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नौकरी हो तो ऐसी
10-04-2016, 09:56 AM
Post: #1
नौकरी हो तो ऐसी
यूनिवर्सिटी से पढ़ के अब मैं
ग्रॅजुयेशन कंप्लीट कर चुक्का
था. मैं बचपन से ही अनाथ
था. मैं 1 छोटे से गाओं मे
पला बढ़ा और बाद मे
यूनिवर्सिटी से ग्रॅजुयेशन
कंप्लीट कर लिया. इसमे मेरे
मामाजी का बहुत ही बड़ा
हाथ था. उन्ही के कृपा से
मैं एक काबिल आदमी बन
पाया था. पिछले दो चार
महीनो से मामाजी मुझे
अक्सर कहते थे कि मेरे एक
मित्र घयपुर जिले से
आनेवाले है अपनी बहू को
लेने के लिए, जिसने तीन
महीने पूर्व ही एक बच्चे को
जन्म दिया था.
एक दिन सबेरे सबेरे मुझे उठाते
हुए ममाजी बोले "तुम्हे
घयपुर जाना होगा सेठ जी
के साथ" जब मैने पूछा कि
क्यू तो जवाब मिला "उनके
यहा पे एक अच्छे और
ईमानदार व्यक्ति की उन्हे
ज़रूरत है तो मैने तुम्हारा
नाम आगे कर दिया और वो
तुम्हे अच्छी तनख़्वाह देने के
लिए भी राज़ी हो गये है "
तो मैने पूछा अब आगे क्या
तो ममाजी बोले "तो तुम्हे
उनके साथ जाना होगा, 2
दिन का ट्रेन का सफ़र है,
ट्रेन कल दोपेहर 2 बजे
निकलने वाली है सब
तय्यारी कर लो"
मैं कोई गाव –वाव मे काम
नही करना चाहता था परंतु
मामा जी का हुक्म था
तो मैने सब तय्यारी कर ली
और दूसरे दिन ममाजी के
साथ स्टेशन पे पहुँच गया.
स्टेशन पे पहुचते ही ममाजी
ने मुझे सेठ जी से मिलवाया.
सेठ जी मिड्ल एज्ड लग रहे
थे परंतु उनकी चाल ढाल से
पता चल रहा था कि बूढ़ा
तो बहुत ही ठंडा है, एक
बात बोलनेको 10 मिनट
लेता है. फिर मामा जी घर
के लिए चल दिए. उतने मे ही
ट्रेन आ गयी. और कुली ने
जल्दी से 2 औरतो के साथ
हमारा समान ट्रेन मे चढ़ा
दिया. जैसे कि सेठ जी बड़े
आदमी थे और बहुत पैसेवाले
थे उन्होने 6 लोगो का 1
पूरा एसी कॉमपार्टमेंट ही
बुक करवाया था. क्यू कि
उनकी बहू और बीवी भी
उनके जानेवाली थी जो
बहुको लेने आई थी.
जब मैं अंदर आके बैठा तो मुझे
ऐसे लगा जैसे मैं कही जन्नत
मे आ गया हू. सेठ के बीवी
को देख के ऐसे लग रहा था
कि कोई मदमस्त हसीना
ट्रेन मे बैठी हो. उसका वो
गोल मटोल चेहरा, पुश्त
बाहें, बड़ी बड़ी चुचिया
जो उनके ब्लाउस से सॉफ
दिखाई दे रही थी, बड़ी –
लचकीली कमर, और मोटे
भारी गांद देख मे मैं दंग रह
गया और मैं देखते ही रह गया
जब सेठ जी ने बैठ जाओ
कहा तब मैं होश मे आया. मैं
शेठ जी की बीवी के पास
बैठ गया, बैठते ही शेठ जी
की बीवी कोमल बाहें मेरे
हाथो से टकराई और मेरे
शरीर मे करेंट उतर गया. मैं
जीवन मे पहली बार ऐसा
एहसास कर रहा था. मेरा
लंड ऐसे खड़ा हो गया जैसे
मानो कोई बम्बू हो. शेठ
जी के बीवी मुझे देखकर हस
रही थी. और मुझे चिपकने
की कोशिश कर रही थी.
मेरे सामने शेठ जी की बहू
बैठी थी और बच्चे को सुला
रही थी और शेठ जी बाहर
देखते हुए हवा खा रहे थे. बहू
की तरफ देखा तो मैं कतई
दंग रह गया, वो अपनी सास
से दस्पाट सुंदर थी और
हसीन थी, क्या फिगर थी
उसकी मानो भगवान ने
उसकी एक एक चीज़ घंटो
बर्बाद कर कर के बनाई हो.
उसकी चुचिया ब्लाउस से
बाहर आने के लिए मानो
जैसे तरस रही हो. और
डेलिवरी के कारण तो और
हसीन और कम्सीन दिख
रही थी. परंतु थोड़ी उदास
उदास दिख रही थी. इधर
शेठ जी की बीवी मुझसे
चिपके जा रही थी और मेरे
हाथ से हाथ घिसने का
कोई मौका नही छोड़ रही
थी. उतने मे बहू का पैर मेरे
पैरो को लगा और मैं चमक
उठा. मैने अपना पैर थोड़ा
पीछे खिचा, परंतु थोड़ी देर
मे वोही घटना हो गई मैं
समझ गया कि शेठ जी की
बहू नाराज़ नाराज़ क्यू है
और ये क्या हो रहा है. इसने
बड़े लंबे समय से चुदवाया
नही इसी कारण ये गरम हो
रही है और पाव पर पाव
घिस रही है. थोड़ी देर मे बहू
मेरी तरफ देखकर थोड़ा
थोड़ा हसने लगी. मैं भी
पाव आगे करने लगा थोड़ी
हिचखिचाहट थी परंतु अभी
हौसला बढ़ रहा था. मैने
अपना पैर उसके पंजे से उपर
चढ़ाना शुरू किया और मुझे
वो नरम नरम चिकने चिकने
पैर से प्यार हो गया और मैं
पैर ज़ोर ज़ोर से घिसने लगा.
उधर बाजू मे शेठ की बीवी
ने मेरे दाए साइड के पैर पर
हाथ रख दिया और उसपे
अपनी सारी सरका दी,
ताकि कोई देख ना पाए. मैं
थोड़ा नर्वस होने के कारण
उधर से उठा गया और
बाथरूम की और चल दिया.
जैसे ही मैं बाथरूम का
दरवाजा बंद करनेवाला था,
मैने देखा शेठ की बीवी
नेमेरा हाथ पकड़ लिया और
चुपके से अंदर घुस आई मैं कुछ
समझ पाउ इसके पहले ही
उसने मुझे चुप रहने का
इशारा किया और अपने
शरीर से मुझे जाकड़ लिया.
अब तो बस मेरा लंड पूरा के
पूरा खड़ा हो गया. उस
स्पर्श से मेरा रोम रोम जल
उठा रहा था. शेठ जी की
बीवीकी चुचिया मेरे
छाती से चिपक रही थी
और मुझे स्वर्ग मे जाने का
आभास हो रहा था. मैने
ज़ोर से शेठ की बीवी के मूह
मे मूह डाल और ज़ोर से किस
करने लगा वो भी मुझे
ज़ोर्से किस करने लगी. हम
दोनो की जीभ एक दूसरे
टकरा रही थी और मुझे बहुत
ही आनंद आ रहा था. शेठ
जी की बीवी ने मेरे मूह से
थूक चाटनी शुरू की और
मेरी थूक अपनी मूह मे ले ली.
और मेरे पॅंट की ज़िप खोलने
लगी.
ज़िप खोलते ही मेरा पहाड़
जैसा लंड बाहर या और
सेठानी उसे देखते रह गयी
बोली " मुझे माफ़ कर दो
मुझे तुम्हारी औकात का
पता नही था, मैं जाती हू
मुझे जाने दो " मैने सेठानी
की सारी पकड़ली चूत के
नज़दीक के झाँत बाल
सहलाए और हल्केसे खिचे,
और वो ज़ोर से कराह उठी.
उसकी चूत के बाल मेरे हाथ
मे थे और वो मदमस्त दिख
रही थी. उसके लाल लाल
होंठो को मैं दांतो से
चबाने लगा और उसका मुख
रस अपने मुँह मे लेने लगा. मैने
सेठानी को बोला "तुम
यहा आई अपनी मर्ज़ी से
हो जाओगी मेरी मार्जिसे
रंडी" और वो थोड़ी डर सी
गयी.
मैने उसकी सारी खोलने
लगा. जैसे ही सारी खोल
रहा था उसका वो असीम
सौन्दर्य अपनी खुली आँखो
मे समाने लगा, अब मेरे लंड के
सूपदे से पानी निकलने लगा,
मैने सारी खोली और खड़े
खड़े ही उसके पीठ से चिपक
गया, उसकेगालो को
सहलाते हुए, लंड को उसकी
गांद के दो पहाड़ो की
झिर्री के बीच निकर्स से
घिसने लगा…उसकी गांद
का घेराव बहुत ही मस्त
था….अब मुझे बहुत ही आनंद
आ रा था, और अभी मैं पीठ
को पूरी तरह से चिपक गया,
और उसके शरीर को अपने
अंदर महसूस करने लगा …मेरा
अंग अंग रोमांचित हो रहा
था…और उसी वक़्त मैने सोच
लिया की एक दिन मैं
इसकी गांद इस तरह फड़ुँगा
कि ये किसीसे चुदवाने से
पहले 10 बार सोचेगी. अब
मैने सेठानी की निकर भी
निकाल दी.
सेठानी सिर्फ़ ब्लू ब्लाउस
मे मेरे सामने खड़ी थी. उस
अपारदर्शक ब्लाउस से
उसकी चुचया सॉफ दिख
रही. एक चुचि को मूह मे लेके
मैं उसे ब्लाउस के बाहर से ही
चाटने लगा….ब्लाउस
गीला हो रहा और सेठानी
का निपल सख़्त होते जा रहे
थे उसके तंग ब्लाउस से उसके
कांख के नीचे के काले बाल
दिख रहे थे थोड़े थोड़े मैने
उन्हे थोड़ा सा
खिचा…"एयेए…आ…ईयीई"…
और वो आगे पीछे डोलने
लगी थी मैने 1 चुचि को
हल्केसे काट लिया सेठानी
बोली "होले होले" मैं हस्ने
लगा….और मैने फिरसे काट
दिया …और वो कराह
उठी…..उसकी आँखे लाल
हो रही थी और गाल
मानो जैसे टमाटर की तरह
फूल रहे थे. मैने उसे वही नीचे
बिठा दिया और मूह पे एक
चपत लगा दी. वो दर्द से
करहकर उठी बोली "तुम
आदमी हो या जानवर,
मारते हो …गधे जैसा
तुम्हारा लंड है, इतना बड़ा
10 इंच का लंड मैने आज तक
नही देखा है, मुझमे इतनी
हिम्मत नही है कि मैं इससे
जूझ पाउ, मुझे जाने दो."
मैने एक ना सुनी और मेरा
लंड उसके मूह मे घुसेड दिया.
और ज़ोर ज़ोर से झटके मारने
लगा. उसके मूह से गु गुगु गुगु गु
की आवाज़ आने लगी. और
उसकी आँखो मे पानी आ
गया. जब मैने लंड बाहर
निकाला तो वो ज़ोर्से
हाफ़ रही थी. मैने मूह पे 1
और थप्पड़ मारा और कहा
"इस उमर मे ऐसी हरकते
करती हो तुम्हे सज़ा
मिलनी ही चाहिए" मैने उसे
वही खड़ा किया और
उसकी चूत को सहलाने
लगा, उसकी सासे तेज़ होने
लगी और मैने ज़ोर से 1
उंगली अंदर घुसेड दी. वो
चिल्लाने लगी वैसे ही मैने
उसके मूह पे हाथ रख दिया.
उसके हाथ पैर हिलने लगे.
अब मैने उसे कुत्ति की तरह
आसान बनाके के खड़ा कर
दिया . और बोला "ये ले
मेरी रानी ……..मन मे
बोला तू तो अब गयी" मैने
अपना लंड उसकी चूत के उपर
लगाया ..वो गोरी गोरी
चूत काले घने बालो के बीच
से मेरे लंड के सूपदे को पुकार
रही थी. सेठानी की चूत
की लाल लकीर काले
बालो के बीच मे बहुत ही
नाज़ुक और कोमल लग रही
थी. मैने उसपे थोड़ा थुका,
और चटा और और 1 उंगली
डाल दी. सेठानी तड़पने
लगी. मैने और थुका और चूत
के लिप्स को अलग करते हुए
अंदर देखने लगा. मैं जीवन मे
पहली बार कोई चूत देख
रहा था. वो इतनी हसीन
थी कि लग रहा था कि
देखते रहू..मैं सेठानी के चूतड़
मे उंगलिया डाल डाल के
उसके लिप्स को बाजू कर
कर के अंदर देख रहा था और
थूक रहा था ऐसे लग रा था
मानो मैं स्वर्ग मे हू. मैने अब
चूत के अंदर के छोटेसे होल मे
तीन उंगलिया डाली और
ज़ोर ज़ोर से अंदर बाहर करने
लगा. सेठानी तड़पने लगी
और बोलने लगी "हल्लू हल्लू
बहुत दुख रहा है वाहा
….हल्ल्लू हल्लू ".
मैने अभी देर ठीक नही
समझी और मेरा लॉडा
सेठानी के चूतड़ पे रखा और
ज़ोर का झटका देके अंदर
घुसेड दिया 1 ट्राइ मे 4 इंच
अंदर चला गया और सेठानी
बिखलने लगी "बाहर
निकालो बाहर निकालो
मैं मर जाउन्गि….बहुत दर्द
हो रहा है" मैं बोला "अरे
अभी तो आधा भी अंदर
नही गया और बाहर
निकालो चुपचाप खड़ी
रहो मेरी रानी नही तो
बाहर जाके सेठ जी को
बोलता हू तेरी बीवी
चुड़क्कड़ रांड़ है और सब से
चुदवाती है तेरी रानी "
इसके बाद वो कुछ ना
बोली. सेठानी की चूत
बहुत ही टाइट थी. इसके
कारण मेरा लंड एकदम जाम
हो गया हो ऐसे लग रहा
था.


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10-04-2016, 09:56 AM
Post: #2
RE: नौकरी हो तो ऐसी
मैने 1 और ज़ोर का झटका
लगाया और 3 इंच लंड अंदर
घुसेड दिया. और सेठानी
की आँखोसे आँसू निकल
आए. "अरे अभी तो बाकी है
ज़रा धीरज से काम लो "
सेठानी बोली "इसे बाहर
निकालो मुझे बहुत दर्द हो
रहा है मैं कांप रही हू ….इतने
बड़े लंड की आदत मुझे नही
है" मैं बोला "तो आदत डाल
लो अभी तो मैं तुम्हारे गाव
मे रहने वाला हू रानी …और
इस दरम्यान तू अगर ,मुझसे
चुदवाने से इनकार करेगी तो
सब गाव वालो को जाके
बोल दूँगा …समझी …? अब
चुपचाप पड़ी रहना नही तो
बहुत ज़ोर्से धक्का
मारूँगा…" वो फिर चुप
होगयि और मैने और 1 ज़ोर
से धक्का मारा तो उसकी
ज़ोर्से चीख निकल पड़ी
और वो नीचे फिसल गयी.
मैने उसके मूह पे हाथ रखा
था इसलिए आवाज़ बाहर
नही गयी. परंतु फिसलने के
कारण मैं भी उसके उपर
फिसल गया और मेरा पूरा
लंड जड़ तक उसके चूत मे घुस
गया. अब वो ज़ोर से
कराहने लगी और हाथ पाव
हिलाने लगी. परंतु मेरे उपर
जानवर सवार था मैने उसके
उपर धक्के शुरू कर दिए. और
सेठानी को नानी याद आ
गयी…वो ज़ोर ज़ोर से पाव
हिलाने लगी और मुझे बाजू
धकेलेने की कोशिश करने
लगी ….उसकी चूत, मूह, गाल
सब लाल –लाल हो रहे थे.
चूत नरम और छोटी होने के
कारण एकदम मेरे लंड को
पूरी तरह चिपक गयी जैसे
मानो जन्मोसे मेरा लंड
उसका साथी हो….लंड अंदर
जाके पूरा गीला हो गया
था…और मैं मदहोश हो रहा
था उसी क्षण मैने सेठानी
को उपर उठाया लंड बाहर
निकाला और ज़ोर का
झटका मारा सेठानी
फिरसे घुटने से फिसल गयी
और मेरा लंड जड़ तक उसके
पेट तक घुस गया. और वो
रोने लग गयी और बोली
"सस्सस्स….हिस्स्स…..इसे
बाहर निकालो नहियीईईई
तो मैं मररर्र्र्र्ररर जाउन्गि
ईई….मुझे बहुत दर्द हो रहा
आआआअ है …आआ ईईए ऐसे
तो मेरी चूत से
खुन्न्न्न..निकल जाएगा .…
आ एयेए आआ…ईयीई"
अब मैने धक्को की रफ़्तार
बढ़ा दी और थोड़ी ही देर
मे सेठानी के पानी के साथ
मेरा भी वीर्य निकल गया.
मैने सेठानी की चूत से लंड
निकाल के उस पर थूक कर
सेठानी के मूह मे घुसेड़ने
लगा. उससे मेरा लंड चॅट के
पूरा साफ करवाया. और
सेठानी को उसकी सारी
वापस दे दी. सेठानी पूरी
लाल नीली हो गयी थी.
उठने के लिए भी उसे मेरे
सहारे की ज़रूरत पड़ी. मैने
उसे हाथ देकर उठाया और
बोला "जल्दी से यहा से
निकलो और तैयार होके
बाहर आ जाओ..समझी ….
सेठ जी को अगर शक आ
गया तो मेरी नौकरी लगने
से पहले ही छूट जाएगी" और
मेरी रानी कहकर उसके मूह
का 1 कस के चुम्मा ले
लिया.
मैं बाहर आने के लिए बाथरूम
का दरवाजा खोला, तो मैं
दंग रह गया. सामने सेठानी
की बहू खड़ी थी. मुझे देखते
ही उसने 1 उंगली अपने दात
तले दबा ली और हल्केसे
मुस्कुराइ और बोली " आपने
तो सासू मा की छुट्टी कर
दी…" मैं और सेठानी दंग रह
गये, मैं बोला "वो –वो…… "
बहू बोली " ये वो छोड़िए,
अब मैं सब जाके ससुर्जीको
बोलने वाली हू …" और
मुस्कुराने लगी. इधर मेरी
और सेठानी की हालत
पतली हो जा रही थी. बहू
ने हमे बाथरूम के बाहर खड़े
होके रगेहाथ पकड़ लिया
था. मैं बोला "ग़लती हो
गयी…." उधर सेठानी बोली
"किसी को मत बताना बहू
….तुझे मेरी कसम"
बहू बोली "नही
बताउन्गि….परंतु 1 शर्त
पर…." मुझे पता था ये मुझसे
चुदवाना चाहती है बहू
बोली "तुम्हे मेरे सामने
सासुमा को चोदना
होगा….और वो भी आज
अभी" ये सुनके हम लोग दंग
रह गये. मुझे लगा ये चुदवाने
की बात करेगी परंतु इसे तो
देखने आनंद लेना था.
सेठानी बोली "तू ये क्या
बकवास कर रही है बहू…ये
नही होगा" "तो ठीक है मैं
चली ससुरजी के पास" मैं
बोला "नही नही ….हम
प्रयत्न करेंगे …परंतु अभी नही
रात को…" बहू बोली "तो
ठीक है आज तुम रात को मेरे
सामने मेरी प्यारी चुड़दकड़
सासू मा को चोदोगे"
सेठानी कैसे तैसे राज़ी हो
गयी. और सेठानी के बहू ने
मेरे गाल का अचानक से
चुम्मा ले लिया.
4 बजे हम लोग कॉमपार्टमेंट
मे पहुचे. तो सेठ जी पहले से
सो रहा था. 7 बजे के लगभग
टाइम हमने कॉमपार्टमेंट मे
डिसाइड कर लिया कि
रात को 2-3 नींद की
गोली पानी मे मिलाके के
सेठ को सुला दिया
जाएगा और बाद मे हमारा
प्रोग्राम होगा. लगभग 8
बजे खाना आनेवाला था.
उतने मे सेठ जी उठ बैठे और
बोले "अरे मेरी कब आँख
लगी पता ही नही चला…
बड़ा अच्छा मौसम है आज
….बहुत आनंद आ रहा है सफ़र
का …मेरी नींद भी बहुत
अच्छी हुई है …अभी मुझे रात
को जल्दी नींद नही
आएगी" और फिर सो गया
ये सेठ कब सोता कब
जागता कुछ समझ नही आ
रहा था.
मैं मन ही मन मे बोला "दिन
तुम्हारे लिए नही मेरे लिए
मस्त है..और ये सब आप की
देन है..और नींद आपको तो
हम चाहे तब आएगी आप आगे
देखो होता है क्या.." इतने
मे बच्चा रोने लगा तो सेठ
की बहू ने उसे गोद मे लिया
और उसे दूध पिलाने के लिए
अपने पीले कलर के तंग
ब्लाउस के बटन खोलने
लगी. उसकी चुचिया दूध से
भरी होने के कारण स्तनो
के घेराव आकार मे बहुत बड़े
नज़र आ रहे थे. जैसे लग रहा
था कि तरबूज रखे हो
ब्लाउस मे. उसने बटन खोल
के एक निपल बच्चे के मूह मे
डाल दिया. और बच्चा
शांति से दूध पीने लगा. सेठ
जी की बहू ने जानते हुए भी
कि ये लोग बैठे है…बात को
अंजाना करते हुए घूँघट नही
लिया और बच्चे को दुख
पिलाने लगी. उसके वो
गुलाबी कलर का निपल देख
के मेरे शरीर मे ज्वालए
उत्पन्न हो गयी. मेरा लंड 1
क्षण मे पूरा 10 इंच टाइट
हो गया. ये बात सेठानी
की आँखो ने भाप ली और
बहुने भी ….और दोनो एक
दूसरे के आँखोमे देखकर
मुस्कुराने लगी. इधर मैं
लज्जित होते जा रहा था.
क्यू की मैं मेरी इच्छा को
कंट्रोल नही कर पा रहा
था और लंड के रूप मे उसके
सबको दर्शन दिला रहा
था. सेठानी और सेठानी
की बहू पहले आँख मिलाने मे
थोड़े हड़बड़ा रहे थे. पर कहते
है ना चुड़क्कड़ औरतो की
शर्म लज्जा 1 क्षण के लिए
होती है….थोड़ी ही देर मे
दोनो मेरी तरफ देखकर मेरी
तंग पॅंट से दर्शन दे रहे मेरे लंड
को घुरे जा रही थी …और
मन ही मन मे आनंदित हो
रही थी. उधर सेठ जी ऐसे
सोया था जैसे स्वर्ग मे
सोया हो. और इधर उसकी
घरवालिया गुल खिला रही
थी. इतने मे खाना आ गया
फिर सेठ जी नींद से उठ गये.
फिर हम लोग बीच टेबल की
तरह रचना करके खाने के
लिए बैठ गये. खाने का 1
नीवाला मेरे मूह मे जाने ही
वाला था कि मैने मेरी पॅंट
पे हाथ का स्पर्श महसूस
किया. सेठानी की बहू ने
बाया हाथ मेरे टांग पे रख
दिया. इधर सेठानी ने भी
अपनी हरकते शुरू कर दी और
वो मेरे बाजू मे खिसक के मेरे
दाए साइड चिपक गयी.
सेठ जी को होश ही नही
था कि क्या चल रहा है
बेचारा बूढ़ा मटक मटक
आवाज़ निकाल के खाना
खाते जा रहा था. जैसे कि
मेरा 1 हाथ खाली था
सेठानी की बहू मेरा हाथ
पकड़ लिया और अपनी
जाँघ पे घिसने लगी और
फिर अपनी चूत के पास ले
जाकर मुझे चूत को दबाने
का इशारा करने लगी. मैने
चुपके से दोंनो को सेठ जी
की तरफ इशारा किया …
तो दोनो ही हस पड़ी
….सेठानी की बहू मेरे
कानो मे बोली "बूढ़े को
श्याम और रात मे बहुत कम
दिखता है…तुम चिंता मत
करो." और फिर मेरा हाथ
चूत पे दबाने लगी. मैने बहू
की सारी नीचे से उपर
खीची और अंदर हाथ डाल
दिया. ये हरकत देखकर
सेठानी मुस्कुराइ और
बोली "आराम से खाना
खाना …बहुत भाग दौड़ है
(होनेवाली है) आज
तुम्हारी. " और दोनो भी
हस्ने लगी. मैने बहू की चूत के
अंदर 1 उंगली डाल दी.चूत
बहुत ही ढीली और नाज़ुक
लग रही थी. मैने दूसरी
उंगली डाल दी. और अंदर
बाहर करने लगा तो बहू
अपना नीचे का होंठ दाँत
तले दबाने लगी और लंबी
सासे लेने लगी. इतने मे
सेठानी बोली "ज़रा हमे
भी उस सब्जी का मज़ा
चखाओ..दिखाओ इधर कैसी
है टेस्ट मे " उस रंडी का
मतलब बहू के चूत से निकल रहे
रस के ओर था. मैने कहा "हाँ
क्यूँ नही क्यू नही" इतने मे
सेठ जी खाना ख़ाके हाथ
धोने के लिए बाथरूम की
तरफ चल दिए और मैने अपनी
उंगली सेठानी के मूह मे
डाल दी उसने उसे चटाना
शुरू किया. और मैने मोके
फ़ायदा उठाते हुए फटक से
बहू के ब्लाउस के बटन खोले
और एक निपल मूह मे ले
लिया..और चूसने लगा तो
सेठानी बोला "सिर्फ़
चॅटो, चूसो नही …दूध तुम्हारे
लिए नही बच्चे के लिए है."
मैं सिर्फ़ मुस्कुराया और
ज़ोर से निपल को चूसना शुरू
कर दिया.
इतने मे सेठ जी के आने की
भनक लग गयी और हम लोग
बाजू हो गये. सेठानी की
बहू ने ब्लाउस के बटन बंद कर
दिए और सारी नीचे कर डी
और मेरा हाथ अपनी टाँगो
के बीच से निकालकर बाजू
कर दिया. फिर बहू ने
सेठानी के संदूक से नींद की
दो-तीन गोली निकाली
और नींबू पानी मे मिक्स
कर दी. और पानी का
ग्लास सेठ जी के हाथ मे देते
हुए बोली "बाबूजी आप इसे
जल्दी से पी लीजिएगा …
नींबू पानी से सेहत अच्छी
रहती है" कितना भोलापन
था उसके बातो मे. सेठ जी
ने अपनी प्यारी-भोली बहू
का हुक्म सुनकर ग्लास पेट मे
पूरा खाली कर दिया और
दस मिनिट मे जगह पे लूड़क
गये. अब बहू हम दोनो की
तरफ देखने लगी.
उसकी नज़र की गर्मी की
हवा मेरे और सेठानी के अंग
से बहने लगी. बहू का मन
वासना से भर गया था और
वो उसकी नज़र मे भी साफ
दिखाई दे रहा था. वो
बोली "चलो शुरू हो जाओ,
नहितो …." उसके कहते ही
मैने सेठानी की गांद पे
हाथ रख दिया और 1
थप्प्पड़ मारके उसे ज़ोर से
दबाया. सेठानी बेचारी
कहकहा उठी. उसे मैने दो
बर्त के बीच मे खड़ा किया.
एसी कॉमपार्टमेंट होने के
कारण जगह बहुत थी. सेठ
जी को हमने उठाके सामने
वाले बर्त पे लिटा दिया
और उसके उपर दो चार चादरे
चढ़ा दी जो कि उसको
कुछ सुनाई दिखाई ना दे.

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10-04-2016, 09:56 AM
Post: #3
RE: नौकरी हो तो ऐसी
मैने सेठानी का मूह
खिड़की की तरफ किया
और बोला "अब पूरी रात
तुम्हे ऐसे कुत्ते की तरह ही
खड़ा रहना होगा …ज़रा
भी हिलने की कोशिश की
तो लेने के देने पड़ जाएँगे"
सेठानी का मूह खिड़की
की तरफ करके मैने उसे कुत्ते
की तरह खड़ा किया. और
गांद के पीछे से जाके मैं भी
उसी पोज़िशन मे उससे
चिपक गया. बहू ये सब देख के
मज़ा ले रही थी. और निचले
होंठ को दात से दबाते हुए
अपनी सारी के बीचमे से
चूत मे हाथ डाल रही थी.
मौसम बहुत रंगीला था. और
मेरे उपर अभी भूत सवार था.
मैने सेठानी की सारी
खोलनी शुरू की और फिरसे
सेठानी का सौन्दर्य मेरी
नज़रो से मैं देखने लगा . अब
मैने सेठानी का पार्कर भी
खोल दिया. सेठानी अभी
सिर्फ़ निकर और ब्लाउस मे
खड़ी थी. और बहू के सामने
होने कारण थोड़ी शरम
महसूस कर रही थी.
मैने निकर भी निकाल
दिया और ब्लाउस भी,
उसके कांख के बाल बहुत ही
सुंदर थे, मैने उसे थोड़ा
थोड़ा खींचना शुरू किया,
उसके बाद मेरी नज़र गयी
मदमस्त नाज़ुक चूत पे, जिसे
देख के मेरे अंदर का जानवर
जाग गया, चूत का रंग
दोपेहर की ठुकाई के कारण
अभी भी लाल था और उसमे
से मेरे वीर्य की कुछ बूंदे भी
टपक रही थी. अब मैने मेरा
10 इंच का पहाड़ बाहर
निकाला. जिसे देखते ही
बहू बोली "होये रामा
…….आपके रामजी तो बहुत
ही बड़े और लंबे मालूम पड़ते है
अगर ये पूरे सासू मा के अंदर
प्रयाण कर गये तो सासू मा
की चूत का तो समुंदर बन
जाएगा…" और हस्ने लगी.
और बोली "अभी देर ना
करो जल्दी से इसे सासू मा
के अंदर डालो…मुझे देखना है
कैसे सासू मा इसे अपने चूत के
अंदर समाती है…आख़िर
पुरानी खिलाड़ी है" मैने
सेठानी का ब्लू कलर का
ब्लाउस खोल दिया और
उनकी चुचिया चूसने लगा.
वो एकदम गरम हो गयी थी
बोल रही थी "जल्दी से
तुम्हारे लंड के सूपदे को मेरे
चूत मे डालो …मैं और सह
नही सकती"
मैने अपने लंड पे थुका और बहू
की तरफ इशारा किया. उसे
तो इशारे की ही देर थी
वो मेरे पास आके मेरे लंड को
मूह मे लेने लगी और चूसना
शुरू कर दिया मेरे लॅंड से
निकल रहे पानी को वो
चाट लेती थी. उसने मूह मे
बहुत सारी थूक जमा कर ली
और मुझे बोली "सासू मा
की चूत खोलो. मुझे ये सब
उसमे डालना है" मैने दो
उंगलिया डालके सेठानी
की चूत के लिप्स को अलग
किया और बहूने उसमे सब
जमा किया हुआ थूक दिया
और अपनी जीभ से चुतताड
को चाटने लगी. थोड़ी दे मे
मैने बहू की पीले कलर की
सारी और ब्लाउस उतार
दिए. वो अप्सरा समान लग
रही थी. उसकी फिगर कोई
साउत इंडियन हेरोयिन से
कम नही थी. मैं तो बोलता
हू जब भी कोई मर्द इससे
देखता होगा. एक बार तो
इसके नाम पे हिलाता ज़रूर
होगा.
अब मैने अपना लंड चूत पे रख
दिया. बहू की लार चूत से
टपक रही थी. चूत बहुत ही
गीली और लाल हो गयी
और सेठानी उधर चिल्ला
रही थी "जल्दी करो मुझसे
रहा नही जा रहा है " मैं
बोला "मेरी रानी दो
मिनिट शांति रख फिर देख
…" अब मैने धीरे धीरे चूत के
अंदर लंड डालना शुरू किया
और मूह मे बहू की चुचिया ले
ली. और एक ऐसा ज़ोर का
झटका लगाया कि सेठानी
ज़ोर्से चिल्लाई, मैने उसका
मूह दबा दिया, एक झटके मे
आधे से उपर लंड अंदर जाने के
कारण सेठानी से रहा नही
जा रहा था वो दर्द से
बिलख रही थी और मुझे
पीछे धकेलने की कोशिश
करने लगी थी. इधर बहू
सामने से गयी और सासू की
गांद पे थप्पड़ मारते हुए मत
"चिल्ला मत कुतिया नही
तो ये हाथ तेरी गांद मे डाल
दूँगी…." बहू तो एकदम
एक्सपर्ट मालूम होती थी
गाव जाके मैं सबसे पहले मैं
इसका इतिहास जानने
वाला था.
बहू ने सासू मा के मूह पे हाथ
रख दिया. और मैने फिरसे
पोज़िशन लेके ज़ोर का
धक्का मार दिया .
सेठानी जगह पे ही कापने
लगी उसके हाथ पैर हिलने
लगे. बहुत ही कच्ची
खिलाड़ी थी वो, ऐसा लग
रहा ये नीचे बैठ जाएगी या
गिर जाएगी, परंतु बहू ने
उसकी कमर को पकड़े रखा.
अब कि जब मेरा पूरा लंड
अंदर था मैने ज़ोर्से झटके
मारने शुरू कर दिए. और सासू
मा की हालत पतली हो
गयी.उसके मूह के उपर कपड़ा
रखने के कारण उसके मूह से
ज़यादा आवाज़ नही निकल
रही थी परंतु मूह से "एयेए…
सस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सस्स…
स्साआअ.सस्सस्स ऊऊओ…."
की आवाज़े आ रही थी. अब
मैने अपनी गति और तेज कर
दी. और ज़ोर से झटके मारने
लगा, चूत टाइट होने के
कारण मुझे सातवे आसमान
पे होने का एहसास हो रहा
था और हर 1 धक्का मुझे
स्वर्ग का एहसास दिला
रहा था. थोड़ी ही देर मे
मैने मेरा वीर्य परीक्षण
सेठानी की चूत को करा
दिया.
मैने लंड बाहर निकाला और
बहू का सर पकड़ के खिचा
और ज़बरदस्ती अपना वीर्य
से भरा हुवा लंड उसके मूह मे
डाल दिया. एक दो झटके मे
मैने आधे से उपर लंड बहू के मूह
मे घुसेड दिया…और उसकी
आँखो से आसू निकल आए.
मैने लंड बाहर निकाला तो
वो बोली "सच मे जानवर
हो तुम….इतना बड़ा लंड मेरे
मूह मे डाला …मेरा मूह फॅट
जाता…." उसकी चुचिया
पकड़ते हुए मैने उसे उठाया
और बोला "थोड़ी देर पहले
जब तेरी सासू मा की चूत मे
लंड डाल रहा था तब तुझे
कुछ दर्द का नही सूझा और
जब अपने पे आ पड़ी तो
गाली दे रही रंडी…" उसकी
चुचियो को कस्के पकड़ने के
कारण वो तड़प रही थी.
अब मैने उसका एक निपल मूह
मे लिया और उसे ज़ोर्से चूसने
लगा. थोड़ी ही देर मे मैने
उसमे से दूध चूसना शुरू कर
दिया. और सेठानी की बहू
मुझे दूर धकेलने की कोशिश
करने लगी.
परंतु मैं थोड़े ही माननेवालो
मे से था. मैने उसकी टाँगो
को अपने टाँगो के बीच
जाकड़ लिया. और ज़ोर से
उसके निपल चूसने लगा. अब
मैने दूसरा निपल मूह मे
लिया. और उसमे से दूध चूसने
लगा. बहू तड़प तो रही थी
परंतु अभी उसका प्रतिकार
कम हो गया था. और वो
थोडिसी शांत हो गयी
थी. इधर सेठानी बोली
"और चूसो …और चूसो …सब
दूध निकाल लो इस गाय
का…..रंडी साली मुझे
चुदवाते वक़्त बहुत खुश हो
रही थी अब भुगत …."
अब मुझे बहू को चोदने की
मजबूत इच्छा होने लगी. मैने
उसका निपल कामूह बाजू
किया. और पीछे से जाके
उसके गांद से चिपक गया
और सारी खीच के उसे नंगा
करने लगा. वो थोड़ा
प्रतिकार करने लगी परंतु
उसकी भी चुदाई बहुत
दिनोसे ना होने के कारण
उसके प्रतिकार मे दम नही
था. मैने सारी खिच ली
और निकर भी, अब सिर्फ़
पीला ब्लाउस बाकी था.
मैने उसकी गांद के पहाड़ के
बीच अपना लंड घुसा
दिया. और आगे पीछे करने
लगा. उसकी चुचिया भी
दबाने लगा. जो की मेरे
चूसने से एकदम सख़्त और
लाल हो गयी और सहेम गयी
थी.
मैने अभी अपना लंड उसके
पहाड़ो मे ज़ोर्से आगे पीछे
करना शुरू किया. और उसके
ब्लाउस खोल के ब्रा का
हुक खोल दिया. उसके अंग
से एक अलग ही खुशबू आ रही
थी. मैं उसकी पीठ से चिपक
गया. और 2 मिनिट तक
उसी पोज़िशन मे खड़ा
रहा. ऐसा प्रतीत हो रहा
था जैसे मैं किसी अप्सरा के
साथ प्रण कर रहा था. उसके
कांख मे हल्के हल्के काले रंग
के बाल थे मैने उसके हाथ
उपर उठाए और उन बालो
को सहलाने और चूमने लगा.
इस वजह से बहू बहुत ही गरम
हो गयी. मैने वाहा पे
चुम्मा लेना शुरू कर दिया
और अपना सर उसके कांख के
बालो मे डाल के हिलाने
लगा. वो बहुत ही उत्तेजित
होती जा रही थी. और
बोल रही थी "मुझे और ना
तड़पओ मेरी भूक शांत करो
…दया करो" इतने मे सेठानी
बोली "इस रंडी को ऐसा
चोदना की जनम जनम इसे
याद रहे कि इसकी चूत का
भी समुंदर तुमने किया था."
सेठानी ने बहू के कहे गये
वाक्य का बदला ले लिया
था.
मैने अब बहू की चूत को
नज़दीक से देखना शुरू किया
और उसपे ज़ोर से थुका.
डेलिवरी के कारण चूत के
बाल थोड़े थोड़े ही उगे थे
पूरे घने नही थे इसलिए चूत के
बालो मे उसकी गुलाबी रंग
की चिड़िया सुंदर लग रही
थी. मैने अब बहू को एक बर्त
पे बिठा दिया और सेठानी
को बहू की चुचिया चूसने के
लिए कह दिया. वो
चुचिया चूसने लगी. और इधर
बहू की तड़प और बढ़ गयी.
रात के 12 बज चुके थे परंतु
यहा समय की फ़िक्र थी
किसे. मैने नीचे बैठकर बहू
की टाँगो के बीच अपना
मूह घुसेड दिया. और बहू के
गुलाबी रंग के दाने को हल्के
से चबा दिया. वो
तिलमिला उठी. मैने अपनी
जीभ को सीधे करते हुए
सीधे चूत के होल मे डाल
दिया और मेरी जीभ होल
के अंदर जाते ही बहू तड़पने
लगी और मैने ज़ोर्से जीभ
को अंदर बाहर करना शुरू कर
दिया.
बहू ज़ोर्से चिल्लाई "मा के
लव्दे ….मेरी भूक तेरी जीभ
से नही लंड से जाएगी …तेरी
जीभ को निकाल और लंड
को अंदर डाल" मैं बोला
"हा रानी….क्यू नही ज़रूर
…. परंतु बाद मे बाहर
निकालने के लिए नही
कहना नहितो तेरी गांद
फाड़ के रख दूँगा इसी लंड से
….." अब मुझसे रहा नही जा
रहा था. मैने अपने लंड पे
थुका और सेठानी के मूह मे
देते हुए कहा "माजी आपकी
बहू की चुदाई होनेवाली
है…… इस हथियार को ज़रा
अच्छे तैय्यार कीजिए …."
और वो थोड़ी मुस्कुराइ.
अब मैने सेठानी के मूह से लंड
निकाला और बहू की
गुलाबी चूत पर रख दिया
मेरा गदाड़ रंग का लंड और
उसकी गुलाबी की रंग की
चूत. वाह क्या मिलाप
था!!!!!! सेठानी ने लंड के
सूपदे को थूक लगाई और बहू
के चूत के छोटेसे नन्हे से होल
के उपर सूपड़ा रख दिया.
और मैने हर बार की तरह पूरे
बल के साथ एक ज़ोर का
झटका मारा. और बहू चीख
उठी."आअए..ईयीई.उउईईईई
माआ…..आआऐईईईईई
उउउउईइ" उसकी मूह से
चीत्कार निकली और अब
सेठानी की बारी थी उसने
वोही कपड़ा उठाया और
बहू के मूह मे घुसेड दिया और
हस्ने लगी. अब मैने अपनी
गति को बढ़ाया. इधर बहू के
मूह से आवाज़ आ रही थी.
मुझे लगा था कि डेलिवरी
के कारण बहू की चूत बहुत
ही ढीली पड़ गयी होगी,
परंतु 4 महिने के अंतर मे
उसकी चूत फिर पहले के जैसे
टाइट बन गयी. मेरा हर
धक्का मुझे असीम आनंद दे
रहा था. और मैं बहू की चूत
का हर 1 पल अपने जहेन मे
रखने की कोशिश कर रहा
था. वाह क्या दिन निकल
पड़े थे मेरे.

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10-04-2016, 09:57 AM
Post: #4
RE: नौकरी हो तो ऐसी
2-2 चूत, एक लाल और एक
गुलाबी और वो भी इतनी
हसीन की पूछो मत, लंड
डालो उनमे तो बस 1 ही
चीज़ याद आती है….स्वर्ग
कैसा होता होगा…….मैने
अब रफ़्तार बढ़ाई और ज़ोर
के झटको के कारण बहू सहेम
सी गयी और उसका हिलना
अचानक बंद हो गया. तो
सेठानी ने उसके मूह पे बोतल
से निकाल कर पानी मारा,
वैसे वो फिरसे चिल्लाने
लगी और मेरे लंड को
निकालने की मिन्नते
करनी लगी. मैं बोला "बस
हो गया दो मिनिट बहू
रानी " कहते हुए ऐसा
झटका लगाया की बहू के
होश ठिकाने पे आ गये.
टाइट चूत की बजह से मेरा
अभी वीर्यपत होनेवाला
ही था कि इतने मे बहू भी
झड़ी .और मैने अपने वीर्य
की फुव्वारे उसकी चूत के
अंदर छोड़ दिए ….असीम
आनंद का क्षण थॉ वो मेरे
लिए …..अब मैं बर्त पे बैठ
गया और अपनी सांसो को
नियंत्रणा मे लाने की
कोशिश करने लगा …उधर
सेठानी ने बहू की चूत से
निकलने वाले वीर्य को
चाटना शुरू कर दिया.
"मेरी चूत फाड़ के रख दी
तुमने"
मैं बोला "अभी कहा…अभी
तो शुरूवात है..आगे आगे देखो
होता है क्या…"
सेठानी मेरे लंड को चट के
सॉफ कर रही थी. और
उसकी चुचिया लंड को आगे
पीछे करते वक़्त हिल रही
थी. मैने 1 चुचि को दबाना
शुरू किया. और उसके
गुलाबी काले निपल की
हल्की सी चिमती ले ली.
सेठानी बोली "बड़े शैतान
हो तुम…."
मैं बोला "हां वो तो मैं हू
ही….परंतु शैतान तो आपने
बनाया मुझे …हा कि
नही…??"
सेठानी कुछ नही बोली.
और बहू हस्ने लगी. सेठानी
के मूह मे मेरा लंड फिरसे
फूलने लगा. और थोड़ी ही
देर मे वो अपनी पूर्व स्थिति
मे आ गया. मैने अब अपना
लंड सेठानी मूह के अंदर ज़ोर
से अंदर बाहर करना शुरू कर
दिया. जैसे मेरी गति बढ़
रही थी. सेठानी के मूह से
"गुगुगु गुग्गू……उूउउ" आवाज़े
आना बढ़ गयी. इतने मे सेठ
जी बर्त पे हीले. हम सब की
सासे जगह पे ही रुक गयी.
परंतु फिरसे बुड्ढ़ा वैसेके
वैसेही सो गया. अब मैने
फिरसे मूह मे धक्के मारना
शुरू किया और लंड को अंदर
तक घुसाने लगा. और
सेठानी की आँखे लाल हो
गयी. चेहरा पूरा लाल-
लाल हुए जा रहा था.
थोड़ी देर बाद मैने अपना
लंड बाहर निकाला. अभी
मेरा 10 इंच का हठोड़ा
फिरसे गुर गुर करने लगा था.
और उसके सूपदे से पानी
निकल रहा था. बहू ने उसपे
अपनी थूक डालके उसे मूह मे
लिया और चूसने लगी.
थोड़ी देर बाद मैने सेठानी
को बर्त पे लिटा दिया और
उसकी चूत चूसने लगा. इधर
बहू मेरा लंड अपने मूह अंदर
डाले जा रही थी. अब मैने
अपनी लंबी जीभ सेठानी
के छोटेसे लाल रंग के चूत के
छोटेसे होल मे डालना शुरू
किया. मैं 1 दिन मे ही चूत
के अंदर जीभ डालने मे बहुत
ही माहिर हो गया था.
सेठानी उधर फिरसे गरम हो
रही थी. मैने अभी उसके चूत
पे थूक दिया. और वो थूक
उसकी चूत के अंदर के होल मे
घुसा दी. चूत अभी एकदम
गीली और रसीली हो गयी
थी परंतु 2 बार जबरदस्त
ठुकाई के कारण चूत बहुत ही
लाल लाल हो गयी थी. मैने
अब सेठानी के चूत के दाने पे
अपनी जीभ रख दी और उसे
चूसने लगा सेठानी ज़ोर से
तड़पने लगी और मेरा सिर
पकड़ के अपने टाँगो के बीच
मे दबाने लगी वैसे मैने और
ज़ोर्से चूसना शुरू किया अब
सेठानी बहुत ज़्यादा तड़पने
लगी और कुछ देर बाद झाड़
गयी.
उसकी चूत से निकल रहा
वो निर्मल जल मैने अपने मुँह
मे कर लिया वाह क्या
मजेदार स्वाद था उसका.
एकदम मस्त अब मैं बहुत ही
गरम और मदमस्त हो गया
था अभी मुझे चोदने की
बहुत ही इच्छा हो रही थी.
परंतु उससे पहले मुझे लगा क्यू
ना थोड़ा सा जलपान
करले, मैने बहू को अपने बाजू
मे बैठने का इशारा किया.
और उसकी एक चुचि पकड़ के
उसका निपल अपने मूह मे
डालके दुग्ध पान करने लगा.
बहू बोली "ये क्या करते हो
"
मैं बोला "प्यार"
बहू बोली "ये कैसा प्यार
…..ये तुम्हारे लिए थोड़ी
ही है"
मैं बोला "मेरी प्यारी
रानी यही मेरा प्यार है
…..और जो तुम्हारा है वो
अब सब हमारा है…." और
उसकी दूसरे चुचि पे हाथ रख
के सहलाने लगा.
स्तानो से निकल रहे दूध का
स्वाद तो एकदम ही
बढ़िया था. मैं 1 निपल चूसे
जा रहा था और दूसरी चुचि
को सहला रहा था और
नीचे सेठानी मेरे लंड
कोअपने मूह मे लेके फिरसे
अंदर बाहर कर रही थी.
तभी मेरे दिमाग़ मे एक
आइडिया आया. क्यू ना
सेठानी की गांद मार दी
जाए. मैं इस कल्पना से
बहाल हो गया पर मुझे पता
था सेठानी मुझे कभी
अपनी गांद मारने नही
देगी. तो इसलिए मैने अभी
बहू को किस करते हुए
उठाया. और उसके कानो
को किस करना शुरू किया.
और किस करते करते मैने
अपनी इच्छा सेठानी की
गांद मारने की बहू से बोल
दी. बहू ने भी मुझे किस करने
का बहाना करते हुए मेरे एक
कान को अपने मूह मे लिया
और चबाने लगी और चूसने
लगी. और हल्केसे मेरे कान मे
बोल दिया कि तुम सासू
मा को उठाके बर्त पे नीचे
मुंदी करके डाल दो आगे का
मैं संभाल लूँगी. ये सुनते ही
मेरे अंदर का जानवर जाग
गया.
मैने हल्के से सेठानी के मूह से
अपना लंड बाहर निकाला
और जैसे सेठानी पीछे की
तरफ देखने लगी मैने उसे
उठाके बर्त पे उलटा पटक
दिया और उसपे घोड़े जैसा
सवार हो गया. उधर बहू ने
सेठानी के मूह मे बड़ा सा
कपड़ा डाल दिया. और
सेठानी के कुछ समझने से
पहले ही हाथ अपने हाथो मे
दबा दिए और एक कपड़े से
हल्केसे बाँध दिए.
अब सेठानी ज़ोर्से हिलने
लगी पर हमने उसे उस तरह
बर्त पे दबाए रखा. अब बहू ने
संदूक निकाला और उसमे से
तेल की एक बोतल
निकाली और अपनी सासू
मा के गांद के होल के अंदर
उंगली डाल के तेल डालने
लगी. पहले छोटा सा
दिखने वाला सेठानी की
गांद का होल तेल के
मालिश से मेरी थूक से एकदम
आकर्षक और बढ़िया दिखने
लगा, परंतु मेरे लंड के सामने
पता नही वो टिक पाने
वाला था की नही.
मेरा लंड पहले से ही बहुत
टाइट था अब बहू ने उसपे
ठुका और उसपे भी बोतल से
निकाल के तेल डाल दिया.
तेल डालने से मेरा लंड बहुत
चमकने लगा. अब मैने अपने
लंड का सूपड़ा सेठानी की
गांद के छोटेसे होल पे रख
दिया. सेठानी अंदर डालने
से पहले ही बहुत तड़प रही
थी.. अब मैने लंड को अंदर
घुसाना शुरू किया परंतु कुछ
फ़ायदा नही हुआ, वो अंदर
घुस ही नही पा रहा था.
गांद टाइट होने के बजाह से
वो थोड़ा ही अंदर जा रहा
था और थोड़ाही अंदर जाते
हुए ही सेठानी उउउ…
अयू.एम्म…..उूउउ.आवाज़े
निकाल देती थी. मुझे नही
लग रहा था कि मेरा लंड इस
गांद मे घुस पाएगा. अब बहू
ने मेरा लंड अपने हाथ मे लेके
उसपे बहुत सारी थूक डाली
और उसे और चिकना बना
दिया और सेठानी के गांद
पे भी थूक डाल दी. और मुझे
कान मे धीरे धीरे अंदर गांद
के अंदर लंड डाल ने को
बोला और कुछ भी हो
जाए पीछे खिचने के लिए
मना कर दिया.
अब मैने अपना सूपड़ा
सेठानी की गांद मे धीरे
धीरे घुसाना शुरू किया.
गांद बहुत ही टाइट थी. अब
मैने ज़ोर लगाया और लंड
का सूपड़ा गांद के अंदर
चला गया. और सेठानी के
पाव काँपने लगे सेठानी की
आवाज़ो की तीव्रता और
बढ़ गयी परंतु अब मैं पीछे
हटनेवाला नही था अब मैने
गति ली और ज़ोर से अपना
लंड आगे पीछे करने लगा
अभी तक पूरा लंड अंदर नही
गया था और सेठानी के
हाथ पैर काप रहे थे और मेरे
लंड को उसकी गांद अंदर
जकड़े जा रही थी किसी
भी क्षण मेरा वीर्यपात हो
जाए इतनी वो टाइट थी.
अब मैने धीरे धीरे झटके मार
के पूरा लंड अंदर डाल
दिया. सेठानी के हाथ बँधे
होते हुए भी वो मुझे दर्द के
कारण पीछे धकेलने की
कोशिश कर रही थी.
मैने अब अपनी गति नॉर्मल
कर दी और लंड को आगे
पीछे करने लगा वैसे सेठानी
की आवाज़े बढ़ गयी मैं
बोला "सेठानी जी मेरी
प्यारी सेठानी जी अब तो
आपकी गांद की खैर नही"
और ज़ोर्से कस्के धक्के मारने
लगा. सेठानी की गांद मे
आग लग चुकी थी. उसका
मूह पूरा लाल हो गया
बल्कि पूरा शरीर लाल हो
गया था. पहली बार गांद
चुदाई के कारण उनसे सहा
नही जा रहा था. अब मैं
अपनी चरम सीमा तक पहुच
गया था सेठानी इस
दरम्यान तीन बार झड़ी
थी. मैने अभी गति और तेज़
कर दी. और ज़ोर्से मेरे मूह से
आवाज़ निकल पड़ी मैने
मेरा वीर्य सेठानी की
गांद मे अंदर तक घुसेड दिया
था. गांद के अंदर वीर्य के
फुव्वारे की गर्मी के कारण
अब शेतानी के चेहरे पे एक
पूर्णतया और खुशी की
झलक दिख रही थी.
अब रात का 1 बज रहा था
और हम सभी बहुत ही थक
गये थे. हमने सेठ जी को दूसरे
बर्त से उठाके पहले वाली
जगह पर सुला दिया.
बेचारा सेठ जी नींद की
गोलिया के नशे के कारण
कुछ समझने की हालत मे
नही था और पूरी निद्रा मे
सोया हुआ था. अब हम
लोग भी अलग अलग बर्त पे
सो गये.
दूसरे दिन सबेरे जब आँख
खुली, तब सूरज खिड़की से
दिखाई दे रहा था. मैं उठ के
अपने बर्त पे बैठ गया. चदडार
जमा करके अपने संदूक मे
डाल दिया. और मैं उठ के
कॅबिन के बाहर चला आया.
उधर से मुझे सेठानी आते हुई
दिखी. वाह क्क्या
चिकनी चिकनी लग रही
थी वो, परंतु ये
क्या…..सेठानी की चाल
बदल चुकी थी….सेठानी तो
बहुत हल्लू हल्लू चल रही थी.
और ऐसा लग रहा था कि
रात की ठुकाई से उन्हे अभी
भी चलने मे दर्द हो रहा था.
सच मे रात मे ज़रा ज़्यादा
ही हो गयी सेठानी के
साथ, वो जब मेरे बाजू आई
तो थोडिसी मुस्कुराइ और
मेरे गाल पे एक चुम्मा
चिपका के कॅबिन के अंदर
चली गयी. अभी भी ट्रेन
का लगभग 26 घंटो का सफ़र
बाकी था.
मैने नीचे देखा तो मेरे लंड
महाराज खड़े थे और आने
जाने वालो को सलामी दे
रहे थे अब मुझे सेठानी के
हस्ने और चुम्मा देने का
मतलब पता चला. मेरे लंड
को अभी ठुकाई के लिए
कोई चाहिए था. परंतु अभी
तो ठुकाई का चान्स ना के
बराबर दिख रहा था. तभी
एक चाइवाला मेरे बाजूसे
गुज़रा और मुझे देख के
मुस्कुराया. तो मैने उससे
बात करना शुरू कर दी. और
उससे दोस्ती बना ली.
उसका नाम राधे था. और
मैने उसे मेरे ठुकाई के लिए
कुछ इंतज़ाम करने के लिए
कहा. तो वो बोला मैं
लड़की तो लाके देता हू परंतु
उसे ठुकाई के लिए मनाना
और काम कहा करना है ये
आपको देखना पड़ेगा. मैने
उसको अपना प्लान बता
दिया और उसको आधे घंटे के
बाद लड़की को कौन से
बाथरूम मे लेके आने का है, यह
बोल दिया.

☆☆☆☆☆ Meethi Gaand ☆☆☆☆☆ Maa ka Agyakari Beta ☆☆☆☆☆
10-04-2016, 09:57 AM
Post: #5
RE: नौकरी हो तो ऐसी
मैं फटाफट कॅबिन के अंदर
गया. कपड़े लेके बाथरूम के
अंदर घुसके स्नान करके 10
मिनिट मे रेडी हो गया.
और उतने मे बहू ने चाइ का
कप लेक मेरे हाथ मे रख
दिया और मेरे से चिपक कर
बैठ गयी. सेठ जी ट्रेन के
बाहर देखने मे व्यस्त था, और
सेठानी बच्चे को अपनी
गोदी मे लेके सुला रही थी.
बहू ने इतनी देर मे अपनी
हरकते शुरू कर दी और अपना
घूँघट नीचे गिरा दिया. और
अभी बहू की उन्नत छाती
मुझे दिखने लगी. उसके
ब्लाउस के गले से उसकी
चुचिया बहुत ही आकर्षक
और पुश्ता लग रही थी. ऐसे
लग रहा था कि अभी हाथ
डालके एक चुचि बाहर
निकालु और उसमे से दूध
चूसना शुरू कर डू. परंतु सेठ जी
के सामने बैठे होने के कारण
ऐसी हरकत मैं कर नही
सकता था.
मैने बहू की पीठ पीछे हाथ
डालके उसकी सारी के अंदर
अंदर हाथ डाल दिया, और
गांद की तरफ अपना हाथ
बढ़ाने लगा, उसकी त्वचा
बहुत ही नाज़ुक थी और
मुउलायम भी. अब मैं अंदर
अंदर हाथ डाले जा रहा था
और इधर सामने से बहू की
भारी चुचियो को देख के
गरम हो रहा था. सेठानी
की नज़रो से ये बात कैसी
बचती, उसने अपना पैर मेरे
पैरो पे रख दिया और घिसने
लगी. मैं पूरा गरम हो गया
था. इतने मे मुझे चाइ वाले
का राधे का ख़याल आया.
मैं फट से इन मदमस्त रंडियो
के चंगुल से निकल के बाथरूम
की तरफ चल दिया. और जैसे
मैने प्लान किया था. राधे
ने लड़की को बाथरूम के अंदर
पहुचा दिया था. मैने राधे
के हाथ मे कुछ पैसे थमा दिए
और राधे चल पड़ा, मैने
बाथरूम के अंदर प्रवेश
किया. एक मदहोश
करनेवाला चेहरा, सावला
गोरा वदन, लगभग 5 फीट 7
इंच की उचाई, हरी भारी
गोलाकार चुचिया, बड़ी
भारी गोल घेराव वाली
गांद और सबसे मस्त उसके भरे
भरे गाल देख के मैं अपनी इस
सीता को देखते ही रह
गया. मुख से वो मासूम और
अंजान मालूम पड़ रही थी.
और जब मैने उसको ज़ोर्से
कान पे किस करना शुरू कर
दिया वैसे ही
वो बोली "बाबबूजी ज़रा
धीरे करना …मैं नयी नयी हू
इस धंधे मे "
मैने पूछा "अच्छा…..कितनो
से चुदवा चुकी हो"
वो बोली "नही अब तक
चुदाई नही हुई है मेरी …."
मैं बोला "वाह 100 रुपये मे
नया कोरा माल …वाआह
….वाह"
मैं मन ही मन मे बहुत खुस हो
गया क्यू की मैने दोस्तो से
सुना था, जब नये माल को
चोदते है तो सबसे अधिक
मज़ा आता है और पहली
बार लड़की की चूत फटने के
कारण उसकी चूत से लाल
लाल रंग खून भी निकलता
है. मैं इस विचार से बहाल
हो गया.
वो बोली "आप क्या सोच
रहे हो"
मैं बोला "मैं तुझे बहुत आराम
से चोदुन्गा …तुझे बिल्कुल
भी दर्द महसूस नही होने
दूँगा अगर तू मुझे चोदने देगी
तो मैं तुझे और 100 रुपये दे
दूँगा…."
ये बात सुनके वो थोडिसी
खुश हो गयी.
और बोली"तो ठीक है ….पर
आप हमे वचन दीजिए गा
कि आप हमे दर्द नही होने
देंगे." मैने हा मे हा भर दी.
अब मेरा लंड बहुत ही गरम
हो गया था, और मेरी पॅंट से
बाहर निकलने के लिए तरस
रहा था .मैने उसे अपने सामने
पकड़ा और अपने लंड को
उसके दो टाँगो के बीच
डाल दिया. और आगे पीछे
करने लगा, वो अब गरम होने
लगी थी, और मेरी छाती
उसके छाती से घिसने के
कारण गरम गरम और ज़ोर
ज़ोर्से सासे लेने लगी थी.
मैने अभी उसके ब्लाउस का
हुक धीरे धीरे करके खोल
दिया और ब्लाउस के खुलते
ही उसके हॅश्ट पुष्ट चुचिया
ब्लाउस से बाहर निकल के
आई और मेरी छाती से भीड़
गयी, अब मैने एक चुचि के
निपल को अपने मूह मे
लिया, और चुसते हुए अपने
लंड को उसकी टाँगो के
बीच और ज़ोर्से हिलाने
लगा, और वो मुझसे पूरी तरह
चिपक गयी.
उसकी चुचिया बहुत ही नरम
और नाज़ुक आम की तरह
थी. और मेरे कस्के चूसने से
निपल्स सख़्त होने लगे थे.
उसके गुलाबी कलर के
निपल्स के दाने चूसने से गीले
होने की वजह से बहुत ही
रसभरे लग रहे थे. अब मैने
उसकी स्कर्ट मे नीचे से हाथ
डाल के उसे उसकी मासल
जांगो तक उपर उठाया, और
पीछेसे उसकी निकर्स मे
हाथ डाल के उसकी नाज़ुक
गांद को स्पर्श करने लगा,
और वो अपना निचला होंठ
दांतो तले दबाने लगी. मेरे
लंड का अब हथोदा बन
चुका था. मैने अपनी सीता
को नीचे घुटनो पे बिठा
दिया और मूह मे लॅंड घुसा
दिया वाह क्या ठंडक पहुच
रही थी मेरे लंड को.
मैने उसके सर को पकड़ा और
उस पर हाथ रखकर आगे पीछे
करने लगा और मेरे लंड को
उसके मूह के अंदर अंदर घुसेड़ने
लगा. उसके मूह से
"गुगगुगग्गगुउुगु गु उउउउउ गु गु"
आवाज़े निकल रही थी और
मैं मुखमैथून से आनंदित हो
रहा था. अब मुझसे बर्दाश्त
नही हुआ और मैने अपना पूरा
वीर्य उसके मूह के अंदर तक
छोड़ दिया. वो इस धक्के से
अंजान थी और जब तक उसे
कुछ भी समझ आए मैने आधा
वीर्य उसके गले तक धकेल
दिया था. और उसका मन
ना होते हुए बचा आधा
वीर्य उसे पीने को
कहा.उसने मन ना होते हुए
भी वीर्य पी लिया और मेरे
गीले लंड को मूह मे अपने
जीभ से सॉफ करने लगी.
मैं अब नीचे गिर गया और
वो भी मेरे उपर गिर गयी.
उसकी चुचिया मेरे पेट से
चिपकी हुई थी. मेरे पेट मे
अजीब सी और बहुत ही
ठंडक महसूस हो रही थी.
थोड़ी देर तक हम ऐसे ही
चिपके रहे उसके बाद मे मैने
उसके चूत मे उंगली डाली
परंतु मुश्किल से एक उंगली
अंदर जा पा रही थी. उसमे
भी उसके चेहरे पर चिंता
बढ़ा दी थी. क्यू कि मैं जैसे
ही थूक लगा के उंगली अंदर
डालता उसे दर्द होने
लगता.
अब मैने उसे खड़ा कर दिया.
और मैं उसके सामने सीधे
खड़ा हो गया और मेरे लंड
महाशय को उसकी चूत के
उपर निशाना लगाके थूक से
लंड महाशय का सूपड़ा
गीला करके चूत पर लगा
दिया. उसका एक हाथ मेरे
छाती पर था. जैसे ही मैने
लंड अंदर डालना शुरू किया.
मेरे लंड का सूपड़ा उसकी
चूत की टाइट होंठो से
भिड़ाने लगा. अब मैने ज़रा
ज़ोर्से चूत के अंदर सूपड़ा
घुसाने की कोशिश की और
लंड का सूपड़ा थोड़ा अंदर
चला गया, जैसे की उसका
एक हाथ मेरे छाती पे था.
वो मुझे पीछे धकेलने लग
गयी. और उसके मूह से "उईईइ
माआआआअ…उई मा " की
आवाज़े निकलनि शुरू हो
गयी.
जैसे कि उसकी चूत बड़ी ही
टाइट और बिन चुदी थी मुझे
बहुत ही प्रयास करने पड़ रहे
थे, परंतु उसमे भी एक आनंद
था. अब मैने उसे मेरे लंड पे
थूकने को कहा और उसको
मैने अपने छाती से कस्के
पकड़ लिया पूरी ताक़त
लगा के, अब तक तो उसे
पता ही चल गया था कि
अब तो उसकी खैर नही वो
थोडिसी झिजक रह थी मैं
एक हाथ से लंड को चूत के
होल के निशाने पे लगाया,
और उसे अपनी छाती से
दबाते हुए, पूरी ताक़त से
ज़ोर का झटका मारा,
"आआआआआआआहह…..उवूऊय
गेयी….एयाया…
उउउउउ.ईईईई"
उसकी मूह से ज़ोर्से आवाज़
निकली और निकलती रही,
उसकी चूत का हाइमेन फट
गया था और खून निकलने
लगा था उसे बहुत ही दर्द
होना शुरू हो गया, वो
मुझसे छूटने की कोशिश कर
रही थी परंतु मैने कस्के
पकड़ने के कारण कुछ ना कर
पाई, नीचे उसकी चूत से खून
की लाल रंग की बूंदे टपक
रही थी और ज़ोर के धक्के
के बजह से वो एकदम डर गयी
थी और उसे दर्द असहनीय
हो रहा था.
अब मैने धीरे धीरे करके उसे
सहलाते हुए धक्को को
कंट्रोल मे लाया और आधे से
उपर लंड उसकी चूत मे घुसेड़ने
मे कामयाब रहा, और उसे
भी अब चूत गीली होने के
वजह से मज़ा आने लगा पर
बहुत ही कम, वो दर्द से
बिलख रही थी और उसकी
आँखो के कोने से थोड़ा
थोड़ा पानी आसू बन के
टपक रहा था. नवेली दुल्हन
अभी कुँवारी चूत की नही
रही थी, अभी वो
सौभाग्यवती बन गयी थी.
मैने धक्को की गति बढ़ाई
अभी उसे और मज़ा आने
लगा और वो मेरा चुदाई मे
साथ देने लगी.
मुझे अब पूरा लंड उस मासूम
कली के अंदर डालने की
इच्छा हो रही थी, इसलिए
मैने अब पोज़िशन बदली और
उसे कुत्ती की तरह खड़ा
किया और पीछेसे उसकी
पीठ से चिपक के उसे अपनी
बाहो मे भर के पूरे लंड को
पूरा अंदर बाहर निकाल के
धक्के मारने लगा, वो अभी
झड़ने वाली थी, थोड़ी ही
देर मे वो दो बार झाड़
गयी, उसके मूह पे अभी
थोड़ी खुशी और थोड़ा दर्द
महसूस हो रहा था और वो
चुदाई मे अब मेरा पूरा साथ
दे रही थी.
मैने बीच मे लंड को उसके मूह
मे दिया और उसने थूक डाल
के चूत के रस से उसे मिक्स
करके चूसने लगी, और मेरे लंड
को गीला कर दिया, मेरा
लंड एकदम आकर्षक और बहुत
ही बड़ा और मोटा दिख
रहा था, वो इतनी चुदाई
होने के बाद भी आगे चुदाई
की जाए इस बात के लिए
मन से तैयार नही थी, मैने
अभी उसे अपनी बाहो मे
उठाया और अब मेरेपे जानवर
सवार हो गया, जैसे कि
उसका सब नियंत्रण अब मेरे
हाथो मे था, मैने ज़ोर के
झटके मार मार के अपना
पूरा भरा, मोटा, लंबा लंड
उसके चूत मे घुसेड दिया और
वो दर्द से और ज़्यादा
बिखलने लगी….. 10 इंच का
मेरा हथोदा उसके सहन से
बिल्कुल ही बाहर
था….बेचारी बहुत ही
नाज़ुक कली थी…अब
उसका फूल बना दिया था
मैने …अब मेरे मूह से ज़ोर्से
आवाज़े निकलने लगी, मैने
अपना वीर्य उसकी चूत मे
अंदर तक डाल दिया और
मुझे बहुत ही आनंद महसूस
होने लगा.
थोड़ी देर के बाद मैं अपना
लंड उसकी चूत से बाहर
निकाला तो मैने उसे उसके
मूह मे थमा दिया, वो
बेचारी अपने मूह से
वीरयमिश्रित लंड को सॉफ
कर रही थी, और वीर्य चूस
भी रही थी. एक दिन मे मैने
उसे इस खेल मे माहिर बना
दिया था, उतने मे ही
बाथरूम के दरवाजे पर
क़िस्सी के हाथ की ठप
पड़ी.
मैने हल्केसे बाथरूम का
दरवाजा खोला, तो बाहर
चाइवाला राधे खड़ा था,
मैं उसे देख के थोड़ा
मुस्कुराया और
उसे बोला "वाह राधे, तूने
दिल खुश कर दिया आज तो
मेरा , अब तुझे खुश मैं करूँगा!!
"
राधे बोला " मेरे लिए, क्या
करोगे आप बाबूजी…. "
मैं बोला "कुछ नही बस रात
को दस बजे मेरे कॅबिन के
बाहर आ जाना ….ठीक
है….."
बेचारा राधे कुछ समझ नही
पा रहा था. और मैं और मेरी
गाव की गोरी मुस्कुरा
रही, थी अभी गाँव की
गोरी ने अपने पूरे कपड़े पहेन
लिए और मुझे गाल [पे दो
चार चुम्मे देके "फिर मिलेंगे
बाबूजी इसी सफ़र मे" कह के
निकलने लगी, राधे भी
उसके पीछे निकल गया.

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10-04-2016, 09:58 AM
Post: #6
RE: नौकरी हो तो ऐसी
मैं वाहा से निकल के अपने
केबिन मे आ गया. तो बहू,
सेठानी और सेठ जी खाना
खा रहे थे,
सेठ जी मुझे देख के बोले "अरे
भाई कहा निकल लिए थे
सबेरे सबेरे …ये क्या शहर है
घूमने के लिए …किस डिब्बे
मे घुस गये थे ..टिकेट कलेक्टर
पकड़ लेता तो…."
मैं मन मे बोला "अबे बुड्ढे मुझे
क्या टी. सी. पकड़ेगा
साला, अब तक तीन को
चोद चुका हू, उसे तू हमारे
साथ होते हुए भी नही पकड़
पाया, तो टी.सी. क्या
मुझे विदाउट टिकेट
पकड़ेगा…" और मन ही मन मे
मुस्कुराया.
सेठ जी को देख के बोला
"कुछ नही सेठ जी एक चाइ
वाला मिला था, उसीसे
थोड़ी गाव की बातें हो
रही थी….."
सेठ जी मुझे देख के बोले "तो
ठीक है….आओ अभी तुम्हे
भूक लगी होगी …खाना
ख़ालो "
मैं सेठानी के बाजू मे जाके
बैठ गया, वैसे ही सेठानी ने
मेरे बाजू खिसक अपनी गांद
मेरे गांद से चिपका दी और
सारी का पल्लू नीचे गिरा
दिया, बूढ़ा सेठ सेठानी
को घूर्ने लगा, परंतु सेठानी
उसे बिल्कुल ही भाव नही दे
रही थी, सेठानी ने नीचे
मेरी टाँग से टाँग मिला ली
और अपने मांसल हाथ मेरे
हाथ से खाते हुए मुझसे
घिसने लगी. मैने पीछे से
हाथ डॉल के सेठानी की
कमर की बारीक सी
चिमती ली. वैसे ही वो
थोड़ी जगह से हिल
गयी..और उठके नीचे बैठ
गयी, अब मुझसे और थोड़ी
चिपक के मेरे आँखो मे आँखे
डाल के प्यार भरी गरम
निगाह से देखने लगी.
थोड़ी देर बाद हम लोगो
का खाना हो गया और सेठ
जी बाजू मे ही जाके एक
खाली बर्त पे सो गये.
सेठ जी की आँख जैसे ही
लगी, बहू और सेठानी मेरी
बाजू मे आके मुझसे
चिपकाना शुरू हो गयी, मैने
झट से बहू का ब्लाउस
खोला, अब मुझे बहू के स्तनो
मे से दूध चूसने की बहुत इच्छा
हो रही थी, मैने ब्लाउस
खोलते ही बहू का एक
निपल अपने मूह मे ले लिया
और दूध चूसना शुरू कर दिया
आआआ….हहाा….क्या
मज़ा आ रहा था, बहुत ही
बढ़िया थोड़ी देर बाद मैने
बहू का दूसरा निपल चूसना
शुरू किया, और बहू बहुत ही
गरम होने लगी, नीचे
सेठानी ने बर्त पे बैठे बैठे ही
मेरी पॅंट की ज़िप खोल दी,
और मेरे लंड को मूह मे लेने
लगी.
इन दोनो औरतो की हरकते
बढ़ती जा रही थी, मैं सोच
रहा था कि ये दोनो मुझे
जाके काम करने भी देगी
या मुझे चोदने की मशीन
बना देगी. सेठानी के लाल
लाल होंठो के अंदर मेरे लंड
का सूपड़ा बहुत ही आकर्षक
लग रहा था, वो मेरे लंड को
अपने मूह की लार से गीला
कर देती और फिर सॉफ
करती…वाह क्या मदमस्त
होंठ थे सेठानी के, बहुत ही
नरम और मुलायम मुझे बहुत
ही मज़ा आ रहा था. इतने
मे मेरा नियंत्रण छूटा और
मैने मेरा पूरा वीर्य सेठानी
के मूह मे छोड़ दिया
सेठानी ने आधा वीर्य बहू
के मूह मे डाला और बाद मे
दोनो ने सब वीर्य पी
लिया.
अब मुझे नींद बहुत ही आ
रही थी, और मैं अपनी जगह
पे बैठे बैठे ही सो गया.
जब मेरी नींद खुली तो
शाम हो चुकी थी. ट्रेन एक
स्टेशन पे रुकी थी, और
सेठानी, बहू सेठ जी बाहर
प्लॅटफॉर्म पे खड़े थे, बैठ बैठ
के थक जाने से वो लोग
बाहर घूम रहे थे, लग रहा था
कि ये कोई बड़ा स्टेशन था,
क्यू कि बहुत भाग दौड़ हो
रही थी, बहुत सारे लोग चढ़
रहे थे, और बहुत सारे उतर रहे
थे, पाँच मिनिट के बाद वो
तीनो ट्रेन मे चढ़े और कॅबिन
मे आके बैठ गये, सेठानी मेरे
बाजू मे बैठ गयी.
अभी सेठ जी मुझे मेरी
पढ़ाई के बारे मे पूछने लगे और
जानने लगे कि इसको
कितना पता है, मतलब मेरी
नालेज को जानने की
कोशिश कर रहे थे, मैने उनके
हर प्रश्न का आसान और
सीधे शब्दो मे जवाब देते हुए
सेठ जी को खुश कर दिया.
सेठ जी मुझे बता रहे थे कि
उनके गाव मे उनकी बहुत ही
इज़्ज़त है, लोग उनके सामने
मूह उपर करके चलने की
हिम्मत भी नही करते,
मतलब सेठ जी से डरते है. ये
सेठ जी मुझे गाव की और
उसकी राग रोब धन की
कहानिया बता बता के
पका रहा था. और उधर
सेठानी और बहू उसकी तरफ
गुस्से से देख रहे थे, लगता था
कि ये कहानिया उनके लिए
रोज की हो.
थोड़ी देर बाद मे सेठानी ने
विषय बदलते हुए कहा "अरे
छोड़ो, ये तुम्हारी बातें,
इससे ये तो पूछो ये शादी
कब करेगा…..अपनी गाव मे
तो बहुत अच्छी अच्छी
लड़किया है इसके लिए "
तो सेठ बोला "हां हां
बोलो भाई बोलो शादी
कब करोगे…"
मैं सेठानी की बहू की तरफ
देखने लगा वैसे ही वो
हलकीसी मुस्कुराइ और मुझे
आन्ख मारी.
मैं बोला "अभी तो कोई
इरादा नही है …आगे देखते है
अगर कोई अच्छी लड़की
मिल गयी तो कर लूँगा एक
दो साल मे…."
ऐसी सब बातें चल रही थी,
मुझे बहुत ही पका रहा था,
ऐसे ही रात के आठ बज गये थे
अब मैं कब दस बज़ेंगे इस
चिंता से मरे जा रहा था,
थोड़ी देर मे खाना आ गया
और हम लोग खाना खाते
हुए, बातें कर रहे थे, और इधर
सेठानी और बहू मेरी टाँगो
से अपनी टांगे घिस रही
थी. मैने जल्दीही खाना
खा लिया, और फिर
सेठानी और बहू ने फिरसे सेठ
जी को नींबू पानी जिसमे
नींद की गोलिया
मिश्रित थी, पिला
दिया. सेठ जी थोड़ी ही
देर मे ढेर हो गये और बर्त पे
सो के खर्राटे मारने लगे.
अभी मौसम बनने लगा था.
सेठ जी सोते ही बहू ने
सेठानी की सारी खोलना
शुरू किया , अब सेठानी
निक्कर और ब्लाउस मे मेरे
सामने खड़ी थी, थोड़ी ही
देर मे सेठानी ने आगे होते हुए
बहू की सारी भी खोल दी,
और उसे भी अपनी तरह अध-
नंगी बना दिया….वाह
क्या नज़ारा था, दो
आप्सरा मेरे सामने ..उनके
वो पुष्ट शरीर, बड़ी बड़ी
गान्डे और भरे हुए स्थान देख
के मेरे रामजी टाइट होने
लगे और उनके सूपदे से पानी
आना शुरू हो गया.
अभी राधेको आने मे देर थी,
दस बजने को कुछ मिनिट
बाकी थे, मैं राधे की राह
देख रहा था, क्यू मुझे इन
दोनो रंडियो को उससे
चुदवाना था, और उसके
साथ साथ मिलकर मुझे भी
इन दोनो को चोदना था.
मैं बहू के पीछे गया और
अपना लंड उसकी गांद की
पहाड़ियओके बीच घुसा के
आगे पीछे करने लगा, वैसे ही
उसने गरम और तेज सासे लेना
शुरू कर दिया , मैने मेरे हाथ
उसकी चुचियो पे रख दिए,
और उसके ब्लाउस के अंदर
हाथ डालकर उसकी
चुचीयोको सहलाने लगा,
एक उंगली मैने उसके मूह मे
डाल दी और वो उसे अपनी
जीभ से चाटने लगी, मैने अब
मूह से उंगली निकाल के
उसके बाल सहलाना शुरू
किया. और थोड़ी ही देर मे
फिरसे उसकी चुचिया
दबाने लगा.
चुचियोमे दूध भरा होने के
कारण और वो ब्लाउस मे
टाइट दबी होने के कारण
उसमे से थोड़ा थोड़ा दूध
निकल रहा था और उसके
ब्रा और ब्लाउस को गीला
कर रहा था. सेठानी सामने
से आई और उसने ब्लाउस के
उपर मूह लगा के बहू का एक
निपल अपने मूह मे लिया और
चूसने लगी, मैं देख पा रहा
था कि सेठानी बहू के
ब्लाउस पहने होते हुए भी
दूध चूसने मे कामयाब हो
रही थी, बहू का ब्लाउस
अभी चुसाइ के कारण आधे
से ज़्यादा गीला हो गया
था और उसमे से उसकी
चुचिया और निपल बहुत ही
मादक और कम्सीन दिख रहे
थे.
अब मैने बहू के ब्लाउस का
हुक बिना खोले हुए ही एक
स्थान को बाहर निकाल
दिया, वो स्थान आधा
ब्लाउस मे दबे होने के कारण
बहुत ही टाइट और भरा
महसूस हो रहा था, अब मैने
उस चुचि का एक निपल
अपनी दो उंगलियो मे
दबाया और उसे चिमतिया
लेने लगा, वैसे ही बहू के मूह से
"आअहह..आअहह..हह"
आवाज़ निकलने लगी, मैने
अभी निपल को एक हाथ से
पकड़ा और दूसरे हाथ की
उंगलियो से उसपे
टीचकिया मारने लगा.
टीचकिया मारने से और
निपल को दबाने से निकलने
वाले दूध से मेरी उंगलिया
गीली हो गयी. मैने आगे से
सेठानी को बाजू करते हुए
बहू के निपल को अपने मूह मे
लिया, और उसपे हल्केसे
अपनी जीभ फिराने लगा,
मेरी हर्कतो से बहू बहुत ही
गरम हो रही थी, और उसकी
आवाज़ बढ़ रही थी, उसके
शरीर पर ए.सी. डिब्बे मे
होने के बाद भी पसीना
चढ़ रहा था, और सेठानी
मन ही मन मे तड़प रही थी
और सोच रही थी की मेरी
बारी कब आएगी पर उसे
क्या पता था मैने उसके
लिए आज ख़ास इंतज़ाम
किया है.
जैसे ही मैं निपल को अपने
मूह मे लेके चूसने लगा वैसे ही
बहू के मूह से
"आऐईइ..उउउन्हनह" की
आवाज़ आने लगी. मैने अभी
उसे थोड़ा थोड़ा दांतो से
काटना शुरू कर दिया. फिर
मैने ज़ोर्से और लंबे टाइम तक
निपल को दांतो मे पकड़ा
रहा और काटते रहा और इधर
बहू की आवाज़ उँची हो
रही थी, मैने अब अपनी
जीभ बहू के कान मे घुसा
दी. और उसे चूसने और काटने
लगा. अब मुझे बहू की चूत से
खेलने की बहुत ही इच्छा हो
रही थी, मुझे बहू की
गुलाबी चूत के अंदर कब
जीभ डालु ऐसे हो गया था,
क्यू कि उसकी चूत के पानी
का स्वाद आज भी मेरे मूह मे
ताज़ा था.

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10-04-2016, 09:58 AM
Post: #7
RE: नौकरी हो तो ऐसी
मैने कमर के तरफ हाथ बढ़ा
के बहू की निकर उतार दी.
और पैरो मे से निकाल कर
बाजू मे रख दी. बहू अपने
हाथ से चूत को सहलाने
लगी. मैने उसे अब एक बर्त पे
बिठाया और उसकी टाँगो
को फक दिया, जितना
फक सकता था, टाँगो के
बीच मे बड़ी जगह बनाने के
कारण बहू की चूत एकदम
स्पस्ट और बहुत ही
नजाकातदार दिख रही
थी, चूत के बाजू के बॉल जैसे
किसी किले का रक्षण
करनेवाले सैनिको के तरह
दिख रहे थे, और वो बाल
सैनिक बनके बहू के गांद तक
पहुच गये थे, अब सेठानी ने
बहू की टाँगो के बीच घुस
कर बहू की चूत के
दोनोहोंठो पर उंगलिया
रख के चूत को फैला दिया
…वाह क्या लग रही थी बहू
की चूत …एकदम मदमस्त
लाल गुलाबी कलर मानो
उसमे से गिरे जा रहा हो, बहू
की चूत का दाना एकदम
स्पस्ट दिख रहा था, और बहू
की तेज सासो के चलने के
कारण चूत का दाना आगे
पीछे हो रहा था, मैं अब
सेठानी को बाजू करते हुए
बहू की टाँगो के बीच बैठ
गया, और चूत के ओठो को
फैला के चूत के दाने को
उंगलियो से दबाने और
घिसने लगा, वैसे ही बहू की
आआवज़े फिरसे बढ़ गयी. मैने
अभी उंगलियोकि घिसने
की गति बढ़ाई और ज़ोर्से
उंगलिया उसके दाने पे
घिसने लगा, अभी बहू के मूह
से "उउउउह्ह…उ …
माआअ..उउउउउउ" की ज़ोर
ज़ोर की आवाज़े निकलने
लगी. और वो जल्द ही
झाड़ गयी.
अभी मुझे किसिके पैरो की
आवाज़ सुनाई दी. मुझे
यकीन था कि राधे ही
होगा, मैं कॅबिन के दरवाजे
के पास गया और खड़ा रहा,
राधे ने दरवाजा
खटखटाया, तो मैने
दरवाजा खोला और राधे
को अंदर ले लिया, अंदर जैसे
की बहू और सेठानी आधी
नंगी खड़ी थी, उनको देखके
राधे थोडसा शर्मा गया,
और मेरे पीछे आके खड़ा हो
गया.
मैं बोला "राधे …..अरे डरो
नही…..तुमने आज हमे खुश
किया है ….आज हम तुम्हे
खुश करवाते है"
राधे बोला "वो तो ठीक है
बाबूजी पर ये तो
खानदानी लगती है"
मैं बोला "हा तो
खानदानी ही है…चुदवाने मे
इनसे खानदानी औरते तुम्हे
नही मिलेगी..??"
राधे कुछ समझ नही पा रहा
था, इतने मे मैने सेठानी को
इशारा कर दिया, सेठानी
समाज़ गयी और राधे की
तरफ आने लगी, मैने राधे को
आगे खड़ा किया, सेठानी ने
राधे का एक हाथ पकड़ा
और अपने कमर पर घिसने
लगी, राधे और डर गया, मैं
बोला "अरे डरो नही …आनंद
उठाओ"
अब राधे थोड़ा मुस्कुराया
और सेठानी से घिसट बढ़ाने
लगा, इधर बहू आके मुझसे
चिपक गयी और मैं अपना
लंड उसकी गंद के पहाड़ो के
बीच घिसने लगा.
अब सेठानी ने राधे के पॅंट
की ज़िप खोल दी, और दो
सेकेंड के अंदर राधे का
काला जाड़ा साप जैसा
लंड बाहर निकाला, उसको
देखके सेठानी बोली "वाह
वाह …..इसे कहते है लवदा.."
सच मे राधे का लंड, लंड नही
बड़ा सा कला सा साप लग
रहा था, लगभग 9 इंच तक
होगा, मुझे अब एहसास हुआ
कि आज की रात बहुत ही
मजेदार होनेवाली है,
सेठानी ने राधे का लंड मूह
मे लेके उसपे थूक लगा के
चाटने लगी और उसे पीने
लगी, राधे का लंड पलभर मे
बहुत ही कठिन और वज्र के
सामान बन गया, बड़ा ही
आकर्षक दिख रहा था वो.
अब राधे उपर मूह करके नीचे
लेट गया और सेठानी को
अपने उपर बिठा लिया, और
उसने धीरे धीरे करके अपना
लंड सेठानी की चूत मे
घुसाना चाहा, अब उसने
उसपे थूक जमाई और फिरसे
घुसाने लगा, सेठानी की
चूत मेरे से चुदी होने के कारण
लंड दूसरी बार मे अंदर चला
गया, मैं और बहू प्रणय कर रहे
थे और इन दोनोकी
रासलीले भी देख रहे थे, मैने
बहू के रसीले आम अपने मूह मे
जकड़े हुए थे, और उनमे से रस
चूस रहा था, उधर अभी आधे
से उपर लंड बड़े हल्केसे राधे ने
सेठानी की चूत के अंदर
डाल दिया और अब वो
ज़ोर के धक्के मारना शुरू कर
रहा था.
राधे से नियंत्रण नही हो
पा रहा था उसने अभी लंबे
और ज़ोर्से धक्के मारना शुरू
किया, वैसे ही सेठानी उपर
कूदने लगी और चिल्लाने
लगी, उसकी चूत फटी जा
रही थी, और उसका चूत का
खड्डा दिनो दिन बड़ा
बड़ा होते जा रहा था, अब
सेठानी भी पूरे जोश मे थी,
और राधे भी, राधे ने अब
पूरी गति पकड़ ली, और कसे
हुए घोड़े की तरह सेठानी पे
सवार हो गया.
राधे नीचे और सेठानी
उपर..वाह क्या नज़ारा था.
सेठानी की चूत मे लंड जा
रहा था और गांद का
हिस्सा लाल लाल हो रहा
था. सेठानी की गांद का
खड्डा बहुत ही सुंदर और
मस्त दिख रहा था, अब मैं
राधे के पास गया और
सेठानी की गांद के खड्डे मे
थूक डाल दिया, और 1
उंगलिसे थूक को अंदर बाहर
करने लगा, होल बहुत ही
टाइट था, और नीचे राधे के
झटको से मेरी उंगली
सेठानी की गांद से निकल
आ रही थी.
अब मेरे दिमाग़ मे एक
कल्पना आई, मैं सेठानी को
चोदना चाहता था परंतु
अकेले नही, राधे के साथ
साथ! मैने अभी सेठानी को
वैसे ही पड़े रहने दिया और
बहू के कान मे कुछ बोला,
बहुने संदूक खोलके एक तेल
की शीशी निकाली और
उसमे से तेल निकाल के मेरे
लंड पे लगा दिया, और
सेठानी की गांद पे भी,
सेठानी बोली "ये क्या कर
रहे हो तुम लोग "
मैं बोला "कुछ नही रानी…
अब दो दो घोड़े तेरी
सवारी करेंगे ….बहहुत ही
मज़ा आएगा तुझे"
सेठानी बोली "नही नही…
अरे ये कैसे हो सकता है
….मेरी जान निकल जाएगी
"
मैं बोला "कुछ नही होगा
आपको…..बस पड़े रहो ….और
मुहसे ज़्यादा आवाज़ मत
निकालो…नही तो कल जब
हम गाओं मे पहुचेंगे तब पाँच
पाँच लोगो से चुदवाउन्गा
तुझे …समझी मेरी प्यारी
रंडी."
नीचे राधे उपर सेठानी,
सेठानी का मूह राधे की
तरफ किए हुए, और सेठानी
के उपर मैं, नीचेसे राधे ने
अपना लंड सेठानी की चूत
के अंदर डाला, मुझे कुछ
दिख नही रहा था, उतने मे
बहू ने मेरे लंड को पकड़ और
सेठानी की गांद के होल पे
जो तेल से लथपथ था उसपे
रख दिया. सेठानी मूड के
पीछे देखने लगी, बहुने एक
बार मेरा लंड मूह मे लिया
और उसके पे तेल लगाके गांद
के होल पे रख दिया, तेल से
सेठानी की गांद बहुत चमक
रही थी.
अब मैने सेठानी की गांद पे
एक दो चपाटिया लगाई,
और लंड को एक हाथ मे पकड़
के सेठानी की गांद के होल
पे लगाने लगा, नीचेसे राधे
सेठानी की चूत की चुदाई
कर रहा था, और सेठानी
को बहुत ही आनंद रहा था,
राधे के बड़े काले लंड से, मैने
अब अपने लंड का सूपड़ा
सेठानी के कुछ समझने से
पहेले ही गांद के अंदर घुसा
दिया और हल्केसे अंदर बाहर
करने लगा, सेठानी के गांद
पे थोड़े थोड़े बाल होने के
कारण उसकी गांद और भी
मदभरी और रसभरी दिख
रही थी. सेठानी के मूह से
"आआहह आअहह आहह "
आवाज़ आना शुरू हो गयी.
मुझे अभी गर्मी बर्दाश्त
नही हो रही थी. मैने ज़रा
धक्को की गति बढ़ाई और
आधे लंड को गांद के अंदर
घुसेड दिया वैसे ही सेठानी
कराह उठी.
लंड के धक्को से होनेवाला
दर्द उसके सर तक पहुच गया
था और एक 10 इंच के पहाड़
को और दूसरे 9 इंच के साप
को झेलना उउसके बस की
बात नही लग रही थी, उसने
अपने हाथ पाव फड़फड़ाना
शुरू कर दिया. धक्को की
गति बढ़ाते हुए मैने सेठानी
के गले को अपने हाथो से
पकड़ लिया और पीछेसे
धक्के मारते मारते उसके
गालो को चूमने लगा,
कानो को काटते हुए चुम्मा
लेने लगा, इतने मे सेठानी
झड़ने लगी, और वो ज़ोर्से
चिल्लाने लगी, उसके
चिल्लाने के बजाह से सेठ
जी अपने बेड से थोड़े हिल
गये पर बुड्ढ़ा उठा नही, मैं
अब सेठानी की गांद और
पीठ से पूरा चिपक गया और
सेठानी के शरीर के साथ
एक होकर ज़ोर्से लंड को
अंदर बाहर करने लगा, तेल
की चिकनाई के कारण लंड
अंदर तक जा रहा था और
बाहर भी निकल रहा था,
परंतु नीचेसे राधे का बड़ा
लंड होने के कारण लंड को
थोडिसी घिसन महसूस हो
रही थी.
अब राधे ने अपनी गति कम
कर दी और मैने सेठानी की
गांद को अपने हाथो मे
पकड़ के ज़ोर्से आगे पीछे
करने लगा गांद का घेराव
बहुत ही बड़ा था और
सेठानी के पहाड़ो के बीच
मे मेरा लंड अतिशेय मदमस्त
लग रहा था, मैने गांद से
हाथ निकाल कर अब
सेठानी के सर के बाल पकड़
लिए, और ज़ोर्से खिचना
शुरू करते हुए सेठानी को
बालो से आगे पीछे खिचना
शुरू किया, सेठानी के मूह से
निकलने वाली "आआहू
आआहूउ हहुउऊउ
आआहाआहुउऊुउउ
आआआआआआआआअहहुउऊुुउउ
आवाज़े तेज़ हो गयी. और
मैने और राधे ने अपनी गति
और बढ़ा दी, राधे के मूह से
भी "आअहह आअहह "
आवाज़ निकल रही थी.
अब राधे सेठानी के नीचेसे
निकल के खड़ा हो गया और
मैं सेठानी के नीचे सो गया
और उसको अपने उपर
बिठाते हुए उसकी गांद मे
अपना लंड घुसा दिया और
झटके मारने लगा, उधर राधे
ने सेठानी के मूह मे अपना
काला मोटा चौड़ा लंड
घुसेड दिया, और ज़ोर्से अंदर
बाहर करने लगा, सेठानी
की सासे फूली जा रही
थी, परंतु उसको मिलनेवाले
असीम आनंद को वो
गँवाना नही चाहती थी,
इसलिए लंड के अत्याचारो
को सही जा रही थी, अब
राधे सेठानी के उपर चढ़
गया और उसकी चूत मे लंड
घुसाके ज़ोर्से धक्के मारने
लगा, और थोड़ी ही देर मे
सेठानी के अंदर झाड़ गया,
उसकी वीर्य की गर्मी
सेठानी के चेहरे पे और
आवाज़ से साफ झटके रही
थी. अब मैं भी चरंसीमा तक
पहुच गया, और मैने भी अपने
वीर्य के सात आठ हवाई
जहाज़ सेठानी की गांद के
अंदर दाग दिए.
सेठानी की गांद और चूत
वीर्य से लथपथ थी. वीर्य
की बूंदे उनकी गांद से और
चूत से टपक रही थी. बहू ने
सेठानी की चूत से टपकने
वाले वीर्य को चाटते हुए
उसमे उंगली डाल दी, और
उंगली से वीर्य को बाहर
निकाल के उंगली को चाट
रही थी, सेठानी की
कोमल चूत औट गांद बहुत ही
लाल पड़ गयी थी. गांद का
होल तो मेरे लंड के
अत्याचार से फट गया था,
और ऐसे लग रहा था जैसे मेरे
लंड को फिरसे पुकार रहा
था.

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10-04-2016, 09:59 AM
Post: #8
RE: नौकरी हो तो ऐसी
थोदीही देर मे राधे वाहा
से मुझे धन्यवाद देते हुए
निकला और अब डिब्बे मे मे,
सेठानी और बहू ऐसे तीन
लोग ही जाग रहे थे, जोकि
चुदाई के कारण बहुत ही थक
गये थे.
मैने सेठानी के गाल का
चुम्मा लेते हुए पूछा "सेठानी
जी, कल हम कितने बजे
पहुचेंगे आपके गाव?"
सेठानी हसके बोली "करीब
9:30 बजे तक तो पहुच
जाएँगे "
उतने मे बहू ने मेरी टाँग पे
अपनी मांसल टांग घिसते
हुए और मेरे पेट से चिपकते हुए
कहा "अब हमारी चुदाई का
क्या होगा…..गाव मे हम
तो ये ना कर सकेंगे …
किसिको पता लग गया
तो लेने के देने पड़ जाएँगे "
सेठानी बोली "हां…अभी
आदत पड़ गयी है तुमसे
चुदवाने की …तुमसे बिना
चुदवाये तो मैं रह ना
पाउन्गा "
बहू बोली "ठीक है ….गाव मे
जाके चुदाई का इंतज़ाम
करने की ज़िम्मेदारी
मेरी….मैं देखती हू कौन मा
का लाल पकड़ पाता है हमे"
बहू की उंगली अभी भी
सेठानी की गांद मे ही
गढ़ी हुई थी, और बहू उसे
छोटे बच्चो की तरह लाल
पड़ी गांद मे डाल के अंदर
बाहर कर रही थी. कुछ घंटो
मे ही बहू और सेठानी मे
क्या दोस्ती बन गयी थी
…वाह….मानो…जैसे दोनो
रंडीखाने मे सादियो से
रहती हो.
मेरा लंड इन दोनो की
हर्कतो से फिरसे खड़ा हो
गया और बहू ने उसे अपने मूह
मे ले लिया, और अंदर बाहर
करने लगी, उसके मुहसे निकल
रही लार नीचे चटाई पे गिर
रही थी, हम लोग नीचे
चटाई पे बैठे होने के कारण
नीचेसे बहुत ही ठंड लग रही
थी, पर उपर से उतनी ही
गर्मी हो रही थी, बहू ने अब
मेरा लंड सेठानी के मूह मे
ऐसे दे दिया जैसे कोई
सिगार दी हो, क्या
व्यवसायिक रंडिया लग
रही थी दोनो के दोनो…
मानो जैसे बरसो से इनका
चुदवाने का धंधा रहा हो.
बीच मे लंड बहू ने फिरसे अपने
मूह मे ले लिया और
सेठानी बोली "हां….पर
गाव मे जाके कोई और मिल
गयी तो हम दोनो को भूल
मत जाना ….नहितो हम
दोनो तुम्हे …"
मैं बोला "तुम दोनो
क्या……………."
सेठानी और बहू कुछ नही
बोली बस थोडिसी
मुस्कुराइ.
मुझे मन ही मन मे बहू की
गांद मारने की बहुत ही
इच्छा हो रही थी, परंतु बहू
ऐसा नही करने देगी ये मुझे
पता था, क्यू कि जब मैने
उसे सेठानी की गांद मारने
की बात कान मे बताई थी,
तब वो बोली थी "मेरे साथ
ऐसा करने की कोशिश
कभी मत करना नहितो
तुम्हारा ये हथौड़ा जड़ से
उखाड़ दूँगी, मुझे मेरी गांद
तुम्हारे इस हथौड़े से नही
फाड़नी है …मेरी प्रिय
सासुमा की तरह..जो
आजकल ऐसे चल रही है जैसे
गांद मे कुछ फसा हो…."
उसी वक़्त मैने मन ही मन मे
सोच लिया था कि गाव
जाके एक दिन इसकी ऐसी
गांद मारूँगा ना कि चलने
क्या उठने के काबिल भी
नही रहेगी, और जिस दिन से
ये ख़याल मेरे जहाँ मे उत्पन्न
हुवा था उसी दिन मे मैं बहू
की गांद मरनेवाले दिन का
बेसबरी से इंतेज़्ज़ार किए
जा रहा था.
अब बहू और सेठानी ने मेरे लंड
को चूस चूस के पूरा गरम कर
दिया, इतना कि थोड़ी
ही देर मे मैं बहू के मूह मे झाड़
गया, और मेरा वीर्य पीते
हुए बहुने थोड़ासा वीर्य
अपने प्रिय सासू के मूह मे
डाल दिया, उन्होने ने भी
किसी प्रषाद की तरह
ग्रहण करते हुए पी लिया उन
दोनो के होंठो पे मेरे वीर्य
की धाराए मानो अमृत
मालूम हो रही थी.
अभी सेठानी उठ खड़ी हुई
और साड़ी पहनने लगी और
बोली "अभी सो जाओ …
कल सबेरे जल्द ही स्टेशन आ
जाएगा तो हमे बहुत सारा
समान बाहर निकालना
होगा"
बहुने मेरे लंड को सहलाते हुए
पूछा "हमारे वो आ रहे है हमे
लेने?? "
सेठानी बोली "पता नही
वो आएगा की नही….परंतु
मनोहर और उसकी बीबी
छाया आनेवाले है सामान
लेने स्टेशन पे "
छाया नाम सुनते ही मेरा
लंड खुश हो गया, और मैने मन
ही मन मे प्लान भी बना
लिया कि गाव मे जाके
सबसे पहले छाया को
चोदुन्गा. थोड़ी ही देर मे
हम तीनो लोग अपने अपने
बर्त पे लूड़क गये. और कब
नींद लगी पता ही नही
चला.
.
..
….
……
जब सबेरे बूढ़ा सेठ जी मुझे
बिर्तपे हिलने लगा तब
जाके मेरी नींद खुली और
मैने अपनी घड़ी मे टाइम
देखा तो 8:30 बज रहे थे, अब
थोड़ी ही देर मे हम लोग सेठ
जी के प्रिय गाव, जहा पे
उनकी बहुत इज़्ज़त वाहा
पहुचने वाले थे.
9:40 के करीब ट्रेन स्टेशन पे
पहुचि. और हम लोग सामान
लेके भीड़ से निकलते हुए ट्रेन
से उतरने लगे, उतने मे मनोहर
"सेठ जी सेठ जी …….."
चिल्लाता हुआ आया, और
उसने सेठ जी के हाथ से
समान लेते हुए अपने काँधे पे
डाल लिया, उसके साथ
उसकी बीवी छाया भी
आई हुई थी, वो भी भागते
भागते आगे आई, छाया ने
सेठानी के हाथ की संदूक ले
ली और अपने सर पर रख ली.
मैं अपनी नयी शिकार को
देख के हैरान रह गया और मन
मे बोला, "वाह….वाह
……..दिल खुश हो गया."
छाया रहती गाव मे थी
परंतु दिखने मे एकदम गोरी,
सादे पाच फीट कद, भरा
हुवा गोलाकार शरीर,
20-21 साल की उमर, उसके
तने हुए ब्लाउस से बाहर
निकलने की चाह
रखनेवाली उसकी चुचिया,
उसके वो भरी हुई मदमस्त
गांद, उसकी वो चाल, चलते
समय उसकी गोल गोल गांद
इस तरह हिल रही थी, कि
देखनेवाले दंग रह जाए.
उसने अपने सर पे संदूक रखा
हुवा था, और वो चले जा
रही थी, मनोहर के पीछे
पीछे. मनोहर कद मे उससे कम
लग रहा था, थोड़ा सा
मोटू और छोटू और बड़ा ही
अच्छा इंसान मालूम पड़
रहा था, अपने चेहरे से, और
उसकी बीवी, छाया
मदमस्त अपने स्थानो को
गांद को हिलाते हुए चले
जा रही थी.
थोड़ी ही देर मे हम स्टेशन से
बाहर निकल आए, बाहर सेठ
जी और सेठानी के लिए एक
तांगा, और दूसरा तांगा बहू
और मेरे लिए खड़ा था,
मनोहर सेठ जी के साथ टांगे
मे बैठ गया और मेरे और बहू के
साथ छाया बैठ गयी, मैं तो
तांगे वाले के साथ आगे मूह
करके बैठा था, और मेरे पीठ
पीछे छाया बैठी थी, अब
मैने थोड़ा सा वातावरण
का अंदाज लेना चाहा.
मैं पीछे खिसक गया, और
छाया की पीठ से पीठ
लगा दी, वैसे ही वो आगे
सरक गयी, और चुपचाप बैठ
गयी, मैं फिरसे उसकी तरफ
खिसका, इस बार वो आगे
सरक नही पाई, क्यू की वो
आगे सरक्ति तो तांगे से गिर
जाती, पसीने से उसके
सारी का पल्लू गीला था,
वो मुझे महसूस होने लगा, मैं
और थोड़ा पीछे खिसक
गया और उसके पीठ से
अपनी पीठ पूरी तरह
चिपकाकर उसकी पीठ पर
रेल दिया.
जैसे ही तांगा हिलता, हम
दोनो एक दूसरे के और करीब
आ जाते और ज़्यादा चिपक
जाते, जैसे की मेरा बाया
हाथ बहू के बाजू मे था, मैने
अपना दाया हाथ पीछे
किया, और उसे पीछे करते
हुए हल्केसे छाया की चुचि
के साइड पर मलने लगा, जैसे
ही मैने छाया की चुचि के
साइड पर हाथ रखा, मैं
महसूस कर पा रहा था, कि
उसकी सासे तेज़ हो रही है.
अब मैने हल्केसे बहू की तरफ
देखा तो उसकी आँख लग
चुकी थी, और तांगा
सुरक्षित होने के कारण
उससे गिरने का कोई ख़तरा
भी नही था, मेरा हौसला
बहू के सोने के कारण और बढ़
गया, और मैने अब अपना
हाथ छाया की चुचि के
साइड से निकाल के उसकी
पूरी गोलाकार, भारी हुई
चुचि पर रख दिया, और उसे
मसलने लगा, थोड़ी ही देर मे
मुझे उसका निपल हाथ मे
लगा, मैने उसे दबाना शुरू
किया, वैसे ही छाया की
सासे और बढ़ने लगी,
छाया मेरे कान मे बोली "ये
क्या कर रहे हो बाबूजी…."
मैं कुछ नही बोला.
उसने एक हाथ से मेरे हाथ
को उसके स्तनो से
निकालने की कोशिश की,
परंतु ये मैं भी समझ गया था
कि, उस कोशिश मे दम नही
था, और वो महज ही
कोशिश कर रही थी, मैने
अब अपना हाथ और पीछे
करते हुए उसके ब्लाउस मे
हाथ डाल दिया, जैसे ही
मैने उसके ब्लाउस मे हाथ
डाला "वाह क्या बड़ी
बड़ी नरम नरम चुचिया थी
उसकी…..क्या बोलू …स्वर्ग
समेत आनंद महसूस होने
लगा."
पूरे सफ़र मे मैं उसकी कोमल
चुचियो को मसल रहा था,
और निपल्स को
चिमकारिया ले रहा था,
छाया की हालत बहुत
पतली हो गयी थी, वो
ज़ोर ज़ोर से सासे ले रही
थी, लग रहा था कि उसे इस
तरह अभी तक किसीने गरम
ना किया हो, मेरा लंड तो
ऐसे खड़ा हो गया था
मानो जैसे पॅंट को चीर के
बाहर आ जाए.
अब गाव दिखने लगा था,
मैने छाया के ब्लाउस से
अपना हाथ निकाल
लिया, और आगे की तरफ
ध्यान से देखने लगा,
इतने मे तान्गेवाला बोला
"अब हम पाच मिनिट मे घर
पहुच जाएँगे बाबू…..वो जो
हवेली दिख रही है पीले रंग
की …. वो है सेठ जी की
हवेली"
तांगा हवेली के सामने
जाके रुका, और मैं नीचे कूद
गया, अंदरसे दो चार लोग
बाहर आ गये, और समान
उठाके अंदर ले जाने लगे.
हवेली पुरखो की और बहुत
पुरानी मालूम होती थी,
परंतु उसकी देखभाल बहुत
अच्छे की गयी होगी
क्यूकी आज भी वो हवेली
एकदम शान से खड़ी थी, और
उसपे वो अलग अलग तरह का
नाकषिकम उसे और भी
शोभा दे रहा था.
सेठ जी ने मुझे अंदर बुलाया
और एक नौकर को मुझे मेरा
कमरा दिखाने के लिए
बोला, मैं अंदर गया, तो वो
नौकर आके मुझे मेरे कमरे की
तरफ, समान उठाके लेके
निकल पड़ा, हवेली 3 माले
की थी. नीचे के माले पे सेठ
जी रहते होंगे ऐसे मैने सोचा,
पता नही था, परंतु अभी आ
गया हू तो पता चला ही
जाएगा. वो नौकर मुझे दूसरे
माले पे लेके गया और एक
कमरा खोल के मेरा समान
रखते हुए मेरे हाथ मे चाबी
देते हुए निकल गया. मैं कमरे
के अंदर आया कमरे के अंदर
एक अच्छा सा बिस्तर, एक
बड़ा सा मेज, एक छोटा
परंतु आरामदायक 2
आदमियोको बैठने के लिए
सोफा, और बहुत सारा
समान अच्छी तरह रखा हुआ
था. बाजू मे ही जोड़के
छोटसा बाथरूम था, मैं तो
शहर मे भी इतना खुशहाली
से नही रहा था, ऐसे लग रहा
था अब गाव मे ही मेरा आगे
का जीवन व्यतीत
होनेवाला हो.

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10-04-2016, 09:59 AM
Post: #9
RE: नौकरी हो तो ऐसी
मैने बाथरूम के अंदर जाके मूह
हाथ धो लिया, और आके
अपने बिस्तर पर लेट गया,
लगभग शाम हो रही थी तब
दरवाजे पे किसीकि हाथ
की आवाज़ सुनाई दी, मैने
जाके दरवाजा खोला, तो
बाहर सेठानी खड़ी थी.
मैं बोला "इतने देर बाद याद
आई हमारी"
सेठानी बोली "नही ऐसी
बात नही है….पर अब हालत
ट्रेन जैसे थोड़ी ही है…तुम
जल्दिसे तैयार होके नीचे आ
जाओ ….नाश्ता और चाइ
तैयार है ……नाश्ता होनेके
बाद 6 बजे माता रानी
की पूजा है ….आज बहुरानी
घर आई है ना इसलिए…..तो
तुम जल्दिसे नीचे आ
जाओ…सेठ जी तुम्हारा
इंतेज़ार कर रहे है"
मैं बोला "ये तो ठीक है
सेठानी जी…परंतु हमारी
रात की पेट पूजा का क्या
बंदोबस्त है"
सेठानी बोली "वो तो
हमारी प्यारी बहुरानी पे
निर्भर है….देखते है कैसे
रास्ता निकल आता है
आपकी और हमारी पेट पूजा
का.."
ये कह के सेठानी चल दी, मैं
तैयार होके नीचे के माले पे
आ गया, उतने मे मुझे छाया
ने आवाज़ दी और मुझे नाश्ते
के लिए अंदर बुलाया. मैं
अंदर चला गया और एक टेबल
पे बैठ गया, छाया आई और
मुझे नाश्ता देने लगी, मैने
हल्केसे उसके पिछवाड़े की
तरफ हाथ डालते हुए उसके
गांद को एक छोटिसी
चिमती ली, तो वो उछल
पड़ी और हस्ने लगी और
बोली "लगता है आप अपनी
हर्कतो से बाज नही
आनेवाले बाबूजी…." और
मुझे आँख मार दी. थोड़ी
ही देर मे मैने नाश्ता ख़तम
किया तो एक नौकर आके
मुझे बोला "बाबूजी बगल के
कमरे मे पूजा शुरू होनेवाली
है …आप जल्दिसे वाहा
आईएगा …गाव के बहुत सब
लोग आए है"
जब मैं उस बगल के कमरे मे
पहुचा तो दंग रह गया,
लगभग सत्तर अस्सी लोग
पूजा के लिए खड़े हुए थे, अब
पूजा शुरू हो रही थी, मैं
सारे लोगो के पीछे जाके
खड़ा हो गया, और आरती
शुरू हो गयी, अब गाव से और
दस बारह लोग आ गये, और
मेरे पीछे खड़े हो गये.
इस सब हड़बड़ाहट मे मैं कब
महिलाओ की साइड के
पीछे आ गया मुझे पता ही
नही चला. मैं अब बहुत सारी
औरतो के पीछे खड़ा था,
और कितना भी टालू, उनसे
स्पर्स तो हो ही रहा था,
मेरे सामने एक लाल रंग की
सारी मे एक महिला खड़ी
थी. एकदम स्लिम थी, परंतु
जैसे के मैं पीछेसे देख पा रहा
था, उसके चुचिया एकदम
भरी हुई थी, और लटक रही
थी, अब और ज़्यादा लोग
आ गये और इस वजह से हम
लोग एक दूसरे के और
नज़दीक आ गये, जैसे ही मेरा
स्पर्श होने लगा उसकी
सासे तेज़ होने लगती थी,
वो लाल कॉलर की सारी
मे और ब्लाउस मे एकदम
उत्तेजक दिख रही थी, उसके
गांद के घेराव सारी के बीच
पूरे छिपे हुए थे.
थोड़ी ही देर मे हमारे
रामजी लाल सारी वाली
महिला के पिछवाड़े से
टकराने लगे और हमारी
जान निकलने लगी, सोच रहे
थे कि कही कोई देख लेगा
तो जिंदगी की पूरी वाट
लगा देगा, पर वासना तो
दोनोकी जागृत हो चुकी
थी, मैं थोड़ा पीछे हो
गया, परंतु अब उसकी बारी
थी वो महिला भी पीछे
हो गयी और मेरे लंड
महाराज फिरसे उनके गंद के
घेराव से चिपक गये.
अब मुझसे थोड़े ही रहा
जाने वाला था, मैं अब आगे
हो गया और उस महिला के
पूरी गांद से चिपक गया और
लंड को उसके पिछवाड़े पे
घिसने लगा, वाह क्या
महॉल था, और हम लोग
क्या कर रहे थे, मैं पीछेसे
उसकी गांद को घिसते हुए
उसकी चुचिया देख रहा
था, उसने अपनी सारी
चुचियो से थोड़ी बाजू कर
दी, सो मैं देख सकु, अब मुझे
उसकी आधी नग्न चुचिया
दिखाने लगी, वाह क्या
नज़ारा था. बहुत ही गोरी
गोरी थी उसकी चुचिया
अब पिछवाड़े पे लंड घिसते
घिसते मेरा लंड इतना तन
गया कि, कोई बाजू वाला
देखता तो तुरंत पकड़ लेता
कि ये क्या कर रहा है! मैने
उसकी सारी के बीच बनी
पहाड़ो की दरार मे अपना
लंड घुसा दिया, और संभोग
की कल्पना करते हुए आगे
पीछे हिलने लगा, वो
महिला अब काफी गरम हो
गयी थी, और एक हाथ को
पीछे निकाल के मेरी पॅंट के
अंदर हाथ डालने की
कोशिश किए जा रही थी,
परंतु इतने सारे लोगो के
बीच वो बात मुमकिन नही
हो पा रही थी.
मेरे मंन मे उस महिला के
साथ संभोग करने की इच्छा
ने अब बहुत उछाल ले लिया
था, और मुझे सिर्फ़ उस
महिला के साथ कर रहे
संभोग का चित्र नज़र आ
रहा था, उसकी गरम गरम
और नर्मा नरम चुचिया मुझे
चूसने के लिए निमंत्रण दे
रही थी.
अभी पूजा लगभग ख़तम होने
को थी, और लोग बाहर
जाने की हड़बड़ाहट मे दिख
रहे थे, बहुने दुरसे मुझे देखा और
मुझे देखकर आँख मारी, मैं
असल मे क्या कर रहा था
उसे क्या पता होगा भला?
मेरी अंडरवेर अंदर वीर्य से
पहले निकलनेवाले पानी से
लंड से चिपकेने लगी थी, और
मुझे कैसे भी करके अभी
किसी को चोदना था.
थोड़ी ही देर मे पूजा ख़तम
हुई और सब लोग बाहर
निकलने लगे मैं भी बाहर
आके खड़ा हो गया, मैं जिस
महिला से चिपक रहा था
और जिस से संभोग करने की
इच्छा कर रहा था वो मेरे
सामने से गुजर रही थी, वो
अपने पति के साथ आई थी,
उसने अपने पति से कुछ कहा
और उसका पति बाहर जाके
खड़ा हो गया, अभी लगभग
सभी लोग चले गये थे, बरामदे
मे बस 3-4 पुरुष और 5-6
महिलाए खड़ी थी, जो कि
निकलने की तैय्यारि मे थी,
रात के लगभग 8 बज रहे थे.
मैं एक पलंग पे जाके बैठ गया,
और वो महिला दरवाजे पे
खड़ी थी, थोड़ी देर बाद
मुझे वो कुछ तो इशारा देने
लगी, परंतु मेरे कुछ समझ मे
नही आ रहा था, लंबे समय के
इशारो के बाद मुझे पता
चला कि ये मुझे अपने पीछे
आने के लिए कह रही है, मैं
तुरंत खड़ा हुवा और सबकी
नज़रे चुराते हुए बंगले पीछे
आके उसके पीछे चलने लगा,
सेठ जी के बंगले के पीछे बहुत
बड़ा बगीचा है. यह मैने सबेरे
सुना था, अभी अपनी
आँखोसे देख रहा था, चारो
और अंधेरा ही अंधेरा था,
बड़े बड़े वृक्ष थे, फुलो की
महेक हवा को सुगंधित कर
रही थी, परंतु बंगले मे की
गयी थोड़ी बहुत रोशनाई
के कारण मैं उस लाल सारी
वाली महिला को देख पा
रहा था.
मैं उसके पीछे 3-4 मिनट तक
चला और फिर वो रुक गयी,
और एक छोटिसी दीवार के
पीछे चली गयी, मैं भी उसके
पीछे गया, जैसे ही मैं उस
दीवार के पीछे पहुचा उसने
मुझे हाथ देते हुए अपनी ओर
खिचा, और हसणे लग गयी,
और मुझसे चिपक गयी, 3-4
मिनट. चलने के कारण
उसकी सासे थोड़ी तेज़ चल
रही थी. उस दीवार के
सामने एक छोटा सा
रास्ता था, जिससे हम आए
थे, दीवार के पीछे थोड़ा
सा उजाला नज़र आ रहा
था, क्यू कि उसके बगल मे
ही एक बिजली का खंबा
था और उसपे एक मिन्मिनि
सी लाइट जल रही थी,
नीचे हरी घास पाँव को छू
जा रही थी, बहुत ही
सुहाना मौसम था, अंग- अंग
मे रोमांच उठ रहा था, हरी
घास पे पड़ी पानी की
छोटी छोटी निर्मल बूंदे
पाव को छूकर गुदगुदी कर
रही थी, आकाश मे चाँद
नज़र आ रहा था, जैसे वो
हमारी प्रणयक्रीड़ा देखने
आया हो.
सामने लाल सारी वाली
महिला जिसके बारे मे सोच
सोच के मैं रोमांचित हो
गया था, खड़ी थी, मेरी
बाहो मे आने के लिए तरस
रही थी. उसने मेरी पॅंट का
ज़िप खोलते हुए मेरे लंड को
बाहर निकाला, और क्षण
की भी देरी ना करते हुए उसे
मूह मे लेके चूसने लगी, और
उसपे अपनी थूक जड़ने लगी,
ठंडी हवाए शरीर को छू जा
रही थी, अंग पे रोमांच उठ
रहा था, अब इस मदमस्त
हसीना के कारण शरीर तप्त
और गर्म होने लगा था, मेरा
हथौड़ा फिरसे अपने पूर्व
स्वरूप मे आ गया था और उस
महिला के मूह मे डुबकिया
लगते हुए रस्क्रीड़ा का
आनंद ले रहा था.

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10-04-2016, 09:59 AM
Post: #10
RE: नौकरी हो तो ऐसी
मैं बहुत ही गरम
हो गया था अब मुझे सिर्फ़
उसकी चूत दिखाई दे
रही थी,
मैने उसे खड़ा किया और दूसरे हाथ
से उसकी
सारी
खिचनी शुरू
की वो
बोली "सारी
मत निकालो, कोई आएगा तो हम
क्या बताएँगे जी " मैं
बोला "यहा कोई नही
आनेवाला …" और उसके ब्लाउस
के बटन खोल दिए, अब
उसकी वो सुंदर,
मदमस्त और गोल गोल चुचिया मेरे
सामने थी जिन्हे
देखने के लिए मैं पागल हुआ जा
रहा था, मैने उसके दाए निपल को
मूह मे लिया और उसपे थोडा ठूकते
हुए चूसने लगा उसके मूह से
आहह आआआआआहह
की आवाज़े निकालने
लगी, जल्द
ही मैने
उसकी
पॅंटी खोल
दी, और
उसकी मदमस्त चिड़िया
मेरे सामने आ गयी.
मैने उसकी
सीता का दर्शन लिया
और अपनी
उंगली उसमे घुसा
दी, उंगली
पल भर मे ही बहुत
गीली हो
गयी, मैने
उंगली निकाल के फिरसे
उसके मूह मे डाल दी,
क्या अजीब और
अविस्मरणीय नज़ारा था,
मैने दो तीन उंगलिया
उसकी चूत मे डाल
दी और उंगलिया निकाल
के उसके मूह मे डालने लगा,
उसकी चूत
की महेक से वातावरण
मोहित हो गया था, और मुझे उसे
चोदने की बहुत
ही तीव्र
इच्छा हो रही
थी.
मैने उसे घोड़ी
की तरह खड़ा किया,
और निशाना लगाते हुए अपना लंड
उसकी चूत के होल पे
रखा, ज़्यादा प्रकाश ना होने के
कारण कुछ ठीक से
दिखाई नही दे रहा था,
मैने लंड पे थोड़ी थूक
डाल दी, और लंड को
चूत के होल से आगे बढ़ा दिया,
और ज़ोर का झटका देते हुए चूत
के अंदर प्रवेश करवा दिया, आग
जैसे मानो शरीर पे
गिरती हो, और कोई
चिल्लाता है उस तरह वो महिला
मेरा लंड अंदर जाते
ही चिल्लाई, मैने उसे
अपने पुश्ता बाहो मे अच्छे से
जाकड़ रखा था इसलिए वो हिल
नही
पायी, परंतु उसके मूह
से निकली आवाज़ से मैं
डर सा गया था.
मैने उसकी
नीचे गिरी
हुई पॅंटी को उठाया
और उसके मूह मे घुसेड दिया,
और अपने लंड को फिरसे निशाने पे
लगाते हुए, ज़ोर्से झटके मारना शुरू
किया शुरुआत के 5 मिनट मे
ही वो महिला 2 बार
झाड़ चुकी
थी.
मैं अब नीचे बैठ गया,
और उसे मेरे तरफ मूह करते
हुए अपने लंड के उपर बैठने
की आग्या
दी, वो लंड के उपर
जैसे ही बैठने
लगी, लंड अंदर अंदर
जाने लगा, वैसे ही वो
चिल्लाने लगी, मैने
उसके हाथ पकड़ लिए और उसे
पूरी तरह अपने लंड
पे बिठा दिया, पूरा 10 इंच का लंड
अंदर जाने की बजह
से उसके पेट अक्स रहा था जो कि
मैं देख पा रहा था और उसे सहना
उस महिला के लिए बहुत कठिन
हो रहा था, अभी मैं
नीचेसे जोर्के धक्के
देना शुरू हो गया, और उसे
पूरी तरह घायल कर
दिया, वो फिरसे झड़ी,
मैने उसे तुरंत नीचे
घास पे गिराया और उसपे सवार होते
हुए कुछ ऐसे ज़ोर्से धक्के मारने
लगा कि उसको नानी याद
आ गयी, अब मुझसे
रहा नही गया, और
तेज़ धक्को के बजह से उसके
अंदर मेरा वीर्यपात हो
गया, मैं उसके शरीर से
पूरी तरह चिपक गया,
अभी मेरा लंड उसके
चूत मे फुव्वारे मारे ही
जा रहा था, थोड़ी देर मे
वो थोड़ा शांत हो गया, मैने उसे
बाहर ना निकलते हुए उस महिला
की चूत के अंदर रखते
हुए, उसे पूरी तरह
अपने बाहो मे जाकड़ के उससे
चिपक गया, वो भी मेरे
सर के चुम्मे लेने
लगी.
दरवाजे पे कोई ठोक रहा था
"बाबूजी …..अरे वो
बाबूजी
नींद से
जागीए
नीचे सेठ
जी आपको बुला रहे
है" ये शब्द कान पे पड़ते
ही मैं जाग उठा और
मुझे याद आया, वो नाश्ता, वो
आरती,पूजा, वो लाल
सारी वाली
महिला…..ओह भगवान तो यह
सब महेज एक सपना था.
मैं अपने कमरे से उठा, बाथरूम मे
जाके फ्रेश हो गया और
नीचे सेठ
जी से मिलने के लिए
चला गया, मुझे देख के सेठ
जी ने नाश्ता लाने को
बोला और
मुझे पूछा “हो गयी
नींद..”
मैने हां कहा और उनके साथ बैठ
गया.
उधर से चाय नाश्ता लेके आ
गयी, लग
ही नही
रहा थी कि वो इस घर
की
नौकरानी है,
उसकी चाल वो
मदमस्त साड़ी मे
लपेटा हुआ उसका बदन..बहू के
बदन को टक्कर दे रहा था…
उसकी माँग के सिंदूर
का रंग देख के प्रतीत
हो रहा था कि इसकी
चूत का रंग भी ऐसे
ही होगा, मेरे दिल मे
बस अभी छाया का
बदन बस गया था…
मैने नाश्ता किया और सेठ
जी बोले कि आओ मैं
तुम्हे अपने बेटो से मिलावाता हू
फिर सेठ जी उधर से
उठ कर चलाने लगे मैने
भी उनके साथ चलने
लगा… मैं एक बड़े से कमरे मे आ
गया उनके साथ साथ उधर 4 लोग
बैठे थे …. सबकी
उम्र करीब 35 से 45
तक लग रही
थी.
फिर सेठ जी मेरा परिचय
कराते हुए बोले कि ये मेरे साथ
शहर से आया है अपने
दीवान जी
की जगह जो कि अब
नही रहे
उनकी जगह ये आज
से काम करेगा, सबने मुँह हिलाते
हुए हाँ भर दी. फिर
सेठ जी ने मुझे सब
बेटो का परिचय देते हुए बोला ये मेरा
बड़ा बेटा(राव साब), ये उससे छोटा
(वकील बाबू), वो
तीसरा ये(कॉंट्रॅक्टर
बाबू) और वो जो कौने मे बैठा है वो
सबसे छोटा(मास्टर जी)
… हमारे साथ जो
बहूरानी आई
थी ट्रेन मे वो मेरे छोटे
बेटे की
की
बीवी है.
मैने सबको नमस्कार किया और सेठ
जी के सबसे बड़े बेटे
ने जिसे सब लोग राव साब कहते
थे, मुझे अपने पास आके बैठने को
बोला
और पूछा “कहाँ तक पढ़ाई
की है तुमने ”
मैने कहा “ग्रॅजुयेट हूँ”
राव साब बोले “अरे वाह
अच्छी बात है
नही तो हमारे
दीवान जी
ये सब नयी पद्धति का
अकाउंट समझ नही
पाते थे..अच्छा है अच्छा है”
फिर हम लोगो ने उधर
ही बैठ के
थोड़ी देर बातें
की.. अब 8 बज चुके
थे. बाहर अंधेरा हो चुका था.
तभी सेठ
जी ने बोला
की हमे
आरती के लिए गाव के
बाहर लगभग 2 घंटे का सफ़र
करके मंदिर जाना है जहाँ आज
बहू आने की
खुशी मे
माताजी की
पूजा रखी है.
मैने पूछा “सेठ जी
अभी तो 8 बज चुके
है और 2 घंटे का सफ़र मतलब
10 बज जाएँगे ”
तो सेठ जी बोले “हाँ
पर पूजा का शुभ मुहूरत रात 11
बजे का है जो साल मे दो
ही बार आता है तो
हमे जाना ही पड़ेगा ”
हम लोग फिर सब उस बड़े कमरे
से बाहर आ गये और खाना खाने
के बाद सब लोग जैसे कि मुझे पता
था सब लोग पूजा के लिए निकलने
वाले थे
ठीक से लाइट
नही होने के कारण
किसी के चेहरे अच्छे
से नही दिख रहे थे.
फिर सब लोग 3 गाडियो मे बैठ गये.
लग भग 8.30 बज चुके थे.
मेरी गाड़ी
मे ड्राइवर जो आगे बैठा जिसके साथ
सेठ जी बैठे थे. मैं
बीच मे राव साब,
वकील बाबू और
कॉंट्रॅक्टर बाबू के साथ बैठ गया
और पीछे 2 बहू
जिनको मैं देख नही पा
रहा था और समझ
नही पा रहा था कि
कौन किसकी
बीवी है
वो और 2 नौकरानी के
साथ बैठ गयी. आज
चौथी गाड़ी
मे खराबी होने के
कारण 1 कार और 2
बड़ी गाडिया
ही
निकाली थी
और सब लोग दबकर बैठे थे
सब गाड़िया निकल पड़ी
और कच्चे रास्ते से पक्के रास्ते पे
लग गयी…
गाड़ी की
लाइट खराब होने के कारण किसिको
कुछ नही दिख रहा
था, कभी
कभी 5 मिनट बाद कोई
गाड़ी सामने से
जाती तो
थोड़ी लाइट आ
जाती.. लगभग 15
मिनट के बाद हम ने देखा कि
हमारे साथ जो कार थी
वो रास्ते मे एक बाजू
खड़ी है और देखा कि
उसमे बैठे सब लोग बाहर खड़े हैं
…हम उतर गये और देखा तो
गाड़ी का टाइयर पंक्चर
हो गया था
सेठ जी आगे जाके बोले
“साले तुम लोग कभी
नही सुधरोगे मैं
10-15 दिन शहर क्या चला गया
तुम लोगो ने गाडियो की
देख भाल करनी छोड़
दी”
इतना कह के सेठ जी
ने बोला कि सब लोग
बाकी बची
2 गाडियो मे अड्जस्ट हो जाओ
फिर सेठानी सेठ
जी की
बगल मे हमारी
गाड़ी मे बैठ
गयी… और उनके साथ
वाली बहुए
दूसरी गाड़ी
मे बैठ गयी
अभी सिर्फ़
वकील बाबू
की लड़की
बची थी,
तभी कॉंट्रॅक्टर बाबू
बोले “तुम हमारी
गाड़ी मे आ जाओ”
और उसे हमारी
गाड़ी मे ले लिए
पीछे भी
जगह नही
थी और आगे पूजा का
बहुत सारा समान था , सेठ
जी सेठानी
के बैठने के कारण उधर
भी पॅक हो गया था.
फिर वकील बाबू बोले
“आओ बेटी मेरे उपर
बैठ जाओ”
वकील बाबू
की लड़की
उनकी गोद पे बैठ
गयी. जो मेरे से दो
सीट दूर बैठे थे. फिर
गाड़ी चालू हुई और
आगे का सफ़र कटने लगा
मुझे नींद
नही आ
रही थी
लेकिन मैने आखे बंद कर
ली और सोने
की कोशिश करने लगा,
थोड़ी देर होते
ही मुझे
थोड़ी हलचल
सी लगने
लगी, मैं क्या हो रहा
है ये देखने की
कोशिश करने लगा लेकिन जैसे कि
पूरा अंधेरा था क्या हो रहा है
समझ नही आ रहा
था…मैने सोने का नाटक चालू
ही रखा था
तभी सामने से एक
गाड़ी गयी
और गाड़ी के अंदर
थोड़ी सी
रोशनी हुई तो मैने देखा
कि, वकील बाबू
की लड़की
की पॅंटी
नीचे
सर्की हुई है और
उसकी चुचिया पे राव
साब के हाथ है, इधर कॉंट्रॅक्टर
बाबू का तंबू बना दिख रहा था और
हलचल अभी ज़रा
ज़्यादा तेज़ होते हुए दिखने
लगी… मुझे
अभी अंधेरे मे
भी थोड़ा थोड़ा दिखने
लगा था …राव साब के हाथ
वकील बाबू
की लड़की
को दबा रहे थे और
वकील बाबू
नीचे से अपने लंड को
कुछ कशमकश के साथ अड्जस्ट
कर रहे थे जो कि हो
नही रहा था ऐसे
उनके चहरे से भाव दिख रहे थे,
मैने गाड़ी के काँच पर
अपना सर टिका दिया, थोड़ा सा आगे
सरक गया और अपना सर आगे से
नीचे करके ..और
चुपके से एक आँख खोल के
तिरछी नज़र से देखने
लगा…..
वकील बाबू
की लड़की
की पॅंटी
नीचे तक सरक
गयी थी,
और कॉंट्रॅक्टर बाबू अपने हाथ से
अपने तंबू को रगड़ रहे थे.
अचानक से
आआआआआआअह…….
की आवाज़ आई
किसी ने ध्यान
नही दिया, सबको लगा
गाड़ी ने धक्का खा लिया
इसलिए किसी के मुँह
से निकली
होगी परंतु वो आवाज़
वकील बाबू का लंड
अपनी
बेटी की
चूत के अंदर जाने के वजह से
निकली
थी… मुझे
अभी थोड़ी
थोड़ी
बारीकी से
आह… आह… की
आवाज़ सुनाई देने लगी
…. उधर रावसाब भी
अपने तंबू को हिला रहे थे और
वकील बाबू
की बेटी
की चुचियो को चुपके से
सहला रहे थे.

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