कमसिन जवानी
विजय और नीरा का घर आपस में लगा हुआ था। नीरा शादी-शुदा थी और विजय से लगभग दस साल बड़ी थी। नीरा दुबली पतली पर सुन्दर युवती थी। पर घर पर वो कपड़े पहनने के मामले में बहुत बेपरवाह थी। विजय नीरा के घर अक्सर आता जाता रहता था। उसे तो बस नीरा का यही बेपरवाह कपड़े पहनने का तरीका अच्छा लगता था। उसे नीरा के उभरे हुये स्तन, छोटा सा ब्लाऊज बहुत अच्छा लगता था। नीचे कमर से भी नीचे लटका हुआ पेटीकोट, उससे उसके कमर का बहुत बड़ा भाग नंगा दिखता था।
विजय एक कमसिन उम्र का लड़का था, कॉलेज में आया ही था। शरारती भी था, उसके मन में जवानी ने बस अंगड़ाई ली ही थी। उसके लण्ड बस बात बात पर खड़ा हो जाता था। नीरा को देख कर भी उसका लण्ड तन्ना जाता था। पर नीरा को ये सब कैसे दिखाये, इसका एक बहाना तो उसने ढूंढ ही लिया था। वो नीरा के यहाँ बिना चड्डी पहने, बस पजामें में ही आ जाता था। लण्ड जब खड़ा होता था तो वो उसे छिपाता नहीं था, उसका पजामा तम्बू जैसा उभर जाता था। नीरा को देख कर उसे लगता था कि बस उसका पेटीकोट नीचे खींच दे और उसे नंगा कर डाले, या उसका ब्लाऊज जो छोटा सा था उसे उघाड़ कर चूंचिया दबा डाले। अपना तम्बू जैसा लण्ड उसकी चूत में घुसेड़ दे। बस बेचारा तड़प कर रह जाता था। रोज घर जा कर फिर हस्त मैथुन कर लण्ड को रगड़ता था और अपनी जवानी का रस निकाल देता था।
इन दिनों नीरा कम्प्यूटर सीखने के लिये विजय को रात को बुला लेती थी। नीरा का पति रात के आठ बजे अपनी ड्यूटी पर चला जाता था। विजय और नीरा की घनिष्ठता बढ़ चुकी थी। विजय अपने मन की तड़प मिटाने के लिये नीरा के शरीर पर यहां वहां हाथ लगा देता था। पढ़ाने के बहाने अपना पांव उसके पांव से टकरा देता था। कभी कभी पांव से उसकी जांघ तक छू लेता था। पर नीरा इन सबसे अनजान थी। या अनजान होने का बहाना करती थी। पर हां, ऐसे काम करते समय विजय की दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। मामला जम नहीं रहा था। नीरा का इस खेल में कोई भी उत्सुकता नहीं दिखाई दे रही थी। पर नीरा, जहाँ तक उसका सवाल था, वो तो शरम के मारे कुछ भी नहीं कहती थी, पर हां उसका मन उद्वेलित हो उठता था। सोने से पहले वो भी विजय के नाम का हस्त मैथुन करती थी। भला कुवारां लड़का, खड़ा लण्ड, किसको नहीं भायेगा। नीरा का मन भी उसका कुंवारापन तोदने को बेताब था। पर ये सब कैसे हो ?
इस बार तो विजय ने सोच ही लिया था कि आज तो कुछ ना कुछ तो कर ही डालूंगा। विजय जैसे ही उसके कमरे में गया तो नीरा शायद इंतेज़ार करते करते सो गई थी। पर उसका बदन कांप गया। उसका सोना भी गजब का था। उसके चमकते हुये चिकने गोरे स्तन आधे बाहर छलके पड़ रहे थे। पेटीकोट जांघ से ऊपर उठा हुआ था। उसकी चिकनी और उजली जांघे जैसे लण्ड को चोदने के लिये आमंत्रित कर रही थी। उसका मासूम सा चेहरा कयामत ढा रहा था। उसके गुलाबी गाल, और पत्तियो से होंठ उसको चूमने के लिये बरबस ही खींच रहे थे। बस जी कर रहा था कि उसे चोद डाले।
वो धीरे से उसके पास आया और जांघ पर से पेटीकोट उठा कर उसकी चूत देखने की कोशिश की, और उसके मुँह से सिसकी निकल पड़ी। चिकनी साफ़ चूत, उभरी हुई, उसमें से पानी की एक बूंद बाहर ही चमकती हुई नजर आ रही थी। चूत की पलकें और उसके आस पास भूरी भूरी सी नरम सी झांटे, हाय रे ... उसको लण्ड को अपने कंट्रोल में करना मुश्किल हो गया। विजय का लण्ड कुलांचे मारने लगा। अचानक नीरा के करवट ली। विजय के थरथराते हाथो ने पेटीकोट छोड़ दिया और एक आह भरते हुये पलट गया।
"अरे भैया, तुम कब आये ... सॉरी ... जरा सी आंख लग गई थी, पर आप ये क्या कर रहे थे?"
नीरा उसे रंगे हाथ पकड़ना चाह रही थी, और उसे मौका मिल गया था। मन ही मन वो बहुत खुश हो रही थी कि आज विजय ने उसका पेटीकोट उठा कर उसकी मुत्ती के दर्शन कर लिये थे। विजय ने उसे घूम कर देखा। नीरा ने विजय के कड़क खड़े हुये लण्ड का जायजा लिया और खिलखिला कर हंसने लगी। विजय ने उसे अपने लण्ड की ओर निहारते देख लिया था। पर वो मजबूर था। बिना चड्डी के पजामें में से वो उभर कर गजब कर रहा था।
नीरा के दिल पर जैसे छुरियां चल रही थी। उसके लण्ड के उभार को देख कर नीरा की गीली चूत ने भी हाहाकार मचा दिया। उसका शरीर वासना से भर उठा और हाथ ऊंचे करके जो अंगड़ाई ली, विजय के दिल के सभी टांके खुल गये। उसका मदभरा बदन जैसे कसमसा उठा, दिल पर जैसे कोई बिजली गिर पड़ी।
"कुछ नहीं दीदी ... मेरी तो जान निकल गई थी ... " उसके मुख से निकल पड़ा। विजय की वासना भरी निगाहें उसके बदन को जैसे अन्दर तक देख रही थी।
"क्या ... क्या कहा ... क्या हुआ तुम्हारी जान को ... " वो बेहाल विजय को तड़पाने का मजा लेते हुई बोली।
"ओह, दीदी अब तुम नहीं समझोगी ... " नीरा भला कैसे नहीं समझती, शादीशुदा थी, ऐसे माहोल की नजाकत जानती थी। किसी भी चुदासे तन को वो खूब पहचानती थी।
"सब समझती हू विजय जी ... कोई बच्ची नहीं हूँ ... अच्छा चलो आज कम्प्यूटर पर काम करते हैं ... मुझे इन्टरनेट पर साईट कैसे खोलते हैं ! यह बताओ !"
नीरा ने तो नोर्मल तरीके से कहा, पर अन्दर से तो उसे तो कुछ ओर ही हो रहा था। विजय का लण्ड आज बुरी तरह छटपटा रहा था। ये नीरा भी जान चुकी थी कि विजय आज उत्तेजित लग रहा है। नीरा का मन भी आज चंचल हो रहा था। उसने ना तो आज अपने स्तन छिपाये और ना ही अपना पेटीकोट जो कि इतना नीचे था कि उसकी चूतड़ की दरार भी नजर आ रही थी। नीरा का मन भी डोल रहा था। उसे अपनी चूत में विजय के लण्ड नजर आने लगा था। पर आगे कैसे बढ़े ?
यहाँ पर विजय ने हिम्मत की ... ।
"दीदी, एक बात कहूं, आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो ... !" विजय ने ठान ही ली थी कि या तो इस पार या उस पार ...
"अच्छा तो तू भी लगता है विजय ... वर्ना तुझे मैं यहाँ बुलाती क्या !" नीरा ने उसे बढ़ावा देते हुये कहा। उसकी नजर तो उसके उठे हुये लण्ड पर थी। विजय उसकी नजरों को समझ रहा था। उसने नीरा को आगे बढने का मौका दिया।
"सच दीदी ... फिर मुझे एक चुम्मा दे दो ... जरा जोरदार देना !" नीरा हंस पड़ी, और मुझे चहरे पर कस कर दो बार चूम लिया। भला वो मौका कैसे छोड़ देती।
"ऐसे नहीं दीदी ... ऐसे चूमो !" विजय ने नीरा का चेहरा पकड़ कर उसके होंठ चूम लिये और कस कर जकड़ लिया।
"ये क्या कर रहे हो भैया ... " उसने विजय को घूर कर देखा ... उसकी चूत फ़ड़फ़ड़ा उठी, पर नीरा का चेहरा देख कर विजय एक बार तो घबरा गया ... और नीरा खिलखिला कर हंस पड़ी।
"सॉरी दीदी ... मै बहक गया था ... " विजय ने डर कर कहा।
"अरे पागल ऐसे नहीं ... ये देखो इस तरह ... " नीरा ने हंसते हुये विजय को धक्का दे कर बिस्तर पर गिरा दिया और उस पर चढ़ बैठी। उसके होंठो से अपने होंठ लगा दिये और चूसने लगी। विजय का लण्ड कड़क उठा। अपने स्तनों को उसकी छाती पर दबा दिये। विजय ने लण्ड को उसके कूल्हों पर रगड़ दिया।
"दीदी ... बहुत आनन्द आ रहा है ... हाय !" विजय तड़प उठा। उसके कड़क लण्ड को नीरा ने पजामे सहित अपने हाथो में दबा डाला। विजय सिमट गया।
" दीदी ... हाय , मै मर गया ... मेरा लण्ड ... आह्ह्ह !"
"अरे तुझे क्या मालूम, मैं तो शादी-शुदा हूँ ना ... देख अभी तो और मजा आयेगा।" नीरा को वासना का सरूर चढ़ गया था। वो उसके लण्ड को मरोड़ कर दबा दबा कर मस्ती ले रही थी। नीरा के शरीर का बोझ विजय पर बढ़ता जा रहा था। उसके ब्लाऊज के बटन चटक कर खुलते जा रहे थे। विजय के हाथ बरबस ही नीरा की चूंचियो को दबा बैठे। नीरा के मुख से मस्ती की चीख सी निकल पड़ी।
"धीरे से विजय ... मजा आ रहा है ... " नीरा बुदबुदा उठी। विजय के मन की इच्छा पूरी हो रही थी। वो बहुत ही खुश था। जवानी में कदम रखते ही उसे भरी जवानी का स्वाद मिल रहा था। नीरा भी खुश थी कि उसे ताजा और अनछुआ नया माल मिला था। नीरा के पेटीकोट का नाड़ा खुल चुका था। पेटीकोट धीरे धीरे नीचे खिसकता ही जा रहा था। विजय ने भी अपने पजामा का नाड़ा खींच दिया था। लिपटा लिपटी में जाने कब दोनों के वस्त्र नीचे खिसक गये थे। वे दोनों नीचे से नंगे हो गये थे ... और दोनों के चूतड़ अपना अपना जोर लगा रहे थे।
नीरा फिर से खिलखिला उठी ...
विजय का लण्ड इधर उधर चूत के आस पास फ़िसला जा रहा था।
"अरे अनाड़ी ... हाथ में पकड़ कर निशाना लगा ... देख ऐसे ... !" उसने विजय का लण्ड पकड़ कर अपनी फ़ूली हुई चूत पर रख दिया। नीरा को जैसे ही लण्ड के सुपाड़े का नरम सा अहसास हुआ उसकी चूत में मिठास सी भरने लगी। उसने विजय के चूतड़ पकड़ कर अपनी ओर जोर लगाया। गीली और चिकनी चूत में लण्ड सरसराता हुआ घुस पड़ा। विजय को लगा जैसे कोई किला जीत लिया हो। उसने भी नीरा की चूंचियो को दबाते हुये लण्ड को चूत में दबा दिया। उसे लण्ड में तीखी सी जलन सी हुई, पर उसने सोचा कि शायद पहली बार किसी को चोद रहा है सो ऐसा हो रहा है। वह क्षण भर को रुका और फिर से लण्ड को दबाने लगा। मिठास से भरी हुई जलन, लण्ड का कुंवारापन जाता रहा।
नीरा ने इस चीज़ को समझ लिया था। उसने भी अपनी चूत को ऊपर दबा कर लण्ड को पूरा निगल लिया।
" हाय रे विजय, कुँवारे लड़कों की तो बात ही कुछ ओर है ... अब हौले हौले चोद मुझे ... कैसा आनन्द आ रहा है !"
"हां "दीदी,... मुझे भी बहुत मजा आ रहा है ... मेरे लण्ड में तो जादू है ... मुझे भी जलन के साथ मीठा सा मजा आ रहा है !"
"मत बोल रे, ये जलन तो पहली चुदाई की है ... बस चोदता जा ... ! " नीरा उसे अपने में समाते हुये बोली, उसकी दोनों बाहें विजय को अपने में कसती जा रही थी। नीरा अब नीचे से अपनी चूत को बस आगे पीछे लण्ड पर घिस रही थी। जब कि विजय लण्ड को चूत की पूरी गहराई से चोदने के लिये जोर लगा रहा था। नीरा के स्तन विजय के कब्जे थे और वो नीरा को चूमते हुये उसके स्तन भी मरोड़ता जा रहा था। नीरा ने अब नीचे से अपनी चूत उछाल उछाल कर लण्ड अन्दर गहराई तक लेने लगी थी, और सिसकती जा रही थी। दोनों को बहुत ही मनोहारी आनन्द आ रहा था। एक दूसरे में खोये हुये, दीन दुनिया से दूर, मस्त चुदाई में लगे थे। दोनों के नंगे शरीर एक दूसरे में समाने के लिये जोर लगा रहे थे। अचानक नीरा की चूत ने जोर लगा कर लण्ड को घुसेड़ा, और अपनी चूत को जोर जोर से लण्ड पर मारने लगी, उसकी आंखे बन्द होने लगी, मुह से सीत्कार निकल गई।
"भैया, मैं तो गई ... हाय मेरी तो निकल पड़ी है ... हाय रे ... लण्ड पूरा घुसेड़ दे ... मार दे चूत को ... आह्ह्ह्ह " नीरा को लगा कि वो झड़ने वाली है।
"अरे नहीं दीदी ... मुझे और चोदना है ... रुक जाओ ना ... ।"
पर नीरा झड़ने लगी। उसका रज निकल पड़ा ... उसकी चूत चुद चुकी थी, पर विजय का क्या हुआ, नीरा के झड़ते ही उसका लण्ड गीली चूत में फ़च फ़च की आवाज करने लगा।
"ये क्या दीदी ... मेरा तो जैसे सारा मजा चला गया ... " विजय निराशा से भर गया, उसे स्वर्ग जैसा मजा आ रहा था।
"अच्छा , तुझे टाईट चाहिये ना ... मेरी गाण्ड मार ले बस ... खूब मजा आयेगा देखना" नीरा ने विजय को नया अनुभव देने के न्योता दिया।
" पर दीदी, ये कैसे करते हैं ... चूत तो आपने चुदवा ली ... देखो ना , मेरे लण्ड पर भी लग गई है ... !"
"अरे लण्ड तो देखो अभी ठीक हो जायेगा ... चल अब मुझे गाण्ड का मजा दे ... " नीरा ने हाथ बढ़ा कर क्रीम ली और विजय को पकड़ा दिया और खुद कुतिया बन गई, उसके दोनों सुडौल चूतड़ खिल कर उभर आये। उसके गाण्ड का कोमल फ़ूल भूरे रंग का साफ़ नजर आने लगा। विजय ने क्रीम निकाल कर नीरा की दरार में फूल पर क्रीम लगा दी। नीरा का फ़ूल तो पहले से ही खिला हुआ था। उसके पति को भी गाण्ड मारने का शौक था। जैसे ही विजय ने फूल को फ़ोड़ते हुये लण्ड अन्दर प्रवेश कराया तो नीरा के मुख से आह निकल पड़ी।
"क्या हुआ दीदी, दर्द हुआ क्या ... " विजय को लगा कि उसे दर्द हुआ है।
"आह, कैसा मीठा सा मजा आ रहा है ... बस जोर लगा कर चोद दे गाण्ड को ... " नीरा ने वासना से डूबे हुये स्वर में कहा। और गाण्ड को और ढीली कर दी। विजय ने लण्ड का जोर लगाया। गाण्ड ने सहर्ष उसे स्वीकार कर लिया और लण्ड फिर एक बार गहराईयो में उतरता चला गया। नीरा अपने आप को पांव को खोल कर सेट कर रही थी। फिर आराम से सर को तकिये पर रख कर आंखे बंद कर ली और गाण्ड मराने का लुफ़्त लेने लगी। जब जोर से धक्का लगता तो सिसक उठती थी। विजय को एक सुन्दर सा नया अहसास हो रहा था। उसे नीरा की गाण्ड मारने में कोई परेशानी नहीं आ रही थी। चिकनी सट गाण्ड थी, उसका लण्ड अब फ़ूलता जा रहा था। वो नीरा के बोबे पकड़ कर मसलने लगा। नीरा ने उसे कहा कि उसकी चूत को भी दबा दबा कर रगड़ दे ... तो एक हाथ से अब वो उसकी चूत को भी सहला और रगड़ रहा था। अब नीरा भी रंग में आ गई थी। उसे भी बहुत मजा आने लगा था। जोरदार चोदा चोदी का दौर चल रहा था। भचक भचक कर लण्ड गाण्ड को चोद रहा था। नीरा सीत्कारें भरी जा रही थी।
अचानक विजय के लण्ड ने फ़ुफ़कार भरी और गाण्ड से बाहर आ गया। उसके लण्ड ने भरपूर पिचकारी छोड़ दी। जो गाण्ड और चूत को छूते हुये नीचे ही उसके स्तनो पर आ लगी। फिर विजय ने नीरा की चूत दबा दी और झड़ने लगा, तभी नीरा भी चूत दबाने से झड़ने लगी। दोनो ही अपने यौवन रस को जोर लगा कर निकालने लगे। नीरा ने अपने आप को बिस्तर पर चारों खाने चित्त पेट के बल गिरा लिया और विजय भी उसकी पीठ पर अपना लण्ड चूतड़ों पर रख कर लेट गया। अब भी दोनो का वीर्य धीरे धीरे रिस कर बाहर निकल रहा था।
विजय अब बिस्तर पर से नीचे उतर गया था और तौलिये से नीरा का बदन साफ़ कर रहा था। नीरा बड़े प्यार से विजय को निहार रही थी। नीरा की प्यार भरी नजर का ये असर हुआ कि विजय भी नीरा निहारते हुये उससे फिर एक बार और लिपट गया।
"दीदी, बहुत मजा आया ... एक बात कहूं ...! " विजय ने नीरा से लिपटे हुये झिझकते हुये कहा।
"मुझे पता है तुम क्या कहोगे ...! " नीरा ने बड़े ही भावुक स्वर में कहा।
"क्या ... बताओ ना दीदी ... !" विजय भी नीरा के नंगे बदन को सहलाते हुये बोला।
" यही कि तुम मुझे प्यार करते हो, आप बहुत सुन्दर हो, आप पहले क्यूं नहीं मिली ... !" नीरा ने बोलते बोलते अपनी आंखे बन्द कर ली।
"दीदी, बस करो ना ... आप तो सब जानती है ... मुझे अब शरम आ रही है !" विजय भी लिपट पड़ा।
"तो चल शरम दूर करें ... " नीरा ने बहकते हुये कहा।
"वो कैसे दीदी ... "
"चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाये हम दोनों ... और फिर से मुझे चोद डाल, मादरचोद !" नीरा का स्वर उखड़ता जा रहा था।
"जी, ये क्या कह रही है आप ... गालियां ...? " विजय का लण्ड फिर से गालियां सुन कर भड़क गया और उसकी चूत पर गड़ने लगा।
"चल हराम जादे ... घुसा से चूत में अपना लौड़ा और भेन चोद दे मेरी ... भोसड़ी के ... चोद दे ना ... और इस बार शरम छोड़ और गालियाँ दे कर मुझे चोद यार ... चल कुत्ते अपना लौड़ा घुसेड़ डाल मेरे भोसड़े में ... " नीरा का चेहरा विकृत होता जा रहा था। वासना की पीड़ा एक बार फिर से सवार होने लगी।
"ररर् ... रण्डी, छिनाल ... , नहीं ... नहीं ... नहीं बोला जाता है दीदी ... !" नीरा ने विजय को दबा कर पलटी मार दी और उसके कड़कते लण्ड पर आ कर बैठ गई। और उस पर बिछती हुई लेट गई।
"मां के लौड़े ... इस फ़ुफ़कारते हुये लण्ड की कसम ... मेरा भोसड़ा फ़ाड़ दे मेरे राजा ... " नीरा की अदम्य वासना का शिकार बन चुका था विजय। नीरा की वासना प्रचन्ड थी। विजय का लण्ड नीरा की चूत में घुस पड़ा ... और नीरा दहाड़ उठी ...
"ये हुई ना बात भोसड़ी के ... ये ले अब मेरे धक्के ... " नीरा ने चोदना आरम्भ कर दिया और जोर जोर से सीत्कार भरते हुये लगभग चीख सी उठी। नीरा की वासना बढ़ती गई ... विजय को असीम आनन्द आने लगा। नीरा के तूफ़ानी धक्के विजय के लण्ड पर पड़ रहे थे ... कमरे में चुदने की फ़च फ़च की आवाजे आने लगी थी ... दोनों स्वर्ग का विचरण करने निकल पड़े थे ... विजय सोच रहा था कि ऐसे मनभावन सुनहरे पल फिर कब मिलेंगे ... दोनों की वासना भरी सीत्कारें कमरे में गूंजने लगी थी ... दोनों के जिस्म फिर से एक हो चुके थे। ...
 


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