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कामांजलि
10-02-2010, 12:03 PM
Post: #11
RE: कामांजलि
"ये तो बहुत बड़ा है... मैंने तो आज तक किसी का ऐसा नहीं देखा...." मम्मी ने कहा....

"बड़ा है चाची तभी तो तुम्हे ज्यादा मजा आयेगा... चिंता न करो.. मैं इस तरह करूँगा की तुम्हे सारी उमर याद रहेगा... वैसे चाचा का कितना बड़ा है?" सुन्दर ने खुश होकर कहा.. वह पलट कर खुद दीवार से लग गया था और मम्मी की कमर मेरी तरफ कर दी थी.... मम्मी ने शायद उसका कहना मान लिया था....

"धीरे बोलो......" मम्मी उसके आगे घुटनों के बल बैठ गयी... और कुछ देर बाद बोली," उनका तो पूरा खड़ा होने पर भी इससे आधा रहता है.. सच बताऊँ? उनका आज तक मेरी चूत के अंदर नहीं झड़ा..." मम्मी भी उसकी तरह गंदी गंदी बातें करने लगी.. मैं हैरान थी.. पर मुझे मजा आ रहा था.. मैं मजा लेती रही.....

"वह चाची... फिर ये गोरी चिकनी दो फूलझड़ियाँ और वो लट्टू कहाँ से पैदा कर दिया.." सुन्दर ने पूछा... पर मेरी समझ में कुछ नहीं आया था....

"सब तुम जैसों की दया है... मेरी मजबूरी थी...मैं क्या यूँही बेवफा हो गयी...?" कहने के बाद मम्मी ने कुछ ऐसा किया की सुन्दर उछल पड़ा....

"आआआहहहह ... ये क्या कर रही हो चाची... मारने का इरादा है क्या?" सुन्दर हल्का सा तेज बोला.....

"क्या करूँ मैं? मुँह में तो आ नहीं रहा... बाहर से ही खा लूं थोड़ा सा!" उसके साथ ही मम्मी भद्दे से तरीके से हँसी.....

"अरे तो इतना तेज 'बुद्का' (bite) क्यूँ भर रही है... जीभ निकल कर नीचे से उपर तक चाट ले न...!" सुन्दर ने कहा.....

"ठीक है.. पर अब निकलने मत देना... मुझे तैयार करके कहीं भाग जाओ..." मम्मी ने सर उपर उठाकर कहा और फिर उसकी जाँघों की तरफ मुँह घुमा लिया....

मुझे आधी अधूरी बातें समझ आ रही थी... पर उनमे भी मजा इतना आ रहा था की मैंने अपना हाथ अपनी जाँघों के बीच दबा लिया.. और अपनी जाँघों को एक दूसरी से रगड़ने लगी... उस वक्त मुझे नहीं पता था की मुझे ये क्या हो रहा है.......

अचानक हमारे घर के आगे से एक ट्रेक्टर गुजरा... उसकी रौशनी कुछ पल के लिये घर में फैल गयी.. मम्मी डर कर एक दम अलग हट गयी.. पर मैंने जो कुछ देखा, मेरा रोम रोम रोमांचित हो गया...

सुन्दर का लंड गधे के 'सूंड' की तरह भारी भरकम, भयानक और उसके चेहरे के रंग से भी ज्यादा काला कलूटा था...वो सांप की तरह सामने की और अपना फन सा फैलाये सीधा खड़ा था... लंड का आगे का हिस्सा टमाटर की तरह अलग ही दिख रहा था. एक पल को तो मैं डर ही गयी थी.. मैंने उससे पहले कई बार छोटू की 'लुल्ली' देखी थी.. पर वो तो मुश्किल से 2 इंच की थी... वापस अँधेरा होने के बाद भी उसका आकर मेरी आँखों के सामने लहराता रहा...

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10-02-2010, 12:03 PM
Post: #12
RE: कामांजलि
"क्या हुआ? हट क्यूँ गयी चाची.. कितना मजा आ रहा है.. तुम तो कमाल का चाटती हो...!" सुन्दर ने मम्मी के बालों को पकड़ कर अपनी और खींच लिया....

"कुछ नहीं.. एक मिनट.... लाइट ओन कर लूं क्या? बिना देखे मुझे उतना मजा नहीं आ रहा... " मम्मी ने खड़ा होकर कहा...

"मुझे तो कोई दिक्कत नहीं है... तुम अपनी देख लो चाची...!" सुन्दर ने कहा....

"एक मिनट...!" कहकर मम्मी मेरी तरफ आई.. मैंने घबराकर अपनी आँखें बंद कर ली... मम्मी ने मेरे पास आकर झुक कर देखा और मुझे थपकी सी देकर रजाई मेरे मुँह पर डाल दी...

कुछ ही देर बाद रजाई में से छन छन कर प्रकाश मुझ तक पहुँचने लगा... मैं बेचैन सी हो गयी.. मेरे कानों में 'सापड़ सापड़' और सुन्दर की हल्की हल्की सिसकियाँ सुनाई दे रही थी... मुँह ढक कर सोने की तो मुझे ऐसे भी आदत नहीं थी... फिर मुझे सारा 'तमाशा' देखने की ललक भी उठ रही थी...

कुछ ही देर बाद मैंने बिस्तर और रजाई के बीच थोड़ी सी जगह बनाई और सामने देखने लगी... मेरे अचरज का कोई ठिकाना न रहा.. "ये मम्मी क्या कर रही हैं?" मेरी समझ में नहीं आया....

घुटनों के बल बैठी हुई मम्मी ने अपने हाथ में पकड़ कर सुन्दर का भयानक लंड उपर उठा रखा था और सुन्दर के लंड के नीचे लटक रहे मोटे मोटे गोलों (टट्टों)को बारी बारी से अपने मुँह में लेकर चूस रही थी...

मेरी घिघ्घी बंधती जा रही थी... सब कुछ मेरे लिये अविश्वसनीय सपने जैसा था.. मैं तो अपनी पलकें तक झपकाना भूल चुकी थी.....

सुन्दर खड़ा खड़ा मम्मी का सर पकडें सिसक रहा था.. और मम्मी बार बार उपर देख कर मुस्करा रही थी... सुन्दर की आँखें पूरी तरह बंद थी... इसीलिए मैंने रजाई को थोड़ा सा और उपर उठा लिया....

कुछ देर बाद मम्मी ने गोलों को छोड़ कर अपनी पूरी जीभ बाहर निकाली और सुन्दर के लंड को नीचे से शुरू करके उपर तक चाट लिया.. मानों वह कोई आइसक्रीम हो....

"ओह्ह्हू... इश्ह्ह्ह्ह ... मेरा निकल जायेगा...!" सुन्दर की टांगें कांप उठी... पर मम्मी बार बार उपर नीचे नीचे उपर चाटती रही.. सुन्दर का पूरा लंड मम्मी के थूक से गीला होकर चमकने लगा था..

"तुम्हारे पास कितना टाइम है?" मम्मी ने लंड को हाथ से सहलाते हुए पूछा....

"मेरे पास तो पूरी रात है चाची... क्या इरादा है?" सुन्दर ने सांस भर कर कहा...

"तो निकल जाने दो..." मम्मी ने कहा और लंड के सुपाड़े पर मुँह लगा कर अपने होंठ को लंड पर...तेजी से आगे पीछे करने लगी...

अचानक सुन्दर ने अपने घुटनों को थोड़ा सा मोड़ा और दीवार से सटकर मम्मी के बालों को खींचते हुए लंड को उसके मुँह में ठूसने की कोशिश करने लगा... 'टमाटर' तो मम्मी के मुँह में घुस भी गया था.. पर शायद मम्मी का दम घुटने लगा और उन्होंने किसी तरह उसको निकल दिया...

सुन्दर का लंड मम्मी के चेहरे पर गाढ़े वीर्य की पिचकारियाँ सी छोड़ रहा था.. .. मम्मी ने वापस सुपाड़े के आगे मुँह खोला और सुन्दर के रस को गटकने लगी... जब खेल खत्म हो गया तो मम्मी ने हँसते हुए कहा," सारा चेहरा खराब कर दिया.."

"मैं तो अंदर ही छोड़ना चाहता था चाची... तुमने ही मुँह हटा लिया.." सुन्दर के चेहरे से संतुष्टि झलक रही थी....

"कमाल का लंड है तुम्हारा... मुझे पहले पता होता तो मैं कभी तुम्हे न तडपाती..." मम्मी ने सिर्फ इतना ही कहा और सुन्दर की शर्ट से अपने चेहरे को साफ़ करने लगी.....

मुझे तो तब तक इतना ही पता था की 'लुल्ली' मूतने के काम आती है... आज पहली बार पता चला की 'ये' और कुछ भी छोड़ता है.. जो बहुत मीठा होता होगा... तभी तो मम्मी चटखारे ले लेकर उसको बाद में भी चाटती रही...

"अब मेरी बारी है... कपड़े निकल दो..." सुन्दर ने मम्मी को खड़ा करके उनके चूतड़ अपने हाथों में पकड़ लिये....

"तुम पागल हो क्या? परसों कोठड़े में सारे निकल दूँगी... आज सिर्फ सलवार नीचे करके 'चोद' लो..." मम्मी ने नाडा ढीला करते हुए कहा...

मेरा अश्लील शब्दकोष उनकी बातों के कारण बढ़ता ही जा रहा था...

"मन तो कर रहा है चाची की तुम्हे अभी नंगी करके खा जाऊं! पर अपना वादा याद रखना... परसों खेत वाला..." सुन्दर ने कहा और मम्मी को झुकाने लगा.. पर मम्मी तो सब जानती थी... हल्का सा इशारा मिलते ही मम्मी ने उलटी होकर झुकाते हुए अपनी कोहनिया फर्श पर टिका ली और घुटनों के बल होकर जाँघों को खोलते हुए अपने चूतड़ों को उपर उठा लिया...

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10-02-2010, 12:04 PM
Post: #13
RE: कामांजलि
सुन्दर मम्मी का दीवाना यूँ ही नहीं था.. न ही उसने मम्मी की झूठी तारीफ़ की थी... आज भी मम्मी जब चलती हैं तो देखने वाले देखते रह जाते हैं.. चलते हुए मम्मी के चूतड़ ऐसे थिरकते हैं मानों चूतड़ नहीं कोई तबला हो जो हल्की सी थाप से ही पूरा कांपने लगता है... कटोरे के आकर के दोनों चूतड़ों का उठान और उनके बीच की दरार; सब कातिलाना थे...

मम्मी के कसे हुए शरीर की दूधिया रंगत और उस पर उनकी कातिल अदायें; कौन न मर मिटे!

खैर, मम्मी के कोहनियों और घुटनों के बल झुकाते ही सुन्दर उनके पीछे बैठ गया... अगले ही पल उन्होंने मम्मी के चूतड़ों पर थपकी मार कर सलवार और कच्छी को नीचे खींच दिया. इसके साथ ही सुन्दर के मुँह से लार टपक गयी," क्या मस्त गोरे कसे हुए चूतड़ हैं चाची..!" कहते हुए उसने अपने दोनों हाथ मम्मी के चूतड़ों पर चिपका कर उन्हें सहलान शुरू कर दिया...

मम्मी मुझसे 90 डिग्री के एंगेल पर झुकी हुई थी, इसीलिए मुझे उनके ऊँचे उठे हुए एक चूतड़ के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था.. पर मैं टकटकी लगाये तमाशा देखती रही.....

"हाय चाची! तेरी चूत कितनी रसीली है अभी तक... इसको तो बड़े प्यार से ठोकना पड़ेगा... पहले थोड़ी चूस लूं..." उसने कहा और मम्मी के चूतड़ों के बीच अपना चेहरा घुसा दिया.... मम्मी सिसकते हुए अपने चूतड़ों को इधर उधर हटाने की कोशिश करने लगी...

"आआइश्ह्ह्ह्ह ...अब और मत तड़पाओ सुन्दर..आआअह्हह्ह .... मैं तैयार हूँ.. ठोक दो अंदर!"

"ऐसे कैसे ठोक दूँ अंदर चाची...? अभी तो पूरी रात पड़ी है...." सुन्दर ने चेहरा उठाकर कहा और फिर से जीभ निकल कर चेहरा मम्मी की जाँघों में घुसा दिया...

"समझा करो सुन्दर... आआहहह...फर्श मुझे चुभ रहा है... थोड़ी जल्दी करो..!" मम्मी ने अपना चेहरा बिल्कुल फर्श से सटा लिया.. उनके 'दूध' फर्श पर टिक गये....," अच्छा.. एक मिनट... मुझे खड़ी होने दो...!"

मम्मी के कहते ही सुन्दर ने अच्छे बच्चे की तरह उन्हें छोड़ दिया... और मम्मी ने खड़ा होकर मेरी तरफ मुँह कर लिया... जैसे ही सुन्दर ने उनका कमीज उपर उठाया.. मम्मी की पूरी जांघें और उनके बीच छोटे छोटे गहरे काले बालों वाली मोटी मोटी चूत की फांकें मेरे सामने आ गयी... एक बार तो खुद में ही शर्मा गयी... गर्मियों में जब मैं कई बार छोटू के सामने नंगी ही बाथरूम से निकल आती तो मम्मी मुझे 'शेम शेम' कह कर चिड़ाती थी... फिर आज क्यूँ अपनी शेम शेम को सुन्दर के सामने परोस दिया; उस वक्त मेरी समझ से बाहर था....

सुन्दर घुटने टेक कर मम्मी के सामने मेरी तरफ पीठ करके बैठ गया और मम्मी की चूत मेरी नजरों से छिपी गयी... अगले ही पल मम्मी आँखें बंद करके सिसकने लगी... उनके मुँह से अजीब सी आवाजें आ रही थी...

मैं हैरत से सब कुछ देख रही थी...

"बस-बस... मुझसे खड़ा नहीं रहा जा रहा सुन्दर... दीवार का सहारा लेने दो..", मम्मी ने कहा और साइड में होकर दीवार से पीठ सटा कर खड़ी हो गयी... उन्होंने अपने एक पैर से सलवार बिल्कुल निकल दी और सुन्दर के उनके सामने बैठते ही अपनी नंगी टांग उठाकर सुन्दर के कंधे पर रख दी..

अब सुन्दर का चेहरा और मम्मी की चूत मुझे आमने सामने दिखाई दे रहे थे.. हाय राम! सुन्दर ने अपनी जीभ बाहर निकाली और मम्मी की चूत में घुसेड़ दी.. मम्मी पहले की तरह ही सिसकने लगी... मम्मी ने सुन्दर का सर कसकर पकड़ रखा था और सुन्दर अपनी जीभ को कभी अंदर बाहर और कभी उपर नीचे कर रहा था...

अनजाने में ही मेरे हाथ अपनी सलवार में चले गये.. मैंने देखा; मेरी चूत भी चिपचिपी सी हो रखी है.. मैंने उसको साफ़ करने की कोशिश की तो मुझे बहुत मजा आया....

अचानक मम्मी पर मानों पहाड़ सा टूट पड़ा... जल्दी में सुन्दर के कंधे से पैर हटाने के चक्कर में मम्मी लड़खड़ा कर गिर पड़ी... उपर से पापा जोर जोर से बडबडाते हुए आ रहे थे...,"साली, कमीनी, कुतिया! कहाँ मर गयी....?"

सुन्दर भाग कर हमारी खाट के नीचे घुस गया... पर मम्मी जब तक संभल कर खड़ी होती, पापा नीचे आ चुके थे.. मम्मी अपनी सलवार भी पहन नहीं पाई थी...

पापा नींद में थे और शायद नशे में भी.. कुछ पल मम्मी को टकटकी लगाये देखते रहे फिर बोले," बहनचोद कुतिया.. यहाँ नंगी होकर क्या कर रही है..? किसी यार को बुलाया था क्या?" और पास आकर एक जोर का थप्पड़ मम्मी को जड़ दिया....

मैं सहम गयी थी...

मम्मी थरथराते हुए बोली...,"नन्नहीं... वो ....मेरी सलवार में कुछ घुस गया था... पता नहीं क्या था..."

"हमेशा 'कुछ' तेरी सलवार में ही क्यूँ घुसता है कुतिया... तेरी चूत कोई शहद का छत्ता है क्या?..." पापा ने घूरते हुए मम्मी का गला पकड़ लिया...

मम्मी गिडगिडाते हुए पापा के क़दमों में आ गिरी,"प्लीज.. ऐसा मत कहीये.. मेरा तो सब कुछ आप का ही है....!"

"हमममम ... ये भी तो तेरा ही है.. ले संभल इसको.. खड़ा कर..." मैं अचरज से पापा का लंड देखती रह गयी.. उन्होंने अपनी चेन खोलकर अपना लंड बाहर निकल लिया और मम्मी के मुँह में ठूसने लगे... मैं सुन्दर का लंड देखने के बाद उनका लंड देख कर हैरान थी.. उनका लंड तो छोटा सा था बिल्कुल.. और मरे हुए चूहे की तरह लटक रहा था....

"उपर चलिए आप.. मैं कर दूँगी खड़ा... यहाँ छोटी उठ जायेगी... जैसे कहोगे वैसे कर लूंगी...." कहते हुए मम्मी उठी और पापा के लंड को सहलाते हुए उन्हें उपर ले गयी...

उनके उपर जाते ही सुन्दर हडबडाहट में मेरी चारपाई के नीचे से निकला और दरवाजा खोल कर भाग गया...

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10-02-2010, 12:05 PM
Post: #14
RE: कामांजलि
तीसरे दिन मैं जानबूझ कर स्कूल नहीं गयी.. दीदी और छोटू स्कूल जा चुके थे... और पापा शहर....

"अब पड़ी रहना यहाँ अकेली... मैं तो चली खेत में.." मम्मी सजधज कर तैयार हो गयी थी.. खेत जाने के लिये...!

"नहीं मम्मी.. मैं भी चलूंगी आपके साथ.....!" मैंने जिद करते हुए कहा....

"पागल है क्या? तुझे पता नहीं.. वहाँ कितने मोटे मोटे सांप आ जाते हैं... खा जायेंगे तुझे..." मम्मी ने मुझे डराते हुए कहा....

मेरे जहन में तो सुन्दर का 'सांप' ही चक्कर काट रहा था.. वही दुबारा देखने ही तो जाना चाहती थी खेत में...," पर आपको खा गये तो मम्मी...?" मैंने कहा..

"मैं तो बड़ी हूँ बेटी.. सांप को काबू में कर लूंगी... मार भी दूँगी... तू यहीं रह और सो जा!" मम्मी ने जवाब दिया....

"तो आप मार लेना सांप को... मैं तो दूर से ही देखती रहूँगी.... कुछ बोलूँगी नहीं...." मैंने जिद करते हुए कहा...

"चुप कर.. ज्यादा बकवास मत कर... यहीं रह.. मैं जा रही हूँ...!" मम्मी चल दी...

मैं रोती हुई नीचे तक आ गयी.. मेरी आँखों से मोटे मोटे आँसू टपक रहे थे...सुन्दर के 'सांप' को देखने के लिये बेचैन ही इतनी थी मैं.. आखिरकार मेरी जिद के आगे मम्मी को झुकना पड़ा... पर वो मुझे खेत नहीं ले गयी.. खुद भी घर पर ही रह गयी वो!

मम्मी को कपड़े बदल कर मुँह चढ़ाये घर में बैठे 2 घंटे हो गये थे.. मैं उठी और उनकी गोद में जाकर बैठ गयी,"आप नाराज हो मम्मी?"

"हाँ... और नहीं तो क्या? खेत में इतना काम है... तेरे पापा आते ही मेरी पिटाई करेंगे...!" मम्मी ने कहा....

"पापा आपको क्यूँ मारते हैं मम्मी.. ? मुझे पापा बहुत गंदे लगते हैं...

"आप भी तो बड़ी हो.. आप उन्हें क्यूँ नहीं मारती?" मैंने भोलेपन से पूछा...

मम्मी कुछ देर चुप ही रही और फिर एक लंबी सांस ली," छोड़ इन बातों को.. तू आज फिर मेरी पिटाई करवाना चाहती है क्या?"

"नहीं मम्मी..!" मैंने मायूस होकर कहा...

"तो फिर मुझे जाने क्यूँ नहीं देती खेत मैं?" मम्मी ने नाराज होकर अपना मुँह फुलाते हुए कहा....

पता नहीं मैं क्या जवाब देती उस वक्त.. पर इससे पहले मैं बोलती.. नीचे से सुन्दर की आवाज आ गयी,"चाचा.... ओ चाचा!"

मम्मी अचानक खड़ी हो गयी और नीचे झाँका.. सुन्दर उपर ही आ रहा था..

"उपर आते ही उसने मेरी और देखते हुए पूछा," चाचा कहाँ हैं अंजु?"

"शहर गये हैं...!" मैंने जवाब देते हुए उनकी पेंट में 'सांप' ढूंढने की कोशिश की.. पर हल्के उभर के अलावा मुझे कुछ नजर नहीं आया...

"अच्छा... तू आज स्कूल क्यूँ नहीं गयी?" बाहर चारपाई पर वो मेरे साथ बैठ गया और मम्मी को घूरने लगा... मम्मी सामने खड़ी थी....

"बस ऐसे ही.. मेरे पेट में दर्द था..." मैंने वही झूठ बोला जो सुबह मम्मी को बोला था...

सुन्दर ने मेरी तरफ झुक कर एक हाथ से मेरा चेहरा थामा और मेरे हठों के पास गालों को चूम लिया.. मुझे अपने बदन में गुदगुदी सी महसूस हुई...

"ये ले....और बाहर खेल ले....!" सुन्दर ने मेरे हाथ में 5 रुपये का सिक्का रख दिया...

उस वक्त 5 रुपये मेरे लिये बहुत थे.. पर मैं बेवकूफ नहीं थी.. मुझे पता था तो मुझे घर से भगाने के लिये ऐसा बोल रहा है," नहीं.. मेरा मन नहीं है.. मैंने पैसे अपनी मुठ्ठी में दबाये और मम्मी का हाथ पकड़ कर खड़ी हो गयी...

"जा न छोटी... कभी तो मेरा पीछा छोड़ दिया कर!" मम्मी ने हल्के से गुस्से में कहा....

मैं सर उपर उठा उनकी आँखों में देखा और हाथ और भी कसकर पकड़ लिया," नहीं मम्मी.. मुझे नहीं खेलना....!"

"तुम आज खेत में नहीं गयी चाची... क्या बात है?" सुन्दर की आवाज में विनम्रता थी.. पर उसके चेहरे से धमकी सी झलक रही थी...

"ये जाने दे तब जाऊं न.. अब इसको लेकर खेत कैसे आती..!" मम्मी ने बुरा सा मुँह बनाकर कहा....

"आज खाली नहीं जाऊँगा चाची.. चाहे कुछ हो जाये.. बाद में मुझे ये मत कहना की बताया नहीं.." सुन्दर ने घूरते हुए कहा और अंदर कमरे में जाकर बैठ गया....

"अब मैं क्या कर सकती हूँ.. तुम खुद ही देख लो!" मम्मी ने विवश होकर अंदर जाकर कहा.. उनकी उंगली मजबूती से पकड़े मैं उनके साथ साथ जाकर दरवाजे के पीछे खड़ी हो गयी... मम्मी दरवाजे के सामने अंदर की और चेहरा किये खड़ी थी....

अचानक पीछे से कोई आया और मम्मी को अपनी बाहों में भरकर झटके से उठाया और बेड पर लेजाकर पटक दिया.. मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आया..

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10-02-2010, 12:06 PM
Post: #15
RE: कामांजलि
मम्मी ने चिल्लाने की कोशिश की तो वह मम्मी के उपर सवार हो गया और उनका मुँह दबा लिया," तू तो बड़ी कमीनी निकली भाभी.. पता है कितनी देर इंतजार करके आयें हैं खेत में..." फिर सुन्दर की और देखकर बोला,"क्या यार? अभी तक नंगा नहीं किया इस रंडी को.."

उसके चेहरा सुन्दर की और घूमने पर मैंने उन्हें पहचाना.. वो अनिल चाचा थे... हमारे घर के पास ही उनका घर था.. पेशे से डॉक्टर...मम्मी की ही उमर के होंगे... मम्मी को मुश्किल में देख मैं भागकर बिस्तर पर चढ़ी और चाचा को धक्का देकर उनको मम्मी के उपर से हटाने की कोशिश करने लगी,"छोड़ दो मेरी मम्मी को!" मैं रोने लगी...

अचानक मुझे देख कर वो सकपका गया और मम्मी के उपर से उतर गया," तुम.. तुम यहीं हो छोटी?"

मम्मी शर्मिंदा सी होकर बैठ गयी," ये सब क्या है? जाओ यहाँ से.. और सुन्दर की और घूरने लगी... सुन्दर खिसिया कर हँसने लगा...

"अबे पहले देख तो लेता...!" सुन्दर ने अनिल चाचा से कहा....

"बेटी.. तेरी मम्मी का ईलाज करना है... जा बाहर जाकर खेल ले..!" चाचा ने मुझे पुचकारते हुए कहा... पर मैं वहाँ से हिली नहीं...

"जाओ यहाँ से.. वरना मैं चिल्ला दूँगी!" मम्मी विरोध पर उतर आई थी... शायद मुझे देख कर...

"छोड़ न तू .. ये तो बच्ची है.. क्या समझेगी... और फिर ये तेरी प्रॉब्लम है.. हमारी नहीं.. इसको भेजना है तो भेज दे.. वरना हम इसके आगे ही शुरू हो जायेंगे..." सुन्दर ने कहा और सरक कर मम्मी के पास बैठ गया.... मम्मी अब दोनों के बीच बैठी थी...

"तू जा न बेटी.. मुझे तेरे चाचा से ईलाज करवाना है.. मेरे पेट में दर्द रहता है..." मम्मी ने हालात की गंभीरता को समझते हुए मुझसे कहा...

मैंने न मैं सर हिला दिया और वहीं खड़ी रही....

वो इंतजार करने के मूड में नहीं लग रहे थे.. चाचा मम्मी के पीछे जा बैठे और उनके दोनों तरफ से पैर पसार कर मम्मी की चूचियों को दबोच लिया.. मम्मी सिसक उठी.. वो विरोध कर रही थी पर उनपर कोई असर नहीं हुआ...

"नीचे से दरवाजा बंद है न?" सुन्दर ने चाचा से पूछा और मम्मी की टांगों के बीच बैठ गया...

"सब कुछ बंद है यार.. आजा.. अब इसकी खोल दें.." चाचा ने मम्मी का कमीज खींच कर उनकी ब्रा से उपर कर दिया....

"एक मिनट छोडो भी... " मम्मी ने झल्लाकर कहा तो वो ठिठक गये," अच्छा छोटी.. रह ले यहीं.. पर किसी को बोलेगी तो नहीं न.. देख ले... मैं मर जाउंगी!"

"नहीं मम्मी.. मैं किसी को कुछ नहीं बोलेगी... आप मरना मत.. रात वाली बात भी नहीं बताउंगी किसी को..." मैंने भोलेपन से कहा तो तीनो अवाक से मुझे देखते रह गये...

"ठीक है.. आराम से कोने में बैठ जा!" सुन्दर ने कहा और मम्मी की सलवार का नाड़ा खींचने लगा....

कुछ ही देर बाद उन्होंने मम्मी को मेरे सामने ही पूरी तरह नंगी कर दिया..

मैं चुपचाप सारा तमाशा देखती जा रही थी.. मम्मी नंगी होकर मुझे और भी सुन्दर लग रही थी.. उनकी चिकनी चिकनी लंबी माँसल जांघें.. उनकी छोटे छोटे काले बालों में छिपी चूत.. उनका कसा हुआ पेट और सीने पर झूल रही मोटी मोटी चूचियाँ सब कुछ बड़ा प्यारा था...

सुन्दर मम्मी की जाँघों के बीच झुक गया और उनकी जाँघों को उपर हवा में उठा दिया.. फिर एक बार मेरी तरफ मुड़कर मुस्कराया और पिछली रात की तरह मम्मी की चूत को लपर लपर चाटने लगा....

मम्मी बुरी तरह सिसिया उठी और अपने चूतड़ों को उठा उठा कर पटकने लगी.. चाचा मम्मी की दोनों चूचियों को मसल रहा था और मम्मी के निचले होंठ को मुँह में लेकर चूस रहा था...

करीब 4-5 मिनट तक ऐसे ही चलता रहा... मैं समझने की कोशिश कर ही रही थी की आखिर ये ईलाज कौनसा है.. तभी अचानक चाचा ने मम्मी के होंठों को छोड़कर बोला," पहले तू लेगा या मैं ले लूं..?"

सुन्दर ने जैसे ही चेहरा उपर उठाया, मुझे मम्मी की चूत दिखाई दी.. सुन्दर के थूक से वो अंदर तक सनी पड़ी थी.. और चूत के बीच की पत्तियां अलग अलग होकर फांकों से चिपकी हुई थी.. मुझे पता नहीं था की ऐसा क्यूँ हो रहा है.. पर मेरी जाँघों के बीच भी खलबली सी मची हुई थी...

"मैं ही कर लेता हूँ यार! पर थोड़ी देर और रुक जा.. चाची की चूत बहुत मीठी है..." सुन्दर ने कहा और अपनी पेंट निकल दी.. इसी पल का तो मैं इंतजार कर रही थी.. सुन्दर का कच्छा सीधा उपर उठा हुआ था और मुझे पता था की क्यूँ?

सुन्दर वापस झुक गया और मम्मी की चूत को फिर से चाटने लगा... उसका भारी भरकम लंड अपने आप ही उसके कच्छे से बाहर निकल आया और मेरी आँखों के सामने लटका हुआ रह रह कर झटके मार रहा था...

चाचा ने मेरी और देखा तो मैंने शर्माकर अपनी नजरें झुका ली....

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10-02-2010, 12:06 PM
Post: #16
RE: कामांजलि
मम्मी ने अपना मुँह पूरा खोल दिया और सुन्दर ने अपना लंड उनके होंठों पर रख कर थोड़ा सा अंदर कर दिया... इसके साथ ही सुन्दर की आँखें बंद हो गयी और वो सिसकता हुआ मम्मी को शायद वही रस पिलाने लगा जो उसने पिछली रात पिलाया था....मम्मी भी आँखें बंद किये उसका रस पीती जा रही थी.. पीछे से मम्मी को चाचा के धक्के लग रहे थे...

"ले.. अब मुँह में लेकर इसको साफ़ कर दे..." सुन्दर ने कहा और मम्मी ने उसका लंड थोड़ा सा और मुँह में ले लिया.....रस निकल जाने के बाद सुन्दर का लंड शायद थोड़ा पतला हो गया होगा...

अचानक चाचा हटे और सीधे खड़े हो गये... वो भी शायद मम्मी के मुँह की और जान चाहते थे.. पर जाने क्या हुआ.. अचानक रुक कर उन्होंने अपना लंड जोर से खींच लिया और मम्मी के नितंबो पर ही रस की धार छोड़ने लगे...

मुझे नहीं पता था की मुझे क्या हो गया है.. पर मैं पूरी तरह से लाल हो चुकी थी.. मेरी कच्छी भी 2 तीन बार गीली हुई.. ऐसा लगता था....

सुन्दर बिस्तर से उतर कर अपनी पेंट पहनने लगा और मेरी और देख कर मुस्कराया," तू भी बहुत गरम माल बनेगी एक दिन.. साली इतने चस्के से सब कुछ देख रही थी... थोड़ी और बड़ी हो जा जल्दी से.. फिर तेरी मम्मी की तरह तुझे भी मजे दूँगा..."मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ कर लिया....

चाचा के बिस्तर से नीचे उतरते ही मम्मी निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ी.. उन्होंने बिस्तर की चादर खींच कर अपने बदन और चेहरे को ढक लिया... वो दोनों कपड़े पहन वहाँ से निकल गये....

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10-02-2010, 12:07 PM
Post: #17
RE: कामांजलि
वो दिन था और आज का दिन.. एक एक पल ज्यों का त्यों याद करते ही आँखों के सामने दौड़ जाता है... वो भी जो मैंने उनके जाने के बाद मम्मी के पास बैठ कर पूछा था...," ये कैसा ईलाज था मम्मी?"

"जब बड़ी होगी तो पता चल जायेगा.. बड़ी होने पर कई बार पेट में अजीब सी गुदगुदी होती है.. ईलाज न करवाएं तो लड़की मर भी सकती है.. पर शादी के बाद की बात है ये.. तू भूल जा सब कुछ.. मेरी बेटी है न?"

"हाँ मम्मी!" मैं भावुक होकर उनके सीने से चिपक गयी...

"तो बताएगी नहीं न किसी को भी...?" मम्मी ने प्यार से मुझे अपनी बाहों में भर लिया...

"नहीं मम्मी... तुम्हारी कसम! पर ईलाज तो चाचा करते हैं न... सुन्दर क्या कर रहा था...?" मैंने उत्सुकता से पूछा....

"वो अपना ईलाज करा रहा था बेटी... ये प्रॉब्लम तो सबको होती है..." मम्मी ने मुझे बरगलाया....

"पर आप तो कह रहे थे की शादी के बाद होता है ये ईलाज.. उसकी तो शादी भी नहीं हुई..?" मैंने पूछा था...

"अब बस भी कर.. बहुत सयानी हो गयी है तू... मुझे नहीं पता..." मम्मी ने बिदक कर कहा और उठ कर कपड़े पहनने लगी...

" पर उन्होंने आपके साथ अपना ईलाज क्यूँ किया? अपने घर पर क्यूँ नहीं.. उनकी मम्मी हैं, बहन हैं.. कितनी ही लड़कियां तो हैं उनके घर में.. !" मुझे गुस्सा आ रहा था.. 5 रुपये में अपना ईलाज कराके ले गया कमीना!

"तुझे नहीं पता बेटी... हमें उनका बहुत सा कर्जा चूकाना है.. अगर मैं उसको ईलाज करने नहीं देती तो वो मुझे उठा ले जाता हमेशा के लिये... पैसों के बदले में... फिर कौन बनती तेरी मम्मी..?" मम्मी ने कपड़े पहन लिये थे....

मैं नादान एक बार फिर भावुक होकर उनसे लिपट गयी.. मैंने मुठ्ठी खोल कर अपने हाथ में रखे 5 रुपये के सिक्के को नफरत से देखा और उसको बाहर छत पर फैंक दिया," मुझे नहीं चाहिए उसके रुपये.. मुझे तो बस मम्मी चाहिए..."

उसके बाद जब भी मैं उसको देखती.. मुझे यही याद आता की हमें उनका कर्ज उतारना है.. नहीं तो वो एक दिन मम्मी को उठा कर ले जायेगा... और मेरी आँखें उसके लिये घृणा से भर उठी.. हर बार उसके लिये मेरी नफरत बढ़ती ही चली गयी थी...

सालों बाद, जब मुझे ये अहसास हो गया था की मम्मी झूठ बोल रही थी.. तब भी; मेरी उसके लिये नफरत बरकरार रही जो आज तक ज्यों की त्यों है.... यही वजह थी की उस दिन अपने बदन में सुलग रही यौवन की आग के बावजूद उसको खुद तक आने नहीं दिया था....

खैर.. मैं उस दिन शाम को फिर नहा धोकर तैयार हो चश्मू के आने का इंतजार करने लगी....

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10-02-2010, 12:07 PM
Post: #18
RE: कामांजलि
ठीक पिछले दिन वाले टाइम पर ही तरुण ने नीचे आकर आवाज लगायी... मुझे पता था की वो शाम को ही आयेगा.. पर क्या करती, निगोड़ा दिल उसके इंतजार में जाने कब से धड़क रहा था.. मैं बिना अपनी किताबें उठाये नीचे भागी.. पर नीचे उसको अकेला देखकर मैं हैरान रह गयी...

"रिंकी नहीं आई क्या?" मैंने बड़ी अदा से अपनी भीनी मुस्कान उसकी और उछाली....

"नहीं.. उसका फोन आ गया था.. वो बीमार है.. आज स्कूल भी नहीं गयी वो!" तरुण ने सहज ही कहा....

"अच्छा... क्या हुआ उसको? कल तक तो ठीक थी..." मैंने उसके सामने खड़ी होकर अपने हाथों को उपर उठा एक मादक अंगडाई ली.. मेरा सारा बदन चटक गया.. पर उसने देखा तक नहीं गौर से... जाने किस मिट्टी का बना हुआ था....

"पता नहीं.. आओ!" कहकर वो कमरे में जाने लगा....

"उपर ही चलो न! चारपाई पर तंग हो जाते हैं..." मैं बाहर ही खड़ी थी..

"कहा तो था कल भी, की चेअर डाल लो... यहीं ठीक है.. कल यहाँ चेअर डाल लेना.." उसने कहा और चारपाई पर जाकर बैठ गया...

"आ जाओ न.. उपर कोई भी नहीं है..." मैं दोनों हाथों को दरवाजे पर लगाकर खड़ी हो गयी... आज भी मैंने स्कूल ड्रेस ही डाली थी.. मेरी स्कर्ट के नीचे दिख रही घुटनों तक की चिकनी टांगें किसी को भी उसके अंदर झाँकने को ललायित कर सकती थी.. पर तरुण था की मेरी और देख ही नहीं रहा था," उपर टेबल भी है और चेअरस भी... चलो न उपर!" मैंने आग्रह किया....

अब की बार वो खड़ा हो गया.. अपने चश्मा ठीक किये और 2 कदम चल कर रुक गया," चलो!"

मैं खुशी खुशी उसके आगे आगे मटकती हुई चलकर सीढियां चढ़ने लगी.. यूँ तो मेरी कोशिश के बिना भी चलते हुए मेरी कमर में कामुक लचक रहती थी... जान बूझ कर और बल खाने से तो मेरे पिछवाड़े हाहाकार मच रहा होगा.. मुझे विश्वास था....

उपर जाने के बाद वो बाहर ही खड़ा रह गया.. मैंने अंदर जाने के बाद मुड़कर देखा," आओ न.. अंदर!" मैंने मुस्कराकर उसको देखा... मेरी मुस्कराहट में हरपल एक कातिल निमंत्रण रहता था.. पर जाने क्यूँ वह समझ नहीं पा रहा था... या फिर जानबूझ कर मुझे तड़पा रहा हो.... शायद!

तरुण अंदर आकर कुर्सी पर बैठ गया.. टेबल के सामने...

"कौनसी बुक लेकर आऊं पहले!" मेरे चेहरे पर अब भी वैसी ही मुस्कान थी...

"साईंस ले आओ! पहले वही पढ़ लेते हैं.." तरुण ने मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने की पहली बार कोशिश सी की... मुझे बड़ा आनंद आया.. मेरी और उसको यूँ लगातार देखते पाकर....

"ठीक है..." मैंने कहा और बैग में किताब ढूंढने लगी... किताब मुझे मिल गयी पर मैंने उसके देखने के ढंग से उत्साहित होकर नहीं निकाली," पता नहीं कहाँ रख दी... रात को मैं पढ़ रही थी.. हम्म्म्म? " मैंने थोड़ा सोचने का नाटक किया और उसकी तरफ पीठ करके अपने घुटने जमीन पर रखे और चूतड़ों को उपर उठा आगे से बिल्कुल झुक कर बेड के नीचे झाँकने लगी... ठीक उसी तरह जिस तरह अनिल चाचा ने मम्मी को झुका रखा था उस दिन; बेड पर....

इस तरह झुक कर अपने चूतड़ उपर उठाने से यक़ीनन मेरी स्कर्ट जांघों तक खिसक आई होगी.. और उसको मेरी चिकनी गदराई हुई गोरी जांघें मुफ्त में देखने को मिली होगी... मैं करीब 30-40 सेकंड तक उसी पोजीशन में रहकर बेड के नीचे नजरें दौड़ाती रही...

जब मैं खड़ी होकर पलटी तो उसका चेहरा देखने लायक था.. उसने नजरें जमीन में गड़ा रखी थी... उसके गोरे गाल लाल हो चुके थे.. ये इस बात का सबूत था की उसने 'कुछ' न 'कुछ' तो जरूर देखा है...

"यहाँ तो नहीं मिली.. क्या करूँ?" मैं उसकी और देख कर एक बार फिर मुस्कराई.. पर उसने कोई रिस्पोंस न दिया....

"मुझे अलमारी के उपर चढ़ा दोगे क्या? क्या पता मम्मी ने उपर फैंक दी हो..." मेरे मन में सब कुछ क्लीअर था की अब की बार क्या करना है...

"रहने दो.. मैं देख लेता हूँ.." वो कहकर उठा और अलमारी को उपर से पकड़ कर कोहनियाँ मोड़ उपर सरक गया,"नहीं.. यहाँ तो कुछ भी नहीं है... छोडो.. तुम मैथ ही ले आओ.. कल तक ढूंढ लेना..."

मैंने मायूस सी होकर मैथ की किताब बैग से निकल कर टेबल पर पटक दी.. अब काठ की हाँदी बार बार चढ़ाना तो ठीक नहीं है न....

"वो पढ़ाने लगा ही था की मैंने टोक दिया," यहाँ ठीक से दिखाई नहीं दे रहा.. सामने बेड पर बैठ जाऊं क्या?"

"लगता है तुम्हारा पढ़ने का मन है ही नहीं.. अगर नहीं है तो बोल दो.. बेकार की मेहनत करने का क्या फ़ायदा..." तरुण ने हल्की सी नाराजगी के साथ कहा....

मैंने अपने रसीले होंठ बाहर निकाले और मासूम बनने की एक्टिंग करते हुए हाँ में सर हिला दिया," कल कर लेंगे पढाई.. आज रिंकी भी नहीं है.. उसकी समझ में कैसे आयेगा नहीं तो?"

"ठीक है.. मैं चलता हूँ.. अब जब रिंकी ठीक हो जायेगी.. तभी आऊँगा..." वह कहकर खड़ा हो गया....

"अरे बैठो बैठो... एक मिनट..." मैंने पूरा जोर लगाकर उसको वापस कुर्सी पर बिठा ही दिया... वो पागल हुआ हो न हो.. पर मैं उसको छू कर मदहोश जरूर हो गयी थी.....

"क्या है अब!" उसने झल्ला कर कहा....

"बस एक मिनट..." मैंने कहा और किचन में चली गयी.....

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10-02-2010, 12:08 PM
Post: #19
RE: कामांजलि
कुछ ही पलों बाद में अपने हाथों में चाय और बिस्कुट्स लेकर उसके सामने थी.. मैंने वो सब टेबल पर उसके सामने परोस दिया.. परोस तो मैंने खुद को भी दिया ही था उसके सामने, पर वो समझे तब न!

"थैंक्स.. पर इसकी क्या जरूरत थी..." उसने पहली बार मुस्करा कर मेरी और देखा... मैं खुश होकर उसके सामने बेड पर बैठ गयी...

"अंजलि! तुम स्कूल क्यूँ नहीं जाती...? रिंकी बता रही थी..." चाय की पहली चुस्की लेते हुए उसने पूछा....

"अब क्या बताऊँ?" मैंने बुरा सा मुँह बना लिया....

"क्यूँ क्या हुआ?" उसने हैरत से मेरी और देखा.. मैंने कहा ही इस तरह से था की मानों बहुत बड़ा राज मैं छिपाने की कोशिश कर रही हूँ.. और पूछने पर बता दूँगी....

"वो...." मैंने बोलने से पहले हल्का सा विराम लिया," पापा ने मना कर दिया..."

"पर क्यूँ?" वह लगातार मेरी और ही देख रहा था.....

"वो कहते हैं की...." मैं चुप हो गयी और जानबूझ कर अपनी टांगों को मोड़ कर खोल दिया... उसकी नजरें तुरंत झुक गयी.. मैं लगातार उसकी और देख रही थी.. नजरें झुकाने से पहले उसकी आँखें कुछ देर मेरी स्कर्ट के अंदर जाकर ठहरी थी... मेरी कच्छी के दर्शन उसको जरूर हुए होंगे....

कुछ देर यूँही ही नजरें झुकी रहने के बाद वापस उपर उठने लगी.. पर इस बार धीरे धीरे... मैंने फिर महसूस किया.. मेरी जांघों के बीच झाँकता हुआ वो कसमसा उठा था.... उसने फिर मेरी आँखों में आँखें डाल ली....

"क्या कहते हैं वो.." उसकी नजरें बार बार नीचे जा रही थी...

मैंने जांघें थोड़ी सी और खोल दी...," वो कहते हैं की मैं जवान हो गयी हूँ.. आप ही बताओ.. जवान होना न होना क्या किसी के हाथ में होता है... ये क्या कोई बुरी बात है.... मैं क्या सच में इतनी जवान हो गयी हूँ की स्कूल ही न जा सकूं?"

एक बार फिर उसने नजरें झुका कर स्कर्ट के अंदर की मेरी जवानी का जायेजा लिया... उसके चेहरे की बदली रंगत ये पुष्टि कर रही थी की उसका मन भी मान रहा है की मैं जवान हो चुकी हूँ; और पके हुए रसीले आम की तरह मुझे तोड़ा नहीं गया तो मैं खुद ही टूटकर गिरने को बेताब हूँ.....

"ये तो कोई बात नहीं हुई... जरूर कोई दूसरी वजह रही होगी... तुमने कोई शरारत की होगी.. तुम छिपा रही हो..." अब उसकी झिझक भी खुल सी गयी थी.. अब वह उपर कम और मेरी जाँघों के बीच ज्यादा देख रहा था.. उसकी जाँघों के बीच पेंट का हिस्सा अब अलग ही उभरा हुआ मुझे दिखाई दे रहा था....

"नहीं.. मैंने कोई शरारत नहीं की.. वो तो किसी लड़के ने मेरे बैग में गंदी गंदी बातें लिख कर डाल दी थी.. वो पापा को मिल गया..." पूरी बेशर्मी के साथ बोलते बोलते मैंने उसके सामने ही अपनी स्कर्ट में हाथ डाल अपनी कच्छी को ठीक किया तो वो पगला सा गया....

"आ..ऐसा क्या किया था उसने...? मतलब ऐसा क्या लिखा था..." अब तो उसकी नजरें मेरी कच्छी से ही चिपक कर रह गयी थी.....

"मुझे शर्म आ रही है... !" मैंने कहा और अपनी जाँघों को सिकोड़ कर वापस आलथी पालथी लगा ली... मुझे लग रहा था की अब तक वो इतना बेसब्र हो चूका होगा की कुछ न कुछ जरूर कहेगा या करेगा....

मेरा शक गलत नहीं था... मेरी कच्छी के दर्शन बंद होते ही उसका लट्टू सा फ़्यूज़ हो गया... कुछ देर तो उसको कुछ सूझा ही नहीं... फिर अचानक उठते हुए बोला," अच्छा! मैं चलता हूँ... एक बात बोलूँ?"

"हाँ..!" मैंने शर्माकर अपनी नजरें झुका ली.. पर उसने ऐसा कुछ कहा की मेरे कानों से धुँआ उठने लगा...

"तुम सच में ही जवान हो चुकी हो.. जब कभी स्कर्ट पहनों तो अपनी टांगें यूँ न खोला करो.. वरना तुम्हारे पापा तुम्हारा टयूशन भी हटवा देंगे..." उसने कहा और बाहर निकलने लगा....

मैंने भागकर उसकी बाँह पकड़ ली," ऐसा क्यूँ कह रहे हो..?"

वो दरवाजे के साथ खड़ा था और मैं अपने दोनों हाथों से उसके हाथ पकड़े उसके सामने खड़ी थी....

"मैंने सिर्फ सलाह दी है.. बाकी तुम्हारी मरजी...!" उसने सिर्फ इतना ही कहा और अपनी नजरें मुझसे हटा ली.....

"तुम्हे मैं बहुत बुरी लगती हूँ क्या?" मैंने भरभरा कर कहा... उसके इस कदर मुझे लज्जित करके उठने से मैं आहत हुई थी... आज तक तो किसी ने भी नहीं किया था ऐसा... दुनिया मुझे एक नजर देखने को तरसती थी और मैंने उसको अपनी दुनिया ही दिखा दी थी... फिर भी!

"अब ये क्या पागलपन है... छोडो मुझे...!" उसने हल्का सा गुस्सा दिखाते हुए कहा....

नारी कुछ भी सहन कर सकती है.. पर अपने बदन की उपेक्षा नहीं.. मेरे अंदर का नारी-स्वाभिमान जाग उठा.. मैं उससे लिपट गयी.. चिपक गयी," प्लीज.. बताओ न.. मैं सुन्दर नहीं हूँ क्या? क्या कमी है मुझमे.. मुझे तड़पाकर क्यूँ जा रहे हो....."

मेरी छातियाँ उसमे गड़ी हुई थी... मैं उपर से नीचे तक उससे चिपकी हुई थी.. पर उसपर कोई असर न हुआ," हटो! अपने साथ क्यूँ मुझे भी जलील करने पर तूली हुई हो... छोडो मुझे... मैं आज के बाद यहाँ नहीं आने वाला..." कहकर उसने जबरदस्ती मुझे बिस्तर की तरफ धकेला और बाहर निकल गया....

मेरी आँखें रो रो कर लाल हो गयी... वह मुझे इस कदर जलील करके गया था की मैं घर वालों के आने से पहले बिस्तर से उठ ही न सकी.....

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10-02-2010, 12:08 PM
Post: #20
RE: कामांजलि
जब दो दिन तक लगातार वो नहीं आया तो पापा ने उसको घर बुलाया....," तुम आते क्यूँ नहीं बेटा?" मैं पास खड़ी थरथर कांप रही थी.. कहीं वो पापा को कुछ बता न दे.....

"वो क्या है चाचा जी... आजकल मेरे एग्जाम की भी तैयारी करनी पड़ रही है.. और रात को धरमपाल के घर जाना होता है.. उनकी बेटियों को पढ़ाने के लिये.. इसीलिए टाइम कम ही मिल पता है..." बोलते हुए उसने मेरी तरफ देखा.... मैंने आँखों ही आँखों में उसका धन्यवाद किया.....

"हम्म्म्म... कौनसी क्लास में हैं उसकी बेटियाँ?" पापा ने पूछा....

"एक तो इसकी क्लास में ही है.. दूसरी इस साल कॉलेज जाने लगी है.. उसको इंग्लिश पढ़ाकर आता हूँ...." उसने जवाब दिया....

"तो तू ऐसा क्यूँ नहीं करता.. उनको भी यहीं बुला ले... नीचे कमरा तो खाली है ही अपना.. जब तक चाहे पढ़ा....!" पापा ने कहा....

"नहीं... वो यहाँ नहीं आयेंगी चाचा... मुझे दुगने पे करते हैं वो.. उनके घर रात को पढ़ाने के लिये... उन्होंने मेरे घर आने से भी मना कर दिया था...." तरुण ने बताया....

"ओह्ह.. तो ठीक है.. मैं धरमपाल से बात कर लूँगा... अंजलि भी वहीं पढ़ लेगी.. वो तो अपना ही घर है..." पापा ने जाने कैसे ये बात कह दी... मुझे बड़ा अजीब सा लगा था...," पर तुम्हे घर छोड़ कर जाना पड़ेगा अंजु को.. रात की बात है और लड़की की जात है...."

तरुण ने हाँ में सर हिला दिया... और मेरा रात का टयूशन सेट हो गया... धरमपाल चाचा के घर.....

धरमपाल चाचा की दोनों लड़कियां बड़ी खूबसूरत थी... बड़ी को मेरे मुकाबले की कह सकते हैं.. मिनाक्षी... पिछले साल ही हमारे स्कूल से बारहवी की परीक्षा पास की थी... उसका यौवन भी मेरी तरह पूरे शबाब पर था... पर दिल से कहूँ तो वो मेरी तरह चंचल नहीं थी... बहुत ही शर्मीली और शरीफ स्वाभाव की थी.... घर बाहर सब उसको मीनू कहते थे.... प्यार से...

छोटी मेरी उमर की ही थी.. पर शरीर में मुझसे थोड़ी हल्की पड़ती थी... वैसे सुन्दर वो भी बहुत थी और चंचल तो मुझसे भी ज्यादा... पर उसकी चंचलता में मेरी तरह तड़प नहीं थी.. उन्मुक्त व्यवहार था उसका.. पर बच्चों की तरह... घर वालों के साथ ही आस पड़ोस में सबकी लाडली थी वो.. प्रियंका! हम सब उसको पिंकी कहते थे...

अगले दिन में ठीक 7 बजे नहा धोकर टयूशन जाने के लिये तैयार हो गयी.. यही टाइम बताया था तरुण ने. मन ही मन मैं 3 दिन पहले वाली बात याद करके झिझक सी रही थी.. उसका सामना करना पड़ेगा, यही सोच कर मैं परेशान सी थी.. पर जाना तो था ही, सो मैंने अपना बैग उठाया और निकल ली....

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