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कामांजलि
10-02-2010, 12:09 PM
Post: #21
RE: कामांजलि
धरमपाल चाचा के घर जाकर मैंने आवाज लगायी,"पिंकी!"

तभी नीचे बैठक का दरवाजा खुला और पिंकी बाहर निकाली," आ गयी अंजु! आ जाओ.. हम भैया का इंतजार कर रहे हैं..." उसने प्यार से मेरी बाँह पकड़ी और अंदर ले गयी..

मैं मीनू की तरफ देख कर मुस्कराई.. वो रजाई में दुबकी बैठी कुछ पढ़ रही थी...

"तुम भी आज से यहीं पढ़ोगी न अंजु? पापा बता रहे थे...!" मीनू ने एक नजर मुझको देखा और मुस्करा दी....

"हाँ... दीदी!" मैंने कहा और पिंकी के साथ चारपाई पर बैठ गयी..," यहीं पढ़ाते हैं क्या वो!"

जवाब पिंकी ने दिया," हाँ.. उपर t.v. चलता रहता है न... वहाँ शोर होता है...इसीलिए यहीं पढ़ते हैं हम! तुम स्कूल क्यूँ नहीं आती अब.. सब टीचर्स पूछते रहते हैं.. बहुत याद करते हैं तुम्हे सब!"

हाय! क्या याद दिला दिया पिंकी ने! मैं भी तो उन दिनों को याद कर कर के तडपती रहती थी.. टीचर्स तो याद करते ही होंगे! खैर.. प्रत्यक्ष में मैं इतना ही बोली," पापा कहते हैं की एग्जामस का टाइम आ रहा है... इसीलिए घर रहकर ही पढाई कर लूं...

"सही कह रही हो.. मैं भी पापा से बात करूँगी.. स्कूल में अब पढाई तो होती नहीं..." पिंकी ने कहा....

"कब तक पढ़ाते हैं वो.." मैंने पूछा....

"कौन भैया? वो तो देर रात तक पढ़ाते रहते हैं.. पहले मुझे पढ़ाते हैं.. और जब मुझे लटके आने शुरू हो जाते हैं ही ही ही...तो दीदी को... कई बार तो वो यहीं सो जाते हैं...!" पिंकी ने विस्तार से जानकारी दी....

मीनू ने हमें टोक दिया," यार.. प्लीज! अगर बात करनी है तो बाहर जाकर कर लो.. मैं डिस्टर्ब हो रही हूँ..."

पिंकी झट से खड़ी हो गयी और मीनू की और जीभ दिखा कर बोली," चल अंजु.. जब तक भैया नहीं आ जाते.. हम बाहर बैठते हैं...!"

हम बाहर निकाले भी नहीं थे की तरुण आ पहुँचा... पिंकी तरुण को देखते ही खुश हो गयी," नमस्ते भैया..!"

सिर्फ पिंकी ने ही नमस्ते किये थे.. मीनू ने नहीं.. वो तो चारपाई से उठी तक नहीं... मैं भी कुछ न बोली.. अपना सर झुकाये खड़ी रही....

तरुण ने मुझे नीचे से उपर तक गौर से देखा.. मुझे नहीं पता उसके मन में क्या आया होगा.. पर उस दिन में उपर से नीचे तक कपड़ों से लद कर गयी थी.. सिर्फ उसको खुश करने के लिये... उसने स्कर्ट पहनने से मना जो किया था मुझे..

"आओ बैठो!" उसने सामने वाली चारपाई पर बैठ कर वहाँ रखा कमबल ओढ़ लिया.. और हमें सामने बैठने का इशारा किया...

पिंकी और मैं उसके सामने बैठ गये.. और वो हमें पढ़ाने लगे.. पढ़ाते हुए वो जब भी कापी में लिखने लगता तो मैं उसका चेहरा देखने लगती.. जैसे ही वह उपर देखता तो मैं कापी में नजरें गड़ा लेती... सच में बहुत क्यूट था वो.. बहुत स्मार्ट था!

उसको हमें पढ़ाते करीब तीन घंटे हो गये थे.. जैसा की पिंकी ने बताया था.. उसको 10:00 बजते ही नींद आने लगी थी," बस भैया.. मैं कल सारा याद कर लूंगी.. अब नींद आने लगी है...."

"तेरा तो रोज का यही ड्रामा है... अभी तो 10:30 भी नहीं हुए..." तरुण ने बड़े प्यार से कहा और उसके गाल पकड़ कर खींच लिये... मैं अंदर तक जल भुन गयी.. मेरे साथ क्यूँ नहीं किया ऐसा.. जबकी मैं तो अपना सब कुछ 'खिंचवाने' को तैयार बैठी थी... खैर.. मैं सब्र का घूँट पीकर रह गयी.....

"मैं क्या करूँ भैया? मुझे नींद आ ही जाती है.. आप थोड़ा पहले आ जाया करो न!" पिंकी ने हँसते हुए कहा.. ताज्जुब की बात थी उसको मर्द के होंठ अपने गालों पर लगने से जरा सा भी फर्क नहीं पड़ा.. उसकी जगह मैं होती तो... काश! मैं उसकी जगह होती....

"ठीक है.. कल अच्छे से तैयार होकर आना.. मैं टेस्ट लूँगा.." कहते हुए उसने मेरी तरफ देखा," तुम क्यूँ मुँह फुलाए बैठी हो.. तुम्हे भी नींद आ रही है क्या?"

मैंने उसकी आँखों में आँखें डाली और कुछ देर सोचने के बाद उत्तर दिया.. इशारे से अपना सर 'न' में हीलाकर... मुझे नींद भला कैसे आती.. जब इतना स्मार्ट लड़का मेरे सामने बैठा हो....

"तुम्हे पहले छोड़ कर आऊं या बाद में साथ चलोगी..." वह इस तरह बात कर रहा था जैसे पिछली बातों को भूल ही गया हो.. किस तरह मुझे तडपती हुई छोड़ कर चला आया था घर से... पर फिर भी मुझे उसका मुझसे उस घटना के बाद 'डाइरेक्ट' बात करना बहुत अच्छा लगा....

"आ.. आपकी मरजी है...!" मैंने एक बार फिर उसकी आँखों में आँखें डाली....

"ठीक है.. चलो तुम्हे छोड़ आता हूँ... पहले.." वह कहकर उठने लगा था की तभी चाची नीचे आ गयी," अरे.. रुको! मैं तो चाय बनाकर लायी थी की नींद खुल जायेगी.. पिंकी तो खर्राटे ले रही है..."

चाची ने हम तीनो को चाय पकड़ा दी और वहीं बैठ गयी..," अंजु! अगर यहीं सोना हो तो यहाँ सो जाओ! सुबह उठकर चली जाना... अब रात में कहाँ जाओगी.. इतनी दूर..."

"मैं छोड़ आऊँगा चाची.. कोई बात नहीं..." तरुण चाय की चुस्की लेता हुआ बोला....

"चलो ठीक है.. तुम अगर घर न जाओ तो याद करके अंदर से कुंडी लगा लेना.. मैं तो जा रही हूँ सोने... उस दिन कुत्ते घुस गये थे अंदर..." चाची ने ये बात तरुण को कही थी.. मेरे अचरज का ठिकाना न रहा.. कितना घुल मिल गया था तरुण उन सबसे.. अपनी जवान बेटी को उसके पास छोड़ कर सोने जा रही हैं चाची जी... और उपर से ये भी छूट की अगर सोना चाहे तो यहीं सो सकता है... मैं सच में हैरान थी... मुझे दाल में कुछ न कुछ काला तो होने का शक पक्का हो रहा था... पर मैं कुछ बोली नहीं....

"ऐ पिंकी.. चल उपर...!" चाची ने पिंकी के दोनों हाथ पकड़ कर उसको बैठा दिया... पिंकी इशारा मिलते ही उसके पीछे पीछे हो ली.. जैसे उसकी आदत हो चुकी हो....

"चलो!" तरुण ने चाय का कप ट्रे में रखा और खड़ा हो गया... मैं उसके पीछे पीछे चल दी....

रास्ते भर हम कुछ नहीं बोंले.. पर मेरे मन में एक ही बात चक्कर काट रही थी..," अब मीनू और तरुण अकेले रहेंगे... और जो कुछ चाहेंगे.. वही करेंगे....

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10-02-2010, 12:09 PM
Post: #22
RE: कामांजलि
अगले दिन मैंने बातों ही बातों में पिंकी से पूछा था," मीनू कहाँ सोती है?"

"पता नहीं.. पर शायद वो भी उपर ही आ जाती हैं बाद में.. वो तो हमेशा मुझसे पहले उठ जाती हैं... क्यूँ?" पिंकी ने बिना किसी लाग लपेट के जवाब दे दिया...

"नहीं, बस ऐसे ही.. और तुम?" मैंने उसकी बात को टाल कर फिर पूछा....

"मैं.. मैं तो कहीं भी सो जाती हूँ.. उपर भी.. नीचे भी... तुम चाहो तो तुम भी यहीं सो जाया करो.. फिर तो मैं भी रोज नीचे ही सो जाउंगी.. देखो न कितना बड़ा कमरा है..." पिंकी ने दिल से कहा....

"पर.. तरुण भी तो यहाँ सो जाता है न.. एक आध बार!" मेरी छानबीन जारी थी...

"हाँ.. तो क्या हुआ? यहाँ कितनी चारपाई हैं.. 6!" पिंकी ने गिन कर बताया...

"नहीं.. मेरा मतलब.. लड़के के साथ सोने में शर्म नहीं आएगी क्या?" मैंने उसका मन टटोलने की कोशिश की....

"धत्त! कैसी बातें कर रही हो.. 'वो' भैया हैं.. और मम्मी पापा दोनों कहते हैं की वो बहुत अच्छे हैं.. और हैं भी..मैं भी कहती हूँ!" पिंकी ने सीना तान कर गर्व से कहा....

मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था.. मैं खड़ी खड़ी अपना सर खुजाने लगी थी.. तभी मीनू नीचे आ गयी और मैंने उसको चुप रहने का इशारा कर दिया....
पिंकी के घर जाकर पढ़ते हुए मुझे हफ्ता भर हो गया था.. तरुण भी तब तक मेरी उस हरकत को पूरी तरह भूल कर मेरे साथ हँसी मजाक करने लगा था.. पर मैं इतना खुलकर उससे कभी बोल नहीं पाई.. वजह ये थी की मेरे मन में चोर था.. मैं तो उसका चेहरा देखते ही गरम हो जाती थी और घर वापस आकर जब तक नींद के आगोश में नहीं समां जाती; गरम ही रहती थी...

मन ही मन मीनू और उसके बीच 'कुछ' होने के शक का कीड़ा भी मुझे परेशान रखता था..मीनू उससे इतनी बात नहीं करती थी.. पर दोनों की नजरें मिलते ही उनके चहरों पर उभर आने वाली कामुक सी मुस्कान मेरे शक को और हवा दे जाती थी.. शक्ल सूरत और 'पुट्ठे छातीयों' के मामले में मैं मीनू से 20 ही थी.. फिर भी जाने क्यूँ मेरी तरफ देखते हुए उसकी मुस्कान में कभी वो रसीलापन नजर नहीं आया जो उन दोनों की नजरें मिलने पर अपने आप ही मुझे अलग से दिख जाता था...

सच कहूँ तो पढ़ाने के अलावा वो मुझमे कोई इंट्रस्ट लेता ही नहीं था.... मैंने यूँही एक दिन कह दिया था," रहने दो.. अब मुझे डर नहीं लगता.. रोज जाती हूँ न..." उस के बाद तो उसने मुझे वापस घर तक छोड़ना ही छोड़ दिया...

ऐसे ही तीन चार दिन और बीत गये..

मेरा घर पिंकी के घर से करीब आधा किलोमीटर दूर था.. लगभाग हर नुक्कड़ पर स्ट्रीट लाइट लगी थी.. इसीलिए सारे रास्ते रौशनी रहती थी.. सिर्फ एक लगभाग 20 मीटर रास्ते को छोड़ कर... वहाँ गाँव की पुरानी चौपाल थी और चौपाल के आँगन में एक बड़ा सा नीम का पेड़ था (अब भी है). स्ट्रीट लाइट वहाँ भी लगी थी.. पर चौपाल से जरा हटकर.. उस पेड़ की वजह से गली के उस हिस्से में घुप अँधेरा रहता था...

वहाँ से गुजरते हुए मेरे क़दमों की गति और दिल की धड़कन अपने आप ही थोड़ी बढ़ जाती थी.. रात का समय और अकेली होने के कारण अनहोनी का डर किसके मन में नहीं पैदा होगा... पर 3-4 दिन तक लगातार अकेली आने के कारण मेरा वो डर भी जाता रहा...

अचानक एक दिन ऐसा हो गया जिसका मुझे कभी डर था ही नहीं... पर जब तक 'उसकी' मंशा नहीं पता चली थी; मैं डरी रही.. और पसीने पसीने हो गयी....

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10-02-2010, 12:10 PM
Post: #23
RE: कामांजलि
हुआ यूँ की उस दिन जैसे ही मैंने अपने कदम 'उस' अँधेरे टुकड़े में रखे.. मुझे अपने पीछे किसी के तेजी से आ रहे होने का अहसास हुआ... मैं चौंक कर पलटने ही वाली थी की एक हाथ मजबूती से मेरे जबड़े पर आकर जम गया.. मैं डर के मारे चीखी.. पर चीख मेरे गले में ही घुट कर रह गयी... अगले ही पल उसने अपने हाथ का घेरा मेरी कमर के इर्द गिर्द बनाया और मुझे उपर उठा लिया....

मैं स्वाभाविक तौर पर डर के मारे काँपने लगी थी.. पर चिल्लाने या अपने आपको छुड़ाने की मेरी हर कोशिश नाकाम रही और 'वो' मुझे जबरदस्ती चौपाल के एक बिना दरवाजे वाले कमरे में ले गया...

वहाँ एक दम घुप्प अँधेरा था... मेरी आँखें डर के मारे बाहर निकलने को थी.. पर फिर भी कुछ भी देखना वहाँ नामुमकिन था.. जी भर कर अपने आपको छुड़ाने की मश्शकत करने के बाद मेरा बदन ढीला पड़ गया.. मैं थर-थर काँप रही थी....

अजीबोगरीब हादसे से भौचक्क मेरा दिमाग जैसे ही कुछ शांत हुआ.. मुझे तब जाकर पता चला की मामला तो कुछ और ही है.. 'वो' मेरे पीछे खड़ा मुझे एक हाथ से सख्ती से थामे और दूसरे हाथ से मेरे मुँह को दबाये मेरी गरदन को चाटने में तल्लीन था...

उसके मुझे यहाँ घसीट कर लाने का मकसद समझ में आते ही मेरे दिमाग का सारा बोझ गायब हो गया... मेरे बदन में अचानक गुदगुदी सी होने लगी और मैं आनंद से सीहर उठी...

मैं उसको बताना चाहती थी की जाने कब से मैं इस पल के लिये तड़प रही हूँ.. मैं पलट कर उससे लिपट जाना चाहती थी... अपने कपड़े उतार कर फैंक देना चाहती थी... पर वो छोड़ता तभी न....!

मेरी तरफ से विरोध खत्म होने पर उसने मेरी कमर पर अपनी पकड़ थोड़ी ढीली कर दी.... पर मुँह पर उसका हाथ उतनी ही मजबूती से जमा हुआ था... अचानक उसका हाथ धीरे धीरे नीचे सरकता हुआ मेरी सलवार में घुस गया.. और कच्छी के उपर से मेरी चूत की फांकों को ढूंढ कर उन्हें थपथपाने लगा... इतना मजा आ रहा था की मैं पागल सी हो गयी.. होंठों से मैं अपने मानोंभाव प्रकट कर नहीं पा रही थी.. पर अचानक ही जैसे मैं किसी दूसरे ही लोक में पहुँच गयी.. मेरी आँखें अधखुली सी हो गयी... कसमसाकर मैंने अपनी टांगें चौड़ी करके जाँघों के बीच 'और' जगह बना ली... ताकि मेरे अपहर्ता को मेरी 'चूत-सेवा' करने में किसी तरह की कोई दिक्कत न हो... और जैसे ही उस'ने मेरी कच्छी के अंदर हाथ डाल अपनी उंगली से मेरी चूत का छेद ढूंढने की कोशिश की.. मैं तो पागल ही हो गयी... मेरी सिसकी मेरे गले से बाहर न आ सकी.. पर उसको अपने भावों से अवगत कराने के लिये मैंने अपना हाथ भी उसके हाथ के साथ साथ अपनी सलवार में घुसा दिया........

मेरे हाथ के नीचे दबे उसके हाथ की एक उंगली कुछ देर तक मेरी चूत की दरार में उपर नीचे होती रही.. अपने हाथ और पराये हाथ में जमीन आसमान का अंतर होने का मुझे आज पहली बार पता चला.. आनंद तो अपने हाथ से भी काफी आता था.. पर 'उस' के हाथ की तो बात ही अलग थी..

मेरी चिकनी चूत की फांकों के बीच थिरकती हुई उसकी उंगली जैसे ही चूत के दाने को छूती.. मेरा बदन झनझना उठता.. और जैसे ही चिकनाहट से लबालब चूत के छेद पर आकर उसकी उंगली ठहरती.. मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती.. मेरा दिमाग सुन्न हो जाता और मेरी सिसकी गले में ही घुट कर रह जाती....

मुझे यकीन हो चला था की आज इस कुंवारे छेद का कल्याण हो कर रहेगा.. मेरी समझ में नहीं आ रहा था की वो आखिर इतनी देर लगा क्यूँ रहा है.. मेरी बेसब्री बढ़ती जा रही थी.. अपनी जाँघों को मैं पहले से दुगुना खोल चुकी थी और मेरे लिये खड़ा रहना अब मुश्किल हो रहा था...

अचानक उसने अपना हाथ बाहर निकल लिया... मेरा दिल बल्लियों पर आकर अटक गया.. अब मैं उसके आगे बढ़ने की उम्मीद कर रही थी... और ऐसा हुआ भी... अगले ही पल उसने मेरी सलवार का नाड़ा खोला और मेरी सलवार नीचे सरका दी.. मेरी नंगी जाँघों के ठंड से ठिठुर रहे होने का मुकाबला मेरे अंदर से उठ रही भीषण काम~लपटों से हो रहा था.. इसीलिए मुझे ठंड न के बराबर ही लग रही थी...

अचानक उसने मेरी कच्छी भी नीचे सरका दी... और इसके साथ ही मेरे चिकने चूतड़ भी अन्वरित हो गये.. उसने एक अपना हाथ चूतड़ों के एक 'पाट' पर रखा और उसको धीरे धीरे दबाने लगा.. मुझे यकीन था की अगर वहाँ प्रकाश होता तो मेरे चूतड़ों की गोलाइयों, कसावट और उठान देखकर वो पगला जाता.. शायद अँधेरे की वजह से ही वो अब तक संयम से काम ले पा रहा था..

मुझे वहाँ भी मजा आ रहा था पर आगे चूत की तड़प मुझे सहन नहीं हो रही थी.. मैं 'काम' जारी रखने के इरादे से अपना हाथ नीचे ले गयी और 'चूत' फांकों पर हाथ रख कर धीरे धीरे उन्हें मसलने लगी..

मेरे ऐसा करने से शायद उसको मेरे उत्तेजित होने का अहसास हो गया... मेरे नितंबों से कुछ देर और खेलने के बाद वो रुक गया और एक दो बार मेरे मुँह से हाथ ढीला करके देखा... मेरे मुँह से लंबी लंबी साँसे और सिसकियाँ निकालते देख वो पूरी तरह आश्वस्त हो गया और उसने अपना हाथ मेरे मुँह से हटा लिया....

कामांध होने के बावजूद, उसको जानने की जिज्ञासा भी मेरे मन में थी.. मैंने अपनी चूत को सहलाना छोड़ धीरे से उससे कहा,"मुझे बहुत मजा आ रहा है.. पर कौन हो तुम?"

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10-02-2010, 12:10 PM
Post: #24
RE: कामांजलि
जवाब देना तो दूर, उसने तो मेरे मुँह को ही फिर दबा लिया.. मैंने हल्के प्रतिरोध भरo गूं-गूं की तो उसने हाथ हटाकर मेरी बात फिर सुन ली," ठीक है.. मैं कुछ नहीं पूँछती.. पर जल्दी करो न.. मुझे बहुत मजा आ रहा है..." मुझे तो आम खाने से मतलब था.. जो कोई भी था.. मेरे जीवन का प्रथम नारी अहसास मुझे करा ही रहा था.. बहुत सुघढ़ तरीके से....

मेरे ऐसा कहने पर शायद वह बे-फिकर हो गया और मेरी कमीज के नीचे से कूल्हों को पकड़ कर नीचे बैठ गया... उसकी गरम गरम साँसे अब मेरी जाँघों के बीच से जाकर मेरी चूत की फांकों को फडफडाने को विवश कर रही थी....

कुछ देर बाद उसने अपना एक हाथ मेरे कूल्हों से निकल कर मेरी पीठ को आगे की और दबाया... मैं उसका इशारा समझ गयी और खड़ी खड़ी आगे झुक कर अपनी कोहनियाँ सामने छोटी सी दीवार पर टिका ली.. ऐसा करने के बाद मेरे चूतड़ पीछे की और निकल गये..

उसने अपना मुँह मेरे चूतड़ों के बीच घुसा दिया और मेरी चूत को अपने होंठों से चूमa.. मैं कसमसा उठी.. इतना आनंद आया की मैं बयान नहीं कर सकती.. मैंने अपनी जाँघों को और खोल कर मेरे उस अनजाने आशिक की राहें आसान कर दी..

कुछ देर और चूमने के बाद उसने मेरी पूरी चूत को अपने मुँह में दबोच लिया.. आनंद के मारे में छटपटा उठी.. पर वह शायद अभी मुझे और तड़पाने के मूड में था....

वह जीभ निकल कर चूत की फांकों और उनके बीच की पतली सी दरार को चाट चाट कर मुझे पागल करता जा रहा था.. मेरी सिसकियाँ चौपाल के लंबे कमरे के कारण प्रतिध्वनित होकर मुझ तक ही वापस आ रही थी.. उसकी तेज हो रही साँसों की आवाज भी मुझे सुनाई दे रही थी.. पर बहुत धीरे धीरे....

आखिरकार तड़प सहन करने की हद पार होने पर मैंने एक बार और उससे सिसकते हुए निवेदन किया......," अब तो कर दो न! कर दो न प्लीज!"

मुझे नहीं पता उसने मेरी बात पर गौर किया या नहीं.. पर उसकी जीभ का स्थान फिर से उसकी उंगली ने ले लिया... दातों से रह रह कर वो मेरे नितंबो को हल्के हल्के काट रहा था....

जो कोई भी था... पर मुझे ऐसा मजा दे रहा था जिसकी मैंने कल्पना भी कभी नहीं की थी.. मैं उसकी दीवानी होती जा रही थी, और उसका नाम जानने को बेकरार....

अचानक में उछल पड़ी.. मेरी चूत के छेद में झटके के साथ उसकी आधी उंगली घुस गयी... पर मुझे अचानक मिले इस दर्द के मुकाबले मिला आनंद अतुलनीय था.. कुछ देर अंदर हलचल मचाने के बाद जब उसकी उंगली बाहर आई तो मेरी चूत से रस टपक टपक कर मेरी जाँघों पर फैल रहा था.... पर मेरी भूख शांत नहीं हुई....

अचानक उसने मुझे छोड़ दिया.. मैंने खड़ी होकर उसकी तरफ मुँह कर लिया.. पर अब भी सामने किसी के खड़े होने के अहसास के अलावा कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था....

अपनी कमर के पास उसके हाथों की हलचल से मुझे लगा वह अपनी पेंट उतर रहा है... पर मैं इतनी बेकरार हो चुकी थी की पेंट उतरने का इंतजार नहीं कर सकती थी.. मैंने जिंदगी में तीन-चार लंड देखे थे... मैं जल्द से जल्द उसके लंड को छू कर देख लेना चाहती थी और जाना लेना चाहती थी की उसका साइज़ मेरी छोटी सी कुंवारी मछली के लिये उपयुक्त है या नहीं.... मैं अपना हाथ अंदाज़े से उसकी जाँघों के बीच ले गयी...

अंदाज़ा मेरा सही था.. मेरा हाथ ठीक उसकी जाँघों के बीच था... पर ये क्या? उसका लंड तो मुझे मिला ही नहीं....

मेरी आँखें आश्चर्य में सिकुड़ गयी... अचानक मेरे दिमाग में एक दूसरा सवाल कौंधा..," कहीं....?"

और मैंने सीधा उसकी छातीयों पर हाथ मारा... मेरा सारा जोश एक दम ठंडा पड़ गया," छि.. तुम तो लड़की हो!"

वह शायद अपनी पेंट को खोल नहीं बल्कि, अपनी सलवार को बाँध रही थी.. और काम पूरा होते ही वह मेरे सवाल का जवाब दिये बिना वहाँ से गायब हो गयी....

मेरा मन ग्लानि से भर गया.. मुझे पता नहीं था की लड़की लड़की के बीच भी ये खेल होता है.... सारा मजा किरकिरा हो गया और आखिरकार आज मेरी चूत का श्री गणेश होने की उम्मीद भी धूमिल पड़ गयी.. और मेरी लिसलिसी जांघें घर की और जाते हुए मुझे भारी भारी सी लग रही थी....

घर आकर लेते हुए मैं ये सोच सोच कर परेशान थी की मैं उसको पहले क्यूँ नहीं पहचान पाई.. आखिर जब उसने मुझे पकड़ कर उपर उठाया और मुझे चौपाल में ले गयी.. तब तो उसकी छातियाँ मेरी कमर से चिपकी ही होगी... पर शायद डर के चलते उस वक्त दिमाग ने काम करना बांध कर दिया होगा....

अगले दिन मैंने सुबह बाथरूम में अपनी अधूरी प्यास अपनी उंगली से भुझाने की कोशिश की.. पर मैं ये महसूस करके हैरान थी की अब मेरे हाथ से मुझे उतना मजा भी नहीं आ रहा था जितना आ जाता था... मेरा दिमाग खराब हो गया.. अब मेरी चूत को उसके 'यार' की जल्द से जल्द जरूरत थी.. पर सबसे बड़ा सवाल जिसने मुझे पूरे दिन परेशान रखा; वो ये था की आखिर वो थी कौन?

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10-02-2010, 12:11 PM
Post: #25
RE: कामांजलि
शाम को टयूशन के लिये जाते हुए जैसे ही मैं चौपाल के पास से गुजरी, मेरे पूरे बदन में पिछली रात की बात याद करके झुरझुरी सी उठ गयी. बेशक वो लड़की थी, पर मैंने पता चलने से पहले आनंद सागर में जिस तरह डुबकियाँ सी लगायी थी.., उन्हें याद करके मेरा जिस्म एकदम अकड़ गया.....

उस दिन मैं टयूशन पर तरुण से भी ज्यादा उस लड़की के बारे में सोचती रही.. रोज की तरह ही चाची 10 बजे चाय लेकर आ गयी.. उनके आते ही पिंकी तरुण के सामने से उठकर भाग गयी," बस! मम्मी आ गयी! इसका मतलब सोने का टाइम हो गया... है न मम्मी?"

चाची उसकी बात सुनकर हँसने लगी,"निकम्मी! तू पूरी कामचोर होती जा रही है.. देख लेना अगर नंबर कम आये तो..!"

"हाँ हाँ... ठीक है.. देख लेना! अब मैं थोड़ी देर रजाई में गरम हो लूं.. जाते हुए मुझे ले चलना मम्मी!" पिंकी ने शरारत से कहा और रजाई में दुबक गयी...

"ये दोनों पढाई तो ठीक कर रही हैं न; तरुण?" चाची ने पूछा....

"हाँ; ठीक ठाक ही करती हैं चाची..." तरुण ने कहकर तिरछी नजरों से मीनू को देखा और हँसने लगा....

"हमें मीनू की चिंता नहीं है बेटा! ये तो हमारी होनाहार बेटी है.." चाची ने प्यार से मीनू के गाल को पकड़ कर खींचा तो वो भी तरुण की तरफ ही देख कर मुस्कराई...," हमें तो छोटी की चिंता है.. जब तुम पढ़ाते हो.. तभी किताबें खोलती है.. वरना तो ये एक अक्षर तक नहीं देखती...!"

"अच्छा! मैं चलती हूँ चाची!" मैंने कहा और कप को ट्रे में रख कर उठ खड़ी हुई..

"ठीक है अंजु बेटी! जरा संभल कर जाना!" चाची ने कहा...

मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा की असली वजह क्या थी.. पर मैं दरवाजे से ही वापस मुड गयी थी उस दिन," वो... एक बार छोड़ आते..!" मैंने तरुण की और देखते हुए हल्के से कहा...

"क्यूँ?....... क्या हो गया? रोज तो अकेली चली जाती थी.." तरुण ने पूछा....

"पता नहीं क्यूँ? आज डर सा लग रहा है..." मैंने जवाब दिया....

"अरे यहीं सो जाओ न बेटी... वैसे भी ठंड में अब कहाँ बाहर निकलोगी.. मैं फोन कर देती हूँ.. तुम्हारी मम्मी के पास..." चाची ने प्यार से कहा....

"नहीं चाची.. कोई बात नहीं; मैं छोड़ आता हूँ..." कहकर तरुण तुरंत खड़ा हो गया....

जाने क्यूँ? पर मैं तरुण की बात को अनसुना सा करते हुए वापस चारपाई पर आकर बैठ गयी," ठीक है चाची.. पर आप याद करके फोन कर देना.. नहीं तो पापा यहीं आ धमकेंगे.. आपको तो पता ही है..."

"अरे बेटी.. अपने घर कोई अलग अलग थोड़े ही हैं.. अगर ऐसी कोई बात होती तो वो तुम्हे यहाँ टयूशन पर भी नहीं भेजते.. मैं अभी उपर जाते ही फोन कर देती हूँ.... तुम आराम से सो जाओ.. पिंकी और मीनू भी यहीं सो जायेंगी फिर तो... तुम बेटा तरुण...." चाची रुक कर तरुण की और देखने लगी....

"अरे नहीं नहीं चाची.. मैं तो रोज चला ही जाता हूँ.. उस दिन तो.. मुझे बुखार सा लग रहा था.. इसीलिए..." तरुण ने अपना सा मुँह लेकर कहा....

"मैं वो थोड़े ही कह रही हूँ बेटा.. तुम तो हमारे बेटे जैसे ही हो.. मैं तो बस इसीलिए पूछ रही हूँ की अगर तुम्हे न जाना हो तो एक रजाई और लाकर दे देती हूँ..." चाची ने सफाई सी दी.....

"नहीं.. मुझे तो जाना ही है चाची... बस.. मीनू को एक 'सोंनेट' का ट्रांसलेशन करवाना है....

"ठीक है बेटा.. मैं तो चलती हूँ... " चाची ने कहा और फिर मीनू की और रुख किया," दरवाजा ठीक से बंद कर लेना बेटी, अपने भैया के जाते ही..!"

मीनू ने हाँ में सर हिलाया.. पर मैंने गौर किया.. मेरे यहाँ रुकने की कहने के बाद दोनों के चेहरों का गुलाबी रंग उतर गया था.....

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10-02-2010, 12:11 PM
Post: #26
RE: कामांजलि
मुझे रजाई ओढ़ कर लेते हुए आधा घंटा हो चूका था.. पर 'वो' अनजानी लड़की मेरे दिमाग से निकल ही नहीं रही थी.. मुझे 24 घंटे बाद भी उसका सर अपनी जाँघों के बीच महसूस हो रहा था.. मेरी चूत पर बिच्छू से चल रहे थे.. मानों वह अब भी मेरी चूत को लपर लपर अपनी जीभ से चाट रही थी... ऐसे मैं नींद कैसे आती...

उपर से तरुण पता नहीं अंग्रेजी में क्या क्या बके जा रहा था... मैं यही सोच रही थी की कब तरुण यहाँ से निकल कर जाये और मीनू के सोने के बाद मैं अपनी उंगली से ही काम चला कर सोऊ....

अचानक मुझे किताब बंद होने की आवाज आई.. मैं खुश हो गयी....मैं दरवाजा खुलकर बंद होने का इंतज़ार कर ही रही थी की करीब एक-2 मिनट के बाद तरुण की आवाज आई.. आवाज थोड़ी धीमी थी.. पर इतनी भी नहीं की मुझे सुनाई न देती

"तुम्हारी रजाई में आ जाऊं मीनू?"

पहले तरुण की, और फिर मीनू का ये जवाब सुनकर तो मैं अचरज के मारे सुन्न रह गयी.....

"श्ह्ह्ह्ह्ह.... धत्त.. क्या कह रहे हो... आज नहीं....यहाँ ये दोनों हैं आज.. कोई उठ गयी तो....."

मैं तो अपना कालेजा पकड़कर रह गयी.. मैं इनके बारे में जो कुछ सोचती थी.. सब सच निकला.....

"कुछ नहीं होता.. मैं लाइट बंद कर देता हूँ.. कोई उठ गयी तो मैं तुम्हारी रजाई में ही सो जाऊँगा... तुम कह देना मैं चला गया... बस, एक बार.. प्लीज!" तरुण ने धीरे से भीख सी मांगते हुए कहा......

"नहीं.. तरुण.. तुम तो फसने का काम कर रहे हो.. सिर्फ आज की ही तो बात है.. जब अंजु यहाँ नहीं होगी तो पिंकी भी उपर चली जायेगी... समझा करो जानू!" मीनू ने निहायत ही मीठी और धीमी आवाज में उससे कहा....

"जानू?" सुनते ही मेरे कान चोकन्ने हो गये.. अभी तक मैं सिर्फ सुन रही थी.. जैसे ही मीनू ने 'तरुण' के लिये जान शब्द का इस्तेमाल किया.. मैं उछलते उछलते रह गयी... आखिरकार मेरा शक सही निकला... मेरा दिल और ज्यादा धड़कने लगा.. मुझे उम्मीद थी की और भी राज बाहर निकल सकते हैं...

"प्लीज.. एक बार.." तरुण ने फिर से रीकुएस्ट की...," तुम्हारे साथ लेटकर एक किस लेने में मुझे टाइम ही कितना लगेगा.....

"नहीं! आज नहीं हो सकता! मुझे पता है तुम एक मिनट कहकर कितनी देर चिपके रहते हो..... आज बिल्कुल नहीं..." इस बार मीनू ने साफ़ मना कर दिया.....

"मैं समझ गया.. तुम मुझे क्यूँ चुम्मी दोगी..? मैं बस यही देखना चाह रहा था... तुम तो आजकल उस कमीने सोनू के चक्कर में हो न!" तरुण अचानक उबाल सा खा गया... उसका लहजा एकदम बदल गया....

"क्या बकवास कर रहे हो तुम.. मुझे सोनू से क्या मतलब?" मीनू चौंक पड़ी... मेरी समझ में नहीं आया की किस सोनू की बात हो रही है....

"आज तुम्हारी सोनू से क्या बात हुई थी?" तरुण ने बदले हुए लहजे में ही पूछा....

"मैं कभी बात नहीं करती उससे...! तुम्हारी कसम जाना!" मीनू उदास सी होकर बोली.. पर बहुत धीरे से....

"मैं चुतिया हूँ क्या? मैं तुमसे प्यार करता हूँ.. इसका मतलब ये थोड़े ही है की तुम मेरी कसम खा खा कर मेरा ही उल्लू बनाती रहो.... ये.. अंजु भी पहले दिन ही मुझसे चिपकने की कोशिश कर रही थी... कभी पूछ कर देखना, मैंने इसको क्या कहा था.. मैंने तुम्हे अगले दिन ही बता दिया था और फिर इनके घर जाने से मना भी कर दिया... मैं तुम्हे पागलों की तरह प्यार करता रहूँ.. और तुम मुझे यूँ धोखा दे रही हो... ये मैं सहन नहीं कर सकता..." तरुण रह रह कर उबाल खाता रहा.. मैं अब तक बड़े शौक से चुपचाप लेटी उनकी बात सुन रही थी..... पर तरुण की इस बात पर मुझे बड़ा गुस्सा आया.. साले कुत्ते ने मेरी बात मीनू को बता दी... पर मैं खुश थी.. अब बनाउंगी इसको 'जान!'

खैर मैं सांस रोके उनकी बात सुनती रही... मैं पूरी कोशिश कर रही थी की उनकी रसीली लड़ाई का एक भी हिस्सा मेरे कानों से न बच पाये.....

"मैं भी तो तुमसे इतना ही प्यार करती हूँ जाना.. तुमसे पूछे बिना तो मैं कॉलेज के कपड़े पहनने से भी डरती हूँ.. कहीं मैं ऐसे वैसे पहन लूं और फिर तुम सारा दिन जलते रहो..." मीनू को जैसे उसको सफाई देनी जरूरी ही थी.. लात मार देती साले कुत्ते को.. अपने आप दम हिलाता मेरे पास आता..

"तुमने सोनू को आज एक कागज और गुलाब का फूल दिया था न?" तरुण ने दांत से पीसते हुए कहा....

"क्या? ये क्या कह रहे हो.. आज तो वो मेरे सामने भी नहीं आया... मैं क्यूँ दूँगी उसको गुलाब?" मीनू तड़प कर बोली.....

"तुम झूठ बोल रही हो.. तुम मेरे साथ घिनौना मजाक कर रही हो.. रमेश ने देखा है तुम्हे उसको गुलाब देते हुए....." तरुण अपनी बात पर अड़ा रहा....

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10-02-2010, 12:12 PM
Post: #27
RE: कामांजलि
मीनू ने फिर से सफाई देना शुरू किया.. ज्यों ज्यों मामला गरम होता जा रहा था... दोनों की आवाज कुछ तेज हो गयी थी...,"मुझे पता है तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो.. इसीलिए मेरा नाम कहीं झूठा भी आने पर तुम सेंटी हो जाते हो.... इसीलिए इतनी छोटी सी बातों पर भी नाराज हो जाते हो.... पर मैं भी तो तुमसे उतना ही प्यार करती हूँ... मेरा विश्वास करो! मैंने आज उसको देखा तक नहीं.... मेरी सोनू से कितने दिनों से कोई बात तक नहीं हुई.. लैटर या फूल का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.. तुम्हारे कहने के बाद तो मैंने सभी लड़कों से बात ही करनी छोड़ दी है"

"अच्छा... तो क्या वो ऐसे ही गाता फिर रहा है कॉलेज में... वो कह रहा था की तुमने आज उसको लव लैटर के साथ एक गुलाब भी दिया है...." तरुण की धीमी आवाज से भी गुस्सा साफ़ झलक रहा था.....

"बकवास कर रहा है वो.. तुम्हारी कसम! तुम उसको वो लैटर दिखाने को बोल दो.. पता नहीं तुम कहाँ कहाँ से मेरे बारे में उल्टा सीधा सुन लेते हो...." मीनू ने भी थोड़ी सी नाराजगी दिखाई...

"मैंने बोला था साले माँ के.... पर वो कहने लगा की तुमने उस लैटर में मुझे 'वो' न दिखाने का वादा किया है.. रमेश भी बोल रहा था की उसने भी तुम्हे उसको चुपके से गुलाब का फूल देते हुए देखा था... अब सारी दुनिया को झूठी मान कर सिर्फ तुम पर ही कैसे विश्वास करता रहूँ...?" तरुण ने नाराजगी और गुस्से के मिश्रित लहजे में कहा....

"रमेश तो उसका दोस्त है.. वो तो उसके कहने से कुछ भी बोल देगा... तुम प्लीज ये बार बार गली मत दो.. मुझे अच्छे नहीं लगते तुम गली देते हुए... और फिर इनमे से कोई उठ गयी तो.. तुम सिर्फ मुझ पर ही विश्वास नहीं करते... बाकी सब पर इतनी जल्दी कैसे कर लेते हो.....?" मीनू अब तक रोने सी लगी थी... पर तरुण की टोन पर इसका कोई असर सुनाई नहीं पड़ा......

"तुम हमेशा रोने का नाटक करके मुझे eमोटीoनl कर देती हो.. पर आज मुझ पर इसका कोई असर नहीं होने वाला.. क्योंकि आज उसने जो बात मुझे बताई है.. अगर वह सच मिली तो मैं तो मर ही जाऊँगा!" तरुण ने कहा....

"अब और कौनसी बात कह रहे हो...?" मीनू सुबकते हुए बोली....

मैं मन ही मन इस तरह से खुश हो रही थी मानों मुझे कोई खजाना हाथ लग गया हो.. मैं सांस रोके मीनू को सुबकते सुनती रही.....

"अब रोने से मैं तुम्हारी करतूतों को भूल नहीं जाऊँगा... मैं तेरी... देख लेना अगर वो बात सच हुई तो..." तरुण ने दांत पीसते हुए कहा.....

मीनू रोते रोते ही बोलने लगी," अब मैं... मैं तुम्हे अपना विश्वास कैसे दिलवाऊं बार बार... तुम तो इतने शककी हो की मुंडेर पर यूँही खड़ी हो जाऊं तो भी जल जाते हो... मैंने तुम्हे खुश करने के लिये सब लड़कों से बात करनी छोड़ दी.... अपनी पसंद के कपड़े पहनने छोड़ दिये... तुमने मुझे अपने सिवाय किसी के साथ हँसते भी नहीं देखा होगा.. जब से तुमने मुझे मना किया है....

और तुम.. पता नहीं रोज कैसी कैसी बातें उठाकर ले आते हो... तुम्हारी कसम अगर मैंने किसी को आज तक तुम्हारे सिवाय कोई लैटर दिया हो तो... वो इसीलिए जल रहा होगा, क्यूँ की उसके इतने दिनों तक पीछे पड़ने पर भी मैंने उसको भाव नहीं दिये.... और क्योंकि उसको पता है की मैं तुमसे प्यार करती हूँ... वो तो जाने क्या क्या बकेगा... तुम मेरी बात का कभी विश्वास क्यूँ नहीं करते...." मीनू जितनी देर बोलती रही.. सुबकती भी रही!

"वो कह रहा था की... की उसने तुम्हारे साथ प्यार किया है... और वो भी इतने गंदे तरीके से कह रहा था की....." तरुण बीच में ही रुक गया....

"तो? मैं क्या कर सकती हूँ जाना.. अगर वो या कोई और ऐसा कहेगा तो.. मैं दूसरों का मुँह तो नहीं पकड़ सकती न... पर मुझे इससे कोई मतलब नहीं... मैंने सिर्फ तुमसे प्यार किया है.. !" मीनू कुछ रुक कर बोली...

शायद वो समझी नहीं थी की तरुण का मतलब क्या है.. पर मैं समझ गयी थी...... सच कहूँ तो मेरा भी दिल नहीं मान रहा था की मीनू ने किसी के साथ ऐसा किया होगा... पर क्या पता... कर भी लिया हो...सोचने को तो मैं इन दोनों को इकठ्ठे देखने से पहले मीनू को किसी के साथ भी नहीं इस तरह नहीं सोच सकती थी.. और आज देखो.......

"वो प्यार नहीं!" तरुण झल्ला कर बोला....

"तो? और कौनसा प्यार?" मीनू को शायद अगले ही पल खुद ही समझ आ गया और वो चौंकते हुए बोली...," क्या बकवास कर रहे हो... मेरे बारे में ऐसा सोच भी कैसे लिया तुमने... मैं आज तक तुम्हारे साथ भी उस हद तक नहीं गयी.. तुम्हारे इतनी जिद करने पर भी.... और तुम उस घटिया सोनू के कहने पर मान गये.."

"पर उसने कहा है की वो सबूत दे सकता है... और फिर... उसने दिया भी है....."

"क्या सबूत दिया है.. बोलो?" मीनू की आवाज हैरानी और नाराजगी भरी थी...वह चिड सी गयी थी.. तंग आ गयी थी शायद ऐसी बातों से....

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10-02-2010, 12:12 PM
Post: #28
RE: कामांजलि
"उसने बोला की अगर मुझे यकीन उसकी बात का नहीं है तो.... नहीं.. मैंने नहीं बता सकता.." कहकर तरुण चुप हो गया...

"ये क्या बात हुई? मैं अब भी कहती हूँ की उस घटिया लड़के की बातों में आकर अपना दिमाग खराब मत करो... पर अगर तुम्हे मेरी बात का विश्वास नहीं हो रहा तो बताओ उसने क्या सबूत दिया है! तुम यूँ बिना बात के ही अगर हर किसी की बात का विश्वास करते रहे तो.... बताओ न.. क्या सबूत दिया है उसने?" मीनू अब अपने को पाक साफ़ साबित करने के लिये खुद ही सबूत माँग रही थी....

मेरा मन विचलित हो गया.. मुझे डर था कहीं वह सबूत को बोल कर बताने की बजाय 'दिखा' न दे.. और मैं सबूत देखने से वंचित न रह जाऊं.. इसीलिए मैंने उनकी और करवट लेकर हल्की सी रजाई उपर उठा ली.. पर दोनों अचानक चुप हो गये...

"श्ह्ह्ह्ह्श..." मीनू की आवाज थी शायद.. मुझे लगा खेल बिगड़ गया.. कहीं ये अब बात करना बंद न कर दें.. मुझे रजाई के उपर उठने से बने छोटे से छेद में से सिर्फ मीनू के हाथ ही दिखाई दे रहे थे....

शुक्र है थोड़ी देर बाद.. तरुण वापस अपनी बात पर आ गया....

"देख लो.. तुम मुझसे नाराज मत होना.. मैं वो ही कह दूँगा जो उसने कहा है..." तरुण ने कहा....

"हाँ.. हाँ.. कह दो.. पर जल्दी बताओ.. मेरे सर में दर्द होने लगा है.. ये सब सोच सोच कर.. अब जल्दी से इस किससे को खत्म करो.. और एक प्यारी सी किससी लेकर खुश हो जाओ.. I लव यू जान! मैं तुमसे ज्यादा प्यार दुनिया में किसी से नहीं करती.. पर जब तुम्हारा ऐसा मुँह देखती हूँ तो मेरा दिमाग खराब हो जाता है...." मीनू नोर्मल सी हो गयी थी....

"सोनू कह रहा था की ......उसने अपने खेत के कोठड़े में...... तुम्हारी ली थी एक दिन...!" तरुण ने झिझकते हुए अपनी बात कह दी....

"खेत के कोठड़े में? क्या ली थी?" मीनू या तो सच में ही नादान थी.. या फिर वो बहुत शातिर थी.. उसने सब कुछ इस तरह से कहा जैसे उसकी समझ में बिल्कुल नहीं आया हो की एक जवान लड़का, एक जवान लड़की की; खेत के कोठड़े में और क्या लेता है भला.....

"मैं नाम ले दूँ?" मुझे पता था की तरुण ने किस चीज का नाम लेने की इजाजत मानंगी है....

"हाँ.. बताओ न!" मीनू ने सीधे सीधे कहा....

"वो कह रहा था की उसने खेत के कोठड़े में........ तेरी चूत मारी थी.." ये तरुण ने क्या कह दिया.. उसने तो गूगली फैंकते फैंकते अचानक बाउंसर ही जमा दिया.. मुझे ऐसा लगा जैसे उसका बाउंसर सीधा मेरी चूत से टकराया हो.. मेरी चूत तरुण के मुँह से 'चूत' शब्द सुनकर अचानक लिसलिसी सी हो गयी..

"धत्त.. ये क्या बोल रहे हो तुम.. शर्म नहीं आती.." मीनू की आवाज से लगा जैसे वो शर्म के मारे पानी पानी हो गयी हो.. अगले ही पल वो लेट गयी और अपने आपको रजाई में ढक लिया.....

"अब ऐसा क्यूँ कर रही हो.. मैंने तो पहले ही कहा था की बुरा मत मानना.. पर तुम्हारे शर्माने से मेरे सवाल का जवाब तो नहीं मिल जाता न... सबूत तो सुन लो..." तरुण ने कहते हुए उसकी रजाई खींच ली...

मुझे मीनू का चेहरा दिखाई दिया.. वो शर्म के मारे लाल हो चुकी थी.. उसने अपने चेहरे को हाथों से और कोहनियों से अपनी मेरे जितनी ही बड़ी गोल मटोल चूचियों को छिपा रखा था....

"मुझे नहीं सुननी ऐसी घटिया बात.. तुम्हे जो सोचना है सोच लो... मेरी रजाई वापस दो..." मीनू गिडगिडाते हुए बोली....

पर अब तरुण पूरी तरह खुल गया लगता था... उसने मीनू की बाहें पकड़ी और उसको जबरदस्ती बैठा दिया.. बैठने के बाद मुझे मीनू का चेहरा दिखन बंद हो गया.. हाँ.. क्रीम कलर के लोवर में छिपी उसकी गुदाज़ जांघें मेरी आँखों के सामने थी...

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10-02-2010, 12:13 PM
Post: #29
RE: कामांजलि
"तुम्हे मेरी बात सुननी ही पड़ेगी.. उसने सबूत ये दिया है की तुम्हारी.. चूत की दायीं 'पपोटी' पर एक तिल है.. मुझे बताओ की ये सच है या नहीं..." तरुण ने पूरी बेशर्मी दिखाते हुए गुस्से से कहा....

'पपोटी'.. मैंने ये शब्द पहली बार उसी के मुँह से सुना था.. शायद वो चूत की फांकों को 'पपोटी कह रहा था....

"मुझे नहीं सुनना कुछ.. तुम्हे जो लगे वही मान लो.. पर मेरे साथ ऐसी बकवास बातें मत करो..." मुझे ऐसा लगा जैसे मीनू अपने हाथों को छुड़ाने का प्रयत्न कर रही है.. पर जब वो ऐसा नहीं कर पाई तो अंदर ही अंदर सुबकने लगी....

"हट, साली कुतिया.. दूसरों के आगे नंगी होती है और मुझसे प्यार का ढ़ोंग करती है.. अगर तुम इतनी ही पाक साफ़ हो तो बताती क्यूँ नहीं 'वहाँ' तिल है की नहीं... ड्रामा तो ऐसे कर रही है जैसे 8-10 साल की बच्ची हो.. जी भर कर गांड मरा अपनी; सोनू और उसके यारों से.. मैं तो आज के बाद तुझ पर टोकूंगा भी नहीं... तेरे जैसी मेरे आगे पीछे हजार घूमती हैं.. अगर दिल किया तो अंजु की मार लूँगा.. ये तो तुझसे भी सुन्दर है..." तरुण थूक गटकता हुआ बोला और शायद खड़ा हो गया..

जाने तरुण क्या क्या बक' कर चला गया.. पर उसने जो कुछ भी कहा.. मुझे एक बात तो सच में बहुत प्यारी लगी ' अंजु की मार लूँगा.. ये तो तुझसे भी सुन्दर है'

उसके जाने के बाद मीनू काफी देर तक रजाई में घुस कर सीसकती रही.. 5-10 मिनट तक मैं कुछ नहीं बोली.. पर अब मेरे मामले के बीच आकर मजे लेने का टाइम हो गया था....

मैं अंगडाई सी लेकर अपनी आँखें मसलती हुई रजाई हटा कर बैठ गयी.. मेरे उठने का आभास होते ही मीनू ने एकदम से अपनी सिसकियों पर काबू पाने की कोशिश की.. पर वो ऐसा न कर पाई और सिसकियाँ इकठ्ठी हो होकर और भी तेजी से निकलने लगी....

"क्या हुआ दीदी..?" मैंने अनजान बनने का नाटक करते हुए उसके चेहरे से रजाई हटा दी...

मेरा चेहरा देखते ही वह अंगारों की तरह धधक उठी..," कुछ नहीं.. कल से तुम हमारे घर मत आना! बस..." उसने गुस्से से कहा और वापस रजाई में मुँह दुबका कर सिसकने लगी....

उसके बाद मेरी उससे बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई.. पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा.. मैंने आराम से रजाई ओढ़ी और तरुण के सपनों में खो गयी.. अब मुझे वहीं कुछ उम्मीद लग रही थी....

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10-02-2010, 12:13 PM
Post: #30
RE: कामांजलि
अगले दिन भी मुझे आना ही था.. सो मैं आई.. बल्कि पहले दिनों से और भी ज्यादा सज धज कर.. मीनू ने मुझसे बात तक नहीं की.. उसका मूड उखड़ा हुआ था.. हाँ.. तरुण उस दिन कुछ खास ही लाड़-प्यार से मुझे पढ़ा रहा था.. या तो उसको जलाने के लिये.. या फिर मुझे पटाने के लिये....

"चलो अंजु! तुम्हे घर छोड़ दूँ... मुझे फिर घर जाना है...!" चाची के जाते ही तरुण खड़ा हो गया....

"दीदी को नहीं पढ़ाओगे क्या? आज!" मैंने चटखारा लिया....

"नहीं!" तरुण ने इतना ही कहा....

"पर.. पर मुझे कुछ जरूरी बात करनी है.. अपनी पढाई को लेकर...!" मीनू की आवाज में तड़प थी....

मैंने जल्दी से आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया.. कहीं मीनू का सच्चा प्यार उसको रुकने पर मजबूर न कर दे (ही ही ही)," चले!"

तरुण ने उसको कड़वी नजर से देखा और दरवाजे की और बढ़ने लगा..," चलो, अंजु!"

मीनू ने लगभाग खिसियाते हुए मुझसे कहा," तुम कहाँ जा रही हो अंजु.. तुम तो यही सो जाओ!" मुझे पता था की उसके खिसियाने का कारण मेरा और तरुण का एक साथ निकलना है...

"नहीं दीदी, मुझे सुबह जल्दी ही कुछ काम है.. कल देखूंगी..." मैंने मीनू को मुस्करा कर देखा और तरुण के साथ बाहर निकल गयी.....

चौपाल के पास अँधेरे में जाते ही मैं खड़ी हो गयी.. तरुण मेरे साथ साथ चल रहा था.. वह भी मेरे साथ ही रुक गया और मेरे गालों को थपथपाते हुए प्यार से बोला," क्या हुआ अंजु?"

मैंने अपने गाल को थपथपा रहा तरुण का हाथ अपने हाथ में पकड़ लिया," पता नहीं.. मुझे क्या हो रहा है?"
तरुण ने अपना हाथ छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की.. मेरा दिल खुश हो गया...
"अरे बोलो तो सही... यहाँ क्यूँ खड़ी हो गयी?" तरुण एक हाथ को मेरे हाथ में ही छोड़ कर अपने दूसरे हाथ को मेरी गरदन पर ले आया.. उसका अँगूठा मेरे होंठों के पास मेरे गाल पर टिका हुआ था.. मुझे झुरझुरी सी आने लगी...

"नई.. मुझे डर लग रहा है.. अगर मैं कुछ बोलूँगी तो उस दिन की तरह तुम मुझे धमका दोगे!" मुझे उम्मीद थी की आज ऐसा नहीं होगा.. फिर भी मैं.. मासूम बने रहने का नाटक कर रही थी.. मैं चाह रही थी की तरुण ही पहल कर दे...

" नहीं कहूँगा.. पागल! उस दिन मेरा दिमाग खराब था.. बोलो जो बोलना है.." तरुण ने कहा और अपने अँगूठे को मेरे गालों से सरकाकर मारे निचले होंठ पर टिका दिया...

अचानक मेरा ध्यान चौपाल की सीधी पर हुई हल्की सी हलचल पर गया.. शायद कोई था वहाँ, या वही थी.... मैंने चौंक कर सीढियों की तरफ देखा..

"क्या हुआ?" तरुण ने मेरे अचानक मुड कर देखने से विचलित होकर पूछा....

"नहीं.. कुछ नहीं.." मैंने वापस अपना चेहरा उसकी और कर लिया.. बोलने के लिये जैसे ही मेरे होंठ हीले.. उसका अँगूठा थोड़ा और हिल कर मेरे दोनों होंठों पर आ जमा... पर उसको हटाने की न मैंने कोशिश की.. और न ही उसने हटाया.. उल्टा हल्के हल्के से मेरे रसीले होंठों को मसलने सा लगा.. मुझे बहुत आनंद आ रहा था....

"क्या कह रही थी तुम? बोलो न... फिर मुझे भी तुमसे कुछ कहना है..." तरुण मुझे उकसाते हुए बोला.....

"क्या? पहले तुम बताओ न!" मैंने बड़ी मासूमियत से कहा..

"यहाँ कोई आ जायेगा.. आओ न.. चौपाल में चल कर खड़े होते हैं.. वहाँ अच्छे से बात हो जायेंगी..." तरुण ने धीरे से मेरी और झुक कर कहा...

"नहीं.. यहीं ठीक है.. इस वक्त कौन आयेगा!" दरअसलl मैं उस लड़की की वजह से ही चौपाल में जाने से कतरा रही थी....

"अरे.. आओ न.. यहाँ क्या ठीक है?" तरुण ने मेरा हाथ खींच लिया...

"मुझे डर लगेगा यहाँ!" मैंने असली वजह छुपाते हुए कहा....

"इसमें डरने की क्या बात है पागल! मैं हूँ न.. तुम्हारे साथ!" तरुण ने कहा और चौपाल में मुझे उसी कमरे में ले जाकर छोड़ दिया.. जहाँ उस दिन वो लड़की मुझे उठा कर लायी थी..," अब बोलो.. बेहिचक होकर, जो कुछ भी बोलना है.. तुम्हारी कसम मैं कुछ भी नहीं कहूँगा.. उस दिन के लिये सॉरी!"

मैं भी थोड़े भाव खा गयी उसकी हालत देख कर.. मैंने सोचा जब कुँवा प्यासे के पास खुद ही चलकर आना चाहता है तो क्यूँ आगे बढ़ा जाये," पहले आप बोलो न!"

"नहीं.. तुमने पहले कहा था.. अब तुम ही बताओ.. और जल्दी करो.. मुझे ठंड लग रही है.." तरुण ने मेरे दोनों हाथों को अपने हाथों में दबोच लिया...

"ठंड तो मुझे भी लग रही है..." मैंने पूरी तरह भोलेपन का चोला ओढ़ रखा था....

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