा.. बेबस होकर पिंकी रोने लगी.. अचानक पीछे से मीनू आई और तरुण का गिरेबान पकड़ कर उसको पीछे खींच लिया," छोड़ दो मेरी बहन को...!"

जैसे ही पिंकी तरुण के शिकंजे से आजाद हुई.. घायल शेरनी की तरह वो उस पर टूट पड़ी.. मैं देख कर हैरान थी.. पिंकी तरुण की छाती पर सवार थी और तरुण नीचे पड़ा पड़ा अपने चेहरे को उसके थप्पड़ों से बचाने की कोशिश करता रहा....

जी भर कर उसकी ठुकाई करने के बाद जब पिंकी हाँफती हुई अलग हुई तो ही तरुण को खड़ा होने का मौका मिल पाया... पिंकी के थप्पड़ों की बौछार से उसका चेहरा लाल पड़ा हुआ था.. और गालों पर जगह जगह पिंकी के नाखूनों के निशान बने हुए थे....

"कुत्ते, कमीने.. निकल जा यहाँ से... हरामजादा!" पता नहीं पिंकी अब तक कैसे अपने आप पर काबू किये हुए थी.. शायद मीनू की मर्जी से हो रहे 'गलत काम' को तो उसने बर्दाश्त कर भी लिया था.... पर उसके बदन पर तरुण के नापाक हाथ लगते ही तो वह चंडी का रूप धारण कर बैठी...

जी भर कर मार खाने के बाद तरुण की पिंकी की और देखने की हिम्मत तक नहीं हो रही थी... खिसियाया हुआ सा वह दरवाजे के पास जाकर मीनू को घूर कर बोला,"कल कॉलेज में मिलता हूँ तेरे से.. तेरे नंगे फोटो खींच लिये हैं मैंने.... और आज बता रहा हूँ.. इसको चार चार लड़कों से नहीं चुदवाया तो मेरा नाम भी तरुण नहीं...."

इससे पहले की पिंकी फिर से उस पर हमला करती.. वह दरवाजा खोल कर बाहर निकल गया...

मीनू फिर से अपनी चारपाई पर जाकर अंदर ही अंदर सुबकने लगी... अपने सांस उतार कर पिंकी उसके पास गयी और उससे लिपट कर बोली," दीदी.. आप रोवो मत.. भूल जाओ सब कुछ... आपकी कसम मैं किसी को कुछ नहीं बताउंगी.. और न ही आपको कुछ कहूँगी इस बारे में... चुप हो जाओ न दीदी.."

सुनकर मीनू का रोना और भी तेज हो गया.. और उसने अपनी छोटी, पर समझदारी में उससे कहीं बड़ी बहन को सीने से लगा लिया... पिंकी ने प्यार से उसके गालों को सहलाया और उसी के साथ लेट गयी.....
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अगले दिन मैं चुपचाप उठकर घर चली आई.. मुझे पूरा विश्वास था की तरुण अब नहीं आने वाला है.. फिर भी मैं टयूशन के टाइम पर पिंकी के घर जा पहुंची.. पिंकी चारपाई पर बैठी पढ़ रही थी और मीनू अपने सर को चुन्नी से बाँध कर चारपाई पर लेती थी...

"क्या हुआ दीदी? तबीयत खराब है क्या?" मैंने जाते ही मीनू से पूछा...

"इनसे बात मत करो अंजु! दीदी के सर में दर्द है!" पिंकी ने मुझे अपनी चारपाई पर बैठने की जगह देते हुए कहा.. उसका मूड भी खराब लग रहा था..

"हम्म्म्म.. अच्छा!" मैंने कहा और पिंकी के साथ बैठ गयी," आज पढ़ाने आयेगा न तरुण?"

पिंकी ने चौंकते हुए मेरे चेहरे को देखा.. मीनू अचानक बोल पड़ी," क्यूँ? आता ही होगा! आयेगा क्यूँ नहीं.. तुमसे कुछ कहा है क्या उसने?"

"नहीं.. मैं तो यूँही पूछ रही हूँ.." मैं भी जाने कैसा सवाल कर गयी.. जैसे तैसे मैंने अपनी बात को सुधारने की कोशिश करते हुए कहा," आज पढाई का मन नहीं था.. इसीलिए पूछ रही थी..."

"अब भी पढाई नहीं की तो मारे जायेंगे अंजु! 2 दिन तो रह गये हैं.. एग्जाम शुरू होने में.. मुझे तो ऐसे लग रहा है जैसे कुछ भी याद नहीं.. ही ही.." पिंकी ने कहा और फिर कुछ सोच समझ कर बोली," दीदी.. अब मना ही कर देते हैं उसको.. अब तो हमें खुद ही तैयारी करनी है.. क्यूँ अंजु?"

"हम्म्म्म.." मैंने सहमति में सर हिलाया.. मुझे पता तो था ही की अब वो वैसे भी यहाँ आने वाला है नहीं...

"पिंकी!.. जरा चाय बना लाएगी.. मेरे सर में ज्यादा दर्द हो रहा है..." मीनू ने कहा...

"अभी लायी दीदी.." पिंकी ने अपनी किताबें बंद की और उपर भाग गयी...

पिंकी के जाते ही मीनू उठ कर बैठ गयी," एक बात पूंछूं अंजु?"

"आहाँ.. पूछो दीदी!" मैंने अचकते हुए जवाब दिया...

"वो.. देख.. मेरा कुछ गलत मतलब मत निकलना... तुमने तरुण को कभी अकेले में कुछ कहा है क्या?" मीनू ने हिचकते हुए पूछा...

"म म ..मैं समझी नहीं दीदी!" मैंने कहा..

"देख.. मैं तुझसे इस वक्त अपनी छोटी बहन मान कर बात कर रही हूँ.. पर हिचक रही हूँ.. कहीं तुम्हे बुरी न लग जाये.." मीनू ने कहा...

"नहीं नहीं.. बोलो न दीदी!" मैंने प्यार से कहा और उसके चेहरे को देखने लगी...

मीनू ने नजरें एक तरफ कर ली," तू कभी उससे अकेले में.. लिपटी है क्या?"

"ये क्या कह रही हो आप..?" मुझे पता था की वो किस दिन के बारे में बात कर रही है.. मैं मन ही मन कहानी बनाने लगी...

"देख.. मैंने पहले ही कहा था की बुरा मत मान जाना.. मैंने सुना था.. तभी पूछ रही हूँ.. तुझे अगर इस बारे में बात नहीं करनी तो सॉरी.." मीनू अब सीधी मेरी ही आँखों में देख रही थी...

"नहीं दीदी.. दरअसल.. एक दिन.. तरुण ने ही मेरे साथ पढ़ाते हुए ऐसा वैसा करने की कोशिश की थी.. मुझे बहलाकर.. पर मैंने साफ़ मना कर के उसको धमका दिया था.. आपसे किसने कहा...?' मैंने बड़ी सफाई से सब कुछ तरुण के मत्थे मढ़ दिया....

मेरे मुँह से ये सुनते ही मीनू की आँखों से अविरल आँसू बहने लगे.. अपने आँसूओं को पुंछtआई हुई वह बोली," तू बहुत अच्छी है अंजु.. कभी भी उस कुत्ते की बातों में मत आना.. " कहकर मीनू रोने लगी...

"क्या हुआ दीदी? मैंने चौंकने का अभिनय किया और उसके पास जाकर उसके आँसू पुंछने लगी," आप ऐसे क्यूँ रो रही हैं?"

मेरे नाटक को मेरी साहनुभूति जानकर मीनू मुझसे लिपट गयी," वो बहुत ही कमीना है अंजु.. उसने मुझे बर्बाद कर दिया.. ऐसे ही बातों बातों में मुझे बहलाकर..." रोते रोते वह बोली...

"पर हुआ क्या दीदी? बताओ तो?" मैंने प्यार से पूछा....

"देख.. पिंकी को मत बताना की मैंने तुझे कुछ बताया है.." मुझसे ये वायदा लेकर मीनू ने तरुण से प्यार करने की गलती कबूलते हुए चूत पर 'तिल' देखने की उसकी जिद से लेकर कल रात को पिंकी द्वारा की गयी उसकी धुनाई तक सब कुछ जल्दी जल्दी बता दिया..

और फिर बोली," अब आज वो मेरे फोटो सबको दिखाने की धमकी देकर मुझे अकेले में मिलने को कह रहा है.. मैं क्या करूँ..?"

अपनी बात पूरी होते ही मीनू की आँखें फिर छलक आई...

"वो तो बहुत कमीना निकला दीदी.. अच्छा हुआ मैं उसकी बातों में नहीं आई.. पर अब आप क्या करेंगी..?" मैंने पूछा...

"मेरी तो कुछ समझ... लगता है पिंकी आ रही है.. तू अपनी चारपाई पर चली जा!" मीनू ने कहा और रजाई में मुँह ढक कर लेट गयी.... मैं वापस अपनी चारपाई पर आ बैठी.. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था की मीनू ने मुझसे अपने दिल की बात कही.....

आखिरकर वो दिन आ ही गया
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आखिरकर वो दिन आ ही गया जिस'से बचने के लिये मैं हमेशा भगवान की मूर्ति के आगे दिये जलाती रहती थी.. उस दिन से हमारे बोर्ड एग्जाम शुरू थे.. वैसे मैं मन ही मन खुश भी थी.. मेरे लिये कितने दिनों से तड़प रहे मेरी क्लास के लड़कों को मेरे दीदार करने का मौका मिलने वाला था... मैंने स्कूल की ड्रेस ही डाल रखी थी.. बिना ब्रा के !!!

पिंकी सुबह सुबह मेरे पास आ गयी.. एग्जाम का सेंटर 2-3 किलोमीटर की दूरी पर एक दूसरे गाँव में था.. हमें पैदल ही जाना था.. इसीलिए हम टाइम से काफी पहले निकल लिये..... छोटा रास्ता होने के कारण उस रास्ते पर व्हीकल नहीं चलते थे.. रास्ते के दोनों तरफ ऊँची ऊँची झाडियाँ थी.. एक तरफ घने जंगल सा था.. मैं अकेली होती तो शायद दिन में भी मुझे वहाँ से गुजरने में डर लगता...

पर पिंकी मेरे साथ थी.... दूसरे बच्चे भी 2-4; 2-4 के ग्रुप में थोड़ी थोड़ी दूरी पर आगे पीछे चल रहे थे... हम दोनों एग्जाम के बारे में बातें करते हुए चले जा रहे थे...

अचानक पीछे से एक मोटरसाइकिल आई और एकदम धीमी होकर हमारे साथ साथ चलने लगी.. हम दोनों ने एक साथ उनकी और देखा.. तरुण बाइक चला रहा था.. उसके साथ एक और भी लड़का बैठा था.. हमारे गाँव का ही...!

"कैसी हो अंजु?" तरुण ने मुस्कराकर मेरी और देखा....

"ठीक हूँ.. एग्जाम है आज!" मैंने कहा और रुकने की सोची.. पर पिंकी नहीं रुकी.. इसीलिए मजबूरन मैं भी उसके साथ साथ चलती रही....

"आओ.. बैठो! छोड़ देता हूँ सेंटर पर..." तरुण ने इस बार मेरी तरफ आँख मारी और मुस्करा दिया...

मैंने पिंकी की और देखा.. उसका चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था.. उसने और तेज चलना शुरू कर दिया... अगर पिंकी मेरे साथ न होती तो मैं ये मौका कभी न गंवाती," नहीं.. हम चले जायेंगे.." मैंने कहा.. पिंकी कुछ आगे निकल गयी थी...

"अरे आओ न... क्या चले जायेंगे? 2 मिनट में पहुँचा देता हूँ...!" तरुण ने जोर देकर कहा...

"पर.. पर मेरे साथ पिंकी भी है.. चार कैसे बैठेंगे?" मैंने हडबड़ाकर कहा... अंदर से मैं चलने को तैयार हो चुकी थी... पर पिंकी को छोड़कर..... न... अच्छा नहीं लगता न!

"अरे किस फूहड़ गँवार का नाम ले रही है.. तुझे चलना है तो बोल..." तरुण ने जरा ऊँची आवाज में कहा.... मेरे आगे चल रही पिंकी के कदम शायद कुछ कहने को रुके.. पर वो फिर चल पड़ी....

"नहीं.. हम चले जायेंगे..." मैंने आँखों ही आँखों में अपनी मजबूरी उसको बताने की कोशिश की...

"ठीक है... मुझे क्या?" तरुण ने कहा और बाइक की स्पीड थोड़ी तेज करके पिंकी के पास ले गया," ऐ.. तुझे याद है न मैंने क्या कसम खा रखी है..? नाम बदल लूँगा अगर एक महीने के अंदर तुझे... समझ गयी न!" तरुण ने उसकी तरफ गुस्से से देखते हुए कहा,"और तेरी बहन को भी तेरे साथ .. तब सुनाना तू प्रवचन... उसके फोटो दिखाऊँ क्या?"

गुस्से और घबराहट में कम्पकंपायी हुई पिंकी को जब और कुछ नहीं सूझा तो उसने सड़क पर पड़ा एक पत्थर उठा लिया.. तरुण की बाइक अगले ही पल रेत उड़ाती हुई हवा से बातें करने लगी....

पिंकी गुस्से से पत्थर को सड़क पर मारने के बाद खड़ी होकर रोने लगी.. मैंने उसके पास जाते ही अनजान बनकर पूछा..," क्या हुआ पिंकी? क्या बोल रहा था तरुण? तू रो क्यूँ रही है.. हट पागल.. चुप हो जा.. आज वैसे भी इंग्लिश का एग्जाम है.. दिमाग खराब मत कर अपना...."

उसने अपने आँसू पूँछे और मेरे साथ साथ चलने लगी. वो कुछ बोल नहीं रही थी. मैंने भी उसको ज्यादा छेड़ना अच्छा नहीं समझा.....

आअहआ!.. सेंटर पर स्कूल का माहौल देखते ही मेरे अंग फडकने लगे.... माहौल भी ऐसा की सब खुले घूम रहे थे.. न किसी टीचर के डंडे का किसी को डर था.. और न ही सीधे क्लास में जाकर बैठने की मजबूरी... एग्जाम में अभी एक घंटा बाकी था... लड़के और लड़कियां.. 5-5; 7-7 के अलग अलग ग्रुप बना कर ग्राउंड में खड़े बातें कर रहे थे.. जैसे ही मैं पिंकी के साथ स्कूल के ग्राउंड में घुसी.. चार पांच लड़कों की उंगलियाँ मेरी और उठ गयी..

मुझे सुनाई नहीं दिया उन्होंने क्या कह कर मेरी और इशारा किया.. पर मुझे हमेशा से पता था.. स्कूल के लड़कों के लिये में हमेशा ही पेज#3 की सेलीब्रिटी थी.. इतने दिनों तक मेरे जलवों से महरूम रहकर भी वो मुझे भूले नहीं थे.. मेरा दिल बाग बाग हो गया...

"आ.. यहाँ बैठते हैं.." मैंने पिंकी को ग्राउंड में एक जगह घास दिखाते हुए कहा....

"मुझे एक बार दीपाली से मिलना है.. कुछ पूछना है उससे.. एग्जाम के बारे में... तू यहीं बैठ.. मैं आती हूँ.. थोड़ी देर में...!" पिंकी रास्ते की बातों को भूल कर सामान्य लग रही थी...

"तो मैं भी साथ चलती हूँ न...!" मैं कहकर उसके साथ चल पड़ी...
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"नहीं अंजु.. तू यहीं बैठ.. तेरे बहाने मैं कम से कम वापस तो आ जाउंगी!.. वरना सब वहीं बातों में लगा लेंगी... क्या फायदा.. थोड़ी देर पढ़ लेंगे..." पिंकी ने मुझे वहीं बैठ कर उसका इंतज़ार करने को कहा और तेजी से मुझसे दूर चली गयी...

मैं वहीं खड़ी होकर स्कूल में पेपर देने आये चहरों का तिरछी नजरों से जायेजा लेने लगी... सारे लड़के मेरे स्कूल के नहीं थे.. शायद बाकी इस स्कूल के होंगे... पर स्कूल के थे या बाहर के.. मेरे आसपास खड़े सब लड़कों की निगाहें मुझ पर ही थी...

मुझे हमेशा की तरह अपने यौवन और सौंदर्य पर प्यार आ रहा था.. मैं मस्ताई में डूबी हुई इधर उधर टहल रही थी की अचानक मेरे पिछवाड़े पर एक कंकर आकर लगा... मैं हडबड़ा कर पलटी.. और अपना चेहरा उठाकर मेरे पीछे खड़े लड़कों की और घूरा.. 3-4 के ग्रुप में लड़के खड़े थे.. पर एक ग्रुप को छोड़ कर सभी की नजरें मुझ में ही गड़ी हुई थी... मैं जब आईडिया नहीं लगा पाई तो शर्माकर वापस पलटी और घास में बैठ गयी...

बैठते ही मुझे करारा झटका लगा.. मेरी समझ में आ गया की कोई क्यूँ घास में नहीं बैठ रहा था...घास के नीचे गीली धरती थी और बैठते ही मैं शर्म से पानी पानी हो गयी........ "उफ्फ्फ्फ़".. मैं कसमसा कर जैसे ही उठी; मेरे पीछे खड़े लड़कों की सीटियाँ बजने लगी.. मेरे चूतड़ों के उपर से स्कर्ट गीली हो गयी....

उस वक्त मेरा चेहरा देखने लायक था.. लड़कों की हँसी और सीटियों से घबराकर मैंने हडबड़ाहट में क्लिपबोर्ड को अपने चूतड़ों पर चिपकाया और वहाँ से दूर भाग आई.. मेरे गाल शर्म और झिझक से लाल हो गये थे.. समझ में नहीं आ रहा था की बाकी का टाइम कैसे निकालूँ... अचानक मेरी नजर पिंकी पर पड़ी... वो सबसे अलग खड़ी हुई हमारी ही क्लास के एक लड़के से बात कर रही थी.. आनन फानन में मैं भागती हुई उसके पास गयी, "पिंकी!"

दूर से ही मुझ पर नजर पड़ते ही पिंकी का वैसा ही हाल हो गया जैसे मेरा घास में बैठने पर हुआ था..," आ.. हाँ.. अंजु.. मैं तेरे पास आ ही रही थी बस.." कहते ही उसने लड़के को इशारों ही इशारों में जाने क्या कहा.. वो मेरे वहाँ पहुँचने से पहले ही उससे दूर चला गया...

"तू तो कह रही थी की तुझे दीपाली से मिलना है.. फिर यहाँ संदीप के पास क्या कर रही है तू?" मैं अपना पिछवाडा भूल कर उसका पिछवाडा कुरेदने में जुट गयी..

"हाँ.. नहीं.. वो.. दीपाली पढ़ रही थी.. फिर ये भी तो क्लास का सबसे इंटेलिजेंट लड़का है.. मैंने सोचा.. इससे.!" पिंकी ने मेरे ख्याल से बात संभाली ही थी.. मुझे मामला कुछ और ही लग रहा था...

"कहीं कुछ.." मैंने उसको बीच में ही रोक कर शरारत से उसकी और देख कर दांत निकल कर कहा....

"तू पागल है क्या?" उसने कहा और मैं जैसे ही संदीप को देखने के लिये पीछे घूमी वह चौंक पड़ी," ये.. तेरी स्कर्ट को क्या हो गया....?"
मुझे अचानक मेरी हालत का ख्याल आया..," ओह्ह.. मैं घास में बैठ गयी थी पिंकी.. क्या करूँ?" मैं चिंतित होकर बोली....

"ये ले.. मेरी शाल ओढ़ ले... और इसको पीछे ज्यादा लटकाये रखना..." पिंकी ने बड़े प्यार से मुझे अपनी शाल में लपेटा और पीछे से उसको ठीक करते हुए बोली,"अब ठीक है.. पर ध्यान रखना इसका.. उपर नहीं उठनी चाहिए.. बहुत गंदी लग रही है पीछे से..."

मैं कृतज्ञ सी होकर पिंकी को देखने लगी.. कितना स्वाभिमान भरा हुआ था उसके अंदर; अपने लिये भी और दूसरों के लिये भी... पर उस वक्त तक कभी 'उस' तरह के स्वाभिमान को मैंने अपने अंदर कभी महसूस नहीं किया था....

"एक बात पूंछू पिंकी..?" मैंने उसके चेहरे की और देखते हुए कहा...

"हाँ.. बोल न!" पिंकी ने अपने साथ लायी हुई किताब के पन्ने पलटते हुए कहा...

"तू संदीप से क्या बात कर रही थी.. मुझे लग रहा है की तुम्हारा कुछ चक्कर है..." मेरे मन से खुरापात निकल ही नहीं पा रही थी....

"हे भगवान.. तू भी न... ये देख.. ये चक्कर था..." पिंकी ने हल्के से गुस्से से कहा और किताब का एक पेज खोल कर मेरी आँखों के सामने कर दिया..," इस सवाल की हिन्दी लिखवाई है उससे.. थोड़ा मुश्किल है.. याद नहीं हो रहा था.. आजा.. अब पढ़ ले... ज्यादा दिमाग मत चला !"

उस समय उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गयी.. पर वो कहते हैं न.. हरियाली के अंधे को हमेशा हरा ही नजर आता है.. मेरे पेट में उसकी दी हुई सफाई पची नहीं.. भला एक लड़का और एक लड़की सबसे अलग जाकर अकेले बात कर रहे हों.. और उनमे कुछ 'न' हो.. ये कैसे हो सकता है?.. मैं बैठी बैठी यही सोच रही थी...

वैसे भी संदीप बहुत स्मार्ट था.. लंबा कद और गोरे चेहरे पर हल्की मूछ दाडी उस पर बहुत जंचती थी.. लड़कियां उसको देख वैसे ही आहें भरती थी जैसे मुझे देख कर लड़के...

पर सभी का मानना था की वो निहायत ही शरीफ और भला लड़का है.. गाँव भर में ये बात चलती थी की वो कभी सर उठा कर नहीं चलता... स्कूल में देखो या घर में.. हमेशा उसकी आँखें किताबों में ही गड़ी रहती थी.. लड़कियों की तरफ तो वो ध्यान देता ही नहीं था.. शायद इसीलिए लड़कियां उसको दूर से ही देख कर आहें भर लेती थी बस... कभी कोई उसके पास मुझे नजर नहीं आई.. सिर्फ आज, इस तरह पिंकी को छोड़ कर....

पर कहने से क्या होता है.. यूँ तो लोग तरुण को भी बहुत अच्छा लड़का मानते थे.. पर देख लो; क्या निकला! मुझे विश्वास था की पिंकी और संदीप के बीच कोई लफड़ा तो जरूर है...

खैर.. एग्जाम के लिये बेल बजी और हम सीटिंग सीट देख कर अपनी अपनी सीट पर जाकर बैठ गये... मैं एग्जाम को लेकर बहुत सहमी हुई थी.. इंग्लिश का पेपर मेरे लिये टेढ़ी खीर था.. 3-4 पर्चियाँ बनाकर ले गयी थी.. पर भरोसा नहीं था उसमे से कुछ आयेगा या नहीं...
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अचानक संदीप हमारे कमरे में आया और मेरी बराबर वाली सीट पर बैठ गया... मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहा.. 'अगर ये मदद कर दे तो...' मैंने सोचा और उसकी तरफ मुड़कर बोली," कैसी तैयारी है.... संदीप?"

"ठीक है.. तुम्हारी?" उसने शराफत से जवाब देकर पूछा...

"मेरी? ... क्या बताऊँ? आज तो कुछ नहीं आता.. मैं तो पक्का फेल हो जाउंगी आज के पेपर में..." मैंने बुरा सा मुँह बनाकर कहा...

"कुछ नहीं होता.. रीलैक्स होकर पेपर देना... जो सवाल अच्छे आते हों.. उनका जवाब पहले लिखना... एग्जामिनर पर इम्प्रेशन बनेगा...आल द बेस्ट!" उसने कहा और सीधा देखने लगा...

"सिर्फ आल द बेस्ट से काम नहीं चलेगा..." मैं अब उसका यूँ पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थी....

"मतलब?" उसने अर्थपूर्ण निगाहों से मेरी तरफ देखा....

"कुछ हेल्प कर दोगे न.. प्लीज..." मैंने उसकी तरफ प्यार भरी मुस्कान उछलते हुए कहा....

"मुझे अपना पेपर भी तो करना है... बाद में कुछ टाइम बचा तो जरूर..." उसने फोर्मल्टी सी पूरी कर दी....

"प्लीज.. हेल्प कर देना न... !" मैंने बेचारगी से उसकी और देखते हुए याचना सी की..

इससे पहले की वो कोई जवाब देता... कमरे में इन्वीजिटर आ गये.. उनके आते ही क्लास एकदम चुप हो गयी.. संदीप भी सीधा होकर बैठ गया... मैं मन मसोस कर भगवान को याद करने लगी....

पेपर हाथ में आते ही सबके चेहरे खिल गये.. पर मेरे चेहरे पर तो पहले की तरह ही 12 बजे हुए थे... मैं मुश्किल सवालो की नकल लेकर आई थी.. पर पेपर आसान आ गया... मेरे लिये तो इंग्लिश में आसान और मुश्किल; सब एक जैसा ही था...

"अब तो खुश हो जाओ... पेपर बहुत ईजी है.. और लेन्थी भी नहीं..." मेरे कानों में धीरे से संदीप की आवाज सुनाई दी... मैंने कुछ बोलने के लिये उसकी और देखा ही था की वह फिर से बोल पड़ा...

"मेरी तरफ मत देखो.. 'सर' की नजरों में आ जाओगी..."

मैंने अपना सर सीधा कर के झुका लिया," मुझे नहीं आता कुछ भी इसमें से..."

काफी देर तक जब उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने अपनी नजरें तिरछी करके उसको देखा.. वह मस्ती से लिखने में खोया हुआ था.. मैं रोनी शक्ल बनाकर कभी सवाल पेपर को कभी आंसर शीट को देखने लगी....

पेपर शुरू हुए करीब आधा घंटा हो गया था और मैं फ्रंट पेज पर अपनी डिटेल लिखने के अलावा कुछ नहीं कर पाई थी... अचानक पीछे से एक पर्ची आकर मेरे पास गिरी... इसके साथ ही किसी लड़के की हल्की सी आवाज.. "उठा लो.. 10 मार्क्स का है!"

मैंने 'सर' पर एक निगाहें डाली और उनकी नजर से बचाते हुए अचानक पर्ची को उठाकर अपनी कच्छी में ठूस लिया....

मुझे कुछ तसल्ली हुई.. की आखिर मेरा भी कोई 'कदरदान' कमरे में मौजूद है... मैंने पीछे देखा.. पर सभी नीचे देख रहे थे... समझ में नहीं आया की मुझ पर ये 'अहसान' किसने किया है...

कुछ देर मौके का इंतज़ार करने के बाद धीरे से मैंने अपनी स्कर्ट के नीचे अपनी कच्छी में हाथ डाला और पर्ची निकल कर आंसर शीट में दबा ली...

पर्ची को खोल कर पढ़ते ही मेरा माथा ठनक गया... मैंने कुछ दिन पहले स्कूल में मिले लैटर का जिकर किया था न! कुछ इसी तरह की अश्लील बातें उसमे लिखी हुई थी.... मैंने हताश होकर पर्ची को पलट कर देखा... शुक्र था एक ऐस्स्से टाइप सवाल का आंसर था वहाँ...

ज्यादा ध्यान न देकर मैंने फटाफट उसकी नकल उतारनी शुरू कर दी..

पर उस दिन मेरा लक कुछ ज्यादा ही खराब था..........वों वों शायद
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पर उस दिन मेरा लक कुछ ज्यादा ही खराब था..........वों वों शायद बाहर बरामदे की खिड़की में से किसी ने मुझे ऐसा करते देख लिया था... मैंने अभी आधा सवाल भी नहीं किया था की अचानक बाहर से एक 'सर' आये और मेरी आंसर शीट को उठाकर झटक दिया.. पर्ची नीचे आ गिरी...

"ये क्या है?" उन्होंने गुस्से से पूछा... करीब 35-40 साल के आसपास की उमर होगी उनकी...

"ज जई ..जी.. पीछे से आई थी..!" मैं सहम गयी...

"क्या मतलब है पीछे से आई थी...? अभी तुम्हारी शीट से निकली है या नहीं..." उनका लहजा बहुत ही सख्त था..

मैं अंदर तक काँप गयी..," जी.. पर ........!" मैंने नजरें झुका ली....

"शर्म नहीं आती तुम लोगों को... सारा साल आखिर करते क्या हो?" उस 'सर' ने मुझे घूर कर देखा और पर्ची उठाकर हाथ में ले ली.. थोड़ी देर मुझे यूँ ही उपर से नीचे देखते रहने के बाद उन्होंने मेरी शीट इन्वीजिटर को पकड़ा दी," शीट वापस नहीं करनी है.. मैं थोड़ी देर में आकर इसका u.m.c. बनाऊंगा" उन्होंने कहा और पर्ची हाथ में लेकर निकल गये...

मैं बैठी बैठी सुबकने लगी.. अचानक संदीप ने कहा," रीकुएस्ट कर लो.. नहीं तो पूरा साल खराब हो जायेगा...!"

उसके कहने पर मैं उठकर 'सर' के पास जाकर खड़ी हो गयी," सर.. प्लीज.. सीट दे दो... अब नहीं करूँगी..."

"इसमें मैं क्या कर सकता हूँ भला? .. बोर्ड के ओब्जर्वोर ने तुम्हारी शीट छिनी है.. मैंने तो तुम्हे पर्ची उठाते देख कर भी इग्नोर कर दिया था.... पर अब तो जैसा वो कहेंगे वैसा ही करना पड़ेगा... उनसे रीकुएस्ट करके देख लो.. ऑफिस में प्रिंसिपल मैडम के पास बैठे होंगे..." सर ने अपनी मजबूरी जता दी...

"जी ठीक है.." मैं कहकर बाहर निकाली और ऑफिस के सामने पहुँच गयी... 'वो' वहीं बैठे प्रिंसिपल मैडम के साथ खिलखिला रहे थे..

मुझे देखते ही उन्होंने अपना थोबड़ा चढ़ा लिया," हाँ.. अब क्या है?"

"जी.. मेरा साल बर्बाद हो जायेगा..." मैंने सहमे हुए स्वर में कहा....

"साल? तुम्हारे तीन साल खराब होंगे.. मैं तुम्हारा u.m.c. बनाने जा रहा हूँ.. सारा साल पढ़ी क्यूँ नहीं...?" उसकी आवाज उसके शरीर की तरह ही बहुत भारी और रुखी सी थी....

"सर प्लीज! कुछ भी कर लो.. पर सीट दे दो" मैंने याचना की...

वह कुछ देर तक मेरी और देखता रहा.. मुझे उसकी नजरें सीधी मेरी छातीयों में गड़ी महसूस हो रही थी.. पर मैंने परवाह न की... मैं यूँही बेचारी नजरों से उसके सामने खड़ी रह कर उसको नजरों से अपनी जवानी का जाम पीते देखती रही..

वह कुछ नर्म पड़ा... प्रिंसिपल की और देख कर बोला," क्या करें मैडम?"

प्रिंसिपल खिलखिला कर बोली," ये तो आपको ही देखना है माथुर साहब.. वैसे.. लड़की का बदन भरा हुआ है... मेरा मतलब पूरी जवान लग रही है.." उसने पैनी नजरों से मुझे देखते हुए कहा और उसकी तरफ बत्तीसी निकाल दी...," घर वाले भी लड़का बड़का देख लेंगे अगर पास हो गयी तो..."

"ठीक है... पियोन भेज कर सीट दिलवा दो.. मैं सोचता हूँ तब तक!" उसने मेरी जवानियों को एकटक घूरते हुए कहा...

मुझे थोड़ी शांति मिली... अपनी आंसर शीट लेकर में अपनी सीट पर जा बैठी... पर अब करने को तो कुछ था नहीं.. बैठी बैठी जितना लिखा था.. उसको पढ़ने लगी...

मुश्किल से 5 मिनट भी नहीं हुए होंगे.. क्लास में पियोन आकर बोला," उस लड़की को प्रिंसिपल मैडम बुला रही हैं.. जिसको अभी शीट मिली थी...."

मैं एक बार फिर मायूस सी होकर उठी और आंसर शीट वहीं छोड़ कर ऑफिस के बाहर चली आयी.. पर मुझे न तो मैडम ही दिखाई दी और न ही 'सर'

"कहाँ हैं मैडम?" मैंने पियोन से पूछा...

"अंदर चली जाओ.. पीछे बैठे होंगे..." पियोन ने कहा....

मैंने अंदर जाकर देखा.. दोनों ऑफिस में पीछे सोफे पर साथ साथ बैठे कुछ पढ़ रहे थे... मेरे अंदर जाते ही मैडम ने मुझे घूर कर देखा," आ जा.. पहले तो तू मेरे पास आ...!"

"जी..", मैं मैडम के पास जाकर नजरें झुका कर खड़ी हो गयी...

"ये क्या है?" मैडम ने एक पर्ची मुझे दिखा कर टेबल पर पटक दी....

मैंने देखा.. वो वही पर्ची थी जो सर मुझसे छिन कर लाये थे... उन्होंने टेबल पर मेरे सामने उस 'लव लैटर' को उपर करके रखा हुआ था....," जी.. मुझे नहीं पता कुछ भी..." मैंने शर्मिंदा सी होकर जवाब दिया...

"अच्छा.. तुझे अब कुछ भी नहीं पता.. U.m.c. बना दूँगा तब तो पता चल जायेगा न...?" सर ने गुस्से से कहा....

"जी.. ये मेरे पास पीछे से आकर गिरी थी.. मुझे नहीं पता किसने..." मैंने धीमे स्वर में हडबड़ा कर कहा.....

"क्या नाम है तेरा?" मैडम ने पूछा...

"जी.. अंजलि!" मैं सहमी हुई थी...

"ये देख.. तेरा ही नाम लिखा है न उपर!.. और तू कह रही है की तुझे कुछ नहीं पता... ऐसे कितने यार बना लिये हैं तूने अब से पहले...!" मैडम ने तैश में आकर कहा...

मुझसे कुछ बोला ही नहीं गया... मैं चुपचाप सर झुकाये खड़ी रही...

"मैं न कहता था मैडम.. आजकल लड़कियां उमर से पहले ही जवान हो जाती हैं... अब देख लो.. एक आपके सामने खड़ी है..!" सर ने मुझ पर व्यंग सा करते हुए कहा.. वह मेरी मजबूरी पर चटखारे ले रहा था....

"हम्म्म्म.. और बेशर्मी की भी हद होती है.. जवान हो गयी तो क्या? हमारे टाइम में तो ऐसी गंदी बातों का पता ही नहीं होता था इस उमर में.. और इसको देख लो.. कैसे कैसे गंदे लैटर आते हैं इसके पास... कौन है तेरा यार.. बता?"

"जी.. मुझे सच में कुछ नहीं पता.. भगवान की कसम.." मैंने आँखों में आँसू लाते हुए कहा...

"अब छोडो मैडम.. जो करेगी वो भरेगी.. हमारा क्या लेगी...? इसकी शीट मंगवा लो.. मैं u.m.c. बना देता हूँ.. तीन साल के लिये बैठी रहेगी घर.. और ये लैटर भी तो अखबार में देने लायक है...." सर ने कहा...
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"सर प्लीज.. ऐसा मत कीजिये..!" मैंने नजरें उठाकर सर को देखा....मेरी आँखें डबडबा गयी.. पर वो अभी भी मेरी कमीज में बिना ब्रा के ही तनी हुई मेरी छातीयों को घूर रहे था...

"तो कैसे करूँ..? तुम ही सलाह दे दो..." उसने मुझे देख कर कहा और फिर मैडम की तरफ बत्तीसी निकल कर हँस दिया...

"देख लीजीये सर.. अब इसकी जिंदगी और इज्जत आपके ही हाथ में है...!" मैडम भी कुछ अजीब से तरीके से उनकी और मुस्कराई..

"पूछ तो रहा हूँ.. क्या करूँ ? ये कुछ बोलती ही नहीं...." मुझे उसकी वासना से भारी आँखें लगातार मेरे बदन में ही गड़ी प्रतीत हो रही थी...

"सर.. प्लीज.. मुझे माफ़ कर दो.. आईन्दा नहीं करूँगी..." मैंने अपनी आवाज को धीमा ही रखा....

"इसकी तलाशी तो ले लो एक बार.. क्या पता कुछ और भी छुपा रखा हो...!" सर ने मैडम से कहा....

तलाशी की बात सुनते ही मेरे होश उड़ गये.. जो पर्चियाँ मैं घर से बना कर लायी थी.. वो अभी भी मेरी कच्छी में ही फंसी हुई थी.. मुझे अब जाकर याद आया....

"न जी न.. मैं क्यूँ लूं.. ? ये आपकी ड्यूटी है.. जो करना हो करीये... मुझे कोई मतलब नहीं...!" मैडम ने हँसते हुए जवाब दिया..

"मैं.. मैं मर्द भला इसकी तलाशी कैसे ले सकता हूँ मैडम... वैसे भी ये पूरी जवान लड़की है! मुझे तो ये हाथ भी नहीं लगाने देगी..." बोलते हुए उसकी आँखें कभी मुझे और कभी मैडम को देख रही थी....

"ऐसी वैसी लड़की नहीं है ये.. हजार आशिक तो जेब में रख कर चलती होगी... इसको कोई फर्क नहीं पड़ेगा आपके हाथों से... और मना करती है तो आपको क्या पड़ी है.. बना दीजीये U.M.C. सबूत तो आपके सामने रखा ही है... पर मैं तलाशी नहीं लूंगी सर!" मैडम ने आश्चर्यजनक रूप से साफ़ मना कर दिया...

"मैं सेंटर को देख आती हूँ सर.. तब तक आप..." मैडम मुस्कराकर कहते हुए अपनी बात को बीच में ही छोड़ कर उठी और बाहर चली गयी....

उनकी बातों से मुझे अहसास होने लगा था की सर की नजर मेरी जवानी पर है.. और मैडम की सहमति भी इसके साथ है...

"अब अगर तुम वापस पेपर में बैठना चाहती हो तो तलाशी तो लेनी ही पड़ेगी.. समझ रही हो न!" सर ने मेरी आँखों में देख कर कहा...

मेरा टाइम निकला जा रहा था और उन्हें मस्ती सूझ रही थी... मैं कुछ न बोली.. सिर्फ सर झुका लिया अपना....

"बोलो.. जवाब दो..! या मैं U.M.C. बना दूँ...? सर ने कहा....

"जी.. मेरे पास 2 और हैं.. मैं निकल कर आ जाती हूँ अभी..." मैंने कसमसा कर कहा....

"निकालो.. जो कुछ है एक मिनट में निकल दो.. यहीं!" सर ने कहा....

मैं एक पल को हिचकिचाई.. फिर कुछ सोच कर तिरछी हुई और उपर से अपनी स्कर्ट में हाथ डाल लिया... उसकी आँखें मेरे हाथ के साथ ही जैसे स्कर्ट में घुस गयी हों.. मैंने और अंदर हाथ ले जाकर पर्चियाँ निकाली और उसको पकड़ा दी...

"हम्म्म्म... क्या जगह चुनी है.. पर्चियाँ छिपाने के लिये... सब लड़कियां यहीं छिपाती हैं... मैं खुद भी तलाशी लेता तो सबसे पहले यहीं चेक करता..." उसने अपनी नाक के पास ले जाकर पर्चियों को सूंघा.. शर्म के मारे मेरा बुरा हाल हो गया... कुछ देर बाद वह फिर मुझे घूरने लगा," और निकालो..."

"जी.. और नहीं है.. एक भी...!" मैंने जवाब दिया....

"तुम कुछ भी कहोगी और मैं विश्वास कर लूँगा... मुझे पागल समझ रखा है क्या?" उसने बनावटी से गुस्से से मुझे घूरा....

"पर सर.. आधा टाइम पहले ही निकल चूका है पेपर का...!" मैंने डरते डरते कहा....

"आज के पेपर को तो भूल ही जाओ... सिर्फ ये दुआ करो की तुम्हारे तीन साल बच जाये.. समझी..." उसने गुर्राकर कहा...

"सर प्लीज..." मैंने सहम कर उसकी आँखों में देखा... वह एकटक मुझे ही घूरे जा रहा था...

"तुम कुछ समझ रही हो या नहीं.. U.M.C. से बचना चाहती हो तो बाकी पर्चियाँ भी निकल दो.... तुम्हारी मरजी है.. कहो तो U.M.C. बना दूँ..." सर ने इस बार एक एक शब्द को जैसे चबा कर कहा....

"जी.. सर.. प्लीज."

"क्या प्लीज प्लीज लगा रखा है.. मैंने तो अब तुम पर ही छोड़ दिया है.... तुमही बोलो क्या करूँ..?"

"जी.. चाहे आप तलाशी ले लो... पर प्लीज.. केस मत बनाना.." मैंने याचना सी करते हुए कहा...

"सोच लो.. तुम एक जवान लड़की हो.. मैं तलाशी लूँगा तो पता नहीं तुम्हारे बदन पर कहाँ कहाँ हाथ मारना पड़ेगा... कहीं तुम्हे बाद में दिक्कत हो...." सर ने कहते हुए मेरी छातीयों को घूरते हुए अपने होंठों पर जीभ फेरi...

मैं कुछ देर सर झुकाये खड़ी रही.. फिर कुछ सोच कर बोली," ले लीजीये तलाशी सर.. पर फिर आप मुझे छोड़ देंगे न?"

"इधर आ जाओ मेरे पास..." सर ने मुझे दूसरी और बुलाया.....

मैं सर के पास जाकर चुपचाप खड़ी हो गयी.. मेरा चेहरा ये सोच कर ही लाल हो गया था की अब मेरी तलाशी होगी...मेरे बदन की तलाशी....
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मैं सर के पास जाकर चुपचाप खड़ी हो गयी.. मेरा चेहरा ये सोच कर ही लाल हो गया था की अब मेरी तलाशी होगी...मेरे बदन की तलाशी....

वह कुछ देर मुझे यूँ उपर से नीचे तक यूँ घूरता रहा मानों कच्चा ही चबा जाने के मूड में हो...

थोड़ा हिचकने के बाद उसने मेरी कमर पर हाथ रख दिया," अब भी सोच लो.. मैं तलाशी लूँगा तो अच्छे से लूँगा.. फिर ये मत कहना की यहाँ हाथ मत लगाओ.. वहाँ हाथ मत लगाओ.. तुम्हारे पास अब भी मौका है.. बीच में अगर टोका तो मैं तुरंत u.m.c. बना दूँगा...."

"जी.. मैं कुछ नहीं बोलूँगी... आप ले लो तलाशी" मैं अब थोड़ा खुल कर बोलने लगी थी...

बिना कुछ बोले ही वह अपना हाथ नीचे सरकाता हुआ लाया और मेरे चूतड़ों की दरार में स्कर्ट के उपर से ही कुछ टटोलता हुआ सा बोला...," एक बात तो है..." उसने बात अधूरी छोड़ दी....

मेरे पूरे बदन में झुरझुरी सी उठने लगी.. अब मुझे पूरा यकीन हो चला था की तलाशी तो सिर्फ एक बहाना है.. मेरे बदन से खेलने के लिये...

"मेरी तरफ मुँह करके खड़ी हो जाओ.." उसने कहा और मैं उसकी तरफ घूम गयी... मेरी पकी हुई सी गोल गोल मस्त छातीयों अब कुर्सी पर बैठे हुए सर की आँखों से कुछ ही उपर थी.. और उसके हाथों की पहुँच में थी....

"एक बात सच सच बताओगी तो मैं तुम्हे माफ़ कर दूँगा..!" सर ने मेरी शर्ट को स्कर्ट में से बाहर निकालते हुए कहा....

"जी..." मैंने कसमसा कर अपनी आँखें बंद कर ली...

"तुम्हे पता है न की ये लैटर वाली पर्ची किसने दी है तुम्हे?" उसने मेरी कमीज के अंदर हाथ डाला और मेरे चिकने पेट पर स्कर्ट की बैल्ट के साथ साथ हाथ फेरने लगा..

मैं सिहर उठी.. उसके खुरदरे मोटे हाथ का स्पर्श मुझे अपने पेट पर बहुत कामुक अहसास दे रहा था... मैंने आह सी भरकर जवाब दिया," नईइइ सर.. भगवान की कसम..."

"चलो कोई बात नहीं.. जवानी में ये सब तो होता ही है.. इस उमर में मजे नहीं लिये तो कब लोगी..? ठीक कह रहा हूँ न...?" उसने बोलते बोलते दूसरा हाथ मेरी स्कर्ट के नीचे से ले जाकर मेरे घुटनों से थोड़ा उपर मेरी झांघ को कसकर पकड़ लिया....

"जी...!" मैं करहाते हुए सी बोली.. वह मेरी बदहवास हो रही हालत को ताड़ गया....

"तुम्हे कोई दिक्कत न हो.. इसीलिए तो धीरे धीरे कर रहा हूँ.... शर्म आ रही है क्या?" सर का हाथ मेरी जाँघों पर उपर नीचे लहराने लगा..

मैंने अपनी आँखें खोल कर उसकी आँखों में एक पल के लिये देखा और फिर आँखें बंद कर ली.. बिना कोई जवाब दिये...

"कोई दिक्कत तो नहीं है न...?" सर ने अपना हाथ स्कर्ट के नीचे कच्छी के उपर से चूतड़ों तक चढ़ाते हुए पूछा...

"आआअहह ह .." मेरे मुँह से एकदम तेज सांस निकली.. उत्तेजना के मारे मेरा बदन अकड़ने सा लगा था....

"मजा आ रहा है न?" उसने चूतड़ पर अपनी हथेली की पकड़ मजबूत करते हुए पूछा...

".आआअहहह" जवाब मेरी धोकुनी की तरह चल रही साँसों ने दिया.. मेरी टांगें कांपने सी लगी थी.... यूँ लग रहा था जैसे ज्यादा देर खड़ी नहीं रह पाऊँगी.... मैंने कसमसाकर मेरे पेट पर धीरे धीरे उपर आ रहा उसका हाथ अपने हाथों में पकड़ लिया..

"अच्छा लग रहा है न.?" उसने दूसरे चूतड़ पर हाथ फेरते हुए पूछा...

मैंने सहमति में सर हिलाया और थोड़ी आगे होकर उसके और पास आ गयी... मुझे बहुत मजा आ रहा था.. सिर्फ पेपर की चिंता थी....

अगले ही पल वो अपनी औकात पर आ ही गया.. मेरे चूतड़ को अपनी हथेली में दबोचे दूसरे हाथ को वो मेरी छातीयों पर ले आया.. मेरी मस्त गोलाकार छातीयों को छूने भर से ही वह पागल सा हो उठा..," क्या चीज हो तुम!.. तुम्हारे जैसी लड़की तो मैंने आज तक देखी भी नहीं... तुम चिंता मत करो.. तुम्हारा हर पेपर अब अच्छा होगा... मैं गारंटी देता हूँ... बस. तुम थोड़ा सा मुझे खुश कर दो.. मैं तुम्हारी ऐश कर दूँगा यहाँ.."

"पर.. आज का पेपर सर...?" मैंने कसमसाते हुए कहा....

"ओहहो..मैं कह तो रहा हूँ.. तुम्हे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं अब... आज तुम्हे पेपर के बाद एक घंटा दे दूँगा... और किसी अच्छे बच्चे का पेपर भी तुम्हारे सामने रखवा दूँगा... बस.. अब तुम पेपर की बात भूल जाओ थोड़ी देर...." उसने कहा और मेरी कच्छी के अंदर हथेली डाल कर मेरी दरार को उँगलियों से कुरेदने लगा...

मैं मन को मिलती शांति और तन को मिली इस गुदगुदी से मचल सी उठी.. एक बार मैंने अपनी एड़ियाँ उठाई और और आगे हो गयी.. अब उसके चेहरे और मेरी छातीयों के बीच 2 इंच का ही फासला रहा होगा....," आआह.. थैंक्स सर..!"

"हाय.. कितनी गरम गरम है तू.. मेरी किस्मत में तेरे जैसी चिकनी लौंडिया होगी.... मैंने तो कभी सपने में भी सोचा नहीं था... मुझे तेरी 'ये' लव लैटर वाली पर्ची हाथ नहीं लगी होती तो मैं सपने में भी नहीं सोच पाता की तू साली इतनी मस्त होगी अंदर से भी... मजा आ रहा है न..?" मेरे उरोजों को मसलते हुए और चिकनी चूत पर हाथ फेरते हुए उसकी भी सांसें सी उखाड़ने लगी थी...

"जी.. आप जी भर कर लो... मुझे बहुत मजा आ रहा है...!" मैंने भी सिसकी सी लेकर कहा और अपनी जांघें खोल दी...

मेरे लाइन देते ही उसने झट से मेरी शर्ट के उपर के दो बटन खोल दिये...

मेरी मस्तायी हुई गोरी छातियाँ टपक से उपर से छलक सी आई.... मेरी गदराई हुई छातियाँ नजरों के सामने आते ही वह मचल उठा," वह.. क्या चीज बनाई है तू राम ने... तेरी चूचियाँ तो बड़ी मस्त हैं.. सेब के जैसी... दिल कर रहा है खा जाऊं इन्हें..."
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मेरी कमीज में घुसे हुए उसके हाथ से उसने एक छाती को और उपर खिसका दिया.. और छाती पर जड़े मोटी जैसे गुलाबी दाने को कमीज से बाहर निकल लिया.... वह पागल सा हो गया," वह.. इसको कहते हैं चुचक.. कितना प्यारा और रसीला है.." आगे वह कुछ न बोला.. अपने होंठों में उसने मेरे दाने को दबा लिया था और किसी बच्चे की तरह उसको चूसने लगा...वह मेरे उरोज के दाने को जीभ से छेडने लगा.. मेरी छातीयों के दाने भी अकड़ से गये थे....

मैं अपनी प्रशंसा सुनकर बाग बाग हो गयी.. थोड़ा इतराते हुए मैंने आँखें खोल कर उसको देखा और मुस्करा कर सिसक उठी...

उसने अपना हाथ मेरे चूतड़ों से हटाया और मेरी कच्छी को थोड़ा नीचे सरका दिया.. गरम हो चुकी मेरी चूत ठंडी हवा लगते ही ठिठुर सी उठी.. अगले ही पल वो अपनी एक उंगली को मेरी चूत की फांकों के बीच ले गया और उपर नीचे करते हुए उसका छेड ढूंढने लगा... मैं दहक उठी.. मेरी चूत ने रस बहाना शुरू कर दिया... उतावलेपन और उत्तेजना में मैंने 'सर' का सर पकड़ लिया और गरम गरम सांसें छोड़ने लगी....

इसी दौरान उसकी उंगली मेरी चूत में उतर गयी.. मैं उछल सी पड़ी.. पर चूत ने उसको जल्दी ही अपने अंदर एडजस्ट कर लिया...

"बहुत टाईट है तेरी 'ये' तो.. पहले कभी किया नहीं.. लगता है..!" मेरे दाने को एक पल के लिये छोड़ कर वह बोला....

मैं घिघिया उठी... बुरा हाल हो रहा था... उसने अपनी उंगली बाहर निकाली और फिर से अंदर सरका दी... इतना मजा आ रहा था की बयान नहीं कर सकती... मेरे होश उड़े जा रहे थे.. मैं सब कुछ भूल चुकी थी... ये भी की मैं यहाँ पेपर देने आई हूँ...

उसकी उंगली अब सटासट अंदर बाहर होने लगी.. मैंने अपनी जाँघों को और खोल दिया और जमकर सिसकियाँ लेते हुए आँखें बंद किये आनंद में डूबी रही... वह भी पागलों की भांति उंगली से रेलम पेल करता हुआ लगातार मेरे दाने को चूसता रहा.. जैसे ही इस बार मेरी चूत का रस निकला.. मैंने अपनी जांघें जोर से भींच ली," बस.. सर.. और नहीं.. अब सहन नहीं होता मुझसे..."

उसने तुरंत अपनी उंगली बाहर निकाली और मेरी छातीयों से हटता हुआ बोला," ठीक है.. जल्दी नीचे बैठ जाओ..."

मैं पूरी तरह उसका मतलब नहीं समझी पर.. जैसे ही उसने कहा.. मैंने अपनी कच्छी ठीक करके शर्ट के बटन बंद किये और नीचे बैठ कर उसकी आँखों में देखने लगी....

उसने झट से अपनी पेंट की जिप खोल कर अपना लंड मेरी आँखों के सामने निकल दिया..," लो! इसको पकड़ कर आगे पीछे करो..!"

हाथ में लेने पर उसका लंड मुझे तरुण जितना ही लंबा और मोटा लगा... मैंने खुशी खुशी उसको हिलाना शुरू कर दिया...

"जब मैं कहूँ.. आअह.. अपना मुँह.... खोल देना..." उसने अपना हाथ उसके लंड को हिला रहे मेरे हाथ पर रख दिया और सिसकते हुए कहा...

मुझे मम्मी और सुन्दर वाला सीन याद आ गया," मुझे पीना है क्या सर?"

"अरे वह.. आअह.. तू तो बड़ी समझ..दार.. है... आअह.. हाँ.. जल्दी जल्दी कर..." उसकी सांसें उखड़ी हुई थी..

करीब 2 मिनट के बाद ही वह कुर्सी से सरक कर आगे की और झुक गया..," हाँ... आआअह.. ले.. मुँह खोल..."

मैंने अपना मुँह पूरा खोल कर उसके लंड के सामने कर दिया... उसने झट से अपने लंड का सुपाडा मेरे मुँह में फंसाया और मेरा सर पकड़ लिया..," आआअह... आआह.. आआह" और रस की पिचकारी सी मुँह में छोड़ने लगा

सुन्दर के मुकाबले रस ज्यादा नहीं निकला था.. पर जितना भी था.. मैंने उसकी एक एक बूँद को अपने गले से नीचे उतार लिया... जब तक उसने अपना लंड बाहर नहीं निकाला.. मेरे गुलाबी रसीले होंठ उसके सुपाड़े को अपनी गिरफ्त में जकड़े रहे... रस का स्वाद मुझे अच्छा नहीं लगा.. पर एग्जाम में मेरी होने वाली मौज को देखते हुए ये कीमत मुझे ज्यादा नहीं लगी....

कुछ देर यूँही झटके खाने के बाद उसका लंड अपने आप ही मेरे होंठों से बाहर निकल आया... उसको अंदर करके उसने अपनी जिप बंद की और अपना मोबाइल निकल कर फोन मिलाया और बोला," आ जाओ मैडम!"

"मैडम बता रही थी तू इस गाँव की नहीं है !" उसने प्यार से मेरे गाल सहलाते हुए पूछा...

"जी नहीं.." मैंने मुस्कराकर जवाब दिया.....

"कौन आया है तेरे साथ?"

"जी कोई नहीं.. अपनी सहेली के साथ आई हूँ...!" मैंने जवाब दिया...

"वेरी गुड.. ऐसा करना.. पेपर के बाद यहीं रहकर सारा पेपर कर लेना.. तुझे तो मैं 2 घंटे भी दे दूँगा.. तू तो बड़े काम की चीज है यार... अपनी सहेली को जाने के लिये बोल देना.. तुझे मैं अपने आप छोड़ आया करूँगा रोज.. ठीक है न...?"

"जी.." मैंने सहमति में सर हिलाया...

तभी मैडम दरवाजा खोल कर अंदर आ गयी," तलाशी दी या नहीं.." उसने अजीब से ढंग से सर को देखा और मुस्कराने लगी...

"ये तो कमाल की लड़की है... बहुत प्यारी है.. ये तो सब कुछ दे देगी.. तुम देखना..." सर ने मैडम की और आँख मारी और फिर मेरी तरफ देख कर बोले..," जा! कर ले आराम से पेपर.. और पेपर टाइम के बाद सीधे यहीं आ जाना.. मैं निकल कर दे दूँगा तुझे वापस.. आराम से सारा पेपर करना... और ये ले.. तेरी पर्ची... इसमें से लिख लेना तब तक.. मैं तुम्हारी क्लास में कहलवा देता हूँ.. तुझे कोई नहीं रोकेगा अब नकल करने से..." कहकर उसने मेरे गाल थपथपा दिये....

मैं खुश होकर बाहर निकाली तो पियोन मुझे अजीब सी नजरों से घूर रहा था.. पर मैंने परवाह नहीं की और अपने रूम में आ गयी...

"क्या हुआ?" क्लास में टीचर ने पूछा...

"कुछ नहीं सर.. मान गये वो..." मैंने कहा और अपनी सीट पर बैठ गयी.. अब आधा घंटा ही बचा था एग्जाम खत्म होने में... मैंने जैसे ही अपनी शीट खोली.. मैं चौंक गयी...
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