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निर्जन टापू पर
10-02-2016, 02:58 AM
Post: #1
निर्जन टापू पर
यह उस ज़माने की बात है जब समुद्र यात्रा को अत्यंत खतरनाक माना जाता था .और धनी लोगों व्यापारियों और साहसी लोगों के लिए ही उपयुक्त माना जाता था .खतरे कई तरह से आते थे जिनका अनुमान लगाना भी करीब करीब नामुमकिन था .मौसम का पूर्वानुमान लगाना न केवल दुसाध्य था बल्कि मौसम की जानकारी हासिल करने के उपकरणों के अभाव में जानकारी ही नहीं हो पाती थी.उष्णकटिबंधीय तूफान के उठने और आगे बढ़ने के बारे में जानकारी देने की व्यवस्था अपनी शैशवावस्था में थी जिससे शायद ही कभी किसी को चेतावनी मिली थी।

प्रशांत क्षेत्र में यह दो मस्तूलो वाला व्यापारी जहाज ,एक घातक समुद्री तूफ़ान में फंस गया और तूफ़ान की उत्ताल लहरों द्वारा घन्टो बुरी तरह से उछाला और पटका जाता रहा .दस दिन पूर्व सैन फ्रानिसको से चलने से पूर्व किसी को ऐसे तूफ़ान की सूचना तक न थी . तूफ़ान इतना घटक और विनाशकारी था की यदि किसी प्रकार से चालक दल को टेलीग्राम से सूचना मिल जाती तो भी इस भयावह और विनाश कारी तूफ़ान से जहाज को बचाना करीब करीब नामुमकिन था .जहाज निकटतम गहरे समुद्री बंदरगाह से हजारो किमी दूर खुले प्रशात महासागर में आगे फिलीपीन्स की ओर बढ़ रहा था यद्यपि उसकी गति काफी अच्छी थी पर तूफ़ान की तुलना में कुछ भी नहीं थी .


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10-02-2016, 02:58 AM
Post: #2
RE: निर्जन टापू पर
किसे पता था कि आकाश में होने वाली हलचल इतना विकराल रूप धारण कर लेगी। जल में उठने वाली लघु -लहरियाँ कुछ ही समय में अन्धकार आँधियो में घिर कर बिजलियाँ नर्तन करेंगी और ज्वालामुखी के सामान भीषण विष्फोट से उद्वेलित सागर को कम्पायमान कर सब कुछ विस्मृति के गर्भ में विलीन हो जाएगा। सागर के इस मदमत्त रूप की कल्पना करना भी संभव नहीं था।
इस प्रलय जलधि में वह पोत सिंधु की गरजती लहरियों पर सवार मदमत्त हाथी के सामान उन फें उगलती लहरों से लोहा ले रहा था। पर कब तक यह क्रीड़ा चलने वाली थी ?
लहरे अठखेलिया करती व्योम को चूम रही थी और तड़ित -जांझवात से उठाने वाली चपलाये मानो नाच कर रही थी और उनसे उठने वाली ज्वालायें आकाश से सीधी झड़ी से शांत हो उस विशाल जलधि में विलीन हो रही थीं सागर के जलचर उस विकल सागर से निकलते और उतरा कर पुनः उसी में समा जाते थे। और जीवन की इस मृग -मरीचिका में , क्रुद्ध सिंधु की तरंगाघातो की मार से आहात किसी बड़े कछुए के सामान डूबता -उतरता इस निर्जन टापू के किनारे आ लगा था।

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10-02-2016, 02:59 AM
Post: #3
RE: निर्जन टापू पर
चालीस वर्ष की आयु की माँ से मिलने उसका पुत्र उसका पुत्र आने वाला था । परिस्थितियों वश कई वर्षो पूर्व से वह अपने पिता के साथ रह रहा था । उसका विवाह -विच्छेद अपने पति से कई वर्ष पहले हो चुका था फिर भी यह एक डोर उन्हें बांधे थी जिसके चलते यद्यपि दोंनो आलग हो चुके थे किन्तु फिर भी जली हुई रस्सी के तरह उनके बीच शायद कुछ बाकी था जिसके चलते ही शायद उनका बेटा अपनी माँ से मिलने आया था। और पिता ने माँ -बेटे के लिए लिए घूमने की व्यवस्था के तहत इस दो मस्तूल वाले जहाज में व्यवस्था की थी । जिससे उनके रिश्ते सामान्य रहे और माँ -बेटे को किसी प्रकार से अपने बीच किसी प्रकार की कमी न महसूस हो ।


किसको पता था कि होनी को क्या मंजूर है और व जहाज तूफ़ान में फंस कर नेस्तनाबूद हो जाएगा और दुर्भाग्य उन्हें इस निर्जन टापू पर ला पटकेगा .पर शायद टापू के देवता उन पर मेहरबान थे ,इस बड़े द्वीप परकई तरह के फल ,मछलियां तथा होने वाली बरसात के चलते पीने के पानी के धाराएं थी .नाना -प्रकार के पक्षी तो थे किन्तु पशुओं का अभाव था .आकाश मे उड्ने वाले पक्षियो कलरव से ही उस द्वीप की नीरवता भंग होती थी इस स्वप्न से झिलमिल संसार मे आशा और व्याकुलता का खेल निरंतर चलता था । हर रात्रि के पश्चात ,नव प्रभात उत्साह की किरण के साथ जीवन का पुलकित प्रवाह लाने की कोशिश करता था । पर उस असीम नीले अंचल की नीरवता जीवन की लालसा को कुछ कम कर ही देती थी ।
उनको उम्मीद थी की शायद कोई उन्हें बचाने जरूर आएगा .जिसके चलते वे समुद्र के किनारे बार - बार जाते ।

धीरे -धीरे वे इसके अभ्यस्त होते जा रहे थे ,.दिन पर दिन बीतते चले जा रहे थे ,किन्तु आशा की कोई किरण दृष्टिगोचर नहीं हुई

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10-02-2016, 02:59 AM
Post: #4
RE: निर्जन टापू पर
उनको उम्मीद थी की शायद कोई उन्हें बचाने जरूर आएगा .जिसके चलते वे समुद्र के किनारे बार - बार जाते .

धीरे -धीरे वे इसके अभ्यस्त होते जा रहे थे ,.दिन पर दिन बीतते चले जा रहे थे ,किन्तु आशा की कोई किरण दृष्टिगोचर नहीं हुई तीन वर्ष बीत चुके थे किन्तु अब तक उन्हें किसी लड़ाकू जहाज के मस्तूल तक के दर्शन नहीं हुए थे और न ही किसी हवाई जहाज चमक ही दिखी थी अब तक उन्होंने मान लिया था की शायद अब उनके नसीब में ,अब यहीं मिट्टी में मिल जाना होगा .
ये तीन साल द्वीप पर अच्छे ही बीते थे ,माँ -बेटे के संबंधो में जो एक दूरी थी उसे यहाँ के एकाकीपन ने दूर कर दिया था ,उनके अलावा था भी कौन ?उनके रिश्तो में प्रगाढ़ता आ गयी थी और द्वीप के वातावरण तथा खाने -पीने की वस्तुओ के प्रचुरता के चलते तथा वातावरण की शुद्धता के कारण उनका स्वास्थ्य भी अच्छा था

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10-02-2016, 03:02 AM
Post: #5
RE: निर्जन टापू पर
नीरवता की गहराई में मग्न
चालीस की वय में वह थोड़ी बेडौल तथा भारी हो चुकी थी। किन्तु पिछले तीन वर्षो में उसकी काया में अद्भुत निखार आ चुका था और वह खूबसूरत से कम कहलाने से काफी आगे निकल चुकी थी। वास्तव में ,इन तीन वर्षो की आयु बढ ने के स्थान पर शायद कम हुई थी। सतत फलों और मछलियों के आहार से तथा दिन भर के कई मील के आवागमन से उसके बदन का छरहरापन वापस लौट आया था और अंग -अंग में कसाव झलकता था। शरीर पर विद्यमान वस्त्रों का क्षरण कब का हो चुका था अब तो टापू पर उगने वाली रेशेदार वनस्पति लज्जा ढकने के उपाय मात्र थे।

पुत्र यद्यपि वयस्क हो चुका था। प्रायः वे तरह तरह के खेल खेला करते थे। तीसरे वर्ष उसने महसूस किया की अब वह उसके शरीर को दूसरी नजर से से देखा करता था और उसके शरीर के अंगो की तारीफ भी करता था । उसकी परखी नजरो ने उसकी नजरो के बदलाव को ताड़ लिया था। उसकी नजरे उसके वक्षस्थल और कदली साम्भ सी जंघाओ का प्रायः अनुसरण करता पाती थी और बात बदल कर उसका ध्यान हटाने का प्रयास करती थी।
अपने ही पुत्र के इस तरह के देखने से उसके भी बदन में झुनझुनी उठने लगती थी ,पर वह स्वयं को भी सयंत करने का भरसक प्रयास करती थी। साथ में पुरुष के होने का अहसास उसके तन बदन में रोमांच और सनसनाहट से अभिसिक्त कर देता थायद्यपि वह उसका ही जाया था।



वह अपने पुत्र के भरपूर शरीर की छवि निहार कर प्रायःमन में उठने वाले वर्जित विचारो से संघर्षरत रहती थी और इस तरह के वर्जित विचार न उठे इसका भपूर प्रयास करती थी विशेषकर जब वह नहाकर आता था। तब उसका दमकता हुआ बदन उसे अपने पति की जवानी के छवि को आमूर्त कर देता था और तब उसके मन के मचलते अरमान उसे अन्दर तक झंकृत कर ही देते थे और तब उसको अपने मन के विचलित होने पर विषाद होता था और वह किसी तरह से अपनी इस मनःस्थिति से किसी तरह निकल पाती थी। स्थिति तब और कठिन हो जाती थी जब नहाने तैरने या मछली मारते समय उसका अंग दिख जाता था तब उसकी चूत में चींटिया घूमती हुई मालूम पड़ती थी और इससे छुटकारा पाने के लिये उसे रात के अँधेरे का ही एकमात्र सहारा होता था और तब उसका मन उसे धिक्कारता था माँ होके भी वह इस तरह कैसे विचलित हो जाती है।
किन्तु अब यह वर्जित इच्छाए दिन पर दिन छुप कर चुपचाप अपना आकार बढ़ा रही थी। और उसके पुत्र का उसके प्रति आकर्षण सामने आ गया जब वह नहा रही थी और उसका वक्षस्थल सूरज की किरणों से दैदीप्यमान था ।

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10-02-2016, 03:02 AM
Post: #6
RE: निर्जन टापू पर
चालीस की वय में वह थोड़ी बेडौल तथा भारी हो चुकी थी। किन्तु पिछले तीन वर्षो में उसकी काया में अद्भुत निखार आ चुका था और वह खूबसूरत से कम कहलाने से काफी आगे निकल चुकी थी। वास्तव में ,इन तीन वर्षो की आयु बढ ने के स्थान पर शायद कम हुई थी। सतत फलों और मछलियों के आहार से तथा दिन भर के कई मील के आवागमन से उसके बदन का छरहरापन वापस लौट आया था और अंग -अंग में कसाव झलकता था। शरीर पर विद्यमान वस्त्रों का क्षरण कब का हो चुका था अब तो टापू पर उगने वाली रेशेदार वनस्पति लज्जा ढकने के उपाय मात्र थे।

पुत्र यद्यपि वयस्क हो चुका था। प्रायः वे तरह तरह के खेल खेला करते थे। तीसरे वर्ष उसने महसूस किया की अब वह उसके शरीर को दूसरी नजर से से देखा करता था और उसके शरीर के अंगो की तारीफ भी करता था । उसकी परखी नजरो ने उसकी नजरो के बदलाव को ताड़ लिया था। उसकी नजरे उसके वक्षस्थल और कदली साम्भ सी जंघाओ का प्रायः अनुसरण करता पाती थी और बात बदल कर उसका ध्यान हटाने का प्रयास करती थी।
अपने ही पुत्र के इस तरह के देखने से उसके भी बदन में झुनझुनी उठने लगती थी ,पर वह स्वयं को भी सयंत करने का भरसक प्रयास करती थी। साथ में पुरुष के होने का अहसास उसके तन बदन में रोमांच और सनसनाहट से अभिसिक्त कर देता थायद्यपि वह उसका ही जाया था।



वह अपने पुत्र के भरपूर शरीर की छवि निहार कर प्रायःमन में उठने वाले वर्जित विचारो से संघर्षरत रहती थी और इस तरह के वर्जित विचार न उठे इसका भपूर प्रयास करती थी विशेषकर जब वह नहाकर आता था। तब उसका दमकता हुआ बदन उसे अपने पति की जवानी के छवि को आमूर्त कर देता था और तब उसके मन के मचलते अरमान उसे अन्दर तक झंकृत कर ही देते थे और तब उसको अपने मन के विचलित होने पर विषाद होता था और वह किसी तरह से अपनी इस मनःस्थिति से किसी तरह निकल पाती थी। स्थिति तब और कठिन हो जाती थी जब नहाने तैरने या मछली मारते समय उसका अंग दिख जाता था तब उसकी चूत में चींटिया घूमती हुई मालूम पड़ती थी और इससे छुटकारा पाने के लिये उसे रात के अँधेरे का ही एकमात्र सहारा होता था और तब उसका मन उसे धिक्कारता था माँ होके भी वह इस तरह कैसे विचलित हो जाती है।
किन्तु अब यह वर्जित इच्छाए दिन पर दिन छुप कर चुपचाप अपना आकार बढ़ा रही थी। और उसके पुत्र का उसके प्रति आकर्षण सामने आ गया जब वह नहा रही थी और उसका वक्षस्थल सूरज की किरणों से दैदीप्यमान था ।

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10-02-2016, 03:02 AM
Post: #7
RE: निर्जन टापू पर
चालीस की वय में वह थोड़ी बेडौल तथा भारी हो चुकी थी। किन्तु पिछले तीन वर्षो में उसकी काया में अद्भुत निखार आ चुका था और वह खूबसूरत से कम कहलाने से काफी आगे निकल चुकी थी। वास्तव में ,इन तीन वर्षो की आयु बढ ने के स्थान पर शायद कम हुई थी। सतत फलों और मछलियों के आहार से तथा दिन भर के कई मील के आवागमन से उसके बदन का छरहरापन वापस लौट आया था और अंग -अंग में कसाव झलकता था। शरीर पर विद्यमान वस्त्रों का क्षरण कब का हो चुका था अब तो टापू पर उगने वाली रेशेदार वनस्पति लज्जा ढकने के उपाय मात्र थे।

पुत्र यद्यपि वयस्क हो चुका था। प्रायः वे तरह तरह के खेल खेला करते थे। तीसरे वर्ष उसने महसूस किया की अब वह उसके शरीर को दूसरी नजर से से देखा करता था और उसके शरीर के अंगो की तारीफ भी करता था । उसकी परखी नजरो ने उसकी नजरो के बदलाव को ताड़ लिया था। उसकी नजरे उसके वक्षस्थल और कदली साम्भ सी जंघाओ का प्रायः अनुसरण करता पाती थी और बात बदल कर उसका ध्यान हटाने का प्रयास करती थी।
अपने ही पुत्र के इस तरह के देखने से उसके भी बदन में झुनझुनी उठने लगती थी ,पर वह स्वयं को भी सयंत करने का भरसक प्रयास करती थी। साथ में पुरुष के होने का अहसास उसके तन बदन में रोमांच और सनसनाहट से अभिसिक्त कर देता थायद्यपि वह उसका ही जाया था।



वह अपने पुत्र के भरपूर शरीर की छवि निहार कर प्रायःमन में उठने वाले वर्जित विचारो से संघर्षरत रहती थी और इस तरह के वर्जित विचार न उठे इसका भपूर प्रयास करती थी विशेषकर जब वह नहाकर आता था। तब उसका दमकता हुआ बदन उसे अपने पति की जवानी के छवि को आमूर्त कर देता था और तब उसके मन के मचलते अरमान उसे अन्दर तक झंकृत कर ही देते थे और तब उसको अपने मन के विचलित होने पर विषाद होता था और वह किसी तरह से अपनी इस मनःस्थिति से किसी तरह निकल पाती थी। स्थिति तब और कठिन हो जाती थी जब नहाने तैरने या मछली मारते समय उसका अंग दिख जाता था तब उसकी चूत में चींटिया घूमती हुई मालूम पड़ती थी और इससे छुटकारा पाने के लिये उसे रात के अँधेरे का ही एकमात्र सहारा होता था और तब उसका मन उसे धिक्कारता था माँ होके भी वह इस तरह कैसे विचलित हो जाती है।
किन्तु अब यह वर्जित इच्छाए दिन पर दिन छुप कर चुपचाप अपना आकार बढ़ा रही थी। और उसके पुत्र का उसके प्रति आकर्षण सामने आ गया जब वह नहा रही थी और उसका वक्षस्थल सूरज की किरणों से दैदीप्यमान था ।

अब माँ तो छोड़ कर बेटा भी माँ के प्रति आसक्त होता जा रहा था और लाख कोशिश के बाद भी वर्षा के पास कोई चारा नहीं था की वो उसके बेटे का उसके प्रति नजरिये को बदल पाये

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10-02-2016, 03:03 AM
Post: #8
RE: निर्जन टापू पर
आखिर लगाम लगाती भी कब तक क्योकि कपडे गायब हो रहे थे पर माँ बेटे पर जवानी के कसाब बड रहे थे !
दोनों की नजर एक दुसरे के प्रति बदल रही थी पर दोनों ही रिश्ते को बचाने के प्रयास मैं अपनी इच्छाओ को लगातार मारे जा रहे थे पर आखिर कब तक कुछ तो होना था
इसे कुछ अच्छा कहे या समाज की नजरो मैं अनर्थ पर क्या हो सकता था की उन्हा उनको रोकने के लिए इन्सान तो इन्सान भगवान भी नहीं थे उस निर्जन टापू पर फिर क्या पता वर्षा की किस्मत मैं ऊपर वाले ने क्या लिखा था
वर्ना जो माँ आज पहली बार अपने बेटे से मिलकर घुमने निकली थी और जिस जहाज पर वो दोनों सवार थे वो जहाज डूब जाता है ! और बचते है तो केवल वर्षा और उसका बेटा अतुल क्या वो दोनों अब इस परिस्थिति से बचने का प्रयास नहीं करेंगे !
पर करंगे तो क्या और कब तक वर्षा अपनी जवानी जो ४० की होने पर भी सलमान की तरह जवान हो रही थी जबकि अतुल तो अभी पूर्ण कुवारा था जिसने अब तक बेरी के बेर तक नहीं छुए थे !
पर ये कमीनी जवानी बड़ी हरामी है जो ललचाये तो तडपाये तो और तो और सारा ज्ञान भी शिखा देती है !

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10-02-2016, 03:05 AM
Post: #9
RE: निर्जन टापू पर
नियमित रूप से पर, मां या बेटा निकट स्थित एक निर्जन मीठे पानी के तालाब में
स्नान के लिए जाते थे । एक छोटे से झरने से उस तालाब में निरंतर जल प्रवाह बना रहता था आस - पास चट्टानें थी जो पानी के भीतर तक फ़ैली थी और कई बार उनकी आड़ में दोनों ही एक साथ स्नान कर लेते थे। वास्तव में झरने में नहाने का लुत्फ़ ही कुछ और है और झरने से बहने वाले पानी ने सैकड़ो सालो में उस तालाब को यह रूप दिया था
एक दिन वह अकेले ही स्नान का आनन्द लेने के लिए चल दी। कमर तक पानी में जाने के बाद उसने झरने की ओर रूख किया उअर उसके नीचे पहुँच कर पानी में कई डुबकियाँ लगाई और और अपने चहरे पर आये हुए बालों को झटका तो झाड़ियों के बीच से उसके बेटे की झलक दिखी। वह स्तब्ध रह गयी। पर ,उसने सोचा कि प्रतिक्रया करना ठीक नहीं होगा और न ही यह जताना ठीक होगा की उसने उसे देखते हुए देख लिया है। पर एक सनसनी सी उसके बदन को हिला गयी ,उसने महसूस किया की उसके भीतर से कुछ गरम सा उठ रहा है और पैरो की और जा रहा है। उसका मन इस स्थिति से अंतर्द्वद्व कर रहा था कि एक ओर उसे यह चिंता सता रही थी की उसका बेटा उसे देख रहा था और दूसरी ओर उसके देखने से वह उत्तेजित हो गयी थी।
इस अंतर द्वंद्व में आखिर विजय उसकी कामना की हुई और उसने कुछ निश्चित किया।

उसके मन में यह तथ्य है कि वह दोनों चिंतित और उत्साहित हैं कि रोबी उसे देख रहi है वह समय के साथ संघर्ष-रत । उसकी इच्छाओं की जीत के रूप में वह एक निर्णय करती है।
वह अपने पुत्र की तरफ आकर्षित तो हो रही थी पर उसे जताना नहीं चाहती थी ,इस लिए वह अपनी नजरे नीचे ही किये हुए थी जिससे उसे इसका आभास भी न हो सके।
वह अपने बालों से खेलने लगी ,फिर थोड़ी देर पानी टपक जाने के बाद वह उन्हें निचोड़ने का उपक्रम करने लगी जिससे उअसके उसके उरोज आंदोलित और आलोड़ित हो रहे थे। अब उसने अपने हाथ पीछे ले जा कर उनका जूडा बनाने लगी ,इससे उसका वक्षोरोज बाहर के ओर और अधिक फ़ैल गए ,इस सब में उसने समय लगाया जिससे उसका पुत्र और अधिक समय तक उसको देख सके।

अब उसने अपने शरीर को रगड़ना आरम्भ किया सबसे पहले आगे झुक कर अपना चेहरा साफ़ करने लगी इससे उसके उरोज अपने समग्र आकार में अपनी मादकता बिखेर रहे थे। हिलाने से उनमे उठाने वाली लहरों की सुन्दरता का अनुमान लगाना कठिन नहीं है । इसके बाद उसने अपने हाथों में पानी भर कर अपनी गर्दन और पीठ पर डालने लगी जिससे उसके स्तन पूरी तरह से लहरा जाते थे। काफी समय तक यह सब करने के पश्चात उसने पानी में डुबकी लगाई और अदा के साथ अपने स्तनों को एक बार फिर उद्भासित किया।

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10-02-2016, 03:06 AM
Post: #10
RE: निर्जन टापू पर
जिससे उसके विशाल उरोज झटके के साथ फ़ैल कर कामुकता को बढ़ा देते हैं वह यह सन अत्यंत मंद गति से करती है कि उसका बेटा इस सब को देख सके .इसके पश्चात् वह अपने उरोजो को उद्भासित करते हुए ,पाने की सतह के ऊपर से कम्पित होते उरोजों के साथ पास की पत्थर की चट्टान पर उस आवरण को रख देती हैइसके पश्चात वह अपने बदन को रगड़ -रगड़ साफ़ करती है इसके लिए वह रेशों से बुने ब्रश का सहारा लेती है और अपने पेट वक्ष व उरोजो को इससे रगड़ती है और साथ ही तेजी से बीच -बीच में डुबकी भी लगा लेती है जिससे उसके उरोज पानी के ऊपर उछल कर आते दीखते है यह जानते हुए की ऐसा करना उसके बेटे का ध्यान अवश्य ही आकर्षित करेगा और उसे आनंद भी देगा .

इसके बाद वह अपने निचले हिस्से के आवरण को भी उसी मंद गति से हटा ती है और उपरी आवरण के पास रखने जाती है और वापस आ कर इस तरह से निम्न भाग को रगड़ कर धोती है कि इसक बेटा उसके नितम्बों का भी रसास्वादन कर सके .

वह जा न रही है कि जो हो रहा है वह गलत है फिर भी ,यह सब अभी इतना आनंद दायक प्रतीत हो रहा है किईसको अभी इसी समय रोक पाना नामुमकिन लगता है

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