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मेरी बहन कविता
10-24-2016, 10:17 AM
Post: #1
मेरी बहन कविता
दुनिया में कुछ बाते कब और कैसे हो जाती है ये कहना
बहुत मुश्किल है. जिसके बारे में आपने कभी कल्पना भी
नहीं की होती वैसी घटनाये आपके जीवन को पूरी तरह
से बदल कर रख देती है. बात इधर उधर घुमाने की
जगह सीधा कहानी पर आता हूँ. मैं मुंबई में रहता था
और वही एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करने के साथ
कंप्यूटर कोर्स भी करता था.
मेरी बड़ी बहन भी वही रहती थी रहती थी. उसका पति
एक प्राइवेट फर्म में काम करता था. अच्छा कमाता
था, और उसने एक छोटा सा एक बेडरूम वाला फ्लैट ले
रखा था. उनका घर छोटा होने के कारण मैं वहां नहीं रह
सकता था. मगर उनके घर के पास ही मैंने भी एक कमरा
किराये पर ले लिया था.
मेरी बहन का नाम कविता था. शादी के 4 साल बाद भी
उसे कोई बच्चा नहीं था और शायद होने की सम्भावना
भी नहीं थी. क्योंकि उसका पति थोड़ा सनकी किस्म का
था . उसके दिमाग में पता नहीं कहाँ से अमीर बन ने का
भूत सवार हो गया था. हालाँकि ये हमारे परिवार की
जरुरत थी. वो हर समय दुबई जाने के बारे में बाते
करता रहता था. हालाँकि दीदी उसकी इन बातो से
कभी-कभी चिढ जाती थी मगर फिर भी वो उसके
विचारो से सहमत थी.
फिर एक दिन ऐसा आया जब वो सच में दुबई चला
गया. वहाँ उसे एक फर्म में नौकरी मिल गई थी. तब
मैंने किराया बचाने और दीदी की सुविधा के लिए अपना
किराये का कमरा छोड़ कर अपने आप को दीदी के एक
बेडरूम फ्लैट में शिफ्ट कर लिया. ड्राइंग रूम के एक
कोने में रखा हुआ दीवान मेरा बिस्तर बना और मैं उसी
पर सोने लगा . दीदी अपने बेडरूम में सोती थी. एक ओर
साइड में रसोइ और दूसरी तरफ लैट्रीन और बाथरूम.
रात में दीदी बेडरूम के दरवाजे को पूरी तरह बंद नहीं
करती थी केवल सटा भर देती थी. अगर दरवाजा थोड़ा
सा भी अलग होता था तो उसके कमरे की नाईट बल्ब
की रौशनी मुझे ड्राइंग रूम में भी आती थी. दरवाजे के
खुले होने के कारण मुझे रात को जब मुठ मारने की तलब
लगती थी तब मुझे बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती थी.
क्योंकि हमेशा डर लगा रहता था की पता नहीं दीदी कब
बाहर आ जायेगी. लड़कियो के प्रति आकर्षण तो शुरू
से था. आस-पास की लड़कियो और शादी शुदा औरतो
को देख-देख कर मूठ मारा करता था.
दीदी के साथ रहते हुए मैंने इस बात को महसूस किया
की मेरी दीदी वाकई बहुत ही खूबसूरत औरत है. ऐसा
नहीं था की दीदी शादी के पहले खूबसूरत नहीं थी. दीदी
एकदम गोरी चिट्टी और तीखे नाक-नक्शे वाली थी. पर
दीदी और मेरे उम्र के बीच करीब 6 से 7 साल का
फर्क था, इसलिए जब दीदी कुंवारी थी तो मेरी उतनी
समझदारी ही नहीं थी की मैं उनकी सुन्दरता को समझ
पाता या फिर उसका आकलन कर पाता. फिर शादी के
बाद दीदी अलग रहने लगी थी. अब जब मैं जवान और
समझदार हो गया था और हम दुबारा साथ रहने लगे तो
मुझे अपनी दीदी को काफी नजदीक से देखने का अवसर
मिल रहा था और यह अहसास हो रहा था की वाकई मेरी
बहन लाखो में एक हैं. शादी के बाद से उसका बदन
थोड़ा मोटा हो गया था. मतलब उसमे भराव आ गया
था. पहले वो दुबली पतली थी मगर अब उसका बदन
गदरा गया था. शायद ये उम्र का भी असर था क्योंकि
उसकी उम्र भी 31-32 के आस पास की हो गई थी .
उसके गोरे सुडौल बदन में गजब का भराव और लोच था.
चलने का अंदाज बेहद आकर्षक और क्या कह सकते है
कोई शब्द नहीं मिल रहा शायद सेक्सी था. कभी चुस्त
सलवार कमीज़ तो कभी साडी ब्लाउज जो भी वो
पहनती थी उसका बदन उसमे और भी ज्यादा निखर
जाता था . चुस्त सलवार कुर्ती में तो हद से ज्यादा
सेक्सी दिखती. दीदी जब वो पहनती थी उस समय
सबसे ज्यादा आकर्षण उसकी टांगो में होता था .
सलवार उसके पैरो से एकदम चिपकी हुई होती थी. जैसा
की आप सभी जानते है ज्यादातर अपने यहाँ जो भी
चुस्त सलवार बनती है वो झीने सूती कपड़ो की होती है.
इसलिए दीदी की सलवार भी झीने सूती कपड़े की बनी
होती थी और वो उसके टांगो से एकदम चिपकी हुई
होती. कमीज़ थोरी लम्बी होती थी मगर ठीक कमर के
पास आकर उसमे जो कट होता था असल में वही
जानलेवा होता था. कमीज़ का कट चलते समय जब
इधर से उधर होता तो चुस्त सलवार में कसी हुई मांसल
जांघे और चुत्तर दिख जाते थे. कविता दीदी की जांघे
एकदम ठोस, गदराई और मोटी कन्दली के खंभे जैसी
थी फिर उसी अनुपात में चुत्तर भी थे. एकदम मोटे मोटे
, गोल-मटोल गदराये, मांसल और गद्देदार जो चलने पर
हिलते थे. सीढियों पर चढ़ते समय कई बार मुझे कविता
दीदी के पीछे चलने का अवसर प्राप्त हुआ था. सीढियाँ
चढ़ते समय जब साडी या सलवार कमीज में कसे हुए
उनके चुत्तर हिलते थे, तो पता नहीं क्यों मुझे बड़ी
शर्मिंदगी महसूस होती थी. इसका कारण शायद ये था
की मुझे उम्र में अपने से बड़ी और भरे बदन वाली
लड़कियोँ या औरते ज्यादा अच्छी लगती थी. सीढियों
पर चढ़ते समय जब कविता दीदी के तरबूजे के जैसे
चुत्तर के दोनों फांक जब हिलते तो पता नहीं मेरे अन्दर
कुछ हो जाता था. मेरी नज़रे अपने आप पर काबू नहीं
रख पाती और मैं उन्हें चोर नजरो से देखने की कोशिश
करता. पीछे से देखते समय मेरा सामना चूँकि दीदी से
नहीं होता था इसलिए शायद मैं उनको एक भरपूर जवान
औरत के रूप में देखने लगता था और अपने आप को
उनके हिलते हुए चूत्तरों को देखने से नहीं रोक पाता था.
अपनी ही दीदी के चुत्तरों को देखने के कारण मैं
अपराधबोध से ग्रस्त हो शर्मिंदगी महसूस करता था.
कई बार वो चुस्त सलवार पर शोर्ट कुर्ती यानि की
छोटी जांघो तक की कुर्ती भी पहन लेती थी. उस दिन मैं
उनसे नज़रे नहीं मिला पाता था. मेरी नज़रे जांघो से
ऊपर उठ ही नहीं पाती थी. शोर्ट कुर्ती से झांकते
चुस्त सलवार में कसे मोटे मोटे गदराये जांघ भला किसे
अच्छे नहीं लगेंगे भले ही वो आपकी बहन के हो. पर
इसके कारण आत्मग्लानी भी होती थी और मैं उनसे
आंखे नहीं मिला पाता था.
दीदी की चुत्तर और जांघो में जो मांसलता आई थी वही
उनकी चुचियों में भी देखने को मिलती थी. उनके मोटे
चुत्तर और गांड के अनुपात में ही उनकी चुचियाँ भी थी.
चुचियों के बारे में यही कह सकते है की इतने बड़े हो की
आपकी हथेली में नहीं समाये पर इतने ज्यादा बड़े भी न
हो की दो हाथो की हथेलियों से भी बाहर निकल जाये.
कुल मिला कर ये कहे तो शरीर के अनुपात में हो. कुछ
१८-१९ साल की लड़कीयों जो की देखने में खूबसूरत तो
होंगी मगर उनकी चुचियाँ निम्बू या संतरे के आकार की
होती है. जवान लड़कियोँ की चुचियों का आकार कम से
कम बेल या नारियल के फल जितना तो होना ही चाहिए.
निम्बू तो चौदह-पंद्रह साल की छोकरियों पर अच्छा
लगता है. कई बार ध्यान से देखने पर पता चल पाता है
की पुशअप ब्रा पहन कर फुला कर घूम रही है. इसी
तरह कुछ की ऐसी ढीली और इतनी बड़ी-बड़ी होगी की
देख कर मूड ख़राब हो जायेगा. लोगो का मुझे नहीं पता
मगर मुझे तो एक साइज़ में ढली चूचियां ही अच्छी
लगती है. शारीरिक अनुपात में ढली में हुई, ताकि ऐसा न
लगे की पुरे बदन से भारी तो चूचियां है या फिर चूची की
जगह पर सपाट छाती लिए घूम रही हो. सुन्दर मुखड़ा
और नुकीली चुचियाँ ही लड़कियों को माल बनाती है.
एकदम तीर की तरह नुकीली चुचिया थी दीदी की. भरी-
भरी, भारी और गुदाज़. गोल और गदराई हुई. साधारण
सलवार कुर्ती में भी गजब की लगती थी. बिना चुन्नी के
उनकी चूचियां ऐसे लगती जैसे किसी बड़े नारियल को दो
भागो में काट कर उलट कर उनकी छाती से चिपका दिया
गया है. घर में दीदी ज्यादातर साड़ी या सलवार कमीज़
में रहती थी . गर्मियों में वो आम तौर पर साड़ी पहनती
थी . शायद इसका सबसे बड़ा कारण ये था की वो घर
में अपनी साड़ी उतार कर, केवल पेटीकोट ब्लाउज में
घूम सकती थी. ये एक तरह से उसके लिए नाईटी या
फिर मैक्सी का काम करता था. अगर कही जाना होता
था तो वो झट से एक पतली सूती साड़ी लपेट लेती थी.
मेरी मौजूदगी से भी उसे कोई अंतर नहीं पड़ता था,
केवल अपनी छाती पर एक पतली चुन्नी डाल लेती थी.
पेटीकोट और ब्लाउज में रहने से उसे शायद गर्मी कम
लगती थी. मेरी समझ से इसका कारण ये हो सकता है
की नाईटी पहनने पर भी उसे नाईटी के अन्दर एक स्लिप
और पेटीकोट तो पहनना ही पड़ता था, और अगर वो
ऐसा नहीं करती तो उसकी ब्रा और पैन्टी दिखने लगते,
जो की मेरी मौजूदगी के कारण वो नहीं चाहती थी.
जबकि पेटीकोट जो की आम तौर पर मोटे सूती कपड़े का
बना होता है एकदम ढीला ढाला और हवादार. कई बार
रसोई में या बाथरूम में काम समय मैंने देखा था की वो
अपने पेटीकोट को उठा कर कमर में खोस लेती थी
जिससे घुटने तक उसकी गोरी गोरी टांगे नंगी हो जाती
थी. दीदी की पिंडलियाँ भी मांसल और चिकनी थी. वो
हमेशा एक पतला सा पायल पहने रहती थी. मैं कविता
दीदी को इन्ही वस्त्रो में देखता रहता था मगर फिर भी
उनके साथ एक सम्मान और इज्ज़त भरे रिश्ते की
सीमाओं को लांघने के बारे में नहीं सोचता था. वो भी
मुझे एक मासूम सा लड़का समझती थी और भले ही
किसी भी अवस्था या कपड़े में हो , मेरे सामने आने में
नहीं हिचकिचाती थी. ड्राइंग रूम में बैठे हुए रसोई में
जहॉ वो खाना बनाती थी वो सब ड्राइंग रूम में रखे
अल्मीराह में लगे आईने (mirror) में स्पष्ट दिखाई
पड़ता था. कई बार दीदी पसीना पोछने के लिए लिए
अपने पेटीकोट का इस्तेमाल करती थी. पेटीकोट के
निचले भाग को ऊपर उठा कर चेहरे का पसीने के पोछते
हुए मैंने कई बार मैंने आईने में देखा. पेटीकोट के निचले
भाग को उठा कर जब वो थोड़ा तिरछा हो कर पसीना
पोछती थी तो उनकी गोरी, बेदाग, मोटी जांघे दिख
जाती थी.


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10-24-2016, 10:17 AM
Post: #2
RE: मेरी बहन कविता
एक दिन गर्मी बहुत ज्यादा थी और दीदी सफ़ेद रंग का
पेटिकोट और लाल रंग का ब्लाउज पहन कर खाना बना
रही थी उस दिन मैं रसोई में फ़्रिज से पानी लेने दो-तीन
बार गया. रसोई में दीदी को बहुत पसीना आ रहा था.
उसके चेहरे और पेट पर पसीना साफ़ दिख रहा था.
पसीने के कारण सफ़ेद रंग का पेटीकोट उनके चुत्तरो से
चिपक गया था. ब्लाउज भी काफी भींग गया था और
उसकी चुचियों से चिपक गया था. ध्यान से देखने पर
मुझे ऐसा लगा जैसे उनकी चुचियों के निप्पल भी ब्लाउज
के ऊपर से दिख रहे थे. शायद दीदी ने गर्मी के कारण
ब्रा नहीं पहना था. मैं फ्रीज से पानी निकाल कर पी रहा
था तभी वो निचे झुक कर कुछ करने लगी, उनके चुत्तर
मेरी आँखों के सामने पूरी तरह से उभर कर आ गए.
पसीने से भीगा पेटीकोट पूरी तरह से चिपक गया था
और दोनों चुत्तर दिखने लगे थे. नीले रंग की पैंटी और
उसके किनारे साफ़ नज़र आ रहे थे. पेटीकोट का कपड़ा
भींग कर उनकी गांड की दरार में फस जाता अगर
उन्होंने पैंटी नहीं पहनी होती. मैं एक दम से घबरा गया
और भाग कर जल्दी से रसोई से निकल गया.
शुक्रवार की रातो को मैं आमतौर पर बहुत देर से सोता
था. क्योंकि अगले दिन शनिवार और रविवार मेरे
ऑफिस में छुट्टी होती थी. ऐसे ही एक शनिवार के दिन
मेरे जीवन में एक नया मोर आया. शुक्रवार की रात थी
और दीदी हमेशा की तरह 11 बजे रात को सोने चली
गई थी. मैं देर रात तक केबल पर फिल्म देखता रहा.
अगले दिन शनिवार को मेरी नींद बहुत देर से खुली .
छुट्टी के दिनों में दीदी मुझे जगाती नहीं थी. क्योंकि घर
में सभी जानते थे की मुझे देर तक सोना पसंद था. उस
दिन ऐसा ही हुआ था. मैंने जब घड़ी देखी तो उस समय
दिन के 10 बज रहे थे . मैं घबरा कर जल्दी से उठा.
अपने चारो तरफ देखते ही मुझे अहसास हो गया की
दीदी बहुत पहले उठ चुकी है क्यों की, पुरे घर की सफाई
हो चुकी थी . मुझे अपने देर से उठने की आदत पर
शर्मिन्दगी हुई. जल्दी से ब्रश किया और चाय के लिए
रसोई में जा कर खुद से चाय बना लिया और पेपर पढ़ते
हुए चाय पिने लगा. बिना चाय पिए मुझे सुबह में
बाथरूम जाने में प्रॉब्लम होती थी. दीदी शायद घर में
नहीं थी, पड़ोस में किसी के पास गई थी. चाय ख़तम
कर के मैं लैट्रीन चला गया.
ये लैट्रीन पहले सेपरेट नहीं था. मतलब बाथरूम के
साथ ही मिला हुआ था और एक ही दरवाजा था. इसके
कारण बहुत असुविधा होती थी. क्योंकि एक आदमी के
घुसने से ही लैट्रीन और बाथरूम दोनों इंगेज हो जाते
थे. अगर घर में ज्यादा सदस्य न हो तब तो कोई
प्रॉब्लम नहीं होती थी, मगर गेस्ट्स के आ जाने पर
समस्या खड़ी हो जाती थी. लैट्रीन बाथरूम सेपरेट रहने
पर दो आदमी एक साथ दो काम कर सकते थे. इसलिए
लैट्रीन और बाथरूम दोनों को सेपरेट कर दिया गया.
इसके लिए बाथरूम के बीच में लकड़ी के पट्टो की
सहायता से एक दिवार बना दी गई. ईट की दीवार बनाने
में एक तो खर्च बहुत आता दूसरा वो ज्यादा जगह भी
लेता, लकड़ी की दीवार इस बाथरूम के लिए एक दम
सही थी. लैट्रीन के लिए एक अलग दरवाजा बना दिया
गया.
दस मिनट बाद जब मैंने फ्लश कर लिया और बाहर
निकलने वाला ही था की तभी मुझे लगा की कोई बाथरूम
का दरवाजा खोल कर अन्दर घुसा है . पता नहीं क्यों
मगर मेरे पैर जहाँ थे वही रुक गए. कौन हो सकता है, ये
बात ज्यादा सोचने की नहीं थी. मैं थोड़ी देर तक वही
दरवाजा बंद होने की आहट का इन्तेज़ार करता रहा.
दीदी शायद कोई गीत गुनगुना रही थी. लैट्रीन में उसकी
आवाज़ स्पष्ट आ रही थी.
बहुत आराम से उठ कर लकड़ी के पट्टो पर कान लगा
कर ध्यान से सुन ने लगा. केवल चुड़ियो के खन-खनाने
और गुन-गुनाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी. फिर नल
के खुलने पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दी. मेरे अन्दर के
शैतान ने मुझे एक आवाज़ दी, लकड़ी के पट्टो को ध्यान
से देख. मैंने अपने अन्दर के शैतान की आवाज़ को
अनसुना करने की कोशिश की, मगर शैतान हावी हो
गया था. दीदी जैसी एक खूबसूरत औरत लकड़ी के
पट्टो के उस पार नहाने जा रही थी. मेरा गला सुख गया
और मेरे पैर कांपने लगे. अचानक ही पजामा एकदम से
आगे की ओर उभर गया. दिमाग का काम अब लण्ड कर
रहा था. मेरी आँखें लकड़ी के पट्टो के बीच ऊपर से
निचे की तरफ घुमने लगी और अचानक मेरी मन की
मुराद जैसे पूरी हो गई. लकड़ी के दो पट्टो के बीच
थोड़ा सा गैप रह गया था. सबसे पहले तो मैंने धीरे से
हाथ बढा का बाथरूम स्विच ऑफ किया फिर लकड़ी के
पट्टो के गैप पर अपनी ऑंखें जमा दी.
दीदी की पीठ लकड़ी की दिवार की तरफ थी. वो सफ़ेद
पेटिको़ट और काले ब्लाउज में नल के सामने खड़ी थी.
नल खोल कर अपने कंधो पर रखे तौलिये को अपना एक
हाथ बढा कर नल की बगल वाली खूंटी पर टांग दिया.
फिर अपने हाथों को पीछे ले जा कर अपने खुले रेशमी
बालो को समेट कर जुड़ा बना दिया. बाथरूम के कोने में
बने रैक से एक क्रीम की बोतल उठा कर उसमे से क्रीम
निकाल-निकाल कर अपने चेहरे के आगे हाथ घुमाने
लगी. पीछे से मुझे उनका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था
मगर ऐसा लग रहा था की वो क्रीम निकाल कर अपने
चेहरे पर ही लगा रही है. लकड़ी के पट्टो के गैप से मुझे
उनके सर से चुत्तरों के थोड़ा निचे तक का भाग दिखाई
पड़ रहा था. क्रीम लगाने के बाद अपने पेटिको़ट को
घुटनों के पास से पकर कर थोड़ा सा ऊपर उठाया और
फिर थोड़ा तिरछा हो कर निचे बैठ गई. इस समय मुझे
केवल उनका पीठ और सर नज़र आ रहा थे. पर अचानक
से सिटी जैसी आवाज़ जो की औरतो के पेशाब करने की
एक विशिष्ट पहचान है वो सुनाई दी. दीदी इस समय
शायद वही बाथरूम के कोने में पेशाब कर रही थी. मेरे
बदन में सिहरन दौर गई. मैं कुछ देख तो सकता नहीं था
मगर मेरे दिमाग ने बहुत सारी कल्पनाये कर डाली.
पेशाब करने की आवाज़ सुन कर कुंवारे लण्ड ने झटका
खाया. मगर अफ़सोस कुछ देख नहीं सकता था.
फिर थोड़ी देर में वो उठ कर खड़ी हो गई और अपने
हाथो को कुहनी के पास से मोर कर अपनी छाती के पास
कुछ करने लगी। मुझे लगा जैसे वो अपना ब्लाउज खोल
रही है. मैं दम साधे ये सब देख रहा था. मेरा लण्ड
इतने में ही एक दम खड़ा हो चूका था. दीदी ने अपना
ब्लाउज खोल कर अपने कंधो से धीरे से निचे की तरफ
सरकाते हुए उतार दिया. उनकी गोरी चिकनी पीठ मेरी
आँखों के सामने थी. पीठ पर कंधो से ठीक थोड़ा सा
निचे एक काले रंग का तिल था और उससे थोड़ा निचे
उनकी काली ब्रा का स्ट्रैप बंधा हुआ था. इतनी सुन्दर
पीठ मैंने शायद केवल फ़िल्मी हेरोइनो की वो भी फिल्मो
में ही देखी थी. वैसे तो मैंने दीदी की पीठ कई बार देखि
थी मगर ये आज पहली बार था जब उनकी पूरी पीठ
नंगी मेरी सामने थी, केवल एक ब्रा का स्ट्रैप बंधा हुआ
था. गोरी पीठ पर काली ब्रा का स्ट्रैप एक कंट्रास्ट
पैदा कर रहा था और पीठ को और भी ज्यादा सुन्दर
बना रहा था. मैंने सोचा की शायद दीदी अब अपनी ब्रा
खोलेंगी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. अपने दोनों हाथो
को बारी-बारी से उठा कर वो अपनी कांख को देखने
लगी. एक हाथ को उठा कर दुसरे हाथ से अपनी कांख
को छू कर शायद अपने कांख के बालो की लम्बाई का
अंदाज लगा रही थी. फिर वो थोड़ा सा घूम गई सामने
लगे आईने में अपने आप को देखने लगी. अब दीदी का
मुंह बाथरूम में रखे रैक और उसकी बगल में लगे आईने
की तरफ था. मैंने सोच रहा था काश वो पूरा मेरी तरफ
घूम जाती मगर ऐसा नहीं हुआ. उनकी दाहिनी साइड
मुझे पूरी तरह से नज़र आ रही थी. उनका दाहिना हाथ
और पैर जो की पेटिको़ट के अन्दर था पेट और ब्रा में
कैद एक चूची, उनका चेहरा भी अब चूँकि साइड से नज़र
आ रहा था इसलिए मैंने देखा की मेरा सोचना ठीक था
और उन्होंने एक पीले रंग का फेसमास्क लगाया हुआ
था. अपने सुन्दर मुखरे को और ज्यादा चमकाने के
लिए. अब दीदी ने रैक से एक दूसरी क्रीम की बोतल
अपने बाएं हाथ से उतार ली और उसमे से बहुत सारा
क्रीम अपनी बाई हथेली में लेकर अपने दाहिने हाथ को
ऊपर उठा दिया. दीदी की नंगी गोरी मांसल बांह अपने
आप में उत्तेजना का शबब थी और अब तो हाथ ऊपर
उठ जाने के कारण दीदी की कांख दिखाई दे रही थी.
कांख के साथ दीदी की ब्रा में कैद दाहिनी चूची भी दिख
रही थी. ब्रा चुकी नोर्मल सा था इसलिए उसने पूरी
चूची को अपने अन्दर कैद किया हुआ था इसलिए मुझे
कुछ खास नहीं दिखा, मगर उनकी कांख कर पूरा नज़ारा
मुझे मिल रहा था. दीदी की कांख में काले-काले बालों
का गुच्छा सा उगा हुआ था. शायद दीदी ने काफी दिनों
से अपने कांख के बाल नहीं बनाये थे. वैसे तो मुझे
औरतो के चिकने कांख ही अच्छे लगते है पर आज पाता
नहीं क्या बात थी मुझे दीदी के बालों वाले कांख भी
बहुत सेक्सी लग रहे थे. मैं सोच रहा था इतने सारे बाल
होने के कारण दीदी की कांख में बहुत सारा पसीना आता
होगा और उसकी गंध भी उन्ही बालों में कैद हो कर रह
जाती होगी. दीदी के पसीने से भीगे बदन को कई बार
मैंने रसोई में देखा था. उस समय उनके बदन से आती
गंध बहुत कामोउत्तेजक होती थी और मुझे हवा तैरते
उसके बदन के गंध को सूंघना बहुत अच्छा लगता था. ये
सब सोचते सोचते मेरा मन किया की काश मैं उसकी
कांख में एक बार अपने मुंह को ले जा पाता और अपनी
जीभ से एक बार उसको चाटता. मैंने अपने लण्ड पर
हाथ फेरा तो देखा की सुपाड़े पर हल्का सा गीलापन आ
गया है. तभी दीदी ने अपने बाएं हाथ की क्रीम को
अपनी दाहिने हाथ की कांख में लगा दिया और फिर
अपने वैसे ही अपनी बाई कांख में भी दाहिने हाथ से
क्रीम लगा दिया. शायद दीदी को अपने कान्खो में बाल
पसंद नहीं थ

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10-24-2016, 10:18 AM
Post: #3
RE: मेरी बहन कविता
कान्खो में हेयर रिमूविंग क्रीम लगा लेने के बाद दीदी
फिर से नल की तरफ घूम गई और अपने हाथ को पीछे ले
जाकर अपनी ब्रा का स्ट्रैप खोल दिया और अपने कंधो
से सरका कर बहार निकाल फर्श पर दाल दिया और
जल्दी से निचे बैठ गई. अब मुझे केवल उनका सर और
थोड़ा सा गर्दन के निचे का भाग नज़र आ रहा था.
अपनी किस्मत पर बहुत गुस्सा आया. काश दीदी
सामने घूम कर ब्रा खोलती या फिर जब वो साइड से
घूमी हुई थी तभी अपनी ब्रा खोल देती मगर ऐसा नहीं
हुआ था और अब वो निचे बैठ कर शायद अपनी ब्लाउज
और ब्रा और दुसरे कपड़े साफ़ कर रही थी. मैंने पहले
सोचा की निकल जाना चाहिए, मगर फिर सोचा की
नहाएगी तो खड़ी तो होगी ही, ऐसे कैसे नहा लेगी.
इसलिए चुप-चाप यही लैट्रिन में ही रहने में भलाई है.
मेरा धैर्य रंग लाया थोड़ी देर बाद दीदी उठ कर खड़ी
हो गई और उसने पेटीकोट को घुटनों के पास से पकड़
कर जांघो तक ऊपर उठा दिया. मेरा कलेजा एक दम
धक् से रह गया. दीदी ने अपना पेटिकोट पीछे से पूरा
ऊपर उठा दिया था. इस समय उनकी जांघे पीछे से पूरी
तरह से नंगी हो गई थी. मुझे औरतो और लड़कियों की
जांघे सबसे ज्यादा पसंद आती है. मोटी और गदराई
जांघे जो की शारीरिक अनुपात में हो, ऐसी जांघे.
पेटीकोट के उठते ही मेरे सामने ठीक वैसी ही जांघे थी
जिनकी कल्पना कर मैं मुठ मारा करता था. एकदम
चिकनी और मांसल. जिन पर हलके हलके दांत गरा कर
काटते हुए जीभ से चाटा जाये तो ऐसा अनोखा मजा
आएगा की बयान नहीं किया जा सकता. दीदी की जांघे
मांसल होने के साथ सख्त और गठी हुई थी उनमे कही
से भी थुलथुलापन नहीं था. इस समय दीदी की जांघे
केले के पेड़ के चिकने तने की समान दिख रही थी. मैंने
सोचा की जब हम केले पेड़ के तने को अगर काटते है या
फिर उसमे कुछ घुसाते है तो एक प्रकार का रंगहीन
तरल पदार्थ निकलता है शायद दीदी के जांघो को चूसने
और चाटने पर भी वैसा ही रस निकलेगा. मेरे मुंह में पानी
आ गया. लण्ड के सुपाड़े पर भी पानी आ गया था.
सुपाड़े को लकड़ी के पट्टे पर हल्का सा सटा कर उस
पानी को पोछ दिया और पैंटी में कसी हुई दीदी के
चुत्तरों को ध्यान से देखने लगा. दीदी का हाथ इस
समय अपनी कमर के पास था और उन्होंने अपने अंगूठे
को पैंटी के इलास्टिक में फसा रखा था. मैं दम साधे इस
बात का इन्तेज़ार कर रहा था की कब दीदी अपनी पैंटी
को निचे की तरफ सरकाती है. पेटीकोट कमर के पास
जहा से पैंटी की इलास्टिक शुरू होती है वही पर हाथो के
सहारे रुका हुआ था. दीदी ने अपनी पैंटी को निचे सरकाना
शुरू किया और उसी के साथ ही पेटीकोट भी निचे की
तरफ सरकता चला गया. ये सब इतनी तेजी से हुआ की
दीदी के चुत्तर देखने की हसरत दिल में ही रह गई.
दीदी ने अपनी पैंटी निचे सरकाई और उसी साथ पेटीकोट
भी निचे आ कर उनके चुत्तरों और जांघो को ढकता चला
गया. अपनी पैंटी उतार उसको ध्यान से देखने लगी पता
नहीं क्या देख रही थी. छोटी सी पैंटी थी, पता नहीं कैसे
उसमे दीदी के इतने बड़े चुत्तर समाते है. मगर शायद
यह प्रश्न करने का हक मुझे नहीं था क्यों की अभी एक
क्षण पहले मेरी आँखों के सामने ये छोटी सी पैंटी दीदी
के विशाल और मांसल चुत्तरों पर अटकी हुई थी. कुछ
देर तक उसको देखने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई
और अपनी पैंटी साफ़ करने लगी. फिर थोड़ी देर बाद
ऊपर उठी और अपने पेटीकोट के नाड़े को खोल दिया.
मैंने दिल थाम कर इस नज़ारे का इन्तेज़ार कर रहा था.
कब दीदी अपने पेटीकोट को खोलेंगी और अब वो क्षण
आ गया था. लौड़े को एक झटका लगा और दीदी के
पेटीकोट खोलने का स्वागत एक बार ऊपर-निचे होकर
किया. मैंने लण्ड को अपने हाथ से पकर दिलासा दिया.
नाड़ा खोल दीदी ने आराम से अपने पेटीकोट को निचे की
तरफ धकेला पेटीकोट सरकता हुआ धीरे-धीरे पहले
उसके तरबूजे जैसे चुत्तरो से निचे उतरा फिर जांघो और
पैर से सरक निचे गिर गया. दीदी वैसे ही खड़ी रही.
इस क्षण मुझे लग रहा था जैसे मेरा लण्ड पानी फेंक
देगा. मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करू. मैंने
आज तक जितनी भी फिल्में और तस्वीरे देखी थी नंगी
लड़कियों की वो सब उस क्षण में मेरी नजरो के सामने
गुजर गई और मुझे यह अहसास दिला गई की मैंने आज
तक ऐसा नज़ारा कभी नहीं देखा. वो तस्वीरें वो
लड़कियाँ सब बेकार थी. उफ़ दीदी पूरी तरह से नंगी हो
गई थी. हालाँकि मुझे केवल उनके पिछले भाग का नज़ारा
मिल रहा था, फिर भी मेरी हालत ख़राब करने के लिए
इतना ही काफी था. गोरी चिकनी पीठ जिस पर हाथ
डालो तो सीधा फिसल का चुत्तर पर ही रुकेंगी. पीठ के
ऊपर काला तिल, दिल कर रहा था आगे बढ़ कर उसे
चूम लू. रीढ़ की हड्डियों की लाइन पर अपने तपते होंठ
रख कर चूमता चला जाऊ. पीठ पीठ इतनी चिकनी और
दूध की धुली लग रही थी की नज़र टिकाना भी मुश्किल
लग रहा था. तभी तो मेरी नज़र फिसलती हुई दीदी के
चुत्तरो पर आ कर टिक गई. ओह, मैंने आज तक ऐसा
नहीं देखा था. गोरी चिकनी चुत्तर. गुदाज और मांसल.
मांसल चुत्तरों के मांस को हाथ में पकर दबाने के लिए
मेरे हाथ मचलने लगे. दीदी के चुत्तर एकदम गोरे और
काफी विशाल थे. उनके शारीरिक अनुपात में, पतली
कमर के ठीक निचे मोटे मांसल चुत्तर थे. उन दो मोटे
मोटे चुत्तरों के बीच ऊपर से निचे तक एक मोटी लकीर
सी बनी हुई थी. ये लकीर बता रही थी की जब दीदी के
दोनों चुत्तरों को अलग किया जायेगा तब उनकी गांड
देखने को मिल सकती है या फिर यदि दीदी कमर के
पास से निचे की तरफ झुकती है तो चुत्तरों के फैलने के
कारण गांड के सौंदर्य का अनुभव किया जा सकता है.
तभी मैंने देखा की दीदी अपने दोनों हाथो को अपनी जांघो
के पास ले गई फिर अपनी जांघो को थोड़ा सा फैलाया
और अपनी गर्दन निचे झुका कर अपनी जांघो के बीच
देखने लगी शायद वो अपनी चूत देख रही थी. मुझे लगा
की शायद दीदी की चूत के ऊपर भी उसकी कान्खो की
तरह से बालों का घना जंगल होगा और जरुर वो उसे ही
देख रही होंगी. मेरा अनुमान सही था और दीदी ने अपने
हाथ को बढा कर रैक पर से फिर वही क्रीम वाली
बोतल उतार ली और अपने हाथो से अपने जांघो के बीच
क्रीम लगाने लगी. पीछे से दीदी को क्रीम लगाते हुए
देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो मुठ मार रही है.
क्रीम लगाने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई और अपने
पेटीकोट और पैंटी को साफ़ करने लगी. मैंने अपने लौड़े
को आश्वाशन दिया की घबराओ नहीं कपरे साफ़ होने के
बाद और भी कुछ देखने को मिल सकता है. ज्यादा नहीं
तो फिर से दीदी के नंगे चुत्तर, पीठ और जांघो को देख
कर पानी गिरा लेंगे.
करीब पांच-सात मिनट के बाद वो फिर से खड़ी हो गई.
लौड़े में फिर से जान आ गई. दीदी इस समय अपनी
कमर पर हाथ रख कर खड़ी थी. फिर उसने अपने
चुत्तर को खुजाया और सहलाया फिर अपने दोनों हाथों
को बारी बारी से उठा कर अपनी कान्खो को देखा और
फिर अपने जांघो के बीच झाँकने के बाद फर्श पर परे हुए
कपड़ो को उठाया. यही वो क्षण था जिसका मैं काफी
देर से इन्तेज़ार कर रहा था. फर्श पर पड़े हुए कपड़ो को
उठाने के लिए दीदी निचे झुकी और उनके चुत्तर लकड़ी
के पट्टो के बीच बने गैप के सामने आ गए. निचे झुकने
के कारण उनके दोनों चुत्तर अपने आप अलग हो गए
और उनके बीच की मोटी लकीर अब दीदी की गहरी गांड
में बदल गई. दोनों चुत्तर बहुत ज्यादा अलग नहीं हुए
थे मगर फिर भी इतने अलग तो हो चुके थे की उनके
बीच की गहरी खाई नज़र आने लगी थी. देखने से ऐसा
लग रहा था जैसे किसी बड़े खरबूजे को बीच से काट कर
थोड़ा सा अलग करके दो खम्भों के ऊपर टिका कर रख
दिया गया है. दीदी वैसे ही झुके हुए बाल्टी में कपड़ो को
डाल कर खंगाल रही थी और बाहर निकाल कर उनका
पानी निचोड़ रही थी. ताकत लगाने के कारण दीदी के
चुत्तर और फ़ैल गए और गोरी चुत्तरों के बीच की गहरी
भूरे रंग की गांड की खाई पूरी तरह से नज़र आने लगी.
दीदी की गांड की खाई एक दम चिकनी थी. गांड के छेद
के आस-पास भी बाल उग जाते है मगर दीदी के मामले
में ऐसा नहीं था उसकी गांड, जैसा की उसका बदन था,
की तरह ही मलाई के जैसी चिकनी लग रही थी. झुकने
के कारण चुत्तरों के सबसे निचले भाग से जांघो के बीच
से दीदी की चूत के बाल भी नजर आ रहे थे. उनके ऊपर
लगा हुआ सफ़ेद क्रीम भी नज़र आ रहा था. चुत्तरो की
खाई में काफी निचे जाकर जहा चूत के बाल थे उनसे
थोड़ा सा ऊपर दीदी की गांड की सिकुरी हुई भूरे रंग की
छेद थी. ऊँगली के अगले सिरे भर की बराबर की छेद
थी. किसी फूल की तरह से नज़र आ रही थी. दीदी के
एक दो बार हिलने पर वो छेद हल्का सा हिला और एक
दो बार थोड़ा सा फुला-पिचका. ऐसा क्यों हुआ मेरी
समझ में नहीं आया मगर इस समय मेरा दिल कर रहा
था की मैं अपनी ऊँगली को दीदी की गांड की खाई में रख
कर धीरे-धीरे चलाऊ और उसके भूरे रंग की दुप-दुपाती
छेद पर अपनी ऊँगली रख हलके-हलके दबाब दाल कर
गांड की छेद की मालिश करू. उफ़ कितना मजा आएगा
अगर एक हाथ से चुत्तर को मसलते हुए दुसरे हाथ की
ऊँगली को गांड की छेद पर डाल कर हलके-हलके कभी
थोड़ा सा अन्दर कभी थोड़ा सा बाहर कर चलाया जाये
तो. पूरी ऊँगली दीदी की गांड में डालने से उन्हें दर्द हो
सकता था इसलिए पूरी ऊँगली की जगह आधी ऊँगली
या फिर उस से भी कम डाल कर धीरे धीरे गोल-गोल
घुमाते हुए अन्दर-बाहर करते हुए गांड की फूल जैसी
छेद ऊँगली से हलके-हलके मालिश करने में बहुत मजा
आएगा. इस कल्पना से ही मेरा पूरा बदन सिहर गया.
दीदी की गांड इस समय इतनी खूबसूरत लग रही थी की
दिल कर रहा थी अपने मुंह को उसके चुत्तरों के बीच
घुसा दू और उसकी इस भूरे रंग की सिकुरी हुई गांड की
छेद को अपने मुंह में भर कर उसके ऊपर अपना जीभ
चलाते हुए उसके अन्दर अपनी जीभ डाल दू. उसके
चुत्तरो को दांत से हलके हलके काट कर खाऊ और पूरी
गांड की खाई में जीभ चलाते हुए उसकी गांड चाटू. पर
ऐसा संभव नहीं था. मैं इतना उत्तेजित हो चूका था की
लण्ड किसी भी समय पानी फेंक सकता था. लौड़ा अपनी
पूरी औकात पर आ चूका था और अब दर्द करने लगा
था. अपने अंडकोष को अपने हाथो से सहलाते हुए हलके
से सुपाड़े को दो उँगलियों के बीच दबा कर अपने आप
को सान्तवना दिया.
सारे कपड़े अब खंगाले जा चुके थे. दीदी सीधी खड़ी हो
गई और अपने दोनों हाथो को उठा कर उसने एक अंगराई
ली और अपनी कमर को सीधा किया फिर दाहिनी तरफ
घूम गई. मेरी किस्मत शायद आज बहुत अच्छी थी.
दाहिनी तरफ घूमते ही उसकी दाहिनी चूची जो की अब
नंगी थी मेरी लालची आँखों के सामने आ गई. उफ़ अभी
अगर मैं अपने लण्ड को केवल अपने हाथ से छू भर देता
तो मेरा पानी निकल जाता. चूची का एक ही साइड दिख
रहा था. दीदी की चूची एक दम ठस सीना तान के खड़ी
थी. ब्लाउज के ऊपर से देखने पर मुझे लगता तो था की
उनकी चूचियां सख्त होंगी मगर 28-29 साल की होने
के बाद भी उनकी चुचियों में कोई ढलकाव नहीं आया
था. इसका एक कारण ये भी हो सकता था की उनको
अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ था. दीदी को शायद ब्रा
की कोई जरुरत ही नहीं थी. उनकी चुचियों की कठोरता
किसी भी 17-18
साल की लौंडिया के दिल में जलन पैदा कर सकती थी.
जलन तो मेरे दिल में भी हो रही थी इतनी अच्छी चुचियों
मेरी किस्मत में क्यों नहीं है. चूची एकदम दूध के जैसी
गोरे रंग की थी. चूची का आकार ऐसा था जैसे किसी
मध्यम आकार के कटोरे को उलट कर दीदी की छाती से
चिपका दिया गया हो और फिर उसके ऊपर किशमिश के
एक बड़े से दाने को डाल दिया गया हो. मध्यम आकार
के कटोरे से मेरा मतलब है की अगर दीदी की चूची को
मुट्ठी में पकड़ा जाये तो उसका आधा भाग मुट्ठी से
बाहर ही रहेगा. चूची का रंग चूँकि हद से ज्यादा गोरा
था इसलिए हरी हरी नसे उस पर साफ़ दिखाई पर रही
थी, जो की चूची की सुन्दरता को और बढा रही थी.
साइड से देखने के कारण चूची के निप्पल वन-
डायेमेन्शन में नज़र आ रहे थे. सामने से देखने पर ही
थ्री-डायेमेन्शन में नज़र आ सकते थे. तभी उनकी
लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई का सही मायेने में अंदाज
लगाया जा सकता था मगर क्या कर सकता था मजबूरी
थी मैं साइड व्यू से ही काम चला रहा था. निप्पलों का
रंग गुलाबी था, पर हल्का भूरापन लिए हुए था. बहुत
ज्यादा बड़ा तो नहीं था मगर एक दम छोटा भी नहीं था
किशमिश से बड़ा और चॉकलेट से थोड़ा सा छोटा.
मतलब मुंह में जाने के बाद चॉकलेट और किशमिश दोनों
का मजा देने वाला. दोनों होंठो के बीच दबा कर हलके-
हलके दबा-दबा कर दांत से काटते हुए अगर चूसा जाये
तो बिना चोदे झर जाने की पूरी सम्भावना थी

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10-24-2016, 10:18 AM
Post: #4
RE: मेरी बहन कविता
दाहिनी तरफ घूम कर आईने में अपने दाहिने हाथ को
उठा कर देखा फिर बाएं हाथ को उठा कर देखा. फिर
अपनी गर्दन को झुका कर अपनी जांघो के बीच देखा.
फिर वापस नल की तरफ घूम गई और खंगाले हुए कपरों
को वही नल के पास बनी एक खूंटी पर टांग दिया और
फिर नल खोल कर बाल्टी में पानी भरने लगी. मैं समझ
गया की दीदी अब शायद नहाना शुरू करेंगी. मैंने पूरी
सावधानी के साथ अपनी आँखों को लकड़ी के पट्टो के
गैप में लगा दिया. मग में पानी भर कर दीदी थोड़ा सा
झुक गई और पानी से पहले अपने बाएं हाथ फिर दाहिनी
हाथ के कान्खो को धोया. पीछे से मुझे कुछ दिखाई नहीं
पर रहा था मगर. दीदी ने पानी से अच्छी तरह से धोने
के बाद कान्खो को अपने हाथो से छू कर देखा. मुझे
लगा की वो हेयर रेमोविंग क्रीम के काम से संतुष्ट हो
गई और उन्होंने अपना ध्यान अब अपनी जांघो के बीच
लगा दिया. दाहिने हाथ से पानी डालते हुए अपने बाएं
हाथ को अपनी जांघो बीच ले जाकर धोने लगी. हाथों को
धीरे धीरे चलाते हुए जांघो के बीच के बालों को धो रही
थी. मैं सोच रहा था की काश इस समय वो मेरी तरफ
घूम कर ये सब कर रही होती तो कितना मजा आता.
झांटों के साफ़ होने के बाद कितनी चिकनी लग रही होगी
दीदी की चुत ये सोच का बदन में झन-झनाहट होने
लगी. पानी से अपने जन्घो के बीच साफ़ कर लेने के बाद
दीदी ने अब नहाना शुरू कर दिया. अपने कंधो के ऊपर
पानी डालते हुए पुरे बदन को भीगा दिया. बालों के जुड़े
को खोल कर उनको गीला कर शैंपू लगाने लगी. दीदी का
बदन भीग जाने के बाद और भी खूबसूरत और मदमस्त
लगने लगा था. बदन पर पानी पड़ते ही एक चमक सी आ
गई थी दीदी के बदन में. शैंपू से खूब सारा झाग बना
कर अपने बालों को साफ़ कर रही थी. बालो और गर्दन
के पास से शैंपू मिला हुआ मटमैला पानी उनकी गर्दन से
बहता हुआ उनकी पीठ पर चुते हुए निचे की तरफ गिरता
हुआ कमर के बाद सीधा दोनों चुत्तरों के बीच यानी की
उनके बीच की दरार जो की दीदी की गांड थी में घुस रहा
था. क्योंकि ये पानी शैंपू लगाने के कारण झाग से मिला
हुआ था और बहुत कम मात्रा में था इसलिए गांड की
दरार में घुसने के बाद कहा गायब हो जा रहा था ये मुझे
नहीं दिख रहा था. अगर पानी की मात्रा ज्यादा होती
तो फिर वो वहां से निकल कर जांघो के अंदरूनी भागो से
ढुलकता हुआ निचे गिर जाता. बालों में अच्छी तरह से
शैंपू लगा लेने के बाद बालों को लपेट कर एक गोला सा
बना कर गर्दन के पास छोड़ दिया और फिर अपने कंधो
पर पानी डाल कर अपने बदन को फिर से गीला कर
लिया. गर्दन और पीठ पर लगा हुआ शैंपू मिला हुआ
मटमैला पानी भी धुल गया था. फिर उन्होंने एक स्पोंज
के जैसी कोई चीज़ रैक पर से उठा ली और उस से अपने
पुरे बदन को हलके-हलके रगरने लगी. पहले अपने हाथो
को रगरा फिर अपनी छाती को फिर अपनी पीठ को फिर
बैठ गई. निचे बैठने पर मुझे केवल गर्दन और उसके
निचे का कुछ हिस्सा दिख रहा था. पर ऐसा लग रहा था
जैसे वो निचे बैठ कर अपने पैरों को फैला कर पूरी तरह
से रगर कर साफ़ कर रही थी क्योंकि उनका शरीर हिल
रहा था. थोरी देर बाद खड़ी हो गई और अपने जांघो को
रगरना शुरू कर दिया. मैं सोचने लगा की फिर निचे बैठ
कर क्या कर रही थी. फिर दिमाग में आया की हो
सकता है अपने पैर के तलवे और उँगलियों को रगर कर
साफ़ कर रही होंगी. मेरी दीदी बहुत सफाई पसंद है.
जैसे उसे घर के किसी कोने में गंदगी पसंद नहीं है उसी
तरह से उसे अपने शरीर के किसी भी भाग में गंदगी
पसंद नहीं होगी. अब वो अपने जांघो को रगर रगर कर
साफ़ कर रही थी और फिर अपने आप को थोड़ा झुका
कर अपनी दोनों जांघो को फैलाया और फिर स्पोंज को
दोनों जांघो के बीच ले जाकर जांघो के अंदरूनी भाग और
रान को रगरने लगी. पीछे से देखने पर लग रहा था जैसे
वो जांघो को जोर यानि जहाँ पर जांघ और पेट के निचले
हिस्से का मिलन होता और जिसके बीच में चूत होती है
को रगर कर साफ़ करते हुए हलके-हलके शायद अपनी
चूत को भी रगर कर साफ़ कर रही थी ऐसा मेरा सोचना
है. वैसे चुत जैसी कोमल चीज़ को हाथ से रगर कर साफ़
करना ही उचित होता. वाकई ऐसा था या नहीं मुझे नहीं
पता, पीछे से इस से ज्यादा पता भी नहीं चल सकता
था. थोड़ी देर बाद थोड़ा और झुक कर घुटनों तक रगर
कर फिर सीधा हो कर अपने हाथों को पीछे ले जाकर
अपने चुत्तरों को रगरने लगी. वो थोड़ी-थोड़ी देर में
अपने बदन पर पानी डाल लेती थी जिस से शरीर का जो
भाग सुख गया होता वो फिर से गीला हो जाता था और
फिर उन्हें रगरने में आसानी होती थी. चुत्तरों को भी
इसी तरह से एक बार फिर से गीला कर खूब जोर जोर
से रगर रही थी. चुत्तरों को जोर से रगरने से कोई
फर्क नहीं पड़ने वाला था क्योंकि वहां का मांस बहुत
मोटा था, पर जोर से रगरने के कारण लाल हो गया था
और थल-थलाते हुए हिल रहा था. मेरे हाथों में खुजली
होने लगी थी और दिल कर रहा था की थल-थलाते हुए
चुत्तरों को पकड़ कर मसलते हुए हलके-हलके मारते हुए
खूब हिलाउ. चुत्तारों को रगरने के बाद दीदी ने स्पोंज
को दोनों चुत्तरों की दरार के ऊपर रगरने लगी फिर
थोड़ा सा आगे की तरफ झुक गैई जिस से उसके चुत्तर
फ़ैल गए. फिर स्पोंज को दोनों चुत्तरों के बीच की खाई
में डाल कर रगड़ने लगी. कोमल गांड की फूल जैसी छेद
शायद रगड़ने के बाद लाल हो गुलाब के फूल जैसी खिल
जायेगी. ये सोच कर मेरे मन में दीदी की गांड देखने की
तीव्र इच्छा उत्पन्न हो गई. मन में आया की इस
लकड़ी की दिवार को तोड़ कर सारी दुरी मिटा दू, मगर,
सोचने में तो ये अच्छा था, सच में ऐसा करने की
हिम्मत मेरी गांड में नहीं थी. बचपन से दीदी का
गुस्सैल स्वभाव देखा था, जानता था, की जब उस दुबई
वाले को नहीं छोड़ती थी तो फिर मेरी क्या बिसात.
गांड पर ऐसी लात मारेगी की गांड देखना भूल जाऊंगा.
हालाँकि दीदी मुझे प्यार भी बहुत करती थी और मुझे
कभी भी परेशानी में देख तुंरत मेरे पास आ कर मेरी
समस्या के बारे में पूछने लगती थी.
स्पोंज से अपने बदन को रगड़ने के बाद. वापस स्पोंज
को रैक पर रख दिया और मग से पानी लेकर कंधो पर
डालते हुए नहाने लगी. मात्र स्पोंज से सफाई करने के
बाद ही दीदी का पूरा बदन चम-चमाने लगा था. पानी से
अपने पुरे बदन को धोने के बाद दीदी ने अपने शैंपू लगे
बालों का गोला खोला और एक बार फिर से कमर के
पास से निचे झुक गई और उनके चुत्तर फिर से लकड़ी
के पट्टो के बीच बने गैप के सामने आ गए. इस बार
उनके गोरे चम-चमाते चुत्तरों के बीच की चमचमाती
खाई के आलावा मुझे एक और चीज़ के दिखने को मिल
रही थी. वो क्या थी इसका अहसास मुझे थोड़ी देर से
हुआ. गांड की सिकुरी हुई छेद से करीब चार अंगुल भर
की दूरी पर निचे की तरफ एक लम्बी लकीर सी नज़र आ
रही थी. मैं ये देख कर ताज्जुब में पर गया, पर तभी
ख्याल आया की घोंचू ये तो शायद चूत है. पहले ये
लकीर इसलिए नहीं नज़र आ रही थी क्योंकि यहाँ पर
झान्ट के बाल थे, हेयर रिमुविंग क्रीम ने जब झांटो की
सफाई कर दी तो चूत की लकीर स्पष्ट दिखने लगी. इस
बात का अहसास होते ही की मैं अपनी दीदी की चूत देख
रहा हूँ, मुझे लगा जैसे मेरा कलेजा मुंह को आ जायेगा
और फिर से मेरा गला सुख गया और पैर कांपने लगे.
इस बार शायद मेरे लण्ड से दो बूँद टपक कर निचे गिर
भी गया पर मैंने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया. लण्ड
भी मारे उत्तेजना के काँप रहा था. बाथरूम में वैसे तो
लाइट आँन थी मगर चूँकि बल्ब भी लकरी के पट्टो के
सामने ही लगा हुआ था इसलिए दीदी की पीठ की तरफ
रोशनी कम थी. फिर भी दोनों मोटी जांघो के बीच ऊपर
की तरफ चुत्तरों की खाई के ठीक निचे एक गुलाबी
लकीर सी दिख रही थी. पट्टो के बीच से देखने से ऐसा
लग रहा था जैसे सेब या पके हुए पपीते के आधे भाग को
काट कर फिर से आपस में चिपका कर दोनों जांघो के
बीच फिट कर दिया गया है. मतलब दीदी की चूत ऐसी
दिख रही थी जैसे सेब को चार भागो में काट कर फिर दो
भागो को आपस में चिपका कर गांड के निचे लगा दिया
गया हो. कमर या चुत्तरों के इधर-उधर होने पर दोनों
फांकों में भी हरकत होती थी और ऐसा लगता जैसे कभी
लकीर टेढी हो गई है कभी लकीर सीधी हो गई है. जैसे
चूत के दोनों होंठ कभी मुस्कुरा रहे है कभी नाराज़ हो रहे
है. दोनों होंठ आपस में एक दुसरे से एक दम सटे हुए
दिख रहे थे. होंठो के आपस में सटे होने के मतलब बाद
में समझ में आया की ऐसा चूत के बहुत ज्यादा टाइट
होने के कारण था. दोनों फांक एक दम गुलाबी और
पावरोटी के जैसे फूले हुए थे. मेरे मन में आया की काश
मैं चूत की लकीर पर ऊपर से निचे तक अपनी ऊँगली
चला और हलके से दोनों फांकों को अलग कर के देख
पाता की कैसी दिखती है, दोनों गुलाबी होंठो के बीच का
अंदरूनी भाग कैसा है मगर ये सपना ही रह गया. दीदी
के बाल धुल चुके थे और वो सीधी खड़ी हो गई.
बालो को अच्छी तरह से धोने के बाद फिर से उनका
गोला बना कर सर के ऊपर बाँध लिया और फिर अपने
कंधो पर पानी डाल कर अपने आप को फिर से गीला कर
पुरे बदन पर साबुन लगाने लगी। पहले अपने हाथो पर
अच्छी तरह से साबुन लगाया फिर अपने हाथो को ऊपर
उठा कर वो दाहिनी तरफ घूम गई और अपने कान्खो को
आईने में देख कर उसमे साबुन लगाने लगी. पहले बाएं
कांख में साबुन लगाया फिर दाहिने हाथ को उठा कर
दाहिनी कांख में जब साबुन लगाने जा रही थी तो मुझे
हेयर रिमुविंग क्रीम का कमाल देखने को मिला. दीदी
की कांख एक दम गोरी, गुलाबी और चिकनी हो गई थी।

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10-24-2016, 10:18 AM
Post: #5
RE: मेरी बहन कविता
जीभ लगा कर चाटो तो जीभ फिसल जाये ऐसी चिकनी
लग रही थी. दीदी ने खूब सारा साबुन अपनी कान्खो में
लगाया और फिर वैसे ही अपनी छाती पर रगर-रगर कर
साबुन लगाने लगी. छाती पर साबुन का खूब सारा झाग
उत्पन्न हो रहा था. दीदी का हाथ उसमे फिसल रहा था
और वो अपनी ही चुचियों के साथ खिलवार करते हुए
साबुन लगा रही थी. कभी निप्पल को चुटकियों में पकर
कर उन पर साबुन लगाती कभी पूरी चूची को दोनों हाथो
की मुट्ठी में कस कर साबुन लगाती. साबुन लगाने के
कारण दीदी की चूची हिल रही थी और थलथला रही थी.
चुचियों के हिलने का नज़ारा लण्ड को बेकाबू करने के
लिए काफी था. तभी दीदी वापस नल की तरफ घूम गई
और फिर निचे झुक कर पैरों पर साबुन लगाने के बाद
सीधा हो कर अपनी जांघो पर साबुन लगाने लगी. दोनों
जांघो पर साबुन लगाने के बाद अपने हाथो में ढेर सारा
साबुन का झाग बना कर अपनी जांघो को फैला कर उनके
बीच अपने हाथों को घुसा दिया. हाथ चलाते हुए अपनी
चूत पर साबुन लगाने लगी. अच्छी तरह से चूत पर
साबुन लगा लेने के बाद जैसा की मैंने सोचा था गांड की
बारी आई और फिर पहले अपने चुतरों पर साबुन लगा
लेने के बाद अपने हाथो में साबुन का ढेर सारा झाग बना
कर अपने हाथो को चुत्तरों की दरार में घुसा दिया और
ऊपर से निचे चलाती हुई अपनी गांड की खाई को रगरते
हुए उसमे साबुन लगाने लगी. गांड में साबुन लगाने से भी
खूब सारा झाग उत्पन्न हो रहा था. खूब अच्छी तरह
से साबुन लगा लेने के बाद. नल खोल कर मग से पानी
उठा-उठा कर दीदी ने अपना बदन धोना शुरू कर दिया.
पानी धीरे-धीरे साबुन को धो कर निचे गिराता जा रहा
था और उसी के साथ दीदी के गोरे बदन की सुन्दरता
को भी उजागर करता जा रहा था. साबुन से धुल जाने के
बाद दीदी का गोरा बदन एक दम ढूध का धुला लग रहा
था. जैसे बाथरूम के उस अंधियारे में चांदनी रौशन हो
गई थी. ऊपर से निचे तक दीदी का पूरा बदन चम-चमा
रहा था. मेरी आंखे चुंधिया रही थी और मैं अपनी आँखों
को फार कर ज्यादा से ज्यादा उसके मद भरे यौवन का
रस अपनी आँखों से पी जाना चाहता था. मेरे पैर थक
चुके थे और कमर अकड़ चूँकि थी मगर फिर भी मैं वह
से हिल नहीं पा रहा था. अपने पुरे बदन को धो लेने के
बाद दीदी ने खूंटी पर टंगा तौलिया उतारा और अपने
बदन को पोछने लगी. पुरे बदन को तौलिये से हौले-हौले
दबा कर पोछने के बाद अपने सर को बालों को तौलिये से
हल्के से पोछा और तौलिये को बालों में लपेट कर एक
गोला बना दिया. फिर दाहिनी तरफ घूम कर आईने के
सामने आ गई. दाहिनी चूची जो की मुझे इस समय दिख
रही थी थोड़ी लाल या फिर कहे तो गुलाबी लग रही थी.
ऐसा शायद रगर का सफाई करने के कारण हुआ होगा,
निप्पल भी थोड़ी काली लग रही थी ऐसा शायद उनमे
खून भर जाने के कारण हुआ होगा. दीदी ने अपने आप
को आईने अच्छी तरह से देखा फिर अपने दोनों हाथो को
उठा कर बारी-बारी से अपनी कान्खो को देखा और
सुंघा भी, फिर अपने दोनों जांघो के बीच अच्छी तरह से
देखा, अपने चेहरे का हर कोण से अच्छी तरह से आईने
में देखा और फिर अपनी नजरो को निचे ले जा कर अपने
पैरों आदि को देखने लगी. मैं समझ गया की अब दीदी
बाहर निकलेंगी. इस से पहले की वो बाहर निकले मुझे
चुप चाप निकल जाना चाहिए. मैं जल्दी से बाहर निकला
और साइड में बने बेसीन पर अपना हाथ धोया और एक
शर्ट पहन कर चुपचाप बाहर निकल गया. मैं किसी भी
तरह का खतरा नहीं मोलना चाहता चाहता था इसलिए
बाहर निकल पहले अपने आप को सयंत किया, अपने
उखरे हुए सांसो पर काबू पाया और फिर करीब पंद्रह
मिनट के बाद घर में फिर से दाखील हुआ.
घर में घुसने पर देखा की दीदी अपने कपड़े पहन कर
बालकनी में खरी हो कर अपने बालों को सुखा रही थी.
पीली साडी और ब्लाउज में आसमान से उतरी परी की
तरह लग रही थी. गर्दन पीछे की तरफ कर के बालों को
तौलिये से रगर कर पोछते हुए शायद उसे ध्यान नहीं था
की टाइट ब्लाउज में बाहर की ओर उसकी चुचियाँ
निकल जाएँगी. देखने से ऐसा लग रहा था जैसे अभी फार
कर बाहर निकल आएगी. उसने शायद थोड़ा मेकअप भी
कर लिया था. बाल सुखाते हुए उसकी नज़र मेरे ऊपर
पड़ी तो बोली “कहाँथा, बोलकेजाता…
मैंकमसेकमदरवाजातोबंदकरलेती”. मैंनेकहा
“सॉरीदीदीवोमुझेध्याननहींरहा…”. फिर बाल सुखाने के
बाद दीदी अपने कमरे में चली गई. मैं वही बाहर बैठ
कर टेलिविज़न देखने लगा.
अब मैं एक चोर बन चूका था, एक ऐसा चोर जो अपनी
बड़ी बहन की खूबसूरती को चोरी छुपे हर समय निहारने
की रहता था की जब दीदी अस्त-व्यस्त अवस्था में
लेटी हो या कुछ काम कर रही हो तो उसकी एक झलक
ले लू. दफ्तर खुल चूका था सो बाथरूम में फिर से दीदी
की जवानी को निहारने का मौका नहीं मिल रहा था.
सुबह-सुबह नहा कर लोकल पकर कर ऑफिस जाता
और फिर शाम में ही घर पर वापस आ पाता था. नया
शनिवार और रविवार आया, उस दिन मैं काफी देर तक
लैट्रिन में बैठा रहा पर दीदी बाथरूम में नहाने नहीं आई.
फिर मैंने मौका देख कर दीदी जब नहाने गई तो लैट्रिन
मेंकोशिश में लगा रहता था. एक चोर की तरह मैं डरता
भी था की कही मेरी चोरी पकरी न जाये. हर समय
कोशिश करता चोरी से घुसने की कोशिश की पर उस
काम में भी असफल रहा परोस से कोई आ कर दरवाज़ा
खटखटाने लगा और दीदी ने बाथरूम में से मुझे जोर से
आवाज़ देकर कहा की “देखकौनहैदरवाजेपर”, मजबूरन
निकलना पड़ा. ऐसे ही हमेशा कुछ न कुछ हो जाता था
और अपने प्रयासों में मुझे असफलता हाथ लगती. फिर
मुझे मौका भी केवल शनिवार और रविवार को मिलता
था. अगर इन दो दिनों में कुछ हो पाता तो ठीक है नहीं
तो फिर पुरे एक सप्ताह तक इंतजार करना परता था.
उस दिन की घटना को याद कर कर के मैंने न जाने
कितनी बार मुठ मारी होगी इसका मुझे खुद अहसास
नहीं था.
इसी तरह एक रात जब मैं अपने लण्ड को खड़ा करके
हलके हलके अपने लण्ड की चमरी को ऊपर निचे करते
हुए अपनी प्यारी दीदी को याद करके मुठ मारने की
कोशिश करते हुए, अपनी आँखों को बंद कर उसके
गदराये बदन की याद में अपने को डुबाने की कोशिश कर
रहा था तो मेरी आँखों में पड़ती हुई रौशनी की लकीर ने
मुझे थोड़ा बैचैन कर दिया और मैंने अपनी आंखे खोल
दी. दीदी के कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला हुआ था.
दरवाजे के दोनों पल्लो के बीच से नाईट बल्ब की रौशनी
की एक लकीर सीधे मेरे तकिये के ऊपर जहाँ मैं अपना
सर रखता हूँ पर आ रही थी. मैं आहिस्ते से उठा और
दरवाजो के पास जा कर सोचा की इसके दोनों पल्लो को
अच्छी तरह से आपस में सटा देता हूँ. चोरी तो मेरे मन
में थी ही. दोनों पल्लो के बीच से अन्दर झाँकने के लोभ
पर मैं काबू नहीं रख पाया.
दीदी के गुस्सैल स्वाभाव से परिचित होने के कारण मैं
जानता था, अगर मैं पकड़ा गया तो शायद इस घर में
मेरा आखिरी दिन होगा. दोनों पल्लो के बीच से अन्दर
झांक कर देखा की दीदी अपने पलंग पर करवट होकर
लेटी हुई थी. उसका मुंह दरवाजे के विपरीत दिशा में
था. यानि की पैर दरवाजे की तरफ था. पलंग एक साइड
से दीवाल सटा हुआ था, दीदी दीवाल की ओर मुंह करके
केवल पेटिकोट और ब्लाउज में जैसा की गर्मी के दिनों
में वो हमेशा करती है लेटी हुई थी. गहरे नीले रंग का
ब्लाउज और पेटिकोट दीदी के गोरे रंग पर खूब खिलता
था. मुझे उनका पिछवारा नज़र आ रहा था. कई बार
सोई हुई अवस्था में पेटिकोट इधर उधर हो जाने पर
बहुत कुछ देख पाने का मौका मिल जाता है ऐसा मैंने कई
कहानियों में पढ़ा था मगर यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था.
पेटिकोट अच्छी तरह से दीदी के पैरों से लिपटा हुआ था
और केवल उनकी गोरी पिंडलियाँ ही दिख रही थी. दीदी
ने अपने एक पैर में पतली सी पायल पहन रखी थी. दीदी
वैसे भी कोई बहुत ज्यादा जेवरों की शौकीन नहीं थी.
हाथो में एक पतली से सोने की चुड़ी. गोरी पिंडलियों में
सोने की पतली से पायल बहुत खूबसूरत लग रही थी.
पेटिकोट दीदी के भारी चुत्तरो से चिपके हुए थे. वो
शायद काफी गहरी नींद में थी. बहुत ध्यान से सुन ने
पर हलके खर्राटों की आवाज़ आ रही थी. मैंने हलके से
दरवाजे के पल्लो को अलग किया और दबे पाँव अन्दर
घुस गया. मेरा कलेजा धक्-धक् कर रहा था मगर मैं
अपने कदमो को रोक पाने असमर्थ था. मेरे अन्दर दीदी
के प्रति एक तीव्र लालसा ने जन्म ले लिया था. मैं
दीदी के पास पहुँच कर एक बार सोती हुई दीदी को
नजदीक से देखना चाहता था. दबे कदमो से चलते हुए मैं
पलंग के पास पहुँच गया. दीदी का मुंह दूसरी तरफ था.
वो बाया करवट हो कर लेटी हुई थी. कुछ पलो के बाद
पलंग के पास मैं अपनी सोई हुई प्यारी बहन के पीछे
खड़ा था. मेरी सांस बहुत तेज चल रही थी. दम साध
कर उन पर काबू करते हुए मैं थोड़ा सा आगे की ओर
झुका. दीदी की सांसो के साथ उनकी छाती धीरे-धीरे
उठ बैठ रही. गहरे नीले रंग के ब्लाउज का ऊपर का एक
बटन खुला हुआ था और उस से गोरी छातियों दिख रही
थी. थोड़ा सा उनके सर की तरफ तिरछा हो कर झुकने
पर दोनों चुचियों के बीच की गहरी घाटी का उपरी भाग
दिखने लगा. मेरे दिमाग इस समय काम करना बंद कर
चूका था. शायद मैंने सोच लिया था की जब ओखली में
सर दे दिया तो मुसल से क्या डरना. मैंने अपने दाहिने
हाथ को धीरे से आगे बढाया. इस समय मेरा हाथ काँप
रहा था फिर भी मैंने अपने कांपते हाथो को धीरे से दीदी
की दाहिनी चूची पर रख दिया. गुदाज चुचियों पर हाथ
रखते ही लगा जैसे बिजली के नंगे तार को छू दिया हो.
ब्लाउज के ऊपर से चूची पर हाथो का हल्का सा दबाब
दिया तो पुरे बदन में चीटियाँ रेंगने लगी. किसी लड़की
या औरत की चुचियों को पहली बार अपने हाथो से छुआ
था. दीदी की चूची एकदम सख्त थी. ज्यादा जोर से
दबा नहीं सकता था. क्योंकि उनके जग जाने का खतरा
था, मगर फिर भी इतना अहसास हो गया की नारियल
की कठोर खोपरी जैसी दिखने वाली ये चूची वास्तव में
स्पोंज के कठोर गेंद के समान थी. जिस से बचपन में
मैंने खूब क्रिकेट खेली थी. मगर ये गेंद जिसको मैं दबा
रहा था वो एक जवान औरत के थे जो की इस समय
सोई हुई थी. इनके साथ ज्यादा खेलने की कोशिश मैं
नहीं कर सकता था फिर भी मैं कुछ देर तक दीदी की
दाहिनी चूची को वही खड़े-खड़े हलके-हलके दबाता
रहा. दीदी के बदन में कोई हरकत नहीं हो रही थी. वो
एकदम बेशुध खर्राटे भर रही थी. ब्लाउज का एक बटन
खुला हुआ था, मैंने हलके से ब्लाउज के उपरी भाग को
पकर कर ब्लाउज के दोनों भागो को अलग कर के चूची
देखने के लिए और अन्दर झाँकने की कोशिश की मगर
एक बटन खुला होने के कारण ज्यादा आगे नहीं जा
सका. निराश हो कर चूची छोर कर मैं अब निचे की तरफ
बढा. दीदी की गोरी चिकनी पेट और कमर को कुछ पलो
तक देखने के बाद मैंने हलके से अपने हाथो को उनकी
जांघो पर रख दिया. दीदी की मोटी मदमस्त जांघो का
मैं दीवाना था. पेटिकोट के कपरे के ऊपर से जांघो को
हलके से दबाया तो अहसास हुआ की कितनी सख्त और
गुदाज जांघे है. काश मैं इस पेटिकोट के कपड़े को कुछ
पलो के लिए ही सही हटा कर एक बार इन जांघो को चूम
पाता या थोड़ा सा चाट भर लेता तो मेरे दिल को करार
आ जाता. दीदी की मोटी जांघो को हलके हलके दबाते
हुए मैं सोचने लगा की इन जांघो के बीच अपना सर रख
कर सोने में कितना मजा आएगा. तभी मेरी नज़र दीदी
की कमर के पास पड़ी जहाँ वो अपने पेटिकोट का नाड़ा
बांधती है. पेटिकोट का नाड़ा तो खूब कस कर बंधा हुआ
था, मगर जहाँ पर नाड़ा बंधा होता है ठीक वही पर
पेटिकोट में एक कट बना हुआ था. ये शायद नाड़ा बाँधने
और खोलने में आसानी हो इसलिए बना होता है. मैं
हलके से अपने हाथो को जांघो पर से हटा कर उस कट
के पास ले गया और एक ऊँगली लगा कर कट को थोड़ा
सा फैलाया. ओह…वहां से सीधा दीदी की बुर का उपरी
भाग नज़र आ रहा था. मेरा पूरा बदन झन-झना गया.
लण्ड ने अंगराई ली और फनफना कर खड़ा हो गया.
ऐसा लगा जैसे पानी एक दम सुपाड़े तक आ कर अटक
गया है और अब गिर जायेगा. मैंने उस कट से दीदी के
पेरू (पेट का सबसे निचला भाग) के थोड़ा निचे तक देख
पा रहा था. चूँकि दीदी को बाथरूम में नहाते हुए देखने के
बाद से तीन हफ्ते बीत चुके थे और शायद दीदी ने
दुबारा फिर से अपने अंदरूनी बालों की सफाई नहीं की थी
इसलिए उनकी चुत पर झांटे उग गई थी. मुझे वही झांटे
दिख रही थी. वासना और उत्तेजना में अँधा हो कर मैंने
धीरे से अपनी ऊँगली पेटिकोट के कट के अन्दर सरका
दी. मेरी उँगलियों को पेरू की कोमल त्वचा ने जब छुआ
तो मैं काँप गया और मेरी उँगलियाँ और अन्दर की तरफ
सरक गई. चुत की झांटे मेरी उँगलियों में उलझ चुकी थी.
मैं बहुत सावधानी से अपनी उँगलियों को उनके बीच
चलाते हुए और अन्दर की तरफ ले जाना चाहता था.
इसलिए मैंने पेटिकोट के कट को दुसरे हाथ की सहायता
से थोड़ा सा और फैलाया और फिर अपनी ऊँगली को
थोड़ा और अन्दर घुसाया और यही मेरी सबसे बड़ी
गलती साबित हो गई.

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10-24-2016, 10:19 AM
Post: #6
RE: मेरी बहन कविता
मुझे ज्यादा लालच नहीं करना चाहिए था मगर गलती हो
चुकी थी. दीदी अचानक सीधी होती हुई उठ कर बैठ
गई. अपनी नींद से भरी आँखों को उन्होंने ऐसे खोल
दिया जैसे वो कभी सोई ही नहीं थी. सीधा मेरे उस हाथ
को पकर लिया जो उनके पेटिकोट के नाड़े के कट के पास
था. मैं एक दम हक्का बक्का सा खड़ा रह गया. दीदी ने
मेरे हाथो को जोर से झटक दिया और एक दम सीधी
बैठती हुई बोली “हरामी…सूअर…क्याकररहा….था…
शर्मनहींआतीतुझे….” कहते हुए आगे बढ़ कर चटक से
मेरी गाल पर एक जोर दार थप्पड़ रशीद कर दिया. इस
जोरदार झापड़ ने मुझे ऊपर से निचे तक एक दम झन-
झना दिया. मेरे होश उर चुके थे. गाल पर हाथ रखे वही
हतप्रभ सा खड़ा मैं निचे देख रहा था. दीदी से नज़र
मिलाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था. दीदी ने एक
बार फिर से मेरा हाथ पकर लिया और अपने पास
खींचते हुए मुझे ऊपर से निचे तक देखा. मैं काँप रहा
था. मुझे लग रहा था जैसे मेरे पैरों की सारी ताकत खत्म
हो चुकी है और मैं अब निचे गिर जाऊंगा. तभी दीदी ने
एक बार फिर कड़कती हुई आवाज़ में पूछा “कमीने…
क्याकररहाथा…जवाबक्योंनहींदेता….” फिर उनकी
नज़रे मेरे हाफ पैंट पर पड़ी जो की आगे से अभी भी
थोड़ा सा उभरा हुआ दिख रहा था. हिकारत भरी नजरो
से मुझे देखते हुए बोली
“यहीकामकरनेकेलिएतू….मेरेपास….छि….उफ़….कैसासू
अर…..”. मेरे पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था मगर
फिर भी हिम्मत करके हकलाते हुए मैं बोला “वोदीदी…
माफ़..मैं…..मुझे…माफ़…मैंअब…आ….आगे…” पर
दीदी ने फिर से जोर से अपना हाथ चलाया. चूँकि वो
बैठी हुई थी और मैं खड़ा था इसलिए उनका हाथ सीधा
मेरे पैंट के लगा. ऐसा उन्होंने जान-बूझ कर किया था
या नहीं मुझे नहीं पता मगर उनका हाथ थोड़ा मेरे लण्ड
पर लगा और उन्होंने अपना हाथ झटके से ऐसे पीछे खिंच
लिया जैसे बिजली के नंगे तारो ने उन को छू लिया हो
और एकदम दुखी स्वर में रुआंसी सी होकर बोली
“उफ़….कैसालड़काहै…..अगरमाँसुनेगी….तोक्याबोलेगी
…ओह…मेरीतोसमझमेंनहींआरहा…मैंक्याकरू…”. बात
माँ तक पहुचेगी ये सुनते ही मेरी गांड फट गई. घबरा
कर कैसे भी बात को सँभालने के इरादे से हकलाता हुआ
बोला “दीदी…प्लीज़….माफ़…करदो…
प्लीज़….अबकभी…ऐसा…नहींहोगा….मैंबहकगया…
था…आजकेबाद…प्लीज़दीदी…प्लीज़…
मैंकहीमुंहनहींदिखापाउँगा…मैंआपकेपैर….” कहते हुए मैं
दीदी के पैरों पर गिर पड़ा. दीदी इस समय एक पैर घुटनों
के पास से मोर कर बिस्तर पर पालथी मारने के अंदाज
में रखा हुआ था और दूसरा पैर घुटना मोर कर सामने
सीधा रखे हुए थी. मेरी आँखों से सच में आंसू निकलने
लगे थे और वो दीदी के पैर के तलवे के उपरी भाग को
भींगा रहे थे. मेरी आँखों से निकलते इन प्रायश्चित के
आंसुओं ने शायद दीदी को पिघला दिया और उन्होंने धीरे
से मेरे सर को ऊपर की तरफ उठाया. हालाँकि उनका
गुस्सा अभी भी कम नहीं हुआ था और वो उनकी आँखों
में दिख रहा था मगर अपनी आवाज़ में थोड़ी कोमलता
लाते हुए बोली “येक्याकररहाथातू…..तुझेलोकलाज…
मानमर्यादाकिसीभीचीज़कीचिंतानहीं….मैंतेरीबड़ीबहनहूँ
….मेरीऔरतेरीउम्रकेबीच…
नौसालकाफासलाहै….ओहमैंक्याबोलूमेरीसमझमेंनहींआरह
ा….ठीकहैतूबड़ाहोगयाहै…
मगर…..क्यायहीतरीकामिलाथातुझे….उफ़…” दीदी की
आवाज़ की कोमलता ने मुझे कुछ शांति प्रदान की
हालाँकि अभी भी मेरे गाल उनके तगड़े झापर से झनझना
रहे थे और शायद दीदी की उँगलियों के निशान भी मेरी
गालों पर उग गए थे. मैं फिर से रोते हुए बोला
“प्लीज़दीदीमुझे…माफ़करदो…मैंअबदुबाराऐसी…
गलती….”. दीदी मुझे बीच में काटते हुए बोली
“मुझेतोतेरेभविष्यकीचिंताहोरहीहै….तुनेजोकियासोकिया
परमैंजानतीहूँ…तूअबबड़ाहोचूकाहै….तूक्याकरताहै….
कहीतूअपनेशरीरकोबर्बाद….तोनहीं…कररहाहै”
मैंने इसका मतलब नहीं समझ पाया. हक्का बक्का सा
दीदी का मुंह ताकता रहा. दीदी ने मेरे से फिर पूछा
“कही….तूकही….अपनेहाथसेतोनहीं….”. अब दीदी की
बात मेरी समझ में आ गई. दीदी का ये सवाल पूछना
वाजिब था क्योंकि मेरी हरकतों से उन्हें इस बात का
अहसास तो हो ही चूका था की मैंने आज तक किसी
लड़की के साथ कुछ किया नहीं था और उन्हें ये भी पता
था की मेरे जैसे लड़के अपने हाथो से काम चलाते है. पर
मैं ये सवाल सुन कर हक्का बक्का सा रह गया गया.
मेरे होंठ सुख गए और मैं कुछ बोल नहीं पाया. दीदी ने
फिर से मेरी बाँहों को पकड़ मुझे झकझोरा और
पूछा“बोलताक्योंनहींहै….मैंक्यापूछरहीहूँ….तूअपनेहाथो
सेतोनहींकरता…” मैंने नासमझ होने का नाटक किया और
बोला “हाथोसेदीदी…मममैंसमझानहीं…”
“देख….इतनातोमैंसमझचुकीहुकीतूलड़कियोंकेबारेमेंसोचत
ा..है…
इसलिएपूछरहीहुतूअपनेआपकोशांतकरनेकेलिए….जैसेतूअ
भीमेरेसाथ…
उफ़बोलनेमेंभीशर्मआरहीपर….अभीजबतेरा….येतनजाता
हैतोअपनेहाथोसेशांतकरताहैक्या…इसे…” मेरे पैंट के
उभरे हुए भाग की तरफ इशारा करते हुए बोली. अब
दीदी अपनी बात को पूरी तरह से स्पष्ट कर चुकी थी मैं
कोई बहाना नहीं कर सकता था गर्दन झुका कर बोला
“दी…दीदी…वोवो…मुझेमाफ़कर…माफ़…” एक बार
फिर से दीदी का हाथ चला और मेरी गाल फिर से लाल
हो गई “क्यादीदी, दीदीकररहाहै…
जोपूछरहीहूँसाफ़साफ़क्योंनहींबताता….हाथसेकरताहै….
यहाँऊपरपलंगपरबैठ…बतामुझे…” कहते हुए दीदी ने मेरे
कंधो को पकड़ ऊपर उठाने की कोशिश की. दीदी को एक
बार फिर गुस्से में आता देख मैं धीरे से उठ कर दीदी के
सामने पलंग पर बैठ गया और एक गाल पर हाथ रखे हुए
अपनी गर्दन निचे किये हुए धीरे से बोला “हाँ…
हाथसे……हाथसे…करता…” मैं इतना बोल कर चुप हो
गया. हम दोनों के बीच कुछ पल की चुप्पी छाई रही फिर
दीदी गहरी सांस लेते हुए बोली
“इसीबातकामुझेडरथा….मुझेलगरहाथाकीइनसबचक्करों
मेंतूअपनेआपकोबर्बादकररहाहै…” फिर मेरी ठोढी पकड़
कर मेरे चेहरे को ऊपर उठा कर ध्यान से देखते हुए
बोली “मैंने…तुझेमारा…उफ़…देखकैसानिशानपरगयाहै…
परक्याकरतीमैंमुझेगुस्साआगयाथा….खैरमेरेसाथजोकिय
ासोकिया……परभाई…
सचमेंमैंबहुतदुखीहूँ…..तुमजोयेकामकरतेहोये…..येतो…”
मेरे अन्दर ये जान कर थोड़ी सी हिम्मत आ गई की मैंने
दीदी के बदन को देखने की जो कोशिश की थी उस बात
से दीदी अब नाराज़ नहीं है बल्कि वो मेरे मुठ मरने की
आदत से परेशान है. मैं दीदी की ओर देखते हुए बोला
“सॉरीदीदी…मैंअबनहीं….करूँगा…”
“भाईमैंतुम्हारेभलेकेलिएहीबोलरहीहूँ…
तुम्हाराशरीरबर्बादकरदेगा…
येकाम…..ठीकहैइसउम्रमेंलड़कियोंकेप्रतिआकर्षणतोहो
ताहै….मगर…येहाथसेकरनासहीनहींहै….येठीकनहींहै…
राजूतुमऐसामतकरोआगेसे….”
“ठीकहैदीदी….मुझेमाफ़करदोमैंआगेसेऐसानहींकरूँगा…
मैंशर्मिंदाहूँ….” मैंने अपनी गर्दन और ज्यादा झुकाते
हुए धीरे से कहा. दीदी एक पल को चुप रही फिर मेरी
ठोड़ी पकड़ कर मेरे चेहरे को ऊपर उठाती हुई हल्का सा
मुस्कुराते हुई बोली“मैंतुझेअच्छीलगतीहूँक्या….” मैं
एकदम से शर्मा गया मेरे गाल लाल हो गए और झेंप कर
गर्दन फिर से निचे झुका ली. मैं दीदी के सामने बैठा
हुआ था दीदी ने हाफ पैंट के बाहर झांकती मेरी जांघो पर
अपना हाथ रखा और उसे सहलाती हुई धीरे से अपने
हाथ को आगे बढा कर मेरे पैंट के उभरे हुए भाग पर रख
दिया. मैं शर्मा कर अपने आप में सिमटते हुए दीदी के
हाथ को हटाने की कोशिश करते हुए अपने दोनों जांघो
को आपस में सटाने की कोशिश की ताकि दीदी मेरे उभार
को नहीं देख पाए. दीदी ने मेरे जांघ पर दबाब डालते हुए
उनका सीधा कर दिया और मेरे पैंट के उभार को पैंट के
ऊपर से पकड़ लिया और बोली “रुक…
आरामसेबैठारह…देखनेदे….सालेअभीशर्मारहाहै,…
चुपचापमेरेकमरेमेंआकरमुझेछूरहाथा…
तबशर्मनहींआरहीथीतुझे…कुत्ते” दीदी ने फिर से अपना
गुस्सा दिखाया और मुझे गाली दी. मैं सहम कर चुप
चाप बैठ गया.
दीदी मेरे लण्ड को छोर कर मेरे हाफ पैंट का बटन खोलने
लगी. मेरे पैंट के बटन खोल कर कड़कती आवाज़ में
बोली“चुत्तर…उठातो…तेरापैंटनिकालू…” मैंने हल्का
विरोध किया “ओहदीदीछोड़दो…”
“फिरसेमारखायेगाक्या…जैसाकहतीहुवैसाकर…” कहती
हुई थोड़ा आगे खिसक कर मेरे पास आई और अपने
पेटिकोट को खींच कर घुटनों से ऊपर करते हुए पहले के
जैसे बैठ गई. मैंने चुपचाप अपने चुत्तरों को थोड़ा सा
ऊपर उठा दिया. दीदी ने सटाक से मेरे पैंट को खींच कर
मेरी कमर और चुत्तरों के निचे कर दिया, फिर मेरे पैरों
से होकर मेरे पैंट को पूरा निकाल कर निचे कारपेट पर
फेंक दिया. मैंने निचे से पूरा नंगा हो गया था और मेरा
ढीला लण्ड दीदी की आँखों के सामने था. मैंने हाल ही में
अपने लण्ड के ऊपर उगे के बालो को ट्रिम किया था
इसलिए झांट बहुत कम थे. मेरे ढीले लण्ड को अपनी
मुठ्ठी में भरते हुए दीदी ने सुपाड़े की चमरी को थोड़ा सा
निचे खींचते हुए मेरे मरे हुए लण्ड पर जब हाथ चलाया
तो मैं सनसनी से भर आह किया. दीदी ने मेरी इस आह
पर कोई ध्यान नहीं दिया और अपने अंगूठे को सुपाड़े पर
चलाती हुई सक-सक मेरे लण्ड की चमरी को ऊपर निचे
किया. दीदी के कोमल हाथो का स्पर्श पा कर मेरे लण्ड
में जान वापस आ गई. मैं डरा हुआ था पर दीदी जैसी
खूबसूरत औरत की हथेली ने लौड़े को अपनी मुठ्ठी में
दबोच कर मसलते हुए, चमरी को ऊपर निचे करते हुए
सुपाड़े को गुदगुदाया तो अपने आप मेरे लण्ड की तरफ
खून की रफ्तार तेज हो गई. लौड़ा फुफकार उठा और
अपनी पूरी औकात पर आ गया. मेरे खड़े होते लण्ड को
देख दीदी का जोश दुगुना हो गया और दो-चार बार
हाथ चला कर मेरे लण्ड को अपने बित्ते से नापती हुई
बोली “बापरेबाप….कैसाहल्लबीलण्डहै…ओह… हाय…
भाईतेरातोसचमेंबहुतबड़ाहै….मेरीइतनीउम्रहोगई….आज
तकऐसानहींदेखाथा…ओह…येपूरानौइंचकालगरहाहै…
इतनाबड़ातोतेरेबहनोईकाभीनहीं….हाय….येतोउनसेबहुत
बड़ालगरहाहै…..औरकाफीशानदारहै….उफ़….मैंतो….
मैंतो……
हाय…..येतोगधेकेलण्डजितनाबड़ाहै…..उफ्फ्फ्फ़…..”
बोलते हुए मेरे लण्ड को जोर से मरोर दिया और सुपाड़े
को अपनी ऊँगली और अंगूठे के बीच कस कर दबा
दिया. दर्द के मारे छटपटा कर जांघ सिकोरते हुए दीदी
का हाथ हटाने की कोशिश करते हुए पीछे खिसका तो
तो मेरे लण्ड को पकर कर अपनी तरफ खींचती हुई बोली
“हरामी….साले….मैंजबसोरहीहोतीहुतोमेरीचूचीदबाताहैमे
रीचुतमेंऊँगलीकरताहै….आगलगाताहै….इतनामोटालौड़ा
लेकर….घूमताहै…और बाएं गाल पर तड़ाक से एक
झापड़ जड़ दिया. मैं हतप्रभ सा हो गया. मेरी समझ में
नहीं आ रहा था मैं क्या करू. दीदी मुझ से क्या चाहती
है, ये भी समझ में नहीं आ रहा था. एक तरफ तो वो मेरे
लण्ड को सहलाते हुए मुठ मार रही थी और दूसरी तरफ
गाली देते हुए बात कर रही थी और मार रही थी. मैं
उदास और डरी हुई नज़रों से दीदी को देख रहा था. दीदी
मेरे लण्ड की मुठ मारने में मशगूल थी.

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10-24-2016, 10:19 AM
Post: #7
RE: मेरी बहन कविता
एक हाथ में लण्ड को पकरे हुए दुसरे हाथ से मेरे
अन्डकोषो को अपनी हथेली में लेकर सहलाती हुई बोली
“….हाथसेकरताहै….
राजू….अपनाशरीरबर्बादमतकर…..तेराशरीरबर्बादहोज
ायेगातोमैंमाँकोक्यामुंहदिखाउंगी….” कहते हुए जब
अपनी नजरों को ऊपर उठाया तो मेरे उदास चेहरे पर
दीदी की नज़र पड़ी. मुझे उदास देख लण्ड पर हाथ
चलाती हुई दुसरे हाथ से मेरे गाल को चुटकी में पकड़
मसलते हुए बोली
“उदासक्योंहै….क्यातुझेअच्छानहींलगरहाहै…..हायराजू
तेरालण्डबहुतबड़ाऔरमजेदारहै….
तेराहाथसेकरनेलायकनहींहै….येकिसीछेदघुसाकरकियाकर
…..” मैं दीदी की ऐसी खुल्लम खुल्ला बातों को सुन कर
एक दम से भोच्चक रह गया और उनका मुंह ताकता
रहा. दीदी मेरे लण्ड की चमरी को पूरा निचे उतार कर
सुपाड़े की गोलाई के चारो तरफ ऊँगली फेरती हुई बोली
“ऐसेक्यादेखरहाहै….तूअपनाशरीरबर्बादकरलेगातोमैंमाँक
ोक्यामुंहदिखाउंगी……
मैंनेसोचलियाहैमुझेतेरीमददकरनीपड़ेगी……..तूघबरामत
….” दीदी की बाते सुन कर मुझे ख़ुशी हुई मैं हकलाते
हुए बोला “हायदीदीमुझेडरलगताहै….आपसे….” इस पर
दीदी बोली “राजूमेरेभाई…
डरमत….मैंनेतुझे….गालीदीइसकीचिंतामतकर….
मैंतेरामजाख़राबनहींकरनाचाहती…ले……
मेरामुंहमतदेखतूभीमजेकर……..” और मेरा एक हाथ
पकड़ कर अपनी ब्लाउज में कसी चुचियों पर रखती हुई
बोली“….तूइनकोदबानाचाहताथाना….ले…दबा…
तू….भीमजाकर….मैंजरातेरेलण्ड…. की……
कितनापानीभराहैइसकेअंदर….” मैंने डरते हुए दीदी की
चुचियों को अपनी हथेली में थाम लिया और हलके हलके
दबाने लगा. अभी दो तीन बार ही दबाया था की दीदी
मेरे लण्ड को मरोरती हुई बोली “साले…
कबमर्दबनेगा….ऐसेऔरतोकीतरहचूचीदबाएगातो…
इतनातगड़ालण्डहाथसेहीहिलातारहजायेगा….अरेमर्दकी
तरहदबाना…
डरमत….ब्लाउजखोलकेदबानाचाहताहैतोखोलदे….हायक
ितनामजेदारहथियारहैतेरा….देख….इतनीदेरसेमुठ
माररहीहूँमगरपानीनहींफेंकरहा…..” मैंने मन ही मन
सोचा की आराम से मुठ मारेगी तभी तो पानी फेंकेगा,
यहाँ तो जैसे ही लौड़ा अपनी औकात पर आया था वैसे
ही एक थप्पर मार कर उसको ढीला कर दिया. इतनी देर
में ये समझ में आ गया की अगर मुझे दीदी के साथ
मजा करना है तो बर्दाश्त करना ही परेगा, चूँकि दीदी ने
अब खुली छूट दे दी थी इसलिए अपने मजे के अनुसार
दोनों चुचियों को दबाने लगा, ब्लाउज के बटन भी साथ
ही साथ खोल दिए और नीले रंग की छोटी से ब्रा में
कसी दीदी की दोनों रसभरी चुचियों को दोनों हाथो में भर
का दबाते हुए मजा लूटने लगा. मजा बढ़ने के साथ
लण्ड की औकात में भी बढोतरी होने लगी. सुपाड़ा
गुलाबी से लाल हो गया था और नसों की रेखाएं लण्ड के
ऊपर उभर आई थी. दीदी पूरी कोशिश करके अपनी
हथेली की मुट्ठी बना कर पुरे लण्ड को कसते हुए अपना
हाथ चला रही थी. फिर अचानक उन्होंने लण्ड को पकरे
हुए ही मुझे पीछे की तरफ धकेला, मेरी पीठ पलंग की
पुश्त से जाकर टकराई मैं अभी संभल भी नहीं पाया था
की दीदी ने थोड़ा पीछे की तरफ खिसकते हुए जगह
बनाते हुए अपने सर को निचे झुका दिया और मेरे लाल
आलू जैसे चमचमाते सुपाड़े को अपने होंठो के बीच कसते
हुए जोर से चूसा. मुझे लगा जैसे मेरी जान सुपाड़े से
निकल कर दीदी के मुंह के अन्दर समा गई हो. गुदगुदी
और मजे ने बेहाल कर दिया था. अपने नौजवान सुपाड़े
को चमरी हटा कर पहले कभी पंखे के निचे हवा लगाता
था तो इतनी जबरदस्त सनसनी होती थी की मैं जल्दी
से चमरी ऊपर कर लेता था. यहाँ दीदी की गरम मुंह के
अन्दर उनके कोमल होंठ और जीभ ने जब अपना कमाल
सुपाड़े पर दिखाना शुरू किया तो मैं सनसनी से भर उठा.
लगा की लण्ड पानी छोड़ देगा. घबरा कर दीदी के मुंह
को अपने लण्ड पर से हटाने के लिए चूची छोड़ कर उनके
सर को पकड़ ऊपर उठाने की कोशिश की तो दीदी मेरे
हाथ को झटक लौड़े पर से मुंह हटाती हुई बोली
“हायराजू….तेरालण्डतोबहुतस्वादिष्टहै….खानेलायकहै
….तुझेमजाआएगा…….चूसनेदे….देखहाथसेकरनेसेज्याद
ामजामिलेगा….” मैं घबराता हुआ बोला “पर…पर…
दीदीमेरानिकलजायेगा,,,,बहुतगुदगुदीहोतीहै…..जबचूसत
ीहो…..हाय. इसपरदीदीखुशहोतीहुईबोली
“कोईबातनहींभाई….ऐसाहोताहै…..आजसेपहलेकभीतुनेचु
सवायाहै…”
“हाय…नहींदीदी…कभी…नहीं….”
“ओह…
हो…..मतलबकिसीकेसाथभीकिसीतरहकामजानहींलियाहै
…..”
“हाय…नहींदीदी….कभीकिसीकेसाथ…..नहीं”
“कभीकिसीऔरतयालड़कीकोनंगानहींदेखाहै…..”
मैं दीदी की इस बात पर शर्मा गया और हकलाते हुए
बोला ” जीकभीनहीं…”
“हायतभीतूइतनातरसरहाहै….औरछुपकरदेखनेकीकोशिश
कररहाथा….कोईबातनहींराजू….मुझेभीमाँकोमुंहदिखानाहै
….चिंतामतकर….पहलेमैंयेतेर
ाचूसकरइसकीमलाईएकबारनिकलदेतीहूँ…
फिरतुझेदिखादूंगी…..” मैं ज्यादा कुछ समझ नहीं पाया
की क्या दिखा दूंगी. मेरा ध्यान तो मेरे तन्नाये हुए
लौड़े पर ही अटका पड़ा था. मैं बहुत ज्यादा उत्तेजित
हो चुंका था और अब किसी भी तरह से लण्ड का पानी
निकलना चाहता था. मैंने अपने लण्ड को हाथ से पकड़ा
तो दीदी ने मेरा हाथ झटक दिया और अपनी चूची पर
रखती हुई बोली “ले इसको पकड़” और मेरे लण्ड को
अपनी मुठ्ठी में भर कर ऊपर निचे करते हुए सुपाड़े को
अपने मुंह में भर कर चूसने लगी. मैं सीसीयाते हुए दोनों
हाथो में दीदी की कठोर चुचियों को मसलते हुए अपनी
गांड बिस्तर से उछालते हुए चुसाई का मजा लेने लगा.
मेरी समझ में नहीं आ रहा था की मैं क्या क्या करू.
सनसनी के मारे मेरा बुरा हाल हो गया था. दीदी मेरे
सुपाड़े के चारो तरफ जीभ फ़िराते हुए मेरे लण्ड को
लौलीपौप की तरह से चूस रही थी. कभी वो पुरे लण्ड पर
जीभ फ़िराते हुए मेरे अंडकोष को अपनी हथेली में लेकर
सहलाते हुए चूसती कभी मेरे लौड़े के सुपाड़े के अपने
होंठो के बीच दबा कर इतनी जोर-जोर से चूसती की
गोल सुपाड़ा पिचक का चपटा होने लगता था. चूची छोड़
कर मैं दीदी के सर को पकड़ गिरगिड़ाते हुए बोला
“हायदीदीमेरा….निकलजाएगा….ओह…
सीसी….दीदीअपनामुंह….हटालो…
ओहदीदी….बहुतगुदगुदीहोरहीहै…
प्लीजदीदी….ओहमुंहहटालो….देखोमेरा….पानीनिकलरहा
है…..” मेरे इतना कहते ही मेरे लण्ड ने एक तेज
पिचकारी छोड़ी. कविता दीदी ने जल्दी से अपना मुंह
हटाया मगर तब भी मेरे लण्ड की तेज धार के साथ
निकली हुई वीर्य की पिचकारी का पहला धार तो उनके
मुंह में ही गिरा बाकी धीरे-धीरे पुच-पुच करते हुए उनके
पेटिकोट एवं हाथ पर गिरने लगा जिस से उन्होंने लण्ड
पकड़ रखा था. मैं डरते हुए दीदी का मुंह का मुंह देखने
लगा की कही वो इस बात के लिए नाराज़ तो नहीं हो गई
की मैंने अपना पानी उनके मुंह में गिरा दिया है. मगर मैंने
देखा की दीदी अपने मुंह को चलाती हुई जीभ निकल कर
अपने होंठो के कोने पर लगे मेरे सफ़ेद रंग के गाढे वीर्य
को चाट रही थी. मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखते हुई बोली
“हायराजू…बहुतअच्छापानीनिकला…. बहुतमजाआया…
तेराहथियारबहुतअलबेलाहै….भाई….बहुतपानीछोड़ताहै
….मजाआयाकीनहीं…बोल…
कैसालगाअपनीदीदीकेमुंहमेंपानीछोड़ना….हाय…
तेरालण्डजिसबूरमेंपानीछोड़ेगावोतो…
एकदमलबालबभरजायेगी….”. दीदी एकदम खुल्ल्लम
खुल्ला बोल रही थी. दीदी के ऐसे बोलने पर मैं झरने के
बाद भी सनसनी से भर शरमाया तो दीदी मेरे झरे लण्ड
को मुठ्ठी में कसती हुई बोली
“अनचुदेलौड़ेकीसहीपहचानयहीहै…
कीउसकाऔजारएकपानीनिकालनेकेबादकितनीजल्दीखड़ाहो
ता…. ” कहते हुए मेरे लण्ड को अपनी हथेली में भर कर
सहलाते हुए सुपाड़े पर ऊँगली चलाने लगी. मेरे बदन में
फिर से सनसनाहट होने लगी. झरने के कारण मेरे पैर
अभी भी काँप रहे थे. दीदी मेरी ओर मुस्कुराते हुए देख
रह थी और बोली
“इसबारजबतेरानिकलेगातोऔरज्यादाटाइमलगाएगा….वै
सेभीतेराकाफीदेरमेंनिकलताहै…..सालाबहुतदमदारलौड़ा
हैतेरा….” मैं शरमाते हुए दीदी की तरफ देखा और बोला
“हाय….फिरसे…मतकरो…हाथसे…”. इस पर दीदी
बोली “ठहरजा…पहलेखड़ाकरलेनेदे…
हायदेखखड़ाहोरहाहैलौड़ा….वाह….बहुततेजीसेखड़ाहोरह
ाहैतेरातो….”. कहते हुए दीदी और जोर से अपने हाथो
को चलाने लगी.
“हायदीदीहाथसेमतकरो….फिरनिकलजाएगा….” मैं
अपने खड़े होते लण्ड को देखते हुए बोला. इस पर दीदी
ने मेरे गाल पकड़ खींचते हुए कहा
“सालेहाथसेकरनेकेलिएतोमैंनेखुदरोकाथा…
हाथसेमैंकभीनहींकरुँगी….मेरेभाईराजाकाशरीरमैंबर्बादनहीं
होनेदूंगी….” फिर मेरे लण्ड को छोड़ कर अपने हाथ को
साइड से अपनी पेटिकोट के अन्दर ले जा कर जांघो के
बीच पता नहीं क्या, शायद अपनी बूर को छुआ और
फिर हाथ निकाल कर ऊँगली दिखाती हुई बोली
“हायदेख…
मेरीचूतकैसेपनियागई….बड़ामस्तलण्डहैतेरा…
जोभीदेखेगीउसकीपनियाजायेगी….एकदमघोड़ेकेजैसाहै…
अनचुदीलौंडियाकीतोफारदेगातू….मेरेजैसीचुदीचुतोकेलाय
कलौड़ाहै….कभीकिसीऔरतकीनंगीनहींदेखीहै….”. दीदी
के इस तरह से बिना किसी लाज शर्म के बोलने के
कारण मेरे अन्दर भी हिम्मत आ रही थी और मैं भी
अपने आप को दीदी के साथ खोलना चाह रहा था. दीदी
के ये बोलने पर मैंने शर्माने का नाटक करते हुए कहा
“हायदीदीकिसीकीनहीं…
बसएकबारवोग्वालिनबाहरमुनिसिप्लिटीकेनलपरसुबह-
सुबहनहारहीथी….तब….” दीदी इस चहकती हुई बोली
“हाँ..तबक्याभाई…तब…”. मैं गर्दन निचे करते हुए
बोला “वो..वो…तो…दीदीकपड़ेपहनकरनहारहीथी…
बैठकर…पैरमोड़कर…..तोउसकीसाड़ीबीचमेंसेहट…
हटगई…पर…काला…
कालादिखरहाथा….जैसेबालहो….” दीदी हँसने लगी और
बोली “अरे…
वोतोझांटेहोंगी….उसकीचूतकी….बसइतनासादेखकरहीते
राकामहोगया….मतलबतुनेआजत
कअसलमेंकिसीकीनहींदेखीहै…” मैं शरमाते हुए बोला
“अबपतानहींदीदी….मुझे….लगावहीहोगी…इसलिए…”
दीदी इस पर मुस्कुराते हुए बोली “ओहहो…
मेराप्याराछोटाभाई…..बेचारा….फिरतुझेऔरकोईनहींमिल
ीदेखनेकेलिएजोमेरेकमरेमेंघुसगया….” मैं इस पर दीदी
का थोड़ा सा विरोध करते हुए बोला
“नहींदीदी….ऐसीबातनहींहै….वोतो….तोमैं….मेरेऑफिस
मेंभीबहुतसारीलड़कियाँहैमगर…..मगर….मुझेनहींपता….
ऐसाक्योंहै….मगरमुझेआपसेज्यादासुन्दर…
कोईनहीं…..कोईभीनहीं….लगती….मुझेवोलड़कियाँअच्छ
ीनहीं…लगतीप्लीज़दीदीमुझेमाफ़करदो… मैं…मैं…
आगेसेऐसा…..नहीं…” इस पर दीदी हँसने लगी और
मुझे रोकते हुए बोली “अरे…रे…
इतनाघबरानेकीजरुरतनहींहै….मैंतोतुमसेइसलिएनाराज़थी
कीतुमअपनाशरीरबर्बादकररहेथे….मेरेभाईकोमैंइतनीअच्
छीलगतीहूँकीउसेकोईऔरलड़कीअच्छीनहींलगती….येमेरेल
िएगर्वकीबातहैमैंबहुतखुशहूँ….मुझेतोलगरहाथाकी
मेरीउम्रबहुतज्यादाहोचूँकिहैइसलिए…..पर….
इक्कीससालकामेरानौजवानभाईमुझेइतनापसंदकरताहैयेतो
मुझेपताहीनहींथा…” कहते हुए आगे बढ़ कर मेरे होंठो
पर एक जोरदार चुम्मा लिया और फिर दुबारा अपने
होंठो को मेरे होंठो से सटा कर मेरे होंठो को अपने होंठो
के दबोच कर अपना जीभ मेरे मुंह में ठेलते हुए चूसने
लगी. उसके होंठ चूसने के अंदाज से लगा जैसे मेरे
कमसिन जवान होंठो का पूरा रस दीदी चूस लेना चाहती
हो. होंठ चूसते चूसते वो मेरे लण्ड को अपनी हथेली के
बीच दबोच कर मसल रही थी. कुछ देर तक ऐसा करने
के बाद जब दीदी ने अपने होंठ अलग किये तो हम दोनों
की सांसे फुल गई थी. मैं अपनी तेज बहकी हुई सांसो को
काबू करता हुआ बोला “हायदीदीआपबहुतअच्छीहो….”

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10-24-2016, 10:19 AM
Post: #8
RE: मेरी बहन कविता
“अच्छा…बेटामख्खनलगारहाहै….”
“नहींदीदी…
आपसचमेंबहुतअच्छीहो….औरबहुतसुन्दरहो….” इस
पर दीदी हंसते हुए बोली
“मैंसबमख्खनबाजीसमझतीहूँबड़ीबहनकोपटाकरनिचेलिटा
नेकेचक्करमें…..हैतू….” मैं इस पर थोड़ा शर्माता हुआ
बोला “हाय…नहींदीदी….आप….” दीदी ने गाल पर एक
प्यार भरा चपत लगाते हुए कहा “हाँ…हाँ…बोल…..”
मैं इस पर झिझकते हुए बोला” वोदीदीदीदी…
आपबोलरहीथीकीमैं….दि…दि…दिखादूंगी….”. दीदी
मुस्कुराते हुए बोली “दिखादूंगी…क्यामतलबहुआ…
क्यादिखादूंगी….” मैं हकलाता हुआ बोला ” वो….वो…
दीदीआपनेखुदबोलाथा…
कीमैं….वोग्वालिनवालीचीज़….”
“अरेयेग्वालिनवालीचीज़क्याहोतीहै….ग्वालिनवालीचीज़
तोग्वालिनकेपासहोगी…मेरेपासकहाँसेआएगी…
खुलकेबतानाराजू….मैंतुझेकोईडांटरहीहूँजोऐसेघबरारहाहै
…. क्यादेखनाहै”
“दीदी…वो…वोमुझे…चु….चु…”
“अच्छातुझेचूचीदेखनीहै….वोतोमैंतुझेदिखादियाना…
यहीतोहै…लेदेख…” कहते हुए अपनी ब्रा में कसी दोनों
चुचियों के निचे हाथ लगा उनको उठा कर उभारते हुए
दिखाया. छोटी सी नीले रंग की ब्रा में कसी दोनों गोरी
गदराई चूचियां और ज्यादा उभर कर नजरो के सामने
आई तो लण्ड ने एक ठुनकी मारी, मगर दिल में करार
नहीं आया. एक तो चूचियां ब्रा में कसी थी, नंगी नहीं
थी दूसरा मैं चुत दिखाने की बात कर रहा था और दीदी
यहाँ चूची उभार कर दिखा रही थी. होंठो पर जीभ फेरते
हुए बोला “हाय…नहीं…
दीदीआपसमझनहींरही….वोवोदू…सरीवालीचीज़चु…चु…
चुतदिखाने….केलिए…”
“ओहहो…तोयेचक्करहै….
येहैग्वालिनवालीचीज़…..सालेग्वालिनकीनहींदेखनेकोमिल
ीतोअपनीबड़ीबहनकीदेखेगा….मैंसोचरहीथीतुझेशरीरबर्बा
दकरनेसेनहींरोकूंगीतोमाँकोक्याबोलेगी….यहाँतोउल्टाहोर
हाहै….देखोमाँ…
तुमनेकैसालाडलापैदाकियाहै….अपनीबड़ीबहनकोबुरदिखने
कोबोलरहाहै….हायकैसाबहनचोदभाईहैमेरा….
मेरीचुतदेखनेकेचक्करमेंहै…उफ्फ्फ….मैंतोफंसगईहूँ…
मुझेक्यापताथाकीमुठमारनेसेरोकनेकीइतनीबड़ीकीमतचुका
नीपड़ेगी….”
दीदी की ऐसे बोलने पर मेरा सारा जोश ठंडा पर गया. मैं
सोच रहा था अब मामला फिट हो गया है और दीदी
ख़ुशी ख़ुशी सब कुछ दिखा देंगी. शायद उनको भी मजा
आ रहा है, इसलिए कुछ और भी करने को मिल जायेगा
मगर दीदी के ऐसे अफ़सोस करने से लग रहा था जैसे
कुछ भी देखने को नहीं मिलने वाला. मगर तभी दीदी
बोली
“ठीकहैमतलबतुझेचुतदेखनीहै….अभीबाथरूमसेआतीहूँतोतु
झेअपनीबुरदिखातीहूँ” कहती हुई बेड से निचे उतर
ब्लाउज के बटन बंद करने लगी. मेरी कुछ समझ में नहीं
आया की दीदी अपना ब्लाउज क्यों बंद कर रही है मैं
दीदी के चेहरे की तरफ देखने लगा तो दीदी आँख नचाते
हुए बोली “चुतहीतोदेखनीहै…
वोतोमैंपेटिकोटउठाकरदिखादूंगी…” फिर तेजी से बाहर
निकल बाथरूम चली गई. मैं सोच में पड़ गया मैं दीदी
को पूरा नंगा देखना चाहता था. मैं उनकी चूची और चुत
दोनों देखना चाहता था और साथ में उनको चोदना भी
चाहता था, पर वो तो बाद की बात थी पहले यहाँ दीदी
के नंगे बदन को देखने का जुगार लगाना बहुत जरुरी था.
मैंने सोचा की मुझे कुछ हिम्मत से काम लेना होगा. दीदी
जब वापस रूम में आकर अपने पेटिकोट को घुटनों के
ऊपर तक चढा कर बिस्तर पर बैठने लगी तो मैं बोला ”
दीदी….दीदी…मैं….चू…चू…चूचीभीदेखना…चाहताहूँ”.
दीदी इस पर चौंकने का नाटक करती बोली
“क्यामतलब…
चूचीभीदेखनीहै….चुतभीदेखनीहै….मतलबतूतोमुझेपूरानंगा
देखनाचाहताहै….हाय….बड़ाबेशर्महै….
अपनीबड़ीबहनकोनंगादेखनाचाहताहै….क्
योंमैंठीकसमझीना…तूअपनीदीदीकोनंगादेखनाचाहताहै…
बोल, …ठीकहैना….” मैं भी शरमाते हुए हिम्मत दिखाते
बोला
“हांदीदी….मुझेआपबहुतअच्छीलगतीहो….मैं….मैंआपको
पूरा…नंगादेखना….चाहता…”
“बड़ाअच्छाहिसाबहैतेरा….अच्छीलगतीहो…..अच्छीलग
नेकामतलबतुझेनंगीहोकरदिखाऊ…
कपड़ोमेंअच्छीनहींलगतीहूँक्या….”
“हायदीदीमेरावोमतलबनहींथा….वोतोआपनेकहाथा….फि
रमैंनेसोचा….सोचा….”
“हायभाई…
तुनेजोभीसोचासहीसोचा….मैंअपनेभाईकोदुखीनहींदेखसक
ती….मुझेख़ुशीहैकीमेराइक्
कीससालकानौजवानभाईअपनीबड़ीबहनकोइतनापसंदकरत
ाहैकीवोनंगादेखनाचाहताहै….हाय…
मेरेरहतेतुझेग्वालिनजैसीऔरतोकीतरफदेखनेकीकोईजरुरत
नहींहै….राजूमैंतुझेपूरानंगाहोकरदिखाउंगी…..फिरतुममुझे
बतानाकीतुमअपनीदीदीकेसाथक्या-
क्याकरनाचाहतेहो….”.
मेरी तो जैसे लाँटरी लग गई. चेहरे पर मुस्कान और
आँखों में चमक वापस आ गई. दीदी बिस्तर से उतर कर
नीचे खड़ी हो गई और हंसते हुए बोली
“पहलेपेटिको़टऊपरउठाऊयाब्लाउजखोलू…” मैंने
मुस्कुराते हुए कहा
“हायदीदीदोनों….खोलो….पेटिको़टभीऔरब्लाउजभी….”
“इस…॥स……स…।
बेशर्मपूरानंगाकरेगा….चलतेरेलिएमैंकुछभीकरदूंगी….अप
नेभाईकेलिएकुछभी…
पहलेब्लाउजखोललेतीहूँफिरपेटिको़टखोलूंगी….चलेगाना…”
गर्दन हिला कर दीदी ने पूछा तो मैंने भी सहमती में
गर्दन हिलाते हुए अपने गालो को शर्म से लाल कर दीदी
को देखा. दीदी ने चटाक-चटाक ब्लाउज के बटन खोले
और फिर अपने ब्लाउज को खोल कर पीछे की तरफ घूम
गई और मुझे अपनी ब्रा का हूक खोलने के लिए बोला
मैंने कांपते हाथो से उनके ब्रा का हूक खोल दिया. दीदी
फिर सामने की तरफ घूम गई. दीदी के घूमते ही मेरी
आँखों के सामने दीदी की मदमस्त, गदराई हुई मस्तानी
कठोर चूचियां आ गई. मैं पहली बार अपनी दीदी के इन
गोरे गुब्बारों को पूरा नंगा देख रहा था. इतने पास से
देखने पर गोरी चूचियां और उनकी ऊपर की नीली नसे,
भूरापन लिए हुए गाढे गुलाबी रंग की उसकी निप्पले और
उनके चारो तरफ का गुलाबी घेरा जिन पर छोटे-छोटे
दाने जैसा उगा हुआ था सब नज़र आ रहा था. मैं एक
दम कूद कर हाय करते हुए उछला तो दीदी मुस्कुराती
हुई बोली “अरे,
रेइतनाउतावलामतबनअबतोनंगाकरदियाहैआरामसेदेखना
….ले…देख…” कहती हुई मेरे पास आई. मैं बिस्तर पर
बैठा हुआ था और वो निचे खड़ी थी इसलिए मेरा चेहरा
उनके चुचियों के पास आराम से पहुँच रहा था. मैं
चुचियों को ध्यान से से देखते हुए बोला “हाय…
दीदीपकड़े…”
“हाँ…हाँ….पकड़लेजकड़…
लेअबजबनंगाकरकेदिखारहीहूँतो…
छूनेक्योंनहींदूंगी….लेआरामसेपकड़करमजाकर……
अपनीबड़ीबहनकीनंगीचुचियोंसेखेल….” मैंने अपने दोनों
हाथ बढा कर दोनों चुचियों को आराम से दोनों हाथो में
थाम लिया. नंगी चुचियों के पहले स्पर्श ने ही मेरे होश
उड़ा. उफ्फ्फ दीदी की चूचियां कितनी गठीली और
गुदाज थी, इसका अंदाजा मुझे इन मस्तानी चुचियों को
हाथ में पकड़ कर ही हुआ. मेरा लण्ड फरफराने लगा.
दोनों चुचियों को दोनों हथेली में कस हलके दबाब के
साथ मसलते हुए चुटकी में निप्पल को पकड़ हलके से
दबाया जैसे किशमिश के दाने को दबाते है. दीदी के मुंह
से एक हलकी सी आह निकल गई. मैंने घबरा कर चूची
छोड़ी तो दीदी ने मेरा हाथ पकड़ फिर से अपनी चुचियों
पर रखते हुए दबाया तो मैं समझ गया की दीदी को मेरा
दबाना अच्छा लग रहा है और मैं जैसे चाहू इनकी चुचियों
के साथ खेल सकता हूँ. गर्दन उचका कर चुचियों के
पास मुंह लगा कर एक हाथ से चूची को पकड़ दबाते हुए
दूसरी चूची को जैसे ही अपने होंठो से छुआ मुझे लगा
जैसे दीदी गनगना गई उनका बदन सिहर गया. मेरे सर
के पीछे हाथ लगा बालों में हाथ फेरते हुए मेरे सर को
अपनी चुचियों पर जोर से दबाया. मैंने भी अपने होंठो को
खोलते हुए उनकी चुचियों के निप्पल सहित जितना हो
सकता था उतना उनकी चुचियों को अपने मुंह में भर
लिया और चूसते हुए अपनी जीभ को निप्पल के चारो
तरफ घुमाते हुए चुमलाया तो दीदी सिसयाते हुए बोली
“आह….आ…हा….सी…सी….येक्याकररहाहै…
उफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ़…..मारडाला….सालेमैंतोतुझेअनारीसमझ
तीथी….मगर….तू….तोखिलाड़ीनिकलारे…..हाय…
चूचीचूसनाजानताहै…..मैंसोचरहीथीसबतेरेकोसिखानापड़े
गा….हाय…चूसभाई…
सीईई….ऐसेहीनिप्पलकोमुंहमेंलेकरचूसऔरचूचीदबा….हा
यरसनिकालबहुतदिनहोगए…..” अब तो मैं जैसे भूखा
शेर बन गया और दीदी की चुचियों को मुंह में भर ऐसे
चूसने लगा जैसे सही में उसमे से रस निकल कर खा
जाऊंगा. कभी बाई चूची को कभी दाहिनी चूची को मुंह में
भर भर कर लेते हुए निप्पलों को अपने होंठो के बीच दबा
दबा कर चूसते हुए रबर की तरह खींच रहा था. चुचियों
के निप्पल के चारो तरफ के घेरे में जीभ चलाते हुए जब
दुसरे हाथ से दीदी की चूची को पकड़ कर दबाते हुए
निप्पल को चुटकी में पकड़ कर खींचा तो मस्ती में
लहराते हुए दीदी लड़खड़ाती आवाज़ में बोली
“हायराजू….सीईई…ई…
उफ्फ्फ्फ्फ्फ….चूसले…..पूरारसचूस…..मजाआरहाहै…
.तेरीदीदीकोबहुतमजाआरहाहैभाई…..हायतूतोचूचीकोक्रि
केटकीगेंदसमझकरदबारहाहै….मेरेनिप्पलक्यामुंहमेंलेचूस
….तूबहुतअच्छाचूसताहै….हायमजाआगयाभाई….
परक्यातूचूचीहीचूसतारहेगा…..बू
रनहींदेखेगाअपनीदीदीकीचुतनहींदेखनीहैतुझे…..हायउस
समयसेमराजारहाथाऔरअभी….जबचूचीमिलगईत
ोउसीमेंखोगयाहै….हायचलबहुतदूधपीलिया…..
अबबादमेंपीना” मेरा मन अभी भरा नहीं था इसलिए मैं
अभी भी चूची पर मुंह मारे जा रहा था. इस पर दीदी ने
मेरे सर के बालों को पकड़ कर पीछे की तरफ खींचते हुए
अपनी चूची से मेरा मुंह अलग किया और बोली
“साले….हरामी….चूची…
छोड़….कितनादूधपिएगा….हायअबतुझेअपनीनिचेकीसहेल
ीकारसपिलातीहु….चलहटमाधरचोद…..” गाली देने से
मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मैं समझ
गया था की ये तो दीदी का शगल है और शायद मार भी
सकती है अगर मैं इसके मन मुताबिक ना करू तो. पर
दुधारू गाये की लथार तो सहनी ही परती है. इसकी
चिंता मुझे अब नहीं थी. दीदी लगता था अब गरम हो
चूँकि थी और चुदवाना चाहती थी. मैं पीछे हट गया और
दीदी के पेट पर चुम्मा ले कर बोला
“हायदीदीबूरकारसपिलाओगी…हायजल्दीसेखोलोना…”
दीदी पेटिको़ट के नाड़े को झटके के साथ खोलती हुई
बोली
“हाराजामेरेप्यारेभाई….अबतोतुझेपिलानाहीपड़ेगा…
ठहरजाअभीतुझेपिलातीअपनीचुतपूराखोलकरउसकीचटनीच
टाऊंगीफिर…देखनातुझेकैसामजाआताहै….” पेटिको़ट
सरसराते हुए निचे गिरता चला गया पैंटी तो पहनी नहीं
थी इसलिए पेटिको़ट के निचे गिरते ही दीदी पूरी नंगी हो
गई. मेरी नजर उनके दोनों जन्घो के बीच के तिकोने पर
गई. दोनों चिकनी मोटी मोटी रानो के बीच में दीदी की
बूर का तिकोना नज़र आ रहा था. चुत पर हलकी झांटे
उग आई थी. मगर इसे झांटो का जंगल नहीं कह सकते
थे. ये तो चुत की खूबसूरती को और बढा रहा था.
उसके बीच दीदी की गोरी गुलाबी चुत की मोटी फांके
झांक रही थी. दोनों जांघ थोड़ा अलग थे फिर भी चुत की
फांके आपस में सटी हुई थी और जैसा की मैंने बाथरूम में
पीछे से देखा था एक वैसा तो नहीं मगर फिर भी एक
लकीर सी बना रही थी दोनों फांके. दीदी की कमर को
पकड़ सर को झुकाते हुए चुत के पास ले जाकर देखने की
कोशिश की तो दीदी अपने आप को छुड़ाते हुए बोली
“हाय…
भाईऐसेनहीं….ऐसेठीकसेनहींदेखपाओगे….दोनोंजांघफैला
करअभीदिखातीहूँ…
फिरआरामसेबैठकरमेरीबूरकोदेखनाऔरफिरतुझेउसकेअन्द
रकामालखिलाउगीं…घबरामतभाई…
मैंतुझेअपनीचुतपूराखोलकरदिखाउंगीऔर…।
उसकीचटनीभीचटाउगीं…चलछोड़ कहते हुए पीछे मुड़ी.
पीछे मुड़ते ही दीदी गुदाज चुत्तर और गांड मेरी आँखों
के सामने नज़र आ गए. दीदी चल रही थी और उसके
दोनों चुत्तर थिरकते हुए हिल रहे थे और आपस में
चिपके हुए हिलते हुए ऐसे लग रहे थे जैसे बात कर रहे हो
और मेरे लण्ड को पुकार रहे हो. लौड़ा दुबारा अपनी पूरी
औकात पर आ चूका था और फनफना रहा था. दीदी
ड्रेसिंग टेबल के पास रखे गद्देदार सोफे वाली कुर्सी
पर बैठ गई और हाथो के इशारे से मुझे अपने पास
बुलाया और बोली “हाय…भाई…आजातुझेमजेकरवातीहूँ
….अपनेमालपुएकास्वादचखातीहूँ….देखभाईमैंइसकुर्सी
केदोनोंहत्थोंपरअपनीदोनोंटांगोकोरखकरजांघटिकाकरफैला
ऊंगीनातोमेरीचुतपूरीउभरकरसामनेआजायेगीऔरफिरतुमउ
सकेदोनोंफांकोकोअपनेहाथसेफैलाकरअन्दरकामालचाटना…
.इसतरहसेतुम्हारीजीभपूराबूरकेअन्दरघुसजायेगी….ठीक
हैभाई…
आजा….जल्दीकर….अभीएकपानीतेरेमुंहमेंगिरादेतीहूँफिर
तुझेपूरामजादूंगी….” मैं जल्दी से बिस्तर छोर दीदी की
कुर्सी के पास गया और जमीं पर बैठ गया. दीदी ने
अपने दोनों पैरो को सोफे के हत्थों के ऊपर चढा कर
अपनी दोनों जांघो को फैला दिया. रानो के फैलते ही दीदी
की चुत उभर कर मेरी आँखों के सामने आ गई.
उफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ़….क्या खूबसूरत चुत थी. गोरी
गुलाबी….काले काले झांटो के जंगल के बीच में से
झांकती ऐसी लग रही थी जैसे बादलो के पीछे से चाँद
मुस्कुरा रहा है. एक दम पावरोटी के जैसी फूली हुई चुत
थी. दोनों पैर कुर्सी के हत्थों के ऊपर चढा कर फैला
देने के बाद भी चुत के दोनों होंठ अलग नहीं हुए थे. चुत
पर ऊपर के हिस्से में झांटे थी मगर निचे गुलाबी कचौरी
जैसे होंठो के आस पास एक दम बाल नहीं थे. मैं जमीन
पर बैठ कर दीदी के दोनों रानो पर दोनों हाथ रख कर
गर्दन झुका कर एक दम ध्यान से दीदी की चुत को
देखने लगा. चुत के सबसे ऊपर में किसी तोते के लाल
चोंच की तरह बाहर की तरफ निकली हुई दीदी के चुत
का भागनाशा था. कचौरी के जैसी चुत के दोनों फांको पर
अपना हाथ लगा कर दोनों फांको को हल्का सा फैलाती
हुई दीदी बोली
“राजू….ध्यानसेदेखले….अच्छीतरहसेअपनीदीदीकीबूरक
ोदेखबेटा….चुतफैलाकेदेखेगातोतुझे….
पानीजैसानज़रआएगा….उसकोचाटकाअच्छीतरहसेखाना
….चुतकीअसलीचटनीवहीहै….” दीदी के चुत के दोनों
होंठ फ़ैल और सिकुर रहे थे. मैंने अपनी गर्दन को झुका
दिया और जीभ निकल कर सबसे पहले चुत के आस
पास वाले भागो को चाटने लगा. रानो के जोर और जांघो
को भी चाटा. जांघो को हल्का हल्का काटा भी फिर
जल्दी से दीदी की चुत पर अपने होंठो को रख कर एक
चुम्मा लिया और जीभ निकाल कर पूरी दरार पर एक
बार चलाया. जीभ छुलाते ही दीदी सिसया उठी और
बोली“सीईई….बहुतअच्छाभाई…तुम्हेआताहै…
मुझेलगरहाथाकीसिखानापड़ेगामगरतूतोबहुतहोशियारहै…
.हाय….बूरचाटनाआताहै….
ऐसेही….राजूतुनेशुरुआतबहुतअच्छीकीहै….अबपूरीचुतपर
अपनीजीभफिरातेहुए…॥
मेरीबूरकीटीटकोपहलेअपनेहोंठोकेबीचदबाकरचूस…
देखमैंबतानाभूलगईथी….चुतकेसबसेऊपरमेंजोलाल-
लालनिकलाहुआहैना….उसीकोहोंठोकेबीचदबाकेचूसेगा….
तबमेरीचुतमेंरसनिकलनेलगेगा….फिरतूआरामसेचाटकरचू
सना….सीईईई…..राजूमैंजैसाबतातीहूँवैसाहीकर….” मैं
तो पहले से ही जानता था की टीट या भागनाशा क्या
होती है. मुझे बताने की जरुरत तो नहीं थी पर दीदी ने ये
अच्छा किया था की मुझे बता दिया था की कहाँ से
शुरुआत करनी है. मैंने अपने होंठो को खोलते हुए टीट को
मुंह में भर कर चूसना शुरू कर दिया. टीट को होंठो के
बीच दबा कर अपनी दांतों से हलके हलके काटते हुए मैं
उस पर अपने होंठ रगर रहा था. टीट और उसके आस
पास ढेर सारा थूक लग गया था और एक पल के लिए
जब मैंने वह से अपना मुंह हटाया तो देखा की मेरी
चुसाई के कारण टीट चमकने लगी है. एक बार और जोर
से टीट को पूरा मुंह में भर कर चुम्मा लेने के बाद मैंने
अपनी जीभ को करा करके पूरी चुत की दरार में ऊपर से
निचे तक चलाया और फिर चुत के एक फांक को अपने
दाहिने हाथ की उँगलियों से पकर कर हल्का सा फैलाया.
चुत की गुलाबी छेद मेरी आँखों के सामने थी. जीभ को
टेढा कर चुत के मोटे फांक को अपने होंठो के बीच दबा
कर चूसने लगा. फिर दूसरी फांक को अपने मुंह में भर
कर चूसा उसके बाद दोनों फांक को आपस में सटा कर
पूरी चुत को अपने मुंह में भर कर चूसने लगा. चुत से
रिस रिस कर पानी निकल रहा था और मेरे मुंह में आ रहा
था. चुत का नमकीन पानी शुरू में तो उतना अच्छा नहीं
लगा पर कुछ देर के बाद मुझे कोई फर्क नहीं पर रहा था
और मैं दुगुने जोश के साथ पूरी चुत को मुंह में भर कर
चाट रहा था. दीदी को भी मजा आ रहा था और वही
कुर्सी पर बैठे-बैठे अपने चुत्तारो को ऊपर
उछालते हुए वो जोश में आ कर मेरे सर को अपने दोनों
हाथो से अपनी चुत पर दबाते हुए बोली “हाय
राजू….बहुत अच्छा कर रहा है उछालते हुए वो जोश में
आ कर मेरे सर को अपने दोनों हाथो से अपनी चुत पर
दबाते हुए बोली
“हायराजू….बहुतअच्छाकररहाहै….राजा…..हाय……
सीईई….बड़ामजाआरहाहै….हायमेरीचुतकेकीड़े….मेरेसै
यां…..ऊऊऊउ…सीईईइ…..खालीऊपर-
ऊपरसेचूसरहाहै….
बहनचोद….जीभअन्दरघुसाकरचाटना…..बूरमेंजीभपेलदे
औरअन्दरबाहरकरकेजीभसेमेरीचुतचोदतेहुएअच्छीतरहसे
चाट….अपनीबड़ीबहनकीचुतअच्छीतरहसेचाटमेरेराजा….
माधरचोद….लेले…..ऊऊऊऊ……इस्स्स्स्स्स…
घुसाचुतमेंजीभ….मथ….दे…….” कविता दीदी बहुत
जोश में आ चुकी थी और लग रहा था की उनको काफी
मजा आ रहा है. उनके इतना बोलने पर मैंने दोनों हाथो
की उँगलियों से दोनों फान्को को अलग कर के अपनी
जीभ को कड़ा करके चुत में पेल दिया. जीभ को चुत के
अन्दर बाहर करते हुए लिबलिबाने लगा और बीच बीच
में बूर से चूते रस को जीभ टेढा करके चूसने लगा. दीदी
की दोनों जांघे हिल रही थी और मैं दोनों जांघो को कस
कर हाथ से पकर कर चुत में जीभ पेल रहा था. जांघो को
मसलते हुए बीच बीच में जीभ को आराम देने के लिए मैं
जीभ निकल कर जांघो और उसके आस-पास चुम्मा लेने
लगता था. मेरे ऐसा करने पर दीदी जोर से गुर्राती और
फिर से मेरे बालों को पकर कर अपनी चुत के ऊपर मेरा
मुंह लगा देती थी. दीदी मेरी चुसी से बहुत खुश थी और
चिल्लाती हुई बोल रही थी “हाय….राजा…
जीभबाहरमतनिकालो….हायबहुतमजाआरहाहै…
ऐसेही….
बूरकेअन्दरजीभडालकेमेरीचुतमथतेरहो….हायचोद….देमा
धरचोद….अपनीजीभसेअपनीदीदीकीबूरचोददे….हायसैयां
….बहुतदिनोंकेबादऐसामजाआयाहै….इतनेदिनों
सेतड़पतीघूमरहीथी….हायहाय….अपनीदीदीकी
बूरकोचाटो….मेरेराजा….मेरेबालम….
तुझेबहुतअच्छाइनामदूंगी….
भोसड़ीवाले…..तेरालौड़ाअपनीचुतमेंलुंगी….आजतकतुनेक
िसीकीचोदीनहींहैना….तुझेचोदनेकामौकादूंगी….
अपनीचुततेरेसेमरवाऊगीं….मेरेभाई…..मेरेसोनामोना….
मनलगाकरदीदीकीचुतचाट….मेरापानीनिकलेगा….तेरेमुंहमें
….हायजल्दीजल्दीचाट….पूराजीभअन्दरडालकरसीईई…
..”. दीदी पानी छोरने वाली है ये जान कर मैंने अपनी
पूरी जीभ चुत के अन्दर पेल दी और अंगूठे को टीट के
उ़पर रख कर रगरते हुए जोर जोर से जीभ अन्दर बाहर
करने लगा. दीदी अब और तेजी के साथ गांड उछल रही
थी और मैं लप लप करते हुए जीभ को अन्दर बाहर कर
रहा था. कुत्ते की तरह से दीदी की बूर चाटते हुए टीट
को रगरते हुए कभी कभी दीदी की चुत पर दांत भी गरा
देता था, मगर इन सब चीजों का दीदी के ऊपर कोई
असर नहीं पर रहा था और वो मस्ती में अब गांड को
हवा में लहराते हुए सिसया रही थी “

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10-24-2016, 10:20 AM
Post: #9
RE: मेरी बहन कविता
थी “हायमेरानिकलरहाहै….हायभाई…
निकलरहाहैमेरापानी….पूराजीभघुसादे….साले…..बहुतअ
च्छा….ऊऊऊऊऊ…..सीईईईईईइ….मजाआगयाराजा

मेरेचुतचाटूसैयां….मेरीचुतपानीछोररहीहै………..इस्स्स्
स्स्स्स्स्स……
मजाआगया….बहनचोद….पीलेअपनीदीदीकेबूरकापानी….
हायचूसलेअपनीदीदीकीजवानीकारस…..ऊऊऊऊ…….गां
डू……” दीदी अपनी गांड को हवा में लहराते हुए झरने
लगी और उनकी चुत से पानी बहता हुआ मेरी जीभ को
गीला करने लगा. मैंने अपना मुंह दीदी की चुत पर से हटा
दिया और अपनी जीभ और होंठो पर लगे चुत के पानी
को चाटते हुए दीदी को देखा. वो अपनी आँखों को बंद
किये शांत पड़ी हुई थी और अपनी गर्दन को कुर्सी के
पुश्त पर टिका कर ऊपर की ओर किये हुए थी. उनकी
दोनों जांघे वैसे ही फैली हुई थी. पूरी चुत मेरी चुसाई के
कारण लाल हो गई थी और मेरे थूक और लार के कारण
चमक रही थी. दीदी आंखे बंद किये गहरी सांसे ले रही
थी और उनके माथे और छाती पर पसीने की छोटी-छोटी
बुँदे चमक रही थी. मैं वही जमीन पर बैठा रहा और दीदी
की चुत को गौर से देखने लगा. दीदी को सुस्त परे देख
मुझे और कुछ नहीं सूझा तो मैं उनके जांघो को चाटने
लगा. चूँकि दीदी ने अपने दोनों पैरों को मोड़ कर जांघो
को कुर्सी के पुश्त से टिका कर रखा हुआ था इसलिए
वो एक तरह से पैर मोड़ कर अधलेटी सी अवस्था में
बैठी हुई थी और दीदी की गांड मेरा मतलब है चुत्तर
आधी कुर्सी पर और आधी बाहर की तरफ लटकी हुई
थी. ऐसे बैठने के कारण उनके गांड की भूरी छेद मेरी
आँखों से सामने थी. छोटी सी भूरे रंग की सिकुरी हुई छेद
किसी फूल की तरह लग रही थी और लिए अपना सपना
पूरा करने का इस से अच्छा अवसर नहीं था. मैं हलके से
अपनी एक ऊँगली को दीदी की चुत के मुंह के पास ले
गया और चुत के पानी में अपनी ऊँगली गीली कर के
चुत्तरों के दरार में ले गया. दो तीन बार ऐसे ही करके
पूरी गांड की खाई को गीला कर दिया फिर अपनी ऊँगली
को पूरी खाई में चलाने लगा. धीरे धीरे ऊँगली को गांड
की छेद पर लगा कर हलके-हलके केवल छेद की मालिश
करने लगा. कुछ देर बाद मैंने थोरा सा जोर लगाया और
अपनी ऊँगली के एक पोर को गांड की छोटी सी छेद में
घुसाने की कोशिश की. ज्यादा तो नहीं मगर बस थोड़ी
सी ऊँगली घुस गई मैंने फिर ज्यादा जोर नहीं लगाया
और उतना ही घुसा कर अन्दर बाहर करते हुए गांड की
छेद का मालिश करने लगा. बड़ा मजा आ रहा था. मेरे
दिल की तम्मना पूरी हो गई. बाथरूम में नहाते समय
जब दीदी को देखा था तभी से सोच रहा था की एक बार
इस गांड की दरार में ऊँगली चलाऊंगा और इसकी छेद
में ऊँगली डाल कर देखूंगा कैसा लगता है इस सिकुरी हुई
भूरे रंग की छेद में ऊँगली पेलने पर. मस्त राम की
किताबों में तो लिखा होता है की लण्ड भी घुसेरा जाता
है. पर गांड की सिकुरी हुई छेद इतनी टाइट लग रही थी
की मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की लण्ड उसके अन्दर
घुसेगा. खैर दो तीन मिनट तक ऐसे ही मैं करता रहा.
दीदी की बूर से पानी बाहर की निकल कर धीरे धीरे रिस
रहा था. मैंने दो तीन बार अपना मुंह लगा कर बाहर
निकलते रस को भी चाट लिया और गांड में धीरे धीरे
ऊँगली करता रहा. तभी दीदी ने मुझे पीछे धकेला “हट…
माधरचोद….क्याकररहाहै….गांडमारेगाक्या….फिर
अपने पैर से मेरी छाती को पीछे धकेलती हुई उठ कर
खड़ी हो गई. मैं हड़बड़ाता हुआ पीछे की तरफ गिरा
फिर जल्दी से उठ कर खड़ा हो गया. मेरा लण्ड पूरा
खड़ा हो कर नब्बे डिग्री का कोण बनाते हुए लप-लप
कर रहा था मगर दीदी के इस अचानक हमले ने फिर एक
झटका दिया.
मैं डर कर दो कदम पीछे हुआ. दीदी नंगी ही बाहर
निकल गई लगता था फिर से बाथरूम गई थी. मैं वही
खड़ा सोचने लगा की अब क्या होगा. थोड़ी देर बाद
दीदी फिर से अन्दर आई और बिस्तर पर बैठ गई और
मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा फिर मेरे लपलपाते लण्ड
को देखा और अंगराई लेती हुई बोली
“हायराजूबहुतमजाआया….अच्छाचूसताहै…तू….
मुझेलगरहाथाकीतूअनारीहोगामगरतुनेतोअपनेबहनोईकोभी
मातकरदिया….उससालेकोचूसनानहींआताथा…
खैरउसकाक्या…
उसभोसड़ीवालेकोतोचोदनाभीनहींआताथा….तुनेचाटकरअ
च्छामजादिया… इधरआ,……आना…
वहांक्योंखड़ाहैभाई…..आयहाँबिस्तरपरबैठ….” दीदी
के इस तरह बोलने पर मुझे शांति मिली की चलो नाराज़
नहीं है और मैं बिस्तर पर आ कर बैठ गया. दीदी मेरे
लण्ड की तरफ देखती बोली
“हूँ….खड़ाहोगयाहै….इधरआतोपासमें….देखू….” मैं
खिसक कर पास में गया तो मेरे लण्ड को मुठ्ठी में
कसती हुई सक-सक ऊपर निचे किया. लाल-लाल
सुपाड़े पर से चमरी खिसका. उस पर ऊँगली चलाती हुई
बोली
“अबकभीहाथसेमतकरना…..समझाअगरमैंनेपकड़लियातो
तेरीखैरनहीं…..मारतेमारतेगांडफुलादूंगी….समझा….”
मैं दीदी के इस धमकी को सुन नासमझ बनने का नाटक
करता हुआ बोला
“तोफिरकैसेकरू….मेरीतोशादीभीनहींहुईहै….” फिर
गर्दन झुका कर शरमाने का नाटक किया. दीदी ने मेरी
ठोडी पकड़ गर्दन को ऊपर उठाते हुए कहा
“जानतातोतूसबकुछहै…..फिरकोईलड़कीक्योंनहींपटाताअ
भीतोतेरीशादीमेंटाइमहै…..अपनेलिएकोईछेदखोजले….”
मैं बुरा सा मुंह बनाता हुआ बोला “हुह…
मुझेकोईअच्छीनहींलगती…सबबसऐसेहीहै…..” दीदी
इस पर थोड़ा सा खुंदक खाती हुई बोली “अजीब लड़का
है…बहनचोद…तुझे अपनी बहन के अलावा और कोई
अच्छी नहीं लगती क्या…..”. मैं इस पर शर्माता हुआ
बोला “…मुझेसबसेज्यादाआपअच्छीलगतीहो……
मैं…..”
“आये…।हाय…ऐसातोलड़काहीनहींदेखा…।
बहनकोचोदनेकेचक्करमें….भोसड़ीवालेकोसबसेज्यादाबह
नअच्छीलगतीहै…. मैंनहींमिलीतो……
मुठमारतारहजायेगा…॥” दीदी ने आँख नाचते हुए भौं
उचका कर प्रश्न किया. मैंने मुस्कुराते हुए गाल लाल
करते हुए गर्दन हिला कर हाँ किया. मेरी इस बात पर
रीझती हुई दीदी ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और
अपनी छाती से लगाती हुई बोली
“हायरेमेरासोना….मेरेप्यारेभाई….
तुझेदीदीसबसेअच्छीलगतीहै….तुझेमेरीचुतचाहिए….मिले
गीमेरेप्यारेभाईमिलेगी….मेरेराजा….आजरातभरअपने
हलब्बीलण्डसेअपनीदीदीकीबूरकाबाजाबजाना……
अपनेभैयाराजाकालण्डअपनीचुतमेंलेकरमैंसोऊगीं……
हायराजा…॥
अपनेमुसलसेअपनीदीदीकीओखलीकोरातभरखूबकूटना…..
अबमैंतुझेतरसनेनहींदूंगी….तुझेकहीबाहरजानेकीजरुरतनहीं
है…..चलआजा…..आजकीराततुझेजन्नतकीसैरकरादू….
.” फिर दीदी ने मुझे धकेल कर निचे लिटा दिया और मेरे
ऊपर चढ़ कर मेरे होंठो को चूसती हुई अपनी गठीली
चुचियों को मेरी छाती पर रगड़ते हुए मेरे बालों में अपना
हाथ फेरते हुए चूमने लगी. मैं भी दीदी के होंठो को अपने
मुंह में भरने का प्रयास करते हुए अपनी जीभ को उनके
मुंह में घुसा कर घुमा रहा था. मेरा लण्ड दीदी की दोनों
जांघो के बीच में फस कर उसकी चुत के साथ रगड़ खा
रहा था. दीदी भी अपना गांड नाचते हुए मेरे लण्ड पर
अपनी चुत को रगड़ रही थी और कभी मेरे होंठो को चूम
रही थी कभी मेरे गालो को काट रही थी. कुछ देर तक
ऐसे ही करने के बाद मेरे होंठो को छोर का उठ कर मेरी
कमर पर बैठ गई. और फिर आगे की ओर सरकते हुए
मेरी छाती पर आकर अपनी गांड को हवा में उठा लिया
और अपनी हलके झांटो वाली गुलाबी खुश्बुदार चुत को
मेरे होंठो से सटाती हुई बोली“जराचाटकेगीलाकर…
बड़ातगड़ालण्डहैतेरा…
सुखालुंगीतो…..सालीफटजायेगीमेरीतो…..” एक बार
मुझे दीदी की चुत का स्वाद मिल चूका था, इसके बाद मैं
कभी भी उनकी गुदाज कचौरी जैसी चुत को चाटने से
इंकार नहीं कर सकता था, मेरे लिए तो दीदी की बूर रस
का खजाना थी. तुंरत अपने जीभ को निकल दोनों चुत्तरो
पर हाथ जमा कर लप लप करता हुआ चुत चाटने लगा.
इस अवस्था में दीदी को चुत्तरों को मसलने का भी
मौका मिल रहा था और मैं दोनों हाथो की मुठ्ठी में
चुत्तर के मांस को पकड़ते हुए मसल रहा था और चुत
की लकीर में जीभ चलाते हुए अपनी थूक से बूर के छेद
को गीला कर रहा था. वैसे दीदी की बूर भी ढेर सारा रस
छोड़ रही थी. जीभ डालते ही इस बात का अंदाज हो
गया की पूरी चुत पसीज रही है, इसलिए दीदी की ये
बात की वो चटवा का गीला करवा रही थी हजम तो नहीं
हुई, मगर मेरा क्या बिगर रहा था मुझे तो जितनी बार
कहती उतनी बार चाट देता. कुछ ही देर दीदी की चुत
और उसकी झांटे भी मेरी थूक से गीली हो गई. दीदी
दुबारा से गरम भी हो गई और पीछे खिसकते हुए वो
एक बार फिर से मेरी कमर पर आ कर बैठ गई और
अपने हाथ से मेरे तनतनाये हुए लण्ड को अपनी मुठ्ठी
में कस हिलाते हुए अपने चुत्तरों को हवा में उठा लिया
और लण्ड को चुत के होंठो से सटा कर सुपाड़े को रगड़ने
लगी. सुपाड़े को चुत के फांको पर रगड़ते चुत के रिसते
पानी से लण्ड की मुंडी को गीला कर रगड़ती रही. मैं
बेताबी से दम साधे इस बात का इन्तेज़ार कर रहा था
की कब दीदी अपनी चुत में मेरा लौड़ा लेती है. मैं निचे से
धीरे-धीरे गांड उछाल रहा था और कोशिश कर रहा था
की मेरा सुपाड़ा उनके बूर में घुस जाये. मुझे गांड
उछालते देख दीदी मेरे लण्ड के ऊपर मेरे पेट पर बैठ गई
और चुत की पूरी लम्बाई को लौड़े की औकात पर चलाते
हुए रगड़ने लगी तो मैं सिस्याते हुए बोला
“दीदीप्लीज़….ओह….सीईईअबनहींरहाजारहाहै….जल्दी
सेअन्दरकरदोना…..उफ्फ्फ्फ्फ्फ……
ओहदीदी….बहुतअच्छालगरहाहै….औरतुम्हारीचु…
चु….चु….चुतमेरेलण्डपरबहुतगर्मलगरहीहै…
ओहदीदी…
जल्दीकरोना….क्यातुम्हारामननहींकररहाहै…..” अपनी
गांड नचाते हुए लण्ड पर चुत रगड़ते हुए दीदी बोली
“हाय…
भाईजबइतनाइन्तेजारकियाहैतोथोड़ाऔरइन्तेजारकरलो…
.देखतेरहो….मैंकैसेकरतीहूँ….मैंकैसेतुम्हेजन्नतकीसैरकरा
तीहूँ….मजानहींआयेतोअपनालौड़ामेरीगांडमेंघुसेड़देना…..
माधरचोद….अभीदेखोमैंतुम्हारालण्डकैसेअपनीबूरमेंलेतीहूँ
…..लण्डसारापानीअपनीचुतसेपीलुंगी…
घबराओमत…..राजूअपनीदीदीपरभरोसारखो….येतुम्हारी
पहलीचुदाईहै….इसलिएमैंखुदसेचढ़करकरवारहीहूँ….
ताकितुम्हेसिखनेकामौकामिलजाये….देखो…
मैंअभीलेतीहूँ……” फिर अपनी गांड को लण्ड की लम्बाई
के बराबर ऊपर उठा कर एक हाथ से लण्ड पकड़ सुपाड़े
को बूर की दोनों फांको के बीच लगा दुसरे हाथ से अपनी
चुत के एक फांक को पकड़ कर फैला कर लण्ड के सुपाड़े
को उसके बीच फिट कर ऊपर से निचे की तरफ कमर का
जोर लगाया. चुत और लण्ड दोनों गीले थे. मेरे लण्ड
का सुपाड़ा वो पहले ही चुत के पानी से गीला कर चुकी
थी इसलिए सट से मेरा पहाड़ी आलू जैसा लाल सुपाड़ा
अन्दर दाखिल हुआ. तो उसकी चमरी उलट गई. मैं आह
करके सिस्याया तो दीदी बोली “बसहोगयाभाई…
होगया….एकतोतेरालण्डइंतनामोटाहै…..मेरीचुतएकदमट
ाइटहै….घुसानेमें….येलेबसदोतीनऔर….उईईईइमाँ…..
सीईईईई….बहनचोदका….इतनामोटा…..हाय…
ययय…..उफ्फ्फ्फ्फ़….” करते हुए गप गप दो तीन
धक्का अपनी गांड उचकाते चुत्तर उछालते हुए लगा
दिए. पहले धक्के में केवल सुपाड़ा अन्दर गया था दुसरे
में मेरा आधा लण्ड दीदी की चुत में घुस गया था,
जिसके कारण वोउईईईमाँ करके चिल्लाई थी मगर जब
उन्होंने तीसरा धक्का मारा था तो सच में उनकी गांड भी
फट गई होगी ऐसा मेरा सोचना है. क्योंकि उनकी चुत
एकदम टाइट मेरे लण्ड के चारो तरफ कस गई थी और
खुद मुझे थोड़ा दर्द हो रहा था और लग रहा जैसे लण्ड
को किसी गरम भट्टी में घुसा दिया हो. मगर दीदी अपने
होंठो को अपने दांतों तले दबाये हुए कच-कच कर गांड
तक जोर लगाते हुए धक्का मारती जा रही थी. तीन चार
और धक्के मार कर उन्होंने मेरा पूरा नौ इंच का लण्ड
अपनी चुत के अन्दर धांस लिया और मेरे छाती के दोनों
तरफ हाथ रख कर धक्का लगाती हुई चिल्लाई
“उफ्फ्फ्फ्फ़….बहनकेलौड़े….कैसामुस्टंडालौड़ापालरखा
है….ईई….हाय….गांडफटगईमेरीतो…..
हायपहलेजानतीकी….ऐसाबूरफारुलण्डहैतो….सीईईईइ
…..भाईआजतुने….अपनीदीदीकीफारदी….ओहसीईईई…
.लण्डहैकीलोहेकाराँड….उईईइमाँ…..
गईमेरीचुतआजकेबाद….सालाकिसीकेकामकीनहींरहेगी….
है….हायबहुतदिनसंभालकेरखाथा….फटगई….रेमेरीतोहा
यमरी….” इस तरह से बोलते हुए वो ऊपर से धक्का
भी मारती जा रही थी और मेरा लण्ड अपनी चुत में लेती
भी जा रही थी तभी अपने होंठो को मेरे होंठो पर रखती
हुई जोर जोर से चूमती हुई
बोली“हाय….माधरचोद….आरामसेनिचेलेटकरबूरकामजा
लेरहाहै….भोसड़ी….के….
मेरीचुतमेंगरमलोहेकाराँडघुसाकरगांडउचकारहाहै….उफ्फ्
फ्फ्फ्फ…
भाईअपनीदीदीकुछआरामदो….हायमेरीदोनोंलटकतीहुईचूच
ियांतुम्हेनहींदिखरहीहैक्या…उफ्फ्फ्फ्फ़…
उनकोअपनेहाथोसेदबातेहुएमसलोऔर….मुंहमेंलेकरचूसोभा
ई….इसतरहसेमेरीचुतपसीजनेलगेगीऔर
उसमेऔरज्यादारसबनेगा…
फिरतुम्हारालौड़ाआसानीसेअन्दरबाहरहोगा….हायराजूऐ
साकरोमेरेराजा….तभीतोदीदीकोमजाआएगाऔर….
वोतुम्हेजन्नतकीसैरकराएगी….सीईई…” दीदी के ऐसा
बोलने पर मैंने दोनों हाथो से दीदी की दोनों लटकती हुई
चुचियों को अपनी मुठ्ठी में कैद करने की कोशिश करते
हुए दबाने लगा और अपने गर्दन को थोड़ा निचे की तरफ
झुकाते हुए एक चूची को मुंह में भरने की कोशिश की. हो
तो नहीं पाया मगर फिर भी निप्पल मुंह में आ गया उसी
को दांत से पकड़ कर खींचते हुए चूसने लगा. दीदी अपनी
गांड अब नहीं चला रही थी वो पूरा लण्ड घुसा कर वैसे
ही मेरे ऊपर लेटी हुई अपनी चूची दबवा और निप्पल
चुसवा रही थी.

☆☆☆☆☆ Meethi Gaand ☆☆☆☆☆ Maa ka Agyakari Beta ☆☆☆☆☆
10-24-2016, 10:20 AM
Post: #10
RE: मेरी बहन कविता
उनके माथे पर पसीने की बुँदे छलछला आई थी. मैंने चूची
का निप्पल को दीदी के चेहरे को अपने दोनों हाथो से
पकड़ कर उनका माथा चूमने लगा और जीभ निकल का
उनके माथे के पसीने को चाटते हुए उनकी आँखों को
चुमते हुए नाक पर जीभ फिरते हुए चाटा दीदी अपनी गांड
अब नहीं चला रही थी वो पूरा लण्ड घुसा कर वैसे ही
मेरे ऊपर लेटी हुई अपनी चूची दबवा और निप्पल चुसवा
रही थी. उनके माथे पर पसीने की बुँदे छलछला आई थी.
मैंने चूची का निप्पल को दीदी के चेहरे को अपने दोनों
हाथो से पकड़ कर उनका माथा चूमने लगा और जीभ
निकल का उनके माथे के पसीने को चाटते हुए उनकी
आँखों को चुमते हुए नाक और उसके निचे होंठो के ऊपर
जो पसीने की छोटी छोटी बुँदे जमा हो गई थी उसके
नमकीन पानी को पर जीभ फिराते हुए चाटा और फिर
होंठो को अपने होंठो से दबोच कर चूसने लगा. दीदी भी
इस काम में मेरा पूरा सहयोग कर रही थी और अपने
जीभ को मेरे मुंह में पेल कर घुमा रही थी. कुछ देर में
मुझे लगा की मेरे लण्ड पर दीदी की चुत का कसाव थोड़ा
ढीला पर गया है. लगा जैसे एक बार फिर से दीदी की
चुत से पानी रिसने लगा है. दीदी भी अपनी गांड उचकाने
लगी थी और चुत्तर उछालने लगी थी. ये इस बात का
सिग्नल था का दीदी की चुत में अब मेरा लण्ड एडजस्ट
कर चूका है. धीरे-धीरे उनके कमर हिलाने की गति में
तेजी आने लगी. थप-थप आवाज़ करते हुए उनकी
जान्घे मेरी जांघो से टकराने लगी और मेरा लण्ड
सटासट अन्दर बाहर होने लगा. मुझे लग रहा था जैसे
चुत दीवारें मेरे लण्ड को जकड़े हुए मेरे लण्ड की चमरी
को सुपाड़े से पूरा निचे उतार कर रागड़ती हुई अपने
अन्दर ले रही है. मेरा लण्ड शायद उनकी चुत की अंतिम
छोर तक पहुच जाता था. दीदी पूरा लण्ड सुपाड़े तक
बाहर खींच कर निकाल लेती फिर अन्दर ले लेती थी.
दीदी की चुत वाकई में बहुत टाइट लग रही थी. मुझे
अनुभव तो नहीं था मगर फिर भी गजब का आनंद आ
रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे किसी बोत्तल में मेरा
लौड़ा एक कॉर्क के जैसे फंसा हुआ अन्दर बाहर हो रहा
है. दीदी को अब बहुत ज्यादा अच्छा लग रहा था ये
बात उनके मुंह से फूटने वाली सिस्कारियां बता रही थी.
वो सीसियते हुए बोल रही थी
“आआआ…….सीईईईइ…..भाईबहुतअच्छालौड़ाहैतेरा…
..हायएकदमटाइटजारहाहै…….सीईईइहायमेरी….चुत…
..ओहहो….ऊउउऊ….बहुतअच्छासेजारहाहै…
हाय….गरमलोहेकेरोडजैसाहै….हाय….कितनातगड़ालौड़
ाहै….. हायराजूमेरेप्यारे…
तुमकोमजाआरहाहै….हायअपनीदीदीकीटाइटचुतकोचोदने
में…
हायभाईबताना….कैसालगरहाहैमेरेराजा….क्यातुम्हेअपन
ीदीदीकीबूरकीफांकोकेबीचलौड़ादालकरचोदनेमेंमजाआरहाहै
…..हायमेरेचोदु….अपनीबहनकोचोदनेमेंकैसालगरहाहै….
बताना….अपनीबहनको….सालेमजाआरहा…
सीईईई….ऊऊऊऊ….” दीदी गांड को हवा में लहराते
हुए जोर जोर से मेरे लण्ड पर पटक रही थी. दीदी की
चुत में ज्यादा से ज्यादा लौड़ा अन्दर डालने के इरादे से
मैं भी निचे से गांड उचका-उचका कर धक्का मार रहा
था. कच कच बूर में लण्ड पलते हुए मैं भी सिसयाते हुए
बोला
“ओहसीईईइ….दीदी….आजतकतरसता….ओहबहुतमज
ा…..ओहआई……
ईईईइ….मजाआरहाहैदीदी….उफ्फ्फ्फ्फ़…
बहुतगरमहैआपकीचुत….ओहबहुतकसीहुई….है…
बापरे….मेरेलण्डकोछिल….देगीआपकीचुत….उफ्फ्फ्फ्
फ़….एकदमगद्देदारहै….” चुतहैदीदीआपकी…
हायटाइटहै….हायदीदीआपकीचुतमेंमेरापूरालण्डजारहाहै
….सीईईइ…..मैंनेकभीसोचानहींथाकीमैंआपकीचुतमेंअपना
लौड़ापेलपाउँगा….हाय….. उफ्फ्फ्फ्फ़…
कितनीगरमहै….. मेरीसुन्दर…
प्यारीदीदी….ओहबहुतमजाआरहाहै….ओहआप….ऐसेही
चोदतीरहो…
ओह….सीईईई….हायसचमुझेआपनेजन्नतदिखादिया….
सीईईई… चोददोअपनेभाईको….” मैं सिसिया रहा था
और दीदी ऊपर से लगातार धक्के पर धक्का लगाए जा
रही थी. अब चुत से फच फच की आवाज़ भी आने लगी
थी और मेरा लण्ड सटा-सट बूर के अन्दर जा रहा था.
पुरे सुपाड़े तक बाहर निकल कर फिर अन्दर घुस जा रहा
था. मैंने गर्दन उठा कर देखा की चुत के पानी में मेरा
चमकता हुआ लौड़ा लप से बाहर निकलता और बूर के
दीवारों को कुचलता हुआ अन्दर घुस जाता. दीदी की
गांड हवा लहराती हुई थिरक रही थी और वो अब अपनी
चुत्तरों को नचाती हुई निचे की तरफ लाती थी और
लण्ड पर जोर से पटक देती थी फिर पेट अन्दर खींच
कर चुत को कसती हुई लण्ड के सुपाड़े तक बाहर
निकाल कर फिर से गांड नचाती निचे की तरफ धक्का
लगाती थी. बीच बीच में मेरे होंठो और गालो को चूमती
और गालो को दांत से काट लेती थी. मैं भी दीदी के दोनों
चुत्तरों को दोनों हाथ की हथेली से मसलते हुए चुदाई का
मजा लूट रहा था. दीदी गांड नचाती धक्का मारती बोली
“राजू….मजाआरहाहै….हाय….बोलना….दीदीकोचोदनेमें
कैसालगरहाहैभाई….हायबहनचोद….बहुत
मजादेरहाहैतेरालौड़ा…..मेरीचुतमेंएकदमटाइटजारहाहै….
सीईईइ….माधरचोद….इतनीदूरतकआजतक…..
मेरीचुतमेंलौड़ानहींगया….हाय…खूबमजादेरहाहै….
बड़ाबूरफारुलौड़ाहैरे…
तेरा….हायमेरेराजा….तूभीनिचेसेगांडउछालना….हाय….
अपनीदीदीकीमददकर….सीईईईइ…..मेरेसैयां…..जोरल
गाकेधक्कामार…
हायबहनचोद….चोददेअपनीदीदीको….चोददे….साले…
चोद, चोद….केमेरीचुतसेपसीनानिकालदे…भोसड़ीवाले….
ओहआई……ईईईइ…” दीदी एकदम पसीने से लथपथ हो
रही थी और धक्का मारे जा रही थी. लौड़ा गचा-गच
उसकी चुत के अन्दर बाहर हो रहा था और अनाप शनाप
बकते हुए दाँत पिसते हुए पूरा गांड तक का जोर लगा कर
धक्का लगाये जा रही थी. कमरे में फच-फच…गच-
गच…थप-थप की आवाज़ गूँज रही थी. दीदी के पसीने
की मादक गंध का अहसास भी मुझे हो रहा था. तभी
हांफते हुए दीदी मेरे बदन पर पसर गई.“हाय…
थकादियातुनेतो…..मेरीतोएकबारनिकलभीगई
सालेतेराएकबारभीनहींनिकला…।हाय…।
अबसालेमुझेनिचेलिटाकरचोद…
जैसेमैंनेचोदाथावैसेही….पूरालौड़ाडालकर….मेरीचुतले….
ओह….” कहते हुए मेरे ऊपर से निचे उतर गई. मेरा
लण्ड सटाक से पुच्च की आवाज़ करते हुए बाहर निकल
गया. दीदी अपनी दोनों टांगो को उठा कर बिस्तर पर
लेट गई और जांघो को फैला दिया. चुदाई के कारण
उनकी चुत गुलाबी से लाल हो गई थी. दीदी ने अपनी
जांघो के बीच आने का इशारा किया. मेरा लपलपाता
हुआ खड़ा लण्ड दीदी की चुत के पानी में गीला हो कर
चमचमा रहा था. मैं दोनों जांघो के बीच पंहुचा तो मुझे
रोकते हुए दीदी ने पास में परे अपने पेटिकोट के कपड़े से
मेरा लण्ड पोछ दिया और उसी से अपनी चुत भी पोछ
ली फिर मुझे डालने का इशारा किया. ये बात मुझे बाद
में समझ में आई की उन्होंने ऐसा क्यों किया. उस समय
तो मैं जल्दी से जल्दी उनकी चुत के अन्दर घुस जाना
चाहता था. दोनों जांघो के बीच बैठ कर मैंने अपना लौड़ा
चुत के गुलाबी छेद पर लगा कर कमर का जोर लगाया.
सट से मेरा सुपाड़ा अन्दर घुसा. बूर एक दम गरम थी.
तमतमाए लौड़े को एक और जोर दार झटका दे कर पूरा
पूरा चुत में उतारता चला गया. लण्ड सुखा था चुत भी
सूखी थी. सुपाड़े की चमरी फिर से उलट गई और मुंह से
आह निकल गई मगर मजा आ गया. चुत जो अभी दो
मिनट पहले थोरी ढीली लग रही थी फिर से किसी बोतल
के जैसे टाइट लगने लगी. एक ही झटके से लण्ड पेलने
पर दीदी कोकियाने लगी थी. मगर मैंने इस बात कोई
ध्यान नहीं दिया और तरातर लौड़े को ऊपर खींचते हुए
सटासट चार-पॉँच धक्के लगा दिए. दीदी चिल्लाते हुए
बोली“माधरचोद…
सालेदिखाईनहींदेताकीचुतकोपोछकेसुखादियाथा…
भोसड़ीकेसुखालौड़ाडालकरदुखादिया…॥
तेरीबहनकोचोदु….हरामी…. साले…
अभीभी….चोदनानहींआया…
ऊपरचढ़केसिखायाथा….फिरसालेतुने….” मैं रुक कर
दीदी का मुंह देखने लगा तो फिर बोली
“अबमुंहक्यादेखरहाहै….मारना….धक्का….जोरलगाकेम
ार…हायमेरेराजा…मजाआगया…
इसलिएतोपोछदियाथा….हायदेखक्याटाइटजारहाहै…
इस्स्स्स्स….” मैं समझ गया अब फुल स्पीड में चालू
हो जाना चाहिए. फिर क्या था मैंने गांड उछाल उछाल
कर कमर नचा कर जब धक्का मरना शुरू किया तो दीदी
की चीखे निकालनी शुरू हो गई. चुत फच फच कर पानी
फेंकने लगी. गांड हवा में लहरा कर लण्ड लीलने लगी “
हायपेलदे…॥भाईऐसेहीबेदर्दीसे…..
चोदअपनीकवितादीदीकीचुतको….ओहमाँ….कैसाबेदर्दीभ
ाईहै….हायकैसेचोदरहाहै….अपनीबड़ीबहनको….
हायमाँदेखो….मैंनेमुठमारनेसेमनाकि
यातोसालेनेमुझेचोदडाला……
चोदाइसकेलिएकोईबातनहीं….मगरकमीनेकोऐसेबेदर्दीसेच
ोदनेमेंपतानहींक्यामजामिलरहाहैउफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ्फ़…….म
रगई….हायबड़ामजाआरहाहै…..सीईईईई…..मेरेचोदु
सैयां…मेरेबालम….हायमेरेचोदुभाई…..बहनकेलौड़े…
चोददेअपनीचुदक्कड़बहनको…सीईईईई….” मैं लगातार
धक्के पर धक्का लगता जा रहा था. मेरा जोश भी अपनी
चरम सीमा पर पहुँच चूका था और मैं अपनी गांड तक
का जोर लगा कर कमर नचाते हुए धक्का मार रहा था.
दीदी की चूची को मुठ्ठी में दबोच दबाते हुए गच गच
धक्का मारते हुए मैं भी जोश में सिसिया हुए बोला ”
ओहमेरीप्यारीबहनओह….सीईईईइ….कितनीमस्तहोतुम
….हाय…सीईईईतुमनहींहोतीतो…मैंऐसेहीमुठमारता…
होसीईई…दीदीबहुतमजाआरहाहै…
हायसचमेंदीदीआपकीगद्देदारचुतमेंलौड़ाडालकरऐसालगरह
ाहैजैसे…..जन्नत….हाय…
पुच्च..पुच्चओहदीदीमजाआगया….ओहदीदीतुमगालीभीदे
तीहोतोमजाआताहै….हाय…
मैंनहींजानताथाकीमेरीदीदीइतनीबड़ीचुदक्कड़है….हायमेर
ीचुदैलबहना….सीईईईईहमेशाअपनेभाईकोऐसेहीम
जादेतीरहना….ऊऊऊऊउ….दीदीमेरीजान….हाय….
मेरालण्डहमेशातुम्हारेलियाखड़ारहताथा….हायआज….
मनकीमुराद…..सीईईई….” मेरा जोश अब अपने चरम
सीमा पर पहुँच चूका था और मुझे लग रहा था की मेरा
पानी निकल जायेगा दीदी भी अब बेतहाशा अंट-शंट बक
रही थी और गांड उचकाते हुए दांत पिसते बोली
“हायसाले….चोदनेदेरहीहूँतभीखूबसूरतलगरहीहूँ….माधर
चोदमुझेसबपताहै…..चुदैलबोलताहै….सालेचुदक्कड़
नहींहोती…
मुठमारतारहजाता…..हायजोर….अक्क्क्क्क…..जोरसे
मारतारहमाधरचोद…. मेराअबनिकलेगा…
हायभाईमैंझरनेवालीहूँ….सीईईईई….औरजोरसेपेल….चो
दचोद….चोदचोद….
राजू….बहनचोद….बहनकेलौड़े…..” कहते हुए मुझे
छिपकिली की तरह से चिपक गई. उनकी चुत से छलछला
कर पानी बहने लगा और मेरे लण्ड को भिगोने लगा.
तीन-चार तगड़े धक्के मारने के बाद मेरा लण्ड भी झरने
लगा और वीर्य का एक तेज फौव्वारा दीदी की चुत में
गिरने लगा. दीदी ने मुझे अपने बदन से कस कर चिपका
लिया और आंखे बंद करके अपनी दोनों टांगो को मेरे
चुत्तरों पर लपेट मुझे बाँध लिया. जिन्दगी में पहली बार
किसी चुत के अन्दर लण्ड को झारा था.

☆☆☆☆☆ Meethi Gaand ☆☆☆☆☆ Maa ka Agyakari Beta ☆☆☆☆☆
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