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कमीना चाहे नगीना चोदना
02-24-2017, 06:58 PM
Post: #11
RE: कमीना चाहे नगीना चोदना
बिंदिया मुस्करा के बोली "ऐसे जाम बदल के पीने से प्रेम बढ़ता है काका जी, हमरी जौनपुर की मौसी कहती थी. चलिए पीजिये न जल्दी से "

काका ने धीमे से सर हिला के एक सांस में ही वो मोहिनी शर्बत अपने कंठ में उतार लिया,।

शरबत के कंठ से उतरते ही एक भीनी मादक सुगंध ने नासिका से आत्मा तक काका का सब कुछ महका दिया।
काका की आँखे स्वयं ही बंद होती चली गई, अंग अंग में एक दिव्य ऊर्जा का आभास होने लगा, काका के निर्मल चित में काम रूपी ज्वाला धधक उठी, उसकी साँसे भारी हो चली, और काका का चेहरा कामरूपी ज्वाला से रक्तिम हो धधक उठा, काका ने धीरे से आँखे खोल के बिंदिया की तरफ देखा और हल्का सा मुस्कराया।

बिंदिया ने अपना सुर्ख निचला होठ अपने मोती रूपी दांतो तले दबा के धीरे से मादक स्वर में पूछा "क्या हुआ जी "

"क्या हुआ जी " इतना सुनते ही काका के ह्रदय में एक अनबुझी सी प्यास और एक असीम तृप्ति का भाव एक साथ जागने लगा..काका बिंदिया की नशीली आँखों में देखता हुआ बोला "बिंदिया जी बड़ा अच्छा सा लग रहा, हल्का सा नशा महसूस हो रहा है, "

बिदिया ने अपनी नशीली आँखों को झपकाते हुये अपनी एक भौह हल्की सी उठाई, और बड़ी अदा से पूछा "किस तरह का नशा महसूस कर रहे है आप, और धीरे से काका की जाँघ पे अपना एक हाथ रख दिया,

बिंदिया का कोमल हाथ अपनी जांघ पे महसूस होते ही काका के जिस्म में आतिशवाजी होने लगी, और उसकी साँसे तीव्र गति से चलने लगी।

काका की चेतना पर बस बिंदिया का ही अधिकार हो गया और अनायास ही काका ने अपना कंपकपाता हाथ बिंदिया के हाथ के ऊपर रख धीरे से बुदबुदाया "जी आपका "।

काका के मन में मानव जीवन का असली रहस्य, कामुकता और डर का एक विचित्र मिश्रण हिंडोले ले रहा था। भीतर धोती में काका का लिंग अपनी एकलौती आँख खोल के ताव में आ गया था और उसके तैश के सामने बेचारी धोती का कपड़ा कमज़ोर पड़ रहा था। काका का लिंग अब मुस्तैदी से उठता हुआ आसमान को सलामी दे रहा था।

काका के हाथ को अपने हाथ पर देख बिंदिया के अधरों पर एक रहस्यमय नशीली मुस्कान फैल गयी और उसने आगे बढ़ते हुए अपना सर काका के कंधे पर रख कर आपने आँखे मुंद ली, यह देख एक मीठी सी गजल काका के अंतर्मन में घुलने लगी थी।

बिंदिया का सर अपने कंधे पे देख के काका जी के तो टट्टे ही शार्ट हो गए, उसकी सांस फूलने लगी और बड़ी मुश्किल से अपनी सांसो पर काबू करने की कोशिश करने लगा।

तभी काका की नजर बिंदिया के मोहक चेहरे पर उन उभरे हुए सुर्ख रक्तिम अधरों पर पड़ी जो हल्के से थरथरा रहे थे ऐसा लग रहा था की बस अभी शहद टपक पड़ेगा, काका का गला सूख गया और उसके मन मस्तिक्ष ने उसका साथ छोड़ दिया था, उसकी नजर उन सुर्ख अधरों से और नीचे बिंदिया की सुराहीदार गर्दन पर आई, गर्दन की हँसुली पर बना एक नन्हा सा तिल काका को चिड़ा रहा था, काका की नजर और निचे गयी, जंहा दो मतवाले सुंदर उन्नत गुलाबी उरोजो की गहरी घाटी को देखते ही काका सुन्न पड़ गया, जवान तालू से चिपक गयी, पूरा शरीर थरथर कम्पन करने लगा, और काका के लिंग में रक्त संचार तेज गति से होने लगा, काका को लगा उसके लिंग और आंड में विस्फोट हो जायेगा।

बिंदिया को काका के शरीर की कंपकपाहट महसूस होइ तो उसने अपनी नशीली आँखे खोल काका की तरफ देखा और अपने अधर काका की तरफ बढ़ा के मादक स्वर में पूछा "क्या हुआ काका जी " और बिंदिया के हाथ उठकर काका की पीठ पर बन्ध गए।

काका को अपने चेहरे पर बिंदिया की गर्म सांसे महसूस हुई और काका की आँखे आनन्द अतिरेक से मूंद गयी, एक भीनी मादक सुगंध काका के भीतर उतरती चली गयी, काका को लगा वो अब अपनी सुध खो बैठेगा , मन ही मन काका भगवान् को याद करने लगा लेकिन ऐसी स्थिति में आपका मन आपको भटकाके फिर उलझा देता है बस यही हुआ .........

काका के अधर स्वयम ही बिंदिया के अधरों से जा मिले , एक रेशमी एहसास अधरों से घुलता हुआ , एक अजीब सी उत्तेजना के साथ काका के शरीर में उतरता चला गया,

तभी बाहर आंगन में बादलो की एक तेज घड़घड़ाहट के साथ रिमझिम बारिश का आगमन हुआ मानो आकाश भी काका के साथ ख़ुशी में झूम उठा.

एक तूफ़ान के आने की तैयारी कहें या एक चैतन्य खजुराहो के दर्शन का भाव, काका के अधरों ने बिंदिया के अधरों के साथ उसके उन्नत उरोजो की घाटी के पोर पोर को चूमना शुरू कर दिया..

बिंदिया के उन्नत उरोजो का हर हिस्सा, एक अमृत कुण्ड में परिवर्तित हो गया। जिसकी मिठास में डूब काका स्वयम् को.. उस समय जगत में सबसे सौभाग्य शाली मान रहा था। पोर पोर अमृत पान करते हुए जब अधर अचानक उन उरोजो के मध्य में जाकर ठहर गए..

एक भीनी मादक सुगंध ने नासिका से आत्मा तक सब कुछ महका दिया। काका की जीभ ने जैसे ही दिव्य घाटी को स्पर्श किया... एक मीठी सी सिसकारी बिंदिया के होंठों से छूटी और और उसका सारा बदन थरथराने लगा।

यह काका के लिए बहुत ही खास अनुभव था, एक ऐसा सुख जिस पर जीवन न्योछावर किया जा सकता था।


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